Saturday, December 27, 2014
एक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है
संसार की शय का इतना ही फसाना हैएक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है
ये राह कहां से है, ये राह कहां तक है
ये राज कोई राही समझा है ना जाना है।।।
उफ! आज कार में बज रहे इस गाने ने न जाने मुझे क्यों धुंध के उस आगोश में पहुंचा दिया है, जहां मैं खुद को बेहद अपचरिचित सा महसूस करता हूं। जिंदगी की सार्थकता तो इसी में है कि आप धुंध में न पहुंचे। पर जिंदगी की सच्चाई भी यही है कि बिना इस धुंध में पहुंचे आप जिंदगी को जी नहीं सकते। कुछ इसी तरह की उधेड़बुन से हर पल आपका सामना होता है। देहरादून को छोड़े आज पांच महीने होने जा रहे हैं। जब वहां से विदा ले रहा था तो अपनों के आंखों में आंसू थे। ट्रक पर सामान लादा जा रहा था और मेघ भी बरसने को बेताब थे। मुझे भी ऐसा ही लग रहा था कि कुछ अपना यहां छोड़े जा रहा हूं। एक पल को महसूस हुआ कि धुंध ही तो है नया शहर अंबाला। न कुछ दिख रहा था। न कुछ समझ आ रहा था। राह कहां तक है और कहां तक जाना है, यह सवाल भी पूछा था मेरी जिंदगी के हमसफर मेघा ने। बिल्कुल मन नहीं था उसे कि देहरादून छोड़ कर मैं दूसरी जगह जाऊं। शादी के बाद जब वह पहली बार घर से मेरे भरोसे निकली थी तो देहरादून ही आई थी। उसे एक अलग तरह का प्यार हो गया था इस शहर से। इस शहर के लोग और उनसे मिला अपनापन उसे अंदर तक रुला रहा था। गाड़ी स्टार्ट करते ही यह अपनापन आंसू के रूप में उसकी पलकों तक आ गए। मैं खमोशी से ड्राइव करता हुआ, उसी धुंध के आगोश में समाता चला जा रहा था, जहां बिल्कुल कुछ नहीं दिख रहा था। आज सब कुछ सामान्य है। शहर नया है, पर लोग अपने बन चुके हैं। राह अनजान थी पर आज इससे प्यार हो चुका है। रास्ते की धुंध भी छंट चुकी है। हां यह अलग बात है कि आज सुबह कार में बज रहे गाने के बाद जब शाम में बाहर निकला तो अंबाला की सर्दी का अनोखा रूप देख रहा हूं। धुंध इतनी गहरी है कि आॅफिस के बगल में मौजूद टोयटा का शानदार शो-रूम में भी नजर नहीं आ रहा है। फिर वही धुंध है, फिर वही गाना है....संसार की संसार की शय का इतना ही फसाना है, एक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है।
शिकायतें तो हमें मौसम-ए-बहार से है
शिकायतें तो हमें मौसम-ए-बहार से है
मुनौवर राणा लिखते हैं कि..
थकी-मांदी हुई बेचारियां आराम करती हैं,
न छेड़ो जख्म को बीमारियां आराम करती हैं।
कहां रंगों की आमेजिश (दिखाने) की जहमत आप करते हैं,
लहू से खेलिए पिचकारियां आराम करती हैं।कुछ ऐसी ही स्थिति हो चुकी है झारखंड और जम्मू कश्मीर की राजनीति की। एक जगह गैर आदिवासी मुख्यमंत्री की ताजपोशी की औपचारिक घोषणा हो चुकी है, वहीं दूसरी तरफ जम्मू में गैर मुस्लिम मुख्यमंत्री की खोज और ताजपोशी के लिए तमाम समीकरण बैठाए जा रहे हैं। क्या एक राज्य के विकास को सिर्फ इस बात पर तौला जा सकता है कि एक गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बन जाएगा तो उसके विकास की रफ्तार दोगुनी हो जाएगी। या फिर हिंदु मुख्यमंत्री बन जाने से एक राज्य की तमाम विसंगतियां दूर हो जाएंगी।
मंथन का वक्त है। क्योंकि झारखंड जैसे राज्य की उत्पत्ति के पीछे वही तर्क हैं जो इस वक्त मुख्यमंत्री की खोज में लगाए गए हैं। चौदह साल पहले जब झारखंड राज्य की स्थापना हुई तो उससे पहले लंबा आंदोलन चला। आदिवासियों के नाम से खूब राजनीति हुई। आदिवासियों के विकास, उनके वजूद और उनकी समाज में सहभागिता को लेकर इतने बड़े-बड़े वायदे हुए जो आज तक प्रासंगिक हैं। पर हश्र क्या हुआ, यह किसी से छिपा नहीं है। 14 सालों से राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरते हुए इस छोटे से राज्य ने अब तक नौ मुख्यमंत्री देख लिए।
सिर्फ 23 प्रतिशत आदिवासी आबादी वाले झारखंड का सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य, जो नौ मुख्यमंत्री मिले वे आदिवासी ही थे। आदिवासियों का कितना कल्याण हुआ, यह तो जमीनी स्तर पर वही बता सकते हैं। पर इन्हीं आदिवासियों के नाम से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले एक पूर्व मुख्यमंत्री 25 हजार करोड़ के घोटाले में जेल की हवा तक खा आते हैं। कभी मुंडा, कभी मरांडी और कभी सोरेन के आदिवासी सर नेम से यहां की राजनीति संचालित होती रही। पर विकास का सवाल वहां के आदिवासियों के लिए अभी भी अधूरा ही है। दूसरे राज्यों के र्इंट भट्टे, कल कारखानों और खेतों में मजदूरी करते इन आदिवासियों से पूछा जाना चाहिए कि आदिवासियों के लिए बने स्टेट से उन्हें माइग्रेट क्यों होना पड़ा।
जवाब खोजने के लिए लंबा समय गुजर जाएगा। इसी बीच एक गैर आदिवासी भी 28 दिसंबर को सत्ता की कमान संभाल लेंगे। पर यह सवाल उनका भी पीछा नहीं छोड़ेगा। ठीक उसी तरह जैसे कश्मीर के शासन और वहां की कुर्सी का खेल न तो कभी पूरा विश्व समझ सका है और न भविष्य में समझ सकेगा। एक तरफ जहां राजनीतिक अस्थिरता के बीच झारखंड धीरे-धीरे कई साल पीछे की ओर चलता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक स्थिरता होते हुए भी जम्मू-कश्मीर के हालात सुधरने की बजाय बिगड़ते ही जा रहे हैं। आर्थिक रूप असीम संभावनाओं के बावजूद दिनों दिन कमजोर होते जा रहे इस राज्य के विकास के लिए तमाम समीकरणों का मेल किया और करवाया जा रहा है। गैर मुस्लिम मुख्यमंत्री की खोज को इसी समीकरण का प्रमुख हिस्सा माना जा सकता है। पर यहां भी सवाल वही रहेगा, क्या एक गैर आदिवासी या गैर मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाकर हम उस राज्य को विकास की उन ऊंचाईयों तक ले जा सकेंगे, जिसकी कभी परिकल्पना की गई थी।
जितनी तेजी से जम्मू-कश्मीर में अलगवाद ने अपनी पकड़ मजबूत की है, उतनी ही तेजी से वहां से विकास कोसों दूर चला गया है। एक समय पर्यटन से होने वाली आमदनी ने यहां की जीडीपी ग्रोथ को टॉप टेन तक पहुंचा दिया था। आज हालात ये हैं कि यहां के युवा दूसरे राज्यों में नौकरी के लिए दर-दर ठोकरें खाने को मजबूर हैं। हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि इन युवाओं को दूसरे राज्यों में अजनबियों की तरह देखा और समझा जाता है। मंथन करने की जरूरत है कि आखिर यह स्थिति क्यों आई? क्या सिर्फ एक मजहबी मुखिया को बदल देने से या गैर का तमगा जोड़ देने से दोनों राज्यों की जमीनी हकीकत में कुछ बदवाल आएंगे। क्या दोनों राज्य उस संतोषजनक स्थिति तक पहुंचेंगे जिसके लिए सभी दुआएं कर रहे हैं।
हम भारत के लोग काफी संतोषी और प्रगतिवादी होते हैं। हमें उन सच्चाईयों से लड़ना आता है कि कैसे बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त आता है। पूरे देश में फैले झारखंड और जम्मू-कश्मीर के लोगों को भी शायद इन सियासी बदलावों से काफी कुछ उम्मीदें होंगी। शायद इन्हीं उम्मीदों की कहकशां में किसी ने लिखा है कि ...
नदी पहाड़ों से मैदान में तो आती है,
मगर ये बर्फ पिघलने के बाद आती है।
शिकायतें तो हमें मौसम-ए-बहार से है,
खिजां (पतझड़) तो फूलने फलने के बाद आती है।
मुनौवर राणा लिखते हैं कि..
थकी-मांदी हुई बेचारियां आराम करती हैं,
न छेड़ो जख्म को बीमारियां आराम करती हैं।
कहां रंगों की आमेजिश (दिखाने) की जहमत आप करते हैं,
लहू से खेलिए पिचकारियां आराम करती हैं।कुछ ऐसी ही स्थिति हो चुकी है झारखंड और जम्मू कश्मीर की राजनीति की। एक जगह गैर आदिवासी मुख्यमंत्री की ताजपोशी की औपचारिक घोषणा हो चुकी है, वहीं दूसरी तरफ जम्मू में गैर मुस्लिम मुख्यमंत्री की खोज और ताजपोशी के लिए तमाम समीकरण बैठाए जा रहे हैं। क्या एक राज्य के विकास को सिर्फ इस बात पर तौला जा सकता है कि एक गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बन जाएगा तो उसके विकास की रफ्तार दोगुनी हो जाएगी। या फिर हिंदु मुख्यमंत्री बन जाने से एक राज्य की तमाम विसंगतियां दूर हो जाएंगी।
मंथन का वक्त है। क्योंकि झारखंड जैसे राज्य की उत्पत्ति के पीछे वही तर्क हैं जो इस वक्त मुख्यमंत्री की खोज में लगाए गए हैं। चौदह साल पहले जब झारखंड राज्य की स्थापना हुई तो उससे पहले लंबा आंदोलन चला। आदिवासियों के नाम से खूब राजनीति हुई। आदिवासियों के विकास, उनके वजूद और उनकी समाज में सहभागिता को लेकर इतने बड़े-बड़े वायदे हुए जो आज तक प्रासंगिक हैं। पर हश्र क्या हुआ, यह किसी से छिपा नहीं है। 14 सालों से राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरते हुए इस छोटे से राज्य ने अब तक नौ मुख्यमंत्री देख लिए।
सिर्फ 23 प्रतिशत आदिवासी आबादी वाले झारखंड का सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य, जो नौ मुख्यमंत्री मिले वे आदिवासी ही थे। आदिवासियों का कितना कल्याण हुआ, यह तो जमीनी स्तर पर वही बता सकते हैं। पर इन्हीं आदिवासियों के नाम से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले एक पूर्व मुख्यमंत्री 25 हजार करोड़ के घोटाले में जेल की हवा तक खा आते हैं। कभी मुंडा, कभी मरांडी और कभी सोरेन के आदिवासी सर नेम से यहां की राजनीति संचालित होती रही। पर विकास का सवाल वहां के आदिवासियों के लिए अभी भी अधूरा ही है। दूसरे राज्यों के र्इंट भट्टे, कल कारखानों और खेतों में मजदूरी करते इन आदिवासियों से पूछा जाना चाहिए कि आदिवासियों के लिए बने स्टेट से उन्हें माइग्रेट क्यों होना पड़ा।
जवाब खोजने के लिए लंबा समय गुजर जाएगा। इसी बीच एक गैर आदिवासी भी 28 दिसंबर को सत्ता की कमान संभाल लेंगे। पर यह सवाल उनका भी पीछा नहीं छोड़ेगा। ठीक उसी तरह जैसे कश्मीर के शासन और वहां की कुर्सी का खेल न तो कभी पूरा विश्व समझ सका है और न भविष्य में समझ सकेगा। एक तरफ जहां राजनीतिक अस्थिरता के बीच झारखंड धीरे-धीरे कई साल पीछे की ओर चलता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक स्थिरता होते हुए भी जम्मू-कश्मीर के हालात सुधरने की बजाय बिगड़ते ही जा रहे हैं। आर्थिक रूप असीम संभावनाओं के बावजूद दिनों दिन कमजोर होते जा रहे इस राज्य के विकास के लिए तमाम समीकरणों का मेल किया और करवाया जा रहा है। गैर मुस्लिम मुख्यमंत्री की खोज को इसी समीकरण का प्रमुख हिस्सा माना जा सकता है। पर यहां भी सवाल वही रहेगा, क्या एक गैर आदिवासी या गैर मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाकर हम उस राज्य को विकास की उन ऊंचाईयों तक ले जा सकेंगे, जिसकी कभी परिकल्पना की गई थी।
जितनी तेजी से जम्मू-कश्मीर में अलगवाद ने अपनी पकड़ मजबूत की है, उतनी ही तेजी से वहां से विकास कोसों दूर चला गया है। एक समय पर्यटन से होने वाली आमदनी ने यहां की जीडीपी ग्रोथ को टॉप टेन तक पहुंचा दिया था। आज हालात ये हैं कि यहां के युवा दूसरे राज्यों में नौकरी के लिए दर-दर ठोकरें खाने को मजबूर हैं। हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि इन युवाओं को दूसरे राज्यों में अजनबियों की तरह देखा और समझा जाता है। मंथन करने की जरूरत है कि आखिर यह स्थिति क्यों आई? क्या सिर्फ एक मजहबी मुखिया को बदल देने से या गैर का तमगा जोड़ देने से दोनों राज्यों की जमीनी हकीकत में कुछ बदवाल आएंगे। क्या दोनों राज्य उस संतोषजनक स्थिति तक पहुंचेंगे जिसके लिए सभी दुआएं कर रहे हैं।
हम भारत के लोग काफी संतोषी और प्रगतिवादी होते हैं। हमें उन सच्चाईयों से लड़ना आता है कि कैसे बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त आता है। पूरे देश में फैले झारखंड और जम्मू-कश्मीर के लोगों को भी शायद इन सियासी बदलावों से काफी कुछ उम्मीदें होंगी। शायद इन्हीं उम्मीदों की कहकशां में किसी ने लिखा है कि ...
नदी पहाड़ों से मैदान में तो आती है,
मगर ये बर्फ पिघलने के बाद आती है।
शिकायतें तो हमें मौसम-ए-बहार से है,
खिजां (पतझड़) तो फूलने फलने के बाद आती है।
Saturday, February 22, 2014
इस बार मोहब्बत का कहा मान लिया जाये
इस बार मोहब्बत का कहा
मान लिया जाये
''मेरी भी कोई बात सुनी जाये किसी रोज
मेरा भी किसी रोज कहा मान लिया जाये.
नफरत तो हमेशा हुकूमत में रही है
इस बार मोहब्बत का कहा मान लिया जाये.
महबूब को महबूब ही रहने दिया हमने
क्या ये भी जरूरी है खुदा मान लिया जाये.'
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मोहब्बत की दुनिया कितनी रुमानी है इसे शायद बताने की जरूरत नहीं, यह तो एक ऐसी अता है जिसे हमेशा सजदा करने का दिल करे. पर क्या मोहब्बत और महबूब में फर्क नहीं होना चाहिए? क्या यह जरूरी है कि महबूब को ही खुदा मान लेना चाहिए? यह ऐसे सवालात हैं जिससे मोहब्बत का हर एक अकितमंद जद्दोजहद करता रहता है. जो इससे पार पा गया वो ताउम्र हंसते-हंसाते गुजार लेता है और जो इन उलझनों में डूबता है वह अपने लिए घातक कदम उठा लेता है. यह एक कदम अपनों के लिए कितना संताप भरा होता है, यह देखने को वह इस दुनिया में नहीं रहता है. रह जाती है सिर्फ यादें और उन यादों से लिपटकर रोने वाले अपने.
आप कहेंगे प्यार और रुमानियत के इस वेलेंटाइन वीक में आज मोहब्बत और महबूब की बातों के बीच दुख-संताप की बातें क्यों? पर क्या आप इस बात से इनकार करेंगे कि हमारे देश में हर साल महबूब को खुदा मानकर हजारों युवा अपने सपनों को फांसी के फंदों और जहर की बोतलों में बंद कर देते हैं. उनके लिए जिंदगी ऐसी हो जाती है कि अगर महबूब न मिला तो जिंदगी बेकार.
मोहब्बत के बारे में किसी ने क्या खूब लिखा है कि.....
''उम्र भर दूसरा कोई तुम्हें अच्छा न लगे
कम से कम इतनी तो हम तुमसे मोहब्बत कर जायें'
सच्चे और निश्छल प्यार के लिए क्या ऊपर कि ये चंद पंक्तियां काफी नहीं हैं, जो हम प्यार के नाकामी के नाम पर खुद को इस दुनिया से रुख्सत कर लें. टीनएजर्स के प्यार में सबसे अधिक केमिकल लोचा होता है. एक तो उम्र की ठसक और उस पर आकर्षण का चुंबक. यह दोनों तत्व मिलकर ऐसी दुनिया में पहुंचा देते हैं जहां से निकलने में वक्त लग जाता है. इसी मोड़ पर खासकर दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है. जो इन दुर्घटनाओं से समझदारी भरा सेफ्टी बेल्ट बांधकर निकल गया, वही बाद में समझ पाता है कि जिंदगी कितनी खूबसूरत है.
मोहब्बत की दुनिया इतनी विशाल और अनंत है जिसमें उतरने के बाद ही उसकी गहराई का अंदाजा लगता है. पर क्या यह जरूरी है कि यह मोहब्बत सिर्फ महबूब से ही हो. मोहब्बत तो उस चिडिय़ा का नाम है जो जिस साख पर बैठे उसे ही अपना आशियाना बना ले. सच्ची मोहब्बत तो वह है जो इस खूबसूरत कायनात से की जाए.
मोहब्बत की दुनिया का एक स्याह पक्ष भी है. वह है एकतरफा मोहब्बत. क्या गांव, क्या शहर और क्या मेट्रो सिटी. हर जगह इस एकतरफा मोहब्बत ने न जाने कितने घरों के चिराग बुझा दिए. न जाने कितनी ही लड़कियों को एसिड अटैक से खौफजदा कर दिया. हर साल प्यार के इस इनसाइड स्टोरी में बढ़ोतरी ही होती जा रही है. न्यूज चैनल्स और अखबारों की हेडलाइन से आगे बढ़कर यह सोशल मीडिया तक में वायरल हो चुका है. प्यार के इस खूसनुमा सप्ताह में उन युवाओं के लिए मुनौव्वर राणा की यह चंद पक्तियां........
''मोहब्बत को जबर्दस्ती तो लादा नहीं जा सकता
कहीं खिड़की से मेरी जान अलमारी निकलती है.'
यह जिंदगी बेहद खूबसूरत है, इसे सिर्फ महबूब को खुदा मानकर खत्म करने ही जरूरत नहीं है. प्यार करने से किसी ने रोका नहीं है और न ही इस पर किसी का बस चलता है. पर प्यार और रुमानियत के नाम समर्पित इस वैलेंटाइन वीक में आप और हम मिलकर एक संकल्प तो जरूर कर सकते हैं कि नाकाम मोहब्बत के नाम पर जिंदगी को खत्म करने का प्रयास नहीं करेंगे. इन दो पंक्तियों के साथ हैप्पी वैलेंटाइन वीक.........
''खुदकुशी करने पे आमदा थी नाकामी मेरी
फिर मुझे दीवार पर चढ़ती एक चिंटी मिल गई'
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