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Saturday, June 6, 2015

कहां हैं मानवाधिकार का झंडा उठाने वाले?

मणिपुर में भारतीय सेना के 17 जवान शहीद हो गए। कई जवान जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। पिछले कुछ महीने में जम्मू कश्मीर में सेना पर लगातार घात लगाकर हमले हो रहे हैं। यहां भी जवान शहादत दे रहे हैं। पर लगातार आतंकियों से लोहा लेते हुए संदेश भी दे रहे हैं कि हम हर कीमत पर अपने वतन की रक्षा को तत्पर रहेंगे। इन शहादतों के बीच सबसे अहम है मानवाधिकार का झंडा उठाने वालों की खामोशी। किसी आतंकी की मौत या एनकाउंटर पर सबसे आगे आने वाले इन झंडेदारों की नजर में सैनिकों की शहादत की शायद कोई कीमत नहीं है। आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (अफस्पा) का लगातार विरोध कर रहे संगठनों को भी सैनिकों की शहादत नजर नहीं आती है। कैसे गुरिल्ला की तरह छिपकर वे सैनिकों पर हमला कर रहे हैं और बेरहम बन जा रहे हैं। यह उन्हें नजर नहीं आता है। यह कैसी सोच है। अफस्पा के खिलाफ विरोध का स्वर उठाने वालों के लिए मणिपुर की घटना आंख खोलने वाली होनी चाहिए।
म्यांमार की सीमा से लगा मणिपुर वर्षों से उग्रवाद का शिकार रहा है। अशांत क्षेत्र घोषित होने के बाद से ही यहां अफस्पा लागू किया गया था।  सेना को अफस्पा द्वारा मिले विशेषाधिकार की ही परिणाम है कि आज वहां थोड़ी बहुत शांति है। मणिपुर में उग्रवाद का लंबा इतिहास रहा है। यहां के उग्रवादी संगठनों में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और केवाईकेएल ज्यादा खतरनाक हैं। रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट (आरपीएफ) की ही हथियारबंद शाखा के रूप में पीएलए अस्तित्व में आया था। यह बताने की जरूरत नहीं कि बांग्लादेश या आम भारतीय की भाषा में कहें तो मिनी पाकिस्तान से कैसे आरपीएफ अपनी निर्वासित सरकार चला रहा है। आरपीएफ और उससे जुड़ी शाखाएं कभी भी भारत के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न करने में सक्षम है। 
जम्मू कश्मीर में जिस तरह आतंकी और अलगावादियों ने अलग कश्मीर का राग छेड़ रखा है ठीक उसी तरह मणिपुर की आजादी के लिए भी संघर्ष चल रहा है। साल 1978 से मणिपुर में सक्रिय उग्रवादी संगठन पीएलए मैती, नगा और कुकी कबीलों ने एक साथ आजादी का राग अलापना शुरू किया, जो आज तक जारी है। ऐसे में अगर भारतीय सेना ने यहां मोरचा नहीं लिया होता तो वहां के विनाश की कल्पना नहीं की जा सकती। हद तो यह है कि चीन जैसा अविश्वासी पड़ोसी भी मणिपुर के आतंकी संगठनों के जरिए भारत में अलगवाद की आग को सुलगाता रहा है। नब्बे के दशक में पीएलए को चीन की पीपुल लिबरेशन आर्मी ने ल्हासा में जबर्दस्त सैनिक प्रशिक्षण भी दे रखा है। हाल के वर्षों में म्यांमार में एनएससीएन इसके उग्रवादियों को अतिरिक्त प्रशिक्षण देता रहा है।
ऐसे में कैसे मणिपुर को सेना के मिले विशेषाधिकार से अलग करके देखा जा सकता है। शुरू से ही यहां के आतंकी संगठनों ने भरतीय सैनिकों को टारगेट कर रखा है। अगर भारतीय सेना को जम्मू कश्मीर और मणिपुर जैसे अशांत राज्यों में अफस्पा के जरिए विशेषाधिकार न मिले होते तो ये राज्य कब के हमसे अलग हो चुके होते। मानवाधिकार का झंडा उठाने वालों को सेना का जज्बा और उनकी शहादत तो नजर नहीं आती है, लेकिन अगर किसी आतंकी संगठन या उससे जुड़े लोगों को सेना मार गिराती है तो मानवाधिकार का हनन नजर आने लगता है। आंदोलन छेड़ दिए जाते हैं। मंथन इस बात पर नहीं होना चाहिए कि अफस्पा हटाया जाया जाना चाहिए या नहीं, मंथन तो इस बात पर होना चाहिए कि अगर ये कानून न हों तो भारत जैसा लोकतांत्रिक देश कितने हिस्सों में बंट जाएगा।
यह सही है कि सेना को मिले विशेषाधिकार के कारण जम्मू-कश्मीर हो या मणिपुर, यहां के स्थानीय लोगों को थोड़ी बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पर उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि अगर सेना न हो तो उनका क्या होगा। हर घर में आतंकी पनाह लिए होंगे, हर वक्त गोलियों की तड़तड़ाहट से शहर गूंजते रहेंगे। बहु-बेटियों की इज्जत सड़कों पर निलाम होती रहेगी।  हाल ही में अफस्पा को लेकर गृह मंत्रालय ने आवाज उठाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की समिति के पास पेश की गई जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी कमेटी की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करने की मांग गृह मंत्रालय की तरफ से की गई है। रेड्डी कमेटी ने अफस्पा को उत्पीड़न का प्रतीक बताते हुए निरस्त करने का सुझाव दिया है।
  दरअसल मणिपुर में असम राइफल्स की हिरासत में एक महिला थंगजाम मनोरमा का निधन हो गया था। इसके विरोध में वहां बड़ा आंदोलन हुआ। इरोम शर्मिला भी उसी वक्त से आमरण अनशन पर बैठी है। उसकी एक ही मांग है कि मणिपुर से अफस्पा हमेशा के लिए हटा दिया जाए। इसी मामले की जांच के लिए 2004 में जस्टिस रेड्डी कमिशन का गठन हुआ था। पांच सदस्यीय कमेटी ने जून 2005 में अपनी  147 पेज की रिपोर्ट में अफस्पा को निरस्त करने की सिफारिश की थी। यही रिपोर्ट अब प्रधानमंत्री के पास है।
गृह मंत्रालय के अलावा रक्षा मंत्रालय की नजर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कमेटी की तरफ लगी है। गृह मंत्रालय ने अपना स्टैंड क्लियर कर दिया है। चुंकि यह आतंरिक सुरक्षा का मामला है इसीलिए रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी स्पष्ट कर दिया है कि गृह मंत्रालय जबतक हमारी मदद चाहता है तो हम हर संभव मदद देते रहेंगे। इसी   बीच मणिपुर में बीस सैनिकों की शहादत ने अफस्पा की प्रासंगिता पर नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री का फैसला भविष्य में चाहे जो भी हो, पर इतना जरूर है कि जिस दिन भारतीय सेना को विशेषाधिकार से महरूम किया गया, उसी दिन से कश्मीर और मणिपुर जैसे अशांत राज्यों को भारतीय गणराज्य से अलग करके देखना शुरू कर देना होगा। और जहां तक शर्मिला और उनके जैसे मानवाधिकार संगठनों की बात है तो वे तो आंदोलन करते ही रहेंगे। क्या कभी किसी ने भारतीय सैनिकों की शहादत पर आंदोलन या आमरण अनशन किया है? क्या किसी ने इन शहीदों का बदला लेने के लिए आंदोलन किया है?