Thursday, October 24, 2019

मोदी मैजिक और भाजपा की "दुर्गति" के मायने


त्वरित टिप्पणी
चुनाव से पहले का दृश्य...सभी कहते रहे : आर्थिक मंदी है, लोग परेशान हैं। आॅटो सेक्टर की बैंड बजी है।

भाजपा के नेता कहते रहे : कहां मंदी है? गाड़ियों की एडवांस बुकिंग ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है। आॅनलाइन शॉपिंग बाजार ने करोड़ों का बिजनेस कर लिया है।

सभी कहते रहे : युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है। सरकारी नौकरियों की भर्ती का रिकॉर्ड सबसे बुरे दौर में है।

भाजपा के नेता कहते रहे : हमने रिकॉर्ड नौकरी दी है। पुरानी सरकारों का रिकॉर्ड निकाल लो, फिर कहना।

मतदान के बाद का दृश्य

एग्जिट पोल कहते रहे : मोदी मैजिक फिर काम कर गया है। हरियाणा और महाराष्ट्र में रिकॉर्ड वोट से भाजपा सरकार बनाएगी।

वोटर्स ने कहा : सिर्फ मोदी मैजिक ही रटते रहोगे या जमीन स्तर पर काम करोगे, अभी टेलर दिखाया है। काम नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में दिल्ली, झारखंड सहित कई राज्यों में चुनाव है। पूरी फिल्म दिखाएंगे।

मोदी सरकार पार्ट-2 के बाद महाराष्ट्र और हरियाणा का विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना था। उम्मीद की जा रही थी कि दोनों ही राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन शानदार रहेगा। हरियाणा को लेकर तो स्थानीय नेतृत्व इतना उत्साह में था कि 75 प्लस से नीचे कोई बात ही नहीं करता था। पर वोटर तो वोटर ही है। उसने सभी नारों की ऐसी हवा निकाली कि सारा समीकरण ही उलट-पलट कर रख दिया। महाराष्ट्र में भी पिछले विधानसभा चुनाव से कम सीट भाजपा को मिली है। इसके अलावा 17 राज्यों में हुए उपचुनाव में भी भाजपा की स्थिति कमजोर हुई है। 52 में से सिर्फ 15 सीट मिलना ब हुत कुछ बयां कर रहा है। यहां तक कि गुजरात में भी भाजपा को वोटर्स ने स्पष्ट संदेश दे दिया है।


दरअसल, यह चुनाव जहां एकतरफ भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ था, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था। कांग्रेस ने तो अपनी लाइफ को रिचार्ज करवा लिया, लेकिन भाजपा की प्रतिष्ठा को गहरा ठेस पहुंचा है। निश्चित तौर पर हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों ही जगह भाजपा सरकार बना लेगी, पर इसके साथ ही पार्टी के लिए आत्ममंथन का दौर जरूर शुरू होगा। आत्ममंथन इस बात पर किया जाना जरूरी है कि आखिर मजबूत स्थिति में रहते हुए पार्टी ने कहां गलती कर दी। कुछ ऐसी ही स्थिति गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार जैसे राज्यों की भी रही है। नागपुर जैसे घोर भाजपा और आरएसएस वाले क्षेत्र में आए चुनावी परिणाम ने कड़ा संदेश दिया है। आरएसएस के गढ़ में इस बार कांग्रेस ने सेंध लगा दी है। इससे पहले हुए 2014 के विधानसभा चुनाव में जहां नागपुर जिले की 12 सीटों में से 11 पर बीजेपी का कब्जा था, लेकिन इस बार यह फासला आधे से भी कम हो गया।
अगर हरियाणा की बात की जाए तो 1982 से लेकर 2009 तक भाजपा ने कुल 47 सीट हासिल की थी, पर 2014 में एक साथ 47 सीटें जीत कर रिकॉर्ड बना लिया। हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में भी दस की दस सीट जीतकर भाजपा ने जता दिया था कि हरियाणा में भाजपा का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। पर अचानक से भाजपा का ग्राफ ऐसा गिरा कि चुनाव परिणाम ने सभी को वास्तविकता के धरातल पर लाकर पटक दिया।


ऐसा नहीं था कि भाजपा को हरियाणा में अपनी ग्राउंड रियलिटी का पता नहीं था, पर राज्य का कोई भी बड़ा नेता इसे स्वीकार नहीं कर रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सात बड़ी चुनावी रैलियों ने भी कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ा। हालात यहां तक खराब हुए कि सरकार के पांच कद्दावर मंत्री भी चुनाव हार गए हैं। हरियाणा में पूरे चुनावी कैंपेन के दौरान भाजपा ने सिर्फ और सिर्फ राष्टÑीय मुद्दों पर ही फोकस किया। राष्टÑीय नेता अगर कश्मीर, धारा 370, पाकिस्तान, अमेरिका आदि पर चर्चा करें तो समझ में भी आता है, लेकिन हाल यह था कि स्थानीय नेता भी चुनावी मंच से केंद्र सरकार का ही राग अलापते रहे।

लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में जमीनी अंतर होता है। जनता राज्य के अंदर अपनी बातों को खोजती है। उसे इस बात से अधिक मतलब नहीं होता है कि कश्मीर में शांति है कि नहीं, वहां व्यापार चल रहा है कि नहीं। उसे इस बात से मतलब होता है कि हमारे राज्य में व्यापारियों का क्या हाल है। युवाओं को रोजगार मिला की नहीं। प्रदेश में महिलाएं और बेटियां सुरक्षित हैं या नहीं। सिर्फ बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ के नारे वोट में तब्दील नहीं हो सकते हैं।
महाराष्ट्र में भी भाजपा निश्चित तौर पर सत्ता में वापसी कर चुकी है। पर यहां भी मोदी मैजिक के भरोसे पार्टी रही है। हालांकि यह कहने में गुरेज नहीं कि यहां मोदी मैजिक फीका ही रहा है। पंकजा मुंडे के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी की भव्य रैली करवाई गई। पर हाल देखिए स्वयं पंकजा मुंडे ही चुनाव हार गई हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे में भी भाजपा ने पूरी मनमानी की। शिवसेना बेबस और खामोश बनी रही। पर अब स्थिति दूसरी है। शिवसेना पूरी हनक के साथ अपनी शर्तों को मनवाने की तैयारी कर चुकी है। 2014 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना और बीजेपी दोनों अलग अलग चुनाव लड़े थे। तब बीजेपी ने 122 सीटें जीती थी और शिवसेना को 63 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। इस बार दोनों मिल कर चुनाव लड़े और शिवसेना फायदे में रही।
कांग्रेस ने निश्चित तौर पर तमाम झंझावतों को झेलते हुए अपना पुराना रंग दिखाया है। महाराष्ट्र, हरियाणा से लेकर भाजपा के गढ़ वाले इलाकों में भी अपनी शानदार धमक दिखाकर कांग्रेस ने जता दिया है कि अभी वह सिर्फ कमजोर हुई थी खत्म नहीं। हरियाणा में तो कांग्रेस ने इतने झंझावत झेले कि कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर ही पार्टी छोड़ गए। पर सोनिया गांधी ने अपनी पुरानी टीम पर भरोसा दिखाया। भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा की जोड़ी ने टिकट बंटवारे से लेकर स्थानीय मुद्दों पर फोकस करते हुए चुनावी कैंपेन को संचालित किया। इसका परिणाम आज सामने है। भले ही अभी सत्ता तक पहुंचने में उसे काफी पापड़ बेलने पड़ जाएंगे, लेकिन एक बात तो तय है कि दमदार विपक्ष के साथ भी वह भारतीय जनता पार्टी को आने वाले समय में चैन से नहीं रहने देगी। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है। हरियाणा कांग्रेस भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना सार्थक योगदान देगा इसकी उम्मीद की जाती है।
इस चुनाव के बाद निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी को आत्ममंथन करते हुए जनता से जुड़ी जमीनी दिक्कतों पर फोकस करना होगा। रोजगार, मंदी जैसे तमाम मुद्दों पर आंकड़ों की बाजीगरी से परे सरकार को ठोस काम करना होगा। नहीं तो मोदी मैजिक के भरोसे बहुत कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है।

Saturday, July 13, 2019

एंड्रायड फोन बम है और इंटरनेट इसका बारूद!


आज मंथन से पहले एक छोटी सी घटना का जिक्र कर रहा हूं। इसे पढ़िए फिर आगे की बात करेंगे। शनिवार सुबह मेरी सोसाइटी में ही रहने वाले मेरे मित्र अपनी पत्नी के साथ मेरे घर चाय पीने लिए आ गए। घूमने फिरने पर चर्चा होने लगी। उन्होंने कहा कि एक बार अंडमान निकोबार जाने की इच्छा हो रही है। मुझसे वहां के बारे में पूछने लगे। करीब 15 से बीस मिनट तक हम लोगों ने चाय की चुस्की के साथ अंडमान निकोबार के बारे में बातें की। बातों ही बातों में मेरे मित्र के मन में विचार आया कि क्यों न एक बार दिल्ली से अंडमान की फ्लाइट और उसके फेयर के बारे में चेक किया जाए। उन्होंने चर्चा की और अपना सैमसंग का बिल्कुल लेटेस्ट वाला मोबाइल आॅन कर लिया। पर जैसे ही उन्होंने फ्लाइट सर्च का आॅप्शन खोला वो चौंक गए। वो हैरान परेशान थे। उन्होंने कहा भाई साहब ये कैसे हो सकता है कि हम अभी अंडमान के बारे में चर्चा कर रहे हैं और जैसे ही मैंने फ्लाइट आॅप्शन खोला यहां आॅलरेडी दिल्ली टू अंडमान फ्लाइट की डिटेल फ्लैश हो रही है। उन्होंने बताया कि इससे पहले कभी भी उन्होंने दिल्ली टू अंडमान फ्लाइट की डिटेल सर्च नहीं की थी।
मेरे मित्र परेशान थे। पर क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है? क्या आपने कभी गौर किया है कि जिस चीज के बारे में आप कभी सोच रहे हैं, बात कर रहे हैं किसी से उन बातों को शेयर कर रहे हैं, वो अचानक से आपके मोबाइल स्क्रीन पर किसी वेबसाइट को खोलते ही क्यों फ्लैश होने लगता है? क्या कभी इस पर गौर किया है कि एक बार आपने कोई प्रोडक्ट लेने की बात सोची और किसी वेबसाइट पर विजीट कर लिया तो क्यों बार-बार किसी दूसरी वेबसाइट को खोलते ही सबसे पहले वही प्रोडक्ट फ्लैश होने लगता है। अगर अब तक गौर नहीं किया है तो गौर करना शुरू कर दीजिए। मंथन करना शुरू कर दीजिए कि आखिर आपके मन की बात पूरी दुनिया की कंपनी को क्यों पता चल जा रही है। दरअसल आप जितना ही गैजेट फ्रेंडली और टेक्नो फ्रेंडली हो रहे हैं उतना ही अधिक आपकी प्राइवेसी पर खतरा बढ़ता जा रहा है। आपको पता भी नहीं चल रहा है और लाखों वेबसाइट की निगाहें आपके बेडरूम और बाथरूम तक पहुंच जा रही हैं। दो दिन पहले ही अमेरिकी रेग्युलेटर फेडरल ट्रेड कमीशन (एफटीसी) ने डेटा लीक मामले में फेसबुक पर 5 अरब डॉलर (करीब 34 हजार करोड़ रुपए) के जुर्माने की सिफारिश की है। किसी टेक कंपनी पर यह अब तक की सबसे बड़ी पेनल्टी होगी। इससे पहले 2012 में गूगल पर प्राइवेट डेटा लीक मामले में 154 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया था। मार्च 2018 में फेसबुक के डेटा लीक का सबसे बड़ा मामला सामने आया था। एफटीसी ने फेसबुक को यूजर्स के डेटा की प्राइवेसी और सुरक्षा में चूक का दोषी पाया है।
यह मामला इसलिए मीडिया के जरिए हाईलाइटेड है क्योंकि यह मार्क जुगरबर्क और फेसबुक जैसी बड़ी कंपनी से जुड़ा मामला है। पर आप सोचिए आपके एंड्रॉयड फोन में जितने तरह के ऐप हैं वह आपका कितना डाटा चोरी कर रहे हैं। कोई भी नया ऐप अगर आप इंस्टॉल करते हैं तो सबसे पहले वह आपके फोटो, वीडियो, एसएमएस, कैमरा आदि का एक्सेस मांगता है। आपको वह ऐप बताएगा कि अगर आपने एक्सेस परमिशन दिया तो आपको उस ऐप को यूज करने में और अधिक सुविधा होगी। पर क्या आपने कभी मंथन किया है कि अगर किसी होटल की जानकारी वाले ऐप को इंस्टॉल करते हैं तो क्यों वह आपके मोबाइल कैमरे के एक्सेस की परमिशन मांग रहा है। उसे भला क्या मतलब है कि वह आपके कैमरे या फोटो वीडियो की एक्सेस मांगे। पर आप दे दनादन एक्सेस परमिशन दे देते हैं। तमाम तरह के ऐप्स ने निश्चित तौर पर आपके जीवन को आसान बना दिया है, लेकिन यह आपके जीवन में कितने अंदर तक घुस चुका है इसका आपको अंदाजा भी नहीं है।
मेरे एक सीनियर हैं। वो रोज रात में करीब 12 से 15 किलोमीटर पैदल चलते हैं। उन्होंने अपने मोबाइल में आॅप्शन आॅन कर रखा है कि उनका मोबाइल इसका हिसाब किताब रखे कि वो कितना किलोमीटर चलें। मंथन करिए जरा, वो नाइट वॉक में मोबाइल यूज भी नहीं करते, लेकिन उनके मोबाइल के पास उनके एक-एक कदम का हिसाब है। अगर उन्होंने हेल्थ वॉक से जुड़ा कोई ऐप डाउनलोड कर लिया तो उनके कैलोरी से लेकर उनके ब्लड प्रेशर तक की सटीक जानकारी उनके मिल जाएगी। अब मंथन करिए जरा। सिर्फ मोबाइल अपने पास रखने से आपके हेल्थ और हर एक कदम की जानकारी जब किसी अननोन वेबसाइट के डाटा बेस में सेव हो रही है तो जब आप किसी वेबसाइट या ऐप को अपना सारा एक्सेस दे देते हैं तो वो क्या क्या नहीं कर सकता है आपके फोन के जरिए।
हाल ही में गूगल को लेकर चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। इसमें बताया गया है कि कैसे स्मार्ट फोन, ऐलेक्सा जैसे होम स्पीकर्स और सिक्योरिटी कैमरे में दिए गए गूगल असिस्टेंड आपकी पर्सनल बातों को सुन रहे हैं। वो आपकी बातों को रिकॉर्ड कर रहे हैं और आपकी जरूरतों के अनुसार रिएक्ट कर रहे हैं। मैंने ऊपर अपने दोस्त के साथ अंडमान वाली बात का जो जिक्र किया था वो इसी गुगल असिस्टेंड का परिणाम था। आप मोबाइल पर क्या सुनते हैं, क्या सर्च करते हैं, आपकी जरूरतें क्या क्या हैं, आपने किन बातों के लिए गूगल सर्च किया है, हर बात का रिकॉर्ड गूगल अपने डाटा बेस में सेव करता रहता है। आपकी जरूरतों के मुताबिक जैसे ही आप कोई वेबसाइड एक्सेस करते हैं आपके द्वारा पूर्व में किए गए सारी बातों और रिएक्शन के जरिए आपको उससे संबंधित विज्ञापन दिखाए जाने लगते हैं। तमाम तरह के बैंकिंग ऐप, ई-मेल, यूट्यूब, शॉपिंग ऐप, ट्रैवलिंग ऐप के जरिए आपका मोबाइल फोन एक चलता फिरता बम है और इंटरनेट बारूद के समान है, जो कभी भी फट सकता है। आपके निजी फोटो, वीडियो, बातों की रिकॉर्डिंग कब गलत हाथों में चली जाए आपको पता भी नहीं चलेगा। याद करिए तीन से चार साल पहले जब एंड्रायड फोन का चलन अचानक से बढ़ गया था तो कैसे भारत में पोर्न साइट्स की बाढ़ आ गई थी। हालात यहां तक खराब हो गए थे कि भारत सरकार को हजारों पोर्न साइट्स बंद करनी पड़ी थी। क्या कभी आपने सोचा है कि इन पोर्न साइट्स पर इतने अधिक कंटेंट कहां से पहुंच गए थे। दरअसल वो सब आपके निजी फोन के बेडरूम और बाथरूम कंटेंट थे, जो बड़े मजे से पोर्न साइट्स पर देखे जा रहे थे।

भारत में एक तरफ जहां इंटरनेट यूजर्स की संख्या में जबर्दस्त बढ़ोतरी हो रही है, वहीं उसी रफ्तार में साइबर क्राइम भी बढ़ता जा रहा है। इस वक्त हमारी सरकार का पूरा जोर इंटरनेट यूजर्स को बढ़ाने और हर एक सरकारी व्यवस्था को डिजिटलाइज करने पर लगा है। पर साथ ही साथ मंथन करने का वक्त है कि वर्चुअल वर्ल्ड में हमारा पर्सनल डाटा कितना सुरक्षित है। हमारे भारत में मजबूत डाटा संरक्षण कानून की जरूरत लंबे वक्त से महसूस की जा रही है। पर अफसोस इस बात का है कि इतना लंबा वक्त गुजर जाने पर भी हम डाटा संरक्षण कानून को अब तक मूर्त रूप नहीं दे सके हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, चीन, जर्मनी, आॅस्ट्रेलिया सहित करीब चालीस देशों में मजबूत डाटा संरक्षण कानून मौजूद है। पड़ोसी देश चीन में तो इतना मजबूत कानून है कि वहां ट्विटर जैसा वैश्विक सोशल मीडिया प्लटेफॉर्म तक प्रतिबंधित है। इन देशों ने इसलिए स्थिति पर नियंत्रण पा लिया है क्यों कि इनके पास इंटरनेट और डाटा संरक्षण को लेकर अपने कानून हैं, जबकि भारत में स्थिति विपरीत है।
आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि मौजूद समय में भारत में डाटा संरक्षण को लेकर कोई कानून ही नहीं है। न ही कोई संस्था है जो डाटा की गोपनीयता की सुरक्षा प्रदान करती हो। हां इतना जरूर है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 43-ए के तहत डाटा संरक्षण के लिए उचित दिशा निर्देश दिए गए हैं। पर ये निर्देश सिर्फ कागजों तक ही सीमित माने जाते हैं।
केंद्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पिछले दिनों राज्यसभा में बताया है कि भारत में डाटा संरक्षण कानून को लेकर अभी मंथन चल रहा है। यह अर्लामिंग सिचुएशन है। सुप्रीम कोर्ट भी सरकार को इन मुद्दों पर कठघरे में खड़ा कर चुकी है। कई बार सवाल पूछे जा चुके हैं। पर अब तक डाटा संरक्षण कानून को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत सरकार जल्द ही इस संबंध में आगे बढ़ेगी। फिलहाल अपनी सुरक्षा आपके अपने हाथों के भरोसे ही है। इंटरनेट को लेकर, अपने एंड्रायड फोन को लेकर, तमाम तरह के ऐप्स को लेकर मंथन करें। जागरूक बनें और खुद को बचाएं।

http://www.aajsamaaj.com/android-phone-is-bombs-and-the-internet-is-dynamite/70283

Wednesday, June 26, 2019

ताराकोट मार्ग से मां वैष्णव देवी की यात्रा


जिस धार्मिक स्थल पर करीब एक करोड़ से अधिक लोग हर साल पहुंचते हैं, वहां अगर कोई नई सुविधा मिल जाए तो यह किसी सौगात से कम नहीं है। कुछ ऐसा ही वैष्णव देवी जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए खुला नया मार्ग है। इस नए मार्ग का नाम है ताराकोट मार्ग। 20 जून को मैंने परिवार के साथ इसी मार्ग से यात्रा की। आइए आपको भी लेकर चलता हूं इसी मार्ग से माता के दरबार तक।

दरअसल वैष्णव देवी भवन तक पहुंचने के लिए बेस कैंप कटरा है। यहां से आप तमाम तरीके से 13 किलोमीटर ऊपर त्रिकुटा पर्वत स्थित माता वैष्णव देवी भवन तक पहुंच सकते हैं। सबसे पुराना मार्ग बाणगंगा की तरफ से है। कटरा बस स्टेशन से बाणगंगा तक आप आॅटो के जरिए पहुंच सकते हैं। यहीं से आपको घोड़ा, पालकी और पिठ्ठू की सुविधा मिलती है। श्राइन बोर्ड ने प्री-पेड बूथ स्थापित कर रखे हैं जहां से आप तय राशि देकर कोई सुविधा प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि भवन पहुंचने वाले करीब अस्सी प्रतिशत लोग पैदल ही भवन तक की 13 किलोमीटर यात्रा पूरी करते हैं। बाणगंगा से अर्द्धकुंवारी तक की दूरी छह किलोमीटर है। फिर यहां से आगे सात किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई है, जिसे हाथी मत्था की चढ़ाई कहते हैं। अर्द्धकुंवारी से ही एक नया रास्ता भी बना है जिसे हिमकोटी मार्ग कहते हैं। जिन यात्रियों को हाथी मत्था की खड़ी चढ़ाई नहीं करनी है वह हिमकोटी मार्ग से जा सकते हैं। हिमकोटी मार्ग से घोड़े और खच्चड़ नहीं जाते हैं। वह पुराने मार्ग यानि हाथी मत्था होकर ही जाते हैं। जो सांझी छत की तरफ से जाता है।
अगर आप कटरा से हेलिकॉप्टर सुविधा लेते हैं तो वह हेलिकॉप्टर भी आपको सांझी छत तक ही छोड़ता है। वहां से करीब ढ़ाई किलोमीटर तक आपको पैदल चलना पड़ता है। हालांकि अब सांझी छत से आपको घोड़ा और पालकी की सुविधा भी मिलनी शुरू हो गई है।
ये तो हुई पुराने रास्तों और सुविधाओं की बात। पर अब वैष्णव देवी के श्रद्धालुओं के लिए श्राइन बोर्ड ने नए रास्ते की सौगात दी है। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस रास्ते का उद्घाटन किया था। यह रास्ता ताराकोट गांव की तरफ से जाता है, जिसे ताराकोट मार्ग कहा जाता है।
यह मार्ग उन यात्रियों के लिए सबसे बेहतर है जो भवन तक की यात्रा पैदल पूरी करना चाहते हैं। कटरा बस स्टैंड से आॅटो जिसमें चार लोग बैठ सकते हैं, दो सौ पांच रुपए देकर आप ताराकोट मार्ग के एंट्री प्वाइंट तक पहुंच सकते हैं। इंट्री गेट तक आॅटो की सुविधा मौजूद है। यहीं से आपको पिठ्ठू मिल जाएगा। इन पिठ्ठुओं के पास अब बच्चों के लिए आधुनिक प्रैंप भी मौजूद रहती है।  पिठ्ठू के रेट भी श्राइन बोर्ड ने तय कर रखे हैं। रेट डिस्पले भी है और प्री-पेड काउंटर भी मौजूद है।
आधुनिक तरीके से तैयार ताराकोट मार्ग
जो यात्री पहली बार वैष्णव देवी की यात्रा कर रहे हैं उनके लिए यह मार्ग बेहद निरस लगेगा। ऐसे में मेरी सलाह है कि वो बाणगंगा होकर पुराना रास्ता ही लें, जिसमें उन्हें बाणगंगा के दर्शन, चरण पादुका मंदिर के दर्शन, अर्द्धकुंवारी के दर्शन होंगे। साथ ही उस मार्ग पर चारों तरफ मौजूद चहल पहल भी देखने को मिलेगी। अगर आप ताराकोट मार्ग से जाते हैं तो आपको थोड़ी निराशा हाथ लगेगी।
ताराकोट मार्ग बेहद आधुनिक तरीके से तैयार किया गया है। यह रास्ता अर्द्धकुंवारी तक सात किलोमीटर तक का है। बता दूं कि बाणगंगा होकर जाने पर दूरी छह किलोमीटर है। अर्द्धकुंवारी से यह मार्ग हिमकोटी वाले मार्ग से जुड़ गया है। जहां से भवन की दूरी सात किलोमीटर है। ताराकोर्ट मार्ग पर न तो घोड़े-खच्चर और न पालकी की सुविधा है। यहां सिर्फ पिठ्ठू ही मौजूद मिलेंगे। जैसा की मैंने बताया कि यह रास्ता बेहद आधुनिक तरीके से बनाया गया है। यह  7 किमी लंबा ये रास्ता बालिनी ब्रिज से अर्द्धकुंवारी को जोड़ता है।
पुराने रास्ते पर कहीं-कहीं ही आपको शेड मिलेंगे, जबकि इस नए रास्ते को 95 प्रतिशत अत्याधुनिक शेड से ठंका गया है। जिससे आप गर्मी, बारिश और बर्फबारी में भी आराम से पैदल यात्रा कर सकते हैं। यह रास्ता काफी चौड़ा है जिससे महिंद्रा पिकअप और एंबूलेंस भी आसानी से आ जा सकती है। इस रास्ते पर अत्याधुनिक एंटी स्किड टाइल्स भी लगाई गई है, जिससे पैदल यात्रियों को काफी सुविधा होती है। साथ ही इस मार्ग पर स्लोप स्टैबेलाइजेशन टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया गया है, ताकि चढ़ाई सरल रहे। सीधे शब्दों में कहें तो चढ़ाई बिल्कुल सामान्य है, खड़ी चढ़ाई नहीं है। बाणगंगा होकर जाने पर आपको बिल्कुल खड़ी चढ़ाई मिलेगी।
ताराकोट मार्ग पर हर दो सौ मीटर पर वॉटर कुलर एटीएम लगाए गए हैं, जहां आरओ का स्वच्छ पानी आपके लिए मुफ्त उपलब्ध है। पूरे रास्ते को मल्टीपर्पज आॅडियो सिस्टम से लैस किया गया है। इस रास्ते में बाणगंगा की तरह आपको जगह-जगह खाने पीने के स्टॉल नहीं मिलेंगे। आधुनिक रूप से तैयार व्यू प्वॉइंट पर आपको कैफेटएरिया मिलेंगे। इस रास्ते में आपको करीब छह व्यू प्वाइंट और कैफेटएरिया मिलेंगे।

ताराकोट में तैयार किया गया पार्क।
रास्ते के मिड प्वाइंट जहां ताराकोट गांव स्थित है वहां पहुंचकर आपको बेहद सुकून मिलेगा। ताराकोट प्वाइंट को बेहद आकर्षक तरीके से सजाया और संवारा गया है। यहां पार्क के अलावा फव्वारे भी लगाए गए हैं। यहीं श्राइन बोर्ड की तरफ से 24 घंटे का फ्री लंगर भी स्थापित किया गया है। लंगर हॉल छोटा है, लेकिन बेहद साफ सुथरा और व्यवस्थित है। इसी लंगर हॉल की साइड में शौचालय भी बनाया गया है। हालांकि लोगों की भीड़ को देखें तो और अधिक शौचालय की जरूरत महसूस होती है।शौचालयों का प्रबंधन भी ठीक नहीं है। फिलहाल यहां साफ सफाई की बेहद कमी है, जबकि रास्ते में पड़ने वाले तमाम शौचायल बेहद साफ सुथरे नजर आए।  यहां से घाटियों का बेहद खूबसूरत नजारा आप देख सकते हैं। यहां पहुंचकर आपकी सारी थकावट दूर हो जाएगी।
तारोकोट में श्राइन बोर्ड का लंगर हॉल।
यहां से अर्द्धकुंवारी की दूरी अधिक नहीं है। अर्द्धकुंवारी से जाने वाले हिमकोटी के नए रास्ते में इस रास्ते को मिला दिया गया है। अर्द्धकुंवारी में अगर आपको दर्शन करना है या रुकना है तो आपको करीब तीन सौ मीटर दूसरी तरफ चलना होगा। यहीं से आपको बैटरी आॅपरेटेड आॅटो की सुविधा भी मिलेगी। पहले सिर्फ बुर्जुगों और दिव्यांगजनों के लिए ही यह सुविधा थी। पर अब कोई भी व्यक्ति यह सुविधा ले सकता है। प्रतिव्यक्ति 357 रुपए का टिकट है। आॅटो सुविधा लेने के लिए आपको लंबा इंतजार करना पड़ता है, क्योंकि आॅटो सीमित है, जबकि यात्रियों की भीड़ काफी अधिक है। आॅटो भी हिमकोटी वाले पैदल रास्ते से ही संचालित होती है। इसलिए आपको सावधानी के साथ पैदल चलना होता है। अर्द्धकुंवारी से करीब 7 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़कर आप भवन तक पहुंचते हैं।
भवन से भैरव स्थान जाने के लिए रोपवे की सुविधा।

रोपवे की सुविधा
भवन में मां वैष्णव देवी का दर्शन करने के बाद यात्री भैरव स्थान जाते हैं। भैरव स्थान जाने के लिए बेहद खड़ी चढ़ाई चढ़नी होती थी, पर अब भवन के पास से ही रोपवे की सुविधा मिल गई है। निर्धारित टिकट प्राप्त कर आप रोपवे से सीधे भैरव स्थान पहुंच सकते हैं। आप रोपवे से या तो दोबारा नीचे आकर हिमकोटी के रास्ते नीचे उतर सकते हैं। या फिर भैरव घाटी होते हुए, पुराने रास्ते हाथी मत्था, अर्द्धकुंवारी होते हुए बाणगंगा तक पहुंच सकते हैं। भैरव घाटी से से आपको नीचे उतरने के लिए घोड़े भी मिल जाएंगे। श्राइन बोर्ड ने यात्रियों की सुविधा के लिए सबसे अधिक ध्यान तमाम चीजों के रोट्स पर दिया है। पहले रेट्स को लेकर यात्री बेहद कंफ्यूज रहते थे। अब सभी के रेट्स निर्धारित हैं। जगह-जगह बोर्ड भी लगे हैं और प्री-पेड काउंटर्स भी हैं।
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Sunday, June 23, 2019

इस एक फल ने सभी को ‘फेल’ कर दिया


कल मैंने फेसबुक पर इस फल की एक तस्वीर डालकर इसके बारे में आप सभी से पूछा था। जबर्दस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली। साथ ही एक साथ इतने सारे फलों के नाम भी जानने को मिले। सभी ने अपनी-अपनी जानकारी के अनुसार नाम सही बताए, क्योंकि इस तरह के मिलते जुलते फल भारत के सभी इलाकों में पाए जाते हैं। खासकर उत्तर भारत में इस तरह के फल देखने को मिलते हैं।

पर यह फल उन सभी फलों में सबसे अलग है। यह राजस्थान का स्पेशल फल ‘काचर’ है। तमाम लोगों ने इस फल को कोहड़ा, कोहड़, काढ़ला, कदिमा, पतिसा, कुम्हड़ा, खबहा, छहुआ कोहड़ा, बरिया कोहणा, ककड़ी बताया। जिन लोगों ने इस फल के नाम बताए वो उत्तरप्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल से ताल्लुक रखते हैं। सभी ने एक से बढ़कर एक नए नाम बताए, जो वहां के स्थानीय बोली में प्रचलित हैं। पर जितने भी नाम बताए गए उनमें से अधिकतर का आशय पेठा बनाने वाले फल से था।
पर यह काचर फल उन सभी में से अलग है। यह राजस्थान के रेतिले और बेहद गर्म वाली जगह में पैदा होता है। यह खरबूजे की प्रजाति का ही फल है। पर यह खाने में थोड़ा खट्टापन लिए होता है। जिस तरह आप पपीता को काटते हैं, ठीक उसी तरह जब आप इसे काटेंगे तो आपको पहली झलक में पपीता ही नजर आएगा। पपीते की तरह की बीच में दो भाग होते हैं जिसमें बीज भरा होता है। 
राजस्थान के इलाकों में इस फल को सुखाकर आमचूर की तरह भी प्रयोग में लाया जाता है। स्थानीय लोग इसे सुखाकर इसका पाउडर बनाते हैं और बेचते हैं। जब यह फल होता है तब इसका नाम काचर होता है, लेकिन जब पाउडर बन जाता है तो यह काचरी के नाम से जाना जाता है।
काचर के साथ सबसे मजेदार बात यह है कि काचर को आप कच्चे में सब्जी बनाकर खा सकते हैं। थोड़ा पक जाए तो छिलका उतारकर इसे सलाद के रूप में खा सकते हैं। या फिर आप तरबूज या खरबूज की तरह कभी भी हल्के नमक के साथ खा सकते हैं।  इस फल को लगाने के लिए कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ती है। इसकी बेल खेतों में अपने आप उग आती है। जिस तरह पपीते में बीच की बहुतायत होती है और उसके बीज कहीं फेंक दिए जाए तो पेड़ उग आता है। ठीक उसी तरह काचर के साथ भी है। काचर जब कच्चा रहे तो इसकी मसालेदार सब्जी बनाई जाती है। हमारे बिहार में सिलौटी पर लहसून, लाल मिर्च और पीली सरसों पीस कर जो मसाला तैयार होता है उसी तरह के मसाले में अगर इस काचर को बनाया जाए तो मेरे जैसे चटोरों की चांदी हो जाए।

राजस्थान के मेरे मित्र कल अपने फॉर्म हाउस से इसे लेकर आए थे। उन्होंने पिछले दो साल से इस फल का वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन शुरू किया है। बताते हैं कि अभी इस पर रिसर्च भी चल रहा है, इस फल में औषधिय गुण भी प्रचुर मात्रा में है। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में इससे देसी उपचार भी होता है। पेट के लिए यह रामबाण उपाय है। जिनके कब्ज की शिकायत है, या फिर जिनकी पाचन शक्ति कम हो गई। वो अगर रोज सुबह इसका सेवन करें तो चमत्कारिक फायदा होता है। इस फल को खाने के समय सिर्फ एक सावधानी बरतनी होती है कि आप इसे खाने के बाद पानी का सेवन बिल्कुल न करें। हो सके तो आधे घंटे तक पानी न पीएं।
तो अगली बार जब आप राजस्थान की यात्रा पर निकलें तो काचर का स्वाद जरूर लें। भीषण गर्मी में ही आप इसका स्वाद ले सकते हैं।