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Monday, February 13, 2017

क्यों प्रधानमंत्री मोदी खो रहे अपना सम्मान?

 
देश ने नरेंद्र मोदी को उनकी ईमानदार और दमदार छवि के कारण प्रधानमंत्री जैसे प्रतिष्ठित पद पर बैठाया था। विश्व के सर्वोत्तम लोकतंत्र के पहरेदार के रूप में उन्हें अप्रत्याशित विजय गाथा के साथ निर्वाचित किया गया था। लोकसभा चुनाव के दौरान हर तरफ मोदी-मोदी की ऐसी धूम मची कि अन्य दूसरे दल चारों खाने चित्त हो गए। पर ऐसा क्या हो रहा है और क्या हुआ है कि मोदी अपनी चमक खोते जा रहे हैं। खासकर किसी राज्य में विधानसभा चुनाव के वक्त क्यों अचानक उनके प्रति लोगों में सम्मान की भावना कम होती जा रही है। यह मंथन का समय है। एक बार फिर मोदी ने अपनी लोकप्रियता और सम्मान को ठेस पहुंचाई है।
यह कोई पहली बार नहीं हुआ है कि नरेंद्र मोदी के सम्मान में इतनी गिरावट आई है। अगर गिरावट मापने का कोई पैमाना होता तो यकिन मानिए इस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में पचास से साठ प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई होती। पर मैं यह बात सिर्फ उन लोगों की बातचीत के आधार पर लिखने की हिम्मत कर रहा हूं जो कुछ समय पहले सिर्फ मोदी-मोदी की रट लगाए रहते थे। मोदी के हर एक कदम पर फूलों की बारिश करने वाले ऐसे लोग अचानक मोदी के नाम चिढ़ने क्यों लगे हैं? ऐस क्यों है कि टीवी पर लाइव चलने वाले उनके भाषण को घंटों टकटकी लगाए देखने वाले अब टीवी पर भाईयों और बहनों की आवाज सुनते ही टीवी का रिमोट खोजने लगने लगे हैं। क्यों ऐसा होने लगा है कि मोदी को देश का भगवान मानने वाले लोग भी अब मोदी की न तारीफ करना और न सुनना पसंद करते हैं।
यह कोई अचानक नहीं हुआ है। जब प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने शपथ ग्रहण किया तो पूरे देश को आस थी कि वे प्रधानमंत्री के तौर अपनी एक अलग पहचान कायम करेंगे। कुछ अर्थों में उन्होंने ऐसा किया भी। विदेशों में जिस तरह उन्होंने भारत और भारतीयता की पहचान को ठोस अंदाज में विश्व के सामने रखा उसने उनके प्रति सम्मान कई गुणा बढ़ा दिया। कई बड़े अंतरराष्टÑीय प्लेटफॉर्म पर उन्होंने भारतीयों को गर्व करने का मौका दिया। कई ऐसे मौके भी आए जब देश ने एक सशक्त प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी को पाकर खुद पर गौरव महसूस किया। देश को ऐसा महसूस हुआ कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में लंबे वक्त के बाद एक सुदृढ़ और सशक्त भारत के लिए वोट किया है। पर अचानक ही कुछ ऐसा होने लगा जिससे देश को नरेंद्र मोदी में प्रधानमंत्री की छवि कम और बीजेपी पार्टी के प्रचारक की छवि अधिक दिखने लगी।

प्रधानमंत्री की छवि को सबसे पहला झटका लगा बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान। उस वक्त तक नरेंद्र मोदी बीजेपी और संघ की छाया से कोसों दूर निकल गए थे। पर बिहार चुनाव में स्टार प्रचारक के रूप में उनके पर्दापण ने सबकुछ मिट्टी पलिद कर दिया। पार्टी को ऐसा लगने लगा कि जिस बिहार ने लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम पर जाति, धर्म और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से ऊपर उठकर बीजेपी को वोट दिया, वही बिहार एक बार फिर से मोदीमय हो जाएगा। शायद ऐसा संभव भी हो जाता, अगर नरेंद्र मोदी एक प्रधानमंत्री के तौर पर रहते। पर उन्होंने प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए प्रचार रैलियों के दौरान सभी सीमाएं लांघ दीं। बिहार चुनाव के दौरान कांग्रेस, जदयू और राजद को थ्री इडियट्स की संज्ञा देकर उन्होंने अपने पैरों में ही कुलाहड़ी मार दी। इसके बाद वोट की भीख मांगते वक्त तो ऐसा लगने लगा जैसे वे प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद पर हैं ही नहीं। नीतिश कुमार से लेकर राहूल गांधी और लालू यादव पर व्यक्तिगत हमले कर उन्होंने अपनी सभी प्रतिष्ठा खो दी। देश ने इसका नतीजा जल्द ही देख लिया जब बिहार में बीजेपी बुरी तरह पराजित हुई। सत्ता और अपनी लोकप्रियता की खुमारी जब निकली तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
एक प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी जो कुछ भी कर रहे हैं उसे पूरा देश देख रहा है। उनके काम के प्रति समर्पण, देश के प्रति प्यार ने ही उन्हें इतना लोकप्रिय बनाया है। पूरे विश्व में भारत और भारतीयता की सशक्त पहचान बनाने में भी वो कोई कसर बाकि नहीं रख रहे हैं। नोटबंदी जैसे सशक्त फैसले लेकर भी उन्होंने दिखा दिया है कि वो वोट के लिए प्रधानमंत्री के पद पर नहीं बैठे हैं। ऐसे में अब उनके लिए मंथन का समय है कि वे क्यों बार बार ओछी और निम्न स्तर की बयानबाजी में उलझ जाते हैं। वे क्यों बार बार यह भूल जाते हैं कि देश उन्हें एक सशक्त प्रधानमंत्री के तौर पर ही देखना चाहता है। पंजाब विधानसभा चुनाव, फिर उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव के दौरान वे लगातार चुनावी रैलियां कर हैं। इन रैलियों में उनके द्वारा दिए जा रहे बयानों पर लोग हंस रहे हैं।
प्रधानमंत्री के तौर पर बिहार में की गई भयानक भूल को एक बार फिर नरेंद्र मोदी 2017 के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में दोहरा रहे हैं। वे इस बात को बार-बार भूल जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री के तौर पर किया जा रहा उनका काम अगर बेहतर और सशक्त होगा तो विभिन्न प्रदेशों के लोग भी उन्हें उसी तरह का प्यार देंगे। हां यह भी सच है कि जिस पार्टी की बदौलत वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं, उस पार्टी के प्रति भी उनका दायित्व है। संविधान में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि प्रधानमंत्री अपने पार्टी का   प्रचार प्रसार नहीं कर सकता है। हर एक प्रधानमंत्री ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान पार्टी के लिए प्रचार किया था। नरेंद्र मोदी भी उसी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। पर लोकतंत्र की मार्यादा और प्रधानमंत्री पद की गरिमा का ध्यान रखते हुए उन्हें कम से कम ऐसे शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए जिससे उनकी प्रतिष्ठा पर आंच न आए। अब संचार के ऐसे साधन मौजूद हैं कि उनकी हर एक बाद रिकॉर्ड होती है, बार-बार सुनवाई जाती है। क्षण भर में उनके मुंह से निकली बातें वायरल हो जाती हैं। ऐसे में नरेंद्र मोदी को किसी पर व्यक्तिगत हमले करने या असम्मानजनक भाषा का प्रयोग करने से जरूर बचना चाहिए। पूरा देश उन्हें एक सम्मानित प्रधानमंत्री के तौर पर चाहता है, न कि एक बाजारू और राजनीतिक भाषा बोलने वाले किसी पार्टी के प्रचारक के तौर पर। अब भी समय है। मंथन जरूर करें। आने वाले दिनों में उनकी कई रैलियों का दिन और समय तय है। इन रैलियों में वे प्रधानमंत्री बने रहें तो ठीक, वरना बिहार की जनता की तरह दूसरे राज्यों की जनता भी बहुत समझदार है।