Wednesday, January 7, 2015

ये अक्षरा हैं, इनका सपना था अमिताभ

  जब आई-नेक्स्ट देहरादून आॅफिस में सारिका जी गेस्ट एडिटर के रूप में खबरों की चर्चा कर रहीं थीं, अक्षरा चुपचाप सुन रहीं थीं। बाद में उन्होंने भी अखबारी दुनिया के प्रति अपनी सोच को साझा किया था।

ये अक्षरा हैं। वर्ष 2009 में मम्मी सारिका जी के साथ देहरादून आर्इं थीं। विशेष रिक्वेस्ट पर सारिका जी ने आई-नेक्स्ट का गेस्ट एडिटर बनना स्वीकार किया था। अक्षरा भी आॅफिस आर्इं थीं। सारिका जी में तो गजब का सेंस आॅफ ह्यूमर था ही, बेटी अक्षरा में भी कांफिडेंस कूट-कूट कर भरा था। अक्षरा के नाम के आगे मैं उनका सर नेम ‘हासन’ इसलिए नहीं लगा हूं, क्योंकि उन्हें अपने सर नेम से लगाव नहीं था। लगाव क्यों नहीं है, यह एक पारिवारिक और बेहद ही निजी मामला हो सकता है। पर इतना सार्वजनिक जरूर है कि सारिका और कमल हासन व्यक्तिगत कारणों से अलग हो चुके हैं। अक्षरा कमल हासन की ही संतान हैं। अक्षरा की चर्चा इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि आज मल्टी स्टारर फिल्म शमिताभ का ट्रेलर लांच हुआ है। डायरेक्टर आर बाल्की की यह फिल्म काफी धमाल माचाएगी, ऐसा फिल्मी पंडित कह रहे हैं। फिलहाल इतना जरूर है कि शमिताभ के लिए अक्षरा ने जबर्दस्त मेहनत की है। निर्देशक आर बाल्की तो उन्हें नेक्स्ट बिग थिंक भी कह चुके हैं। 2009 में जब अक्षरा से मुलाकात हुई थी तो मजाक-मजाक में ही पूछ लिया था कि आप भी मम्मी सारिका और बहन श्रुति हासन की तरह फिल्मों में आएंगी क्या? गजब कांफिडेंस से अक्षरा का जवाब था, देखिए फिल्मों में आऊंगी या नहीं, यह तो वक्त तय करेगा, पर इतना जरूर है जिस फिल्म में अमिताभ बच्चन काम
करेंगे, उसी में काम करूंगी। अब यह महज संयोग है या कुछ और पर आज अमिताभ बच्चन के साथ उन्हें खड़ा देखकर इतना जरूर कह सकता हूं कि सपने कभी छोटे मत देखो। देखो तो बड़ी देखो और उसे पालने का माद्दा भी रखो। अक्षरा को उनका सपना पूरा होने पर ढेर सारी बधाई।

Monday, January 5, 2015

बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर, मेल कराती मधुशाला!

कहतें हैं, पी कर बोलने वाला हमेशा सच बोलता है। उसे न दुनिया की फिक्र होती है और न जिंदगी की। वह दूसरी दुनिया में रहता है। शायद इसीलिए दूसरे ग्रह से आने वाली की बात सुनकर ही उसे ‘पीके’ कहा गया। हमारे समाज में भी पी के रहने वालों की बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। कहा जाता है वह पी के बहक गया है। बहक इसलिए गया है क्योंकि वह पी के सच बोल ने लगा है। ऐसा सच जो सामान्य तरीके से स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि वह कड़वी होती है। इसी कड़वी सच्चाई को बयां करते हुए हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमूल्य रचना की थी। नाम भी इसे मधुशाला ही दिया। इसी मधुशाला में वे लिखते हैं।
दुत्कारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला, 
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला, 
कहां ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को? 
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।

दूसरे गोले (ग्रह) से आए पीके ने तो जो बात कहनी थी कह दी। उसे जो समझाना था समझा गया। यह बात भी साफगोई से बता गया कि कोई कपड़ा पहनकर तुमने जन्म नहीं लिया है। पर जिंदगी में कपड़ों के आधार पर कैसे तुम पहचाने जा रहे हो। सिख हो तो पगड़ी से पहचान और हिंदु हो तो टीका और माले से पहचान। दाढ़ी बढ़ा ली तो मुसलमान और गले में क्रॉस लटका लिया तो ईसाई। ये सारी बातें यहीं रह जाएंगी। ये सारे जाति धर्म मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च तक ही सीमित रहेंगे। अब हमारे ऊपर है कि हम कितनी बात समझते हैं, कितनी बात नहीं। पीके की बातों ने करोड़ों रुपयों की कमाई कर ली। उसके ऊपर विरोध-प्रदर्शन को तो कोई असर नहीं पड़ा। अब पीके की बात की खाल निकालने वाले खाल तो नहीं निकाल पा रहे पर पोस्टर जरूर फाड़ रहे हैं। कहीं सेक्यूलरिज्म की बातें हो रही हैं, कहीं इसे टैक्स फ्री करके राजनीतिक रोटी सेंकी जा रही है। कहा जा रहा है कि हिंदु विरोधी बातें ज्यादा कह गया पीके। उसे दूसरे धर्मों पर भी और बकवास करनी चाहिए।
पर सवाल यह है कि अगर पीके ने दूसरे धर्मों पर भी उतनी ही बातें कही होती तो क्या उसका विरोध नहीं करते। क्या उसकी पोस्टर नहीं फाड़ते। हिसाब हुआ बराबर कहकर चुप रह जाते। या कोई और भी कारण है, जिसके ऊपर से कोई परदा उठाना नहीं चाहता। बड़ी बजट की फिल्में, बड़ा नाम, अकूत रुपयों की बारिश जैसे तत्वों से क्या यह विरोध-प्रदर्शन मॉनिटर होता है? इस पर कोई कुछ कहने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाता है। या इस पर भी मंथन क्यों नहीं किया जाता है कि जब-जब बड़ी फिल्में रिलीज होती हैं उसके साथ कांट्रोवर्सी क्यों जुड़ जाती है। कुछ साल पहले ही ओ माई गॉड जैसी फिल्म भी आई थी। पूरी धार्मिक व्यवस्था की इस फिल्म ने धज्जियां उड़ा कर रख दी थी। क्या गीता और क्या कुरान, सभी की बातों का इस फिल्म में पोस्टमार्टम किया गया था। पर उस वक्त तो कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ। यह भी बता दूं कि यह फिल्म चंद करोड़ रुपए का व्यवसाय कर फ्लॉप फिल्मों की श्रेणी में आ गई।
नंगा पुंगा पीके सिर्फ यह बताने की कोशिश करता है कि आप उसे स्वीकार करें जिसने आपकी रचना की है। इस सृष्टि की रचना की है। उसे स्वीकार न करें जो आपके स्वयंभू भगवान बन गए हैं। आपका अपना कोई बीमार है तो तन-मन से उसकी सेवा करें। ईश्वर या अल्लाह से दिल से दुआ मांगें। ऐसा नहीं करें कि उसे तड़पता छोड़कर स्वयंभू भगवानों की बातों में आएं और रांग नंबर को रिसीव  करें। अगर अपने रिमोट को खोजने के लिए पीके को भगवान के पास जाने की सलाह दी जाती है तो वह जाता है। फिर चाहे वह मंदिर में भगवान खोजे, या मस्जिद में। उसके लिए तो गुरुद्वारा और चर्च भी एक समान ही है। उसे तो बस भगवान से मिलना है। भगवान की खोज में वह दर-दर की ठोकरें खाता है। तरह-तरह की सच्ची बातों को बताना है। लोगों की नजर में वह बेवड़ा बन जाता है। वह पीके बन जाता है। पर इससे भी वह संतुष्ट है। क्योंकि ....
धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला, 
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका, 

कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।
मुसलमान औ' हिन्दू हैं दो, एक, मगर, उनका प्याला, 

एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते, 

बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!

Tuesday, December 30, 2014

यूं तेरा चले जाना

यूं तेरा चले जाना
भारत के सफलतम कप्तानों में से एक धोनी का टेस्ट क्रिकेट से यूं चले जाने की उम्मीद कतई नहीं थी। कौन ऐसा भारतीय क्रिकेटर होगा जो उस कप्तान पर गर्व नहीं करेगा जिसने क्रिकेट के तीनों स्तर पर भारत को सफलता के सर्वोच्य शिखर तक पहुंचाया हो। और कौन ऐसा क्रिकेटर होगा जो ऐसे खिलाड़ी को शानदार विदाई नहीं देना चाहता हो। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हमेशा से शांत रहने वाला क्रिकेटर जिस शांत तरीके से भारतीय टेस्ट टीम में पर्दापण करता है, उसी शांत तरीके से इसे अलविदा भी कह देता है। कैप्टन कूल नाम की सार्थकता शायद इसी में थी। आॅन फिल्ड जिस तरह अपने अचानक लिए गए निर्णयों से धोनी सबको हैरान कर देते थे, ठीक उसी तरह आॅफ फिल्ड भी इस तरह के निर्णयों के लिए वे जाने जाने जाते थे। अपनी जिंदगी के कई अहम फैसले धोनी बस यूं चुटकी बजाते ले लिए। धोनी की इस विदाई बेला में उस बात का जिक्र भी अहम हो जाता है, जब भारतीय टीम के कई सीनियर क्रिकेटर को एक तरह से धकिया के टीम के बाहर बिठाया गया था। अपने आलोचकों को करारा तमाचा मारते हुए धोनी ने खुद ही टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया। क्रिकेट के पंडित चाहे इसके लिए सौ कारण गिना दें, पर मेरे जैसे लाखों चाहने वालों के दिलों में धोनी ने अपना कद और भी ऊंचा कर लिया है। हां पर इतना अफसोस जरूर रहेगा कि टेस्ट क्रिकेट के मैदान से इस बेहतरनी खिलाड़ी को सम्मानजनक तरीके से विदाई लेनी चाहिए थी। क्रिकेट की शानदार परंपरा का निवर्हन जरूर करना चाहिए था। अपने साथियों को उन्हें वह मौका जरूर देना चाहिए था कि वे उन्हें अपने कंधों पर उठाकर ड्रेसिंग रूम तक पहुंचाएं। स्टेटियम में मौजूद उन हजारों दर्शकों को वह मौका देना चाहिए था कि अपनी-अपनी सीट पर खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ वे इस खिलाड़ी को शानदार विदाई दें। अफसोस जरूर रहेगा धोनी कि आपने ऐसा कुछ करने नहीं दिया। पर गर्व इस बात पर रहेगा कि आपने पूरे विश्व को एक शानदार क्रिकेटर को देखने का मौका दिया।

Monday, December 29, 2014

श्री कृष्ण म्यूजियम की यात्रा



कुरुक्षेत्र का नाम तो आपने जरूर सुना होगा। हां वही कुरूक्षेत्र जिसे महाभारत के युद्ध के लिए जाना जाता है। सुनता आया था कि यहां की धरती लाल है। पर आज यह कपोल कल्पना ही नजर आती है।
अंबाला से सड़क मार्ग से कुरुक्षेत्र की दूरी करीब 45 किलोमीटर है। वैसे तो ग्रैंड ट्रैंक रोड पर आप अपनी कार को अस्सी नब्बे की रफ्तार में भी दौड़ा सकते हैं, पर बीच-बीच में बन रहे ओवर ब्रिज के कारण आपको वहां पहुंचने में करीब एक घंटे का समय लग सकता है। यहां पहुंचकर अगर आपको महाभारत, श्री कृष्ण और कुरुक्षेत्र को समझना है तो सीधे पहुंच जाएं श्री कृष्ण संग्रहालय। ब्रह्मसरोवर के सटे हुए यह संग्रहालय है। श्री कृष्ण संग्रहायल में प्रवेश करते ही आपको एक विशाल मानचित्र के जरिए यह बताने का प्रयास किया गया है कि आखिर कुरुक्षेत्र कहते किसको हैं। पौराणिक प्रमाणों के आधार पर बताया जाता है कि कुरुक्षेत्र की सीमा 48 कोस में समाहित है। इसमें आधुनिक करनाल, जींद, पानीपत और कैथल का भी काफी इलाका आता है। इसी 48 कोस की पैराणिक सीमा में महाभारत का युद्ध हुआ था। जानकार बताते हैं कि आज भी इस 48 कोस की सीमा में युद्ध के कई प्रमाण मौजूद हैं। इसी कुरुक्षेत्र की सीमा से होकर सरस्वती नदी का भी प्रवाह था। आज भी इस कुरुक्षेत्र की इस पौराणिक सीमा के अंतर्गत 108 प्राचीन मंदिरों का अस्तित्व है। कहते हैं इसी 48 कोस के चार कोणों  पर चार यक्षों का पहरा होता था। म्यूजियम के अंदर आपको भारत की विभिन्न कलाओं का अद्भूत संगम देखने को मिलेगा। यहां श्रीकृष्ण और महाभारत काल के तमाम संग्रह किए गए अवशेष या तो खुदाई में मिले हैं या विभिन्न राज्यों द्वारा म्यूजियम को गिफ्ट किए गए हैं। काष्ठ कला से लेकर, प्राचीन चित्र कला का बेजोड़ नमूना आपको अपने भारत की प्रचीन कलाओं पर गर्व करने का एहसास जरूर कराएगा। स्कल्पचर के जरिए भी आप महाभारत के युद्ध, कृष्ण की लीला को समझ सकते हैं। मृत्युशैया पर पड़े भिष्म और उनके आस पास मौजूद कौरवों और पांडवों सहित श्री कृष्ण की उपस्थिति पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केंद्र है। मंत्रमुग्ध कर देने वाली इस गैलरी के बाद आप जब तीसरी मंजिल पर मौजूद मल्टीमीडिया गैलरी में पहुंचते हैं तो आप खुद को एक रोमांचक दुनिया में पाते हैं। आॅडियो-वीडियो साउंड इफेक्ट के जनिए आपको महाभारत से जुड़े प्रसंगों को समझने का मौका मिलता है। इसी गैलरी में आपको अभिमन्यू के लिए बनाए गए चक्रव्यूह से भी गुजरने का मौका मिलेगा। गैलरी के अंत में आपको यह समझने का मौका मिलेगा कि कैसे श्रीकृष्ण ने देह त्याग किया और कैसे एक स्वाण के साथ धर्मराज युधिष्ठिर का स्वर्गारोहण हुआ। वैसे तो आप अगर देखते जाएं तो पूरे म्यूजियम को एक घंटे में देख सकते हैं। पर अगर इसे समझना है तो गाइड की मदद जरूरी है। मेरा सौभग्य था कि म्यूजियम के क्यूरेटर श्री राणा के सहयोग से चंदर शर्मा जी जैसे प्रखर विद्वान मिल गए। इन्होंने करीब ढ़ाई घंटे में जितना करीब से महाभारत और श्रीकृष्ण से जुड़े प्रसंगों को समझाया वह अकल्पिनय था। हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी पर समान पकड़ रखने वाले शर्मा जी की श्री कृष्ण के प्रति भक्ति-भाव देखकर किसी के भी आंखों में आंसू आ सकता है। ऐसा मेरे साथ भी हुआ जब उन्होंने श्रीकृष्ण और राधा के प्रसंगों को अपने ही अंदाज में सुनाया और दिखाया। शायद भारत के किसी कोने में श्रीकृष्ण को समझने के लिए इससे बेहतर जगह कोई दूसरी नहीं हो सकती। और हां, आप जब कुरुक्षेत्र आएं तो ब्रह्ण सरोवर जाना न भूलें। यह जगह अपने आप में कई कहानियों को समेटे हुए है।