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Friday, September 4, 2015

साहब! सड़क पर कलाम का नाम बदनाम ना करो

बहुत पहले गैंगटोक गया था। वहां का सबसे मुख्य मार्ग, जहां लग्जरी होटल्स की बहार है, सबसे अधिक इटिंग ज्वाइंट्स हैं, उसका नाम महात्मा गांधी मार्ग था। पर यह नाम सिर्फ कागजों और वहां लगे एक शिलापट पर ही दिखता था। पूरे गैंगटोक में किसी से भी पूछ लें कि महात्मा गांधी मार्ग जाना है, वहां जाने का रास्ता बता दें। सब यही पूछेंगे महात्मा गांधी मार्ग? यह कहां है? पर जैसे ही आप पूछेंगे माल रोड जाना है, लोग वहां गलियों से पहुंचने तक का आसान रास्ता बता देंगे। बात सिर्फ इतनी है कि क्या हम किसी सड़क का नाम किसी महापुरुष के नाम पर रखकर उन्हें सम्मान के उच्चतम शिखर पर पहुंचा देते हैं या हमें मंथन करने की जरूरत है कि सड़कों के नाम पर राजनीति न कर उन महापुरुषों के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के प्रति कृतसंकल्पता दिखानी होगी। साथ ही, क्या हमें भारतीय ऐतिहासिकता से जबर्दस्ती छेड़छाड़ करनी चाहिए?
दिल्ली के सबसे ऐतिहासिक औरंगजेब मार्ग का नाम परिवर्तित कर डॉ. अब्दुल कमाल के नाम पर कर दिया गया है। यह फैसला दिल्ली की आप सरकार और उसके अंडर काम करने वाली एनडीएमसी (नई दिल्ली नगर निगम पालिका परिषद) ने इतनी जल्दबाजी में लिया जिसका कोई अर्थ समझ से परे है। स्पष्ट कर दूं कि भाजपा सांसद महेश गिरि, मीनाक्षी लेखी व आप के ट्रेड विंग सचिव ने एनडीएमसी से गत 28 अगस्त को नाम बदलने की सिफारिश की थी और एक सप्ताह के अंदर-अंदर यह हो भी गया। लुटियंस दिल्ली के तकरीबन सारे मार्ग या तो मध्यकालीन मुगल शासकों के नाम पर हैं, या उनके नाम पर हैं जिनके नाम मुगलकालीन शासकों ने रखे थे। ऐतिहासिक तथ्य है कि इन्हीं नामों में सम्राट अशोक के नाम पर भी मार्ग स्थापित है और पृथ्वीराज चौहान के नाम पर भी मार्ग है। बात सिर्फ हिंदु या मुसलमान शासकों या राजाओं की नहीं है, बात यह है कि हम क्यों ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने पर तुले हैं। क्या यह इतना जरूरी था कि एक मुगलकालीन बादशाह के नाम पर जिस सड़क का नाम था वहां एक सर्वकालिक महान व्यक्ति का नाम चिपकाकर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त कर दें।
मुगल शासक औरंगजेब के चरित्र, उसकी राजकाज की क्षमता के आधार पर लंबी बहस हो सकती है। डॉ. कलाम के नाम का समर्थन करने वाले औरंगजेब को एक निरंकुश शासक तक बताने में नहीं चूक रहे हैं, पर क्या इस ऐतिहासिक तथ्य से भी इनकार किया जा सकता है कि वह हमारे देश का ही शासक था? क्या हम भविष्य में इतिहास के किताबों से भी औरंगजेब का नाम हटाने की सिफारिश कर सकते हैं? क्या इतिहास के प्रश्नपत्रों और यूपीएससी की परीक्षाओं में भी औरंगजेब के नाम से प्रश्न पूछने पर मनाही की घोषणा की जा सकती है? अगर ऐसा नहीं है तो दिल्ली सरकार को इसका जवाब भी देना चाहिए कि औरंगजेब मार्ग का नाम परिवर्तित करने के पीछे क्या और कैसा तर्क था।
इस वक्त सीरिया में आईएस के लड़ाकू एकसूत्रीय काम में लगे हैं, वह काम है वहां मौजूद सैकड़ों साल पूराने ऐतिहासिक इमारतों का ध्वस्त करने का। विध्वंसक बारूद लगाकर ऐतिहासिक इमारतों और खंडहरों को जमींदोज किया जा रहा है। आईएस लड़ाकों की मंशा को आसानी से समझा जा सकता है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। तो क्या हमारे देश में भी उसी प्रवृति की एक झलक मिली है। अभी एक मार्ग का नाम परिवर्तित किया गया है, उसके बाद क्या लाल किले और आगरे के किले और ताजमहल की भी बारी आएगी?
सरकार के कदम की सराहना करने वाले अब इस बात की भी मांग करने लगे हैं कि औरंगजेब रोड की तरह ही हुमायंू रोड, अकबर रोड आदि का नाम भी बदल कर नए युग निर्माताओं के नाम पर रखना चाहिए। हो सकता है आने वाले दिनों में ऐसा कर भी दिया जाए। पर इस पर भी मंथन जरूर किया जाना चाहिए कि इन्हीं मुगलशासकों द्वारा लालकिला भी बनाया गया था। इसी लालकिले की प्राचीर से हर साल स्वतंत्रता दिवस की हुंकार भरी जाती है। यही प्राचीर भारत की भव्यता और विराटता के प्रतीक के रूप में पूरे विश्व में नुमांया होती है।
भारतीय स्वतंत्रता में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों, नए भारत का निर्माण करने वालों युगपुरुषों और बड़े राजनेताओं के नाम पर सड़कों का नामकरण करने में कोई बुराई नहीं है। पर यह भी मंथन करने वाली बात है कि ऐतिहासिक तथ्यों या नामों से छेड़छाड़ कर हम कौन सा संदेश देना चाहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि डॉ. कलाम का सम्मान हर एक भारतीय दिल से करता है, पर क्या हम ऐतिहासिक नामों को बदलकर उनका नाम वहां चस्पा कर डॉ. कलाम के आदर्शों का उचित सम्मान कर रहे हैं। क्या हम औरंगजेब की तुलना डॉ. कलाम से कर रहे हैं। इसे भारत सरकार के राणनीतिकारों की ऐतिहासिक भूल के रूप में देखा जाना चाहिए।
हर साल दिल्ली में सैकड़ों नए मार्ग बनाए जाते हैं। दिल्ली और नई दिल्ली में लगातार विकास हो रहा है। सैकड़ों फ्लाईओवर और नए मार्ग इस तरह बन रहे हैं कि दिल्ली के लोग भी हर तीसरे महीने कन्फ्यूज रहते हैं कि किस रास्ते से जाना है। क्या हम ऐतिहासिकता से छेड़छाड़ किए बगैर इन्हीं मार्गों में से किसी एक का नाम डॉ. कलाम के नाम पर नहीं रख सकते थे? क्या यह जरूरी था कि एक ऐतिहासिक मार्ग   के नाम के साथ ही छेड़छाड़ कर हम डॉ. कलाम के प्रति सच्ची श्रद्धा दिखा सकते हैं? अब तो जो होना था वह हो गया। पर मंथन जरूर किया जाना चाहिए कि भविष्य में हम इस ऐतिहासिक भूल को नहीं दोहराएं, क्योंकि बहुत जोर-शोर से मांग हो रही है कि तमाम अन्य वैज्ञानिकों, शहीदों और बड़े हिंदू राजनेताओं के नाम पर सड़कों का नामकरण किया जाए। कहीं ऐसा न हो जाए कि हम भी सड़कों के नाम के खेल में आईएस लड़ाकों जैसा ही कदम नहीं उठाते रहें। ऐतिहासिकता को नष्ट करते रहें।


चलते-चलते
नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) द्वारा नाम बदलने के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एनडीएमसी से पूछा है कि उसने किस आधार पर औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे कलाम रोड किया है? सुनवाई 22 सितंबर को होनी है, पर एनडीएमसी ने तर्क दिया है कि इससे पहले भी वह कई सड़कों का नाम बदल चुका है। एनडीएमसी द्वारा दी गई जानकारी पर आप भी गौर फरमाएं...
1.हुमायुं लेन को बरदुकिल लेन
2.स्टिंग रोड को कृष्णा मेनन मार्ग
3.वेलेसले रोड को जाकिर हुसैन मार्ग
3.कनाट सर्कस को इंदिरा चौक
4.कनाट प्लेस को राजीव चौक
5.कनिंग लेन को माधव राव सिंधिया लेन
6.विलिंगटन क्रिसेंड रोड को मदर टेरेसा रोड