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Tuesday, January 19, 2016

रोहित वेनुला के नाम पर लिखा एक खत,,, प्लीज तुम लोग रोहित मत बनना

 
डीयर रोहित तुमने सुसाइड जैसे कायरतापूर्ण कदम उठाने से पहले एक खत लिखा। तुमने लिखा और बहुत खूब लिखा। तुमने कहा कि जब हम लोग (जो जिंदा हैं) जब तुम्हारा खत पढ़ रहे होंगे तब तक तुम दूसरी दुनिया में जा चुके होगे। रोहित मैंने तुम्हारा खत पढ़ा। शायद इसीलिए तुम्हें यह खत लिख पा रहा हूं। मुझे पता है तुम दूसरी दुनिया में यह खत नहीं पढ़ सकोगे, क्योंकि पता नहीं वहां की भाषा क्या होगी। हिंदी होगी, उर्दू होगी, बंगाली होगी, असमिया होगी या पंजाबी या कोई अन्य भाषा। मुझे नहीं पता कि तुम वहां किस बोली में अपने जैसों से संवाद स्थापित कर रहे होगे। पर फिर भी तुम्हें खत लिख रहा हूं। शायद इस उम्मीद से कि तुम्हारे नाम से 'जिंदा' होने वाले बहुत लोग तुम्हारे जैसे युवाओं को फिर से भटकाएंगे। उन्हें बहलाएंगे। फिर एक ऐसे मोड़ पर ले जाकर छोड़ जाएंगे, जहां से एक ही रास्ता बचता है। हां, वही रास्ता जिस पर तुम चले गए।
From Rohith Vemula FB post

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  रोहित
आज सुबह मैं तुम्हारा फेसबुक प्रोफाइल देख रहा था। पता नहीं क्यों उसे देख कर अच्छा कम लगा और बुरा अधिक। अच्छा इसलिए लगा कि तुम्हारे अंदर अपनी बातों को बेबाकी से रखने की हिम्मत थी। तुम बेखौफ होकर अपने दलित होने का ढोल पीट सकते थे। बेहद पूरजोर तरीके से दलितों की राजनीति कर रहे थे। पर अफसोस इस बात का रहा कि तुम्हारे जैसे रिसर्च स्कॉलर की प्रोफाइल में सिर्फ और सिर्फ राजनीति वह भी दलितों को लेकर रची जाने वाली राजनीति की बू आ रही थी।
मैं हैरान इस बात से था कि एक दलित वर्ग (जैसा कि तुमने बताया है अपनी फेसबुक में) से आया युवा इतनी उच्च तालीम ले रहा था वह कैसे इन तुच्छ राजनीति के चक्कर में पड़ गया। लाखों युवा हैं जो इस वर्ग से आते हैं, पढ़ते हैं, नौकरी पाते हैं, अपने परिवार का मान और सम्मान बढ़ाते हैं। देश और विदेश में नाम कमाते हैं। ऐसे हाइली क्वालिफाइड युवा को क्या जरूरत पड़ गई कि वह कास्ट पॉलिटिक्स में पड़कर अपना भविष्य चौपट करने में जुट गया। मैं यह देखकर हैरान था कि कैसे एक युवा खुद के दलित होने का ढ़ोल पीटकर सिर्फ और सिर्फ हिंदु, मुस्लिम, अंबेदकर, स्वामी विवेकानंद आदि..आदि के नाम पर अपने सोशल मीडिया के दोस्तों को अपनी सोच से अवगत करा रहा है।
रोहित मैंने भी कॉलेज और यूनिवर्सिटी में शिक्षा-दीक्षा ली है। मैं उस कॉलेज का विद्यार्थी रहा जहां एक तरह से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव पड़ी। महात्मा गांधी ने जब चंपारण मूवमेंट शुरू किया तो सबसे पहले हमारे कॉलेज में उन्होंने डेरा डाला। बिहार के मुजफ्फरपुर के उस कॉलेज का नाम वैसे तो लंगट सिंह कॉलेज था। पर इस कॉलेज का शुरुआती नाम ब्राह्मण-भूमिहार कॉलेज था। तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि जिस कॉलेज के नाम से ही जातिवाद की बू आती हो उसी कॉलेज से एक से बढ़कर एक दलित छात्रों ने शिक्षा पाई और कई बड़े मुकाम हासिल किए। हद तो यह था कि इसी कॉलेज के कैंपस में दलितों के लिए अलग छात्रावास की व्यवस्था थी। इतनी ऊंची-नीची खाई के बावजूद कभी मैंने यहां दलितों के नाम पर किसी का उत्पीड़न नहीं देखा। हमेशा मैं इस छात्रावास में जाता था और कभी मैंने यहां उच्च या नीच जाति का भेदभाव नहीं देखा। आज भी कई ऐसी दलित हस्तियां हैं तो उसी कॉलेज में पढ़ा रही हैं। राहित मैं तुम्हें नजदीक से नहीं जानता, पर फेसबुक के जरिए जितना मैं तुम्हें समझ पा रहा हूं तुम एक ऐसे कास्ट सिंड्रोम से पीड़ित थे, जिसका न कोई ईलाज था, न है और न भविष्य में इसकी कोई दवा बनेगी।
रोहित यह भारतीय संविधान ही है जिसने तुम्हें इतना अधिकार दे रखा है कि तुम खुलेआम एक आतंकी के लिए शोकसभा का आयोजन करवा सको। तुमने बीफ फेस्टिवल का आयोजन करवाकर भी अपनी दलित राजनीति और तथाकथित पॉवर का मुजायरा पेश किया। खुलेआम मनुस्मृति दहन आंदोलन का अगुवा बन बैठे। जिस विवेकानंद को पूरी दुनिया मानती है उसका खुलेआम मजाक बना सको। खुलेआम गालियां दे सको। तुम्हारे अनुसार जो भी अगड़ी जाती से है वह तुम्हारा दुश्मन है। बेहद अफसोस आया रोहित तुम्हारी इस मानसिकता को देखकर। फिर तुम कहते थे कि तुम्हारे खिलाफ यूनिवर्सिटी ने दलित विरोधी नीति अपनाई। तुम्हें दलितों के नाम पर प्रताड़ित किया गया।

तुम बाबा साहब अंबेडकर को भगवान की तरह पूजते थे (जैसा कि तुम्हारा सोशल मीडिया प्रोफाइल बता रहा है), तो क्या तुम्हें उनके द्वारा बनाए गए संविधान पर तनिक भी विश्वास नहीं था। तुम्हें तो संविधान सम्मत इतने अधिकार दिए गए थे कि तुम अपना हक आसानी से ले सकते थे। फिर भी तुम युनिवर्सिटी और एचआरडी मिनिस्ट्री के खिलाफ मोरचा खोले बैठे थे। तुम तो यह मान बैठे थे कि अदालत से तुम्हें न्याय नहीं मिलेगा, इसीलिए दलितों वाली राजनीति में घुस जाओ।
जब तुम्हें और तुम्हारे तीन-चार और साथियों को हॉस्टल से निकाला गया। जब तुम्हारे ऊपर प्रतिबंध लगा दिया गया कि तुम ग्रुप में युनिवर्सिटी कैंपस में नहीं टहल सकते हो, तब तुमने नहीं सोचा कि आखिर तुमने कितना बड़ा गुनाह किया है कि पूरी युनिवर्सिटी एडिमिनिस्ट्रेशन को इतना कड़ा फैसला लेना पड़ा। यह सब जानते हुए कि तुम दलित वर्ग से आते हो, दलितों की राजनीति में   सक्रिय हो। बावजूद इसके युनिवर्सिटी ने इतना बड़ा कदम कैसे उठा लिया। रोहित, यह बताने की जरूरत नहीं कि एक सेंट्रल युनिवर्सिटी के अंदर कितने कड़े नियम होते हैं। तुम्हारे खिलाफ बिना पर्याप्त सबूतों के युनिवर्सिटी इतना बड़ा ‘गुनाह’ कैसे कर सकती थी।
रोहित तुम अपने खिलाफ हुए अन्याय के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते थे। तुम्हारे ही खत से मुझे पता चला कि तुम्हें वजिफा मिलता था। जरूर तुम स्कॉलर रहे होगे तभी तुम्हें इतना वजिफा मिलता था जितना एक स्कूल के हेडमास्टर को तनख्वाह नहीं मिलती है। पर तुम पढ़ाई से अधिक राजनीति में सक्रिय रहे। तुम्हें तो याद ही होगा कि तुम्हारे खिलाफ माहौल तब बनना शुरू हुआ था जब तुम पर कैंपस में मारपीट का आरोप लगा था। मुजफ्फरनगर हिंसा पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म की स्क्रीनिंग का विरोध करते वक्त तुम और तुम्हारे साथियों की लड़ाई कैंपस के दूसरे राजनीति गुट के साथ हुई थी। और इसी के बाद तमाम कमेटी और सबकमेटी की रिपोर्ट के बाद तुम्हें कैंपस और हॉस्टर से डी-बार किया गया था।

रोहित क्या जरूरत थी इस तरह की गंदी राजनीति में पड़ने की। तुम्हारे जैसे हजारों युवा इसी तरह की कास्ट पॉलिटिक्स में पड़कर अपना भविष्य अंधेरे में झोंक रहे हैं। तुम भले ही मेरा यह खत नहीं पढ़ पा रहे होगे, लेकिन देख जरूर रहे होगे कि तुम्हारे नाम से कितने लोग ‘जिंदा’ हो गए हैं। तुम्हारी मौत भी एक तमाशा बनकर रह गई है। रोहित तुम तो चले गए, पर विश्वास करो तुम्हारी लाश को लंबे समय तक जिंदा रखा जाएगा। ऐसा ही एक बार मंडल कमीशन के दौर में हुआ था। उस लाश को भी तब तक दफन नहीं किया गया जब तक मंडल-कमंडल का दौर खत्म नहीं हुआ। अब एक बार फिर तुम्हारी लाश को राजनीति के अखाड़े में खड़ा कर दिया गया है। रोहित मैंने टीवी पर रोते-बिलखते तुम्हारे परिजनों को देखा है। तुम्हारे मां के चित्कार मेरे कानों को रौंद रहे थे। उनकी भाषा तो समझ नहीं आ रही थी, पर महसूस कर सकता था कि एक होनहार बेटे का इस कदर दूर चले जाना मां को सीने को कैसे चीर रहा था। सच कह रहा हूं, उन्हें देखकर मुझे भी रोना आ रहा था।

तुम्हारे जैसा निडर और बेखौफ रहने वाला व्यक्ति आत्महत्या जैसा कायरतापूर्ण कदम नहीं उठा सकता है। मुझे तो लगता है सच में तुम्हारी हत्या ही हुई है। देखो न, जिस तरह तुम्हारे मरते ही तुम्हारे युनिवर्सिटी में राजनीति के हाशिए में खड़े लोग पहुंचने लगे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे तुम्हारी लाश से उन्हें संजीवनी मिल गई है। मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे इसी राजनीति के लिए तुम्हें बली का बकरा बनाया गया है। मुझे तुम्हारी आत्महत्या में साजिश की गहरी बू आ रही है। तुमने खुद आत्महत्या की या तुमसे यह आत्महत्या करवाई गई, यह राज तो तुम्हारे साथ ही दफन हो गए। पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि तुम खुद नहीं मरे हो।

रोहित मुझे बेहद अफसोस है कि तुमने अपने सुसाइड नोट में बहुत कुछ कहा, अपने खालीपन का जिक्र किया। पर देश के युवा तुम्हारी तरह इस खालीपन को न जिएं इसके लिए तुम युवाओं के लिए एक छोटा सा संदेश तक नहीं दे सके। मुझे माफ करना तुम्हारे नाम से मैं उनके लिए दो शब्द लिखने की हिमाकत कर रहा हूं।।।।
‘‘ मेरे प्यारे दोस्तों मैं अपने शानदार भविष्य को छोड़कर, अपने बेहद प्यार करने वाली मां और परिजनों को छोड़कर, अपने जान से भी प्यारे दोस्तों को छोड़कर इस दुनिया से जा रहा हूं। इसका कारण सिर्फ इतना है कि मैंने युनिवर्सिटी कैंपस में पढ़ाई छोड़कर राजनीति में कदम बढ़ा लिया। इस राजनीति ने मुझे इस मुकाम तक पहुंचा दिया जहां सिर्फ मौत ही अगला पड़ाव था। तुम युवाओं से गुजारिश है प्लीज रोहित मत बनना। ’’
तुम्हारा अपना रोहित वेनुला
रिसर्च स्कॉलर, सेंट्रल युनिवर्सिटी, हैदराबाद