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Sunday, September 11, 2016

दीपक तुमने जो किया उसने पत्रकारिता को रोशन कर दिया

‘आज समाज’ के पत्रकार हैं दीपक। युवा और मेहनती। कई बार काम में लापरवाही के कारण मुझसे डांट भी सुनते हैं। हालांकि डांट खाने के बाद उनका उत्साह और बढ़ जाता है। दीपक ने कभी अपने काम का बखान नहीं किया और न ही वह कभी करेगा। पर कल शनिवार की रात उसने जो काम किया उसने हम पत्रकारों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। उसने उन लोगों के चेहरे पर करारा तमाचा मारा है जो लोग हम पत्रकारों को संवेदनहीन कहने से नहीं चूकते हैं।
अभी हाल ही में जब मांझी को अपनी पत्नी का शव कंधे पर ले जाते हुए मीडिया में दिखाया गया, तब भी पत्रकारों को कटघरे में खड़ा कर दिया गया। सवाल पूछे गए। मीडिया ने उनकी मदद क्यों नहीं की। सिर्फ तस्वीरें क्यूं बनाते रहे। अब इन्हें कौन समझाए कि अगर मीडिया ने इन तस्वीरों को नहीं खींचा होता तो पूरी दुनिया कभी नहीं समझ सकती कि वहां क्या हुआ। जिसने भी उन तस्वीरों को खींचा उसने पहले अपना पत्रकारिता धर्म निभाया और फिर मानवता धर्म भी।

खैर ऐसे सैकड़ों उदाहरण आपको मिल जाएंगे। पर मैं बात कर रहा था दीपक की। शनिवार की रात दीपक आॅफिस से काम समाप्त कर करीब 11.30 बजे घर जा रहा था। अंबाला आॅफिस से एक किलोमीटर आगे बढ़ते ही चंडीगढ़ एक्सप्रेस हाईवे पर पीर बाबा की मजार के पास पुल के नीचे उसे कुछ लोगों की भीड़ दिखी। उत्सुक्तावश उसने भी अपनी बाइक रोकी और लोगों से पूछा। वहां बलदेवनगर चौकी के कुछ पुलिसकर्मी भी खड़े थे और पुल से नीचे टॉर्च मार रहे थे। जोहड़ (स्थानीय भाषा में तलाब) पूरी तरह जलकुंभी से भरा हुआ था और किसी गाड़ी की पिछली लाइट नजर आ रही थी। पता चला कि अभी दस मिनट पहले एक गाड़ी इस जोहड़ में समा गई है। किसी को नहीं पता कि उस गाड़ी में कितने लोग हैं? जिंदा भी हैं या नहीं। दीपक ने पुलिसवालों से कहा कि पानी में उतरकर देखते हैं, पर पुलिसवालों का जवाब था क्रेन आ रही है, फिर देखेंगे। दीपक ने कहा कि तब तक तो अगर कोई जिंदा भी होगा वह मर जाएगा। दीपक से रहा नहीं गया। उसने आव देखा न ताव जोहड़ में छलांग लगा दी। पल भर में ही वह जोहर में समाई गाड़ी की छत पर था। घने अंधेरे में कुछ भी नजर नहीं आ रहा था कि गाड़ी के अंदर कितने लोग हैं। इसी बीच एक स्थानीय युवक ने भी हिम्मत दिखाई। दीपक के हौसले को देखते हुए वह भी एक र्इंट लेकर गाड़ी तक पहुंच गया। दीपक और उस युवक ने कड़ी मेहनत के बाद गाड़ी का शीशा तोड़ा और ड्राइविंग सीट पर बेहोश पड़े युवक को किसी तरह बाहर खींच कर ले आए। युवक पूरी तरह बेहोश था। उसे तत्काल पास ही के प्राइवेट हॉस्पिटल में ले जाया गया। डॉक्टर्स के तमाम प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका।
इस बीच मुझे भी हादसे की सूचना मिल गई थी। दीपक ने सभी जानकारी तो दी, लेकिन यह नहीं बताया कि कैसे उसने पत्रकारिता के कर्तव्य के साथ मानवता की एक बेहतरीन मिशाल पेश की। पुलिसकर्मी तमाशबीन बनकर देखते रहे। बाद में दीपक ने बताया कि जब उसे बाहर निकाला तो युवक के शरीर पर चोट के कोई गंभीर निशान नहीं थे। हो सकता है वह युवक पानी के अंदर बेहोश हो गया हो, या फिर उसे गाड़ी से निकलने का कोई रास्ता ही नहीं मिला हो जिसके कारण पानी में उसका दम घुंट गया। अगर समय रहते कोई पुलिसवाला हिम्मत करके तत्काल पानी में उतर गया होता तो हो सकता है युवक की जान बच जाती।
खैर दीपक ने जो हिम्मत दिखाई उसने पत्रकारिता के धर्म को और भी पूजनीय बना दिया। यह एक बेहतरनी उदाहरण है कि एक पत्रकार कितना सजग और मददगार हो सकता है।

एक निवेदन
अब किसी हादसे की तस्वीर खींचते वक्त या हादसे में घायल लोगों से बातचीत करते वक्त कोई मीडियाकर्मी नजर आए तो उसका मजाक मत बनाइएगा। वह पत्रकार अपनी पेशागत मजबूरियों के कारण ऐसा करता है न की आपकी कॉमेडी के लिए। जब जरूरत पड़ती है वह हादसे के शिकार लोगों की खबर करता है और जरूरत पड़ने पर दीपक की तरह घने अंधेरे में अपनी जान की परवाह किए बगैर एक अनजान व्यक्ति के लिए जोहड़ में कूदने का जज्बा भी रखता है।
दीपक इस जिंदादिली और हौसले को सलाम। तुमने हमारा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।