Monday, September 11, 2017

संत और बाबा परंपरा के अंतर को समझना होगा


भारतीय इतिहास के कई स्वर्णिम युगों में सनातम धर्म की परंपराओं ने एक अलग मान और सम्मान का काम किया है। युगों-युगों से इस सनातनी परंपरा ने हमारे हिन्दु धर्म को मजबूत और सुसंस्कृत बनाने का काम किया है। जब आदि शंकराचार्य ने पूरे भारतवर्ष में अखाड़ा परंपरा की नींव डाली थी तो उस वक्त शायद किसी ने परिकल्पना भी नहीं की होगी कि इस अखाड़ा परंपरा के समकक्ष डेरा परंपरा शुरू हो जाएगी। और एक वक्त ऐसा आएगा कि इन्हीं डेरा परंपराओं के स्वयंभू बाबा सनातन धर्म के साधू-संतों और सन्यासियों को भी अपने कुकर्मों और अधर्मों से अपवित्र करना शुरू कर देंगे। मंथन का वक्त है कि हम अपने सनातन धर्मों को छोड़कर क्यों ऐसे डेरों और बाबाओं की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।
इस बीच स्वयंभू बाबाओं और सनातन धर्म की परंपराओं के बीच की लकीर को स्पष्ट करते हुए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने बड़ा कदम उठाया है। परिषद ने रविवार को धर्म नगरी इलाहाबाद में बड़ी बैठक करते हुए देश भर के 14 फर्जी बाबाओं की लिस्ट जारी की है। अखाड़ा परिषद के लिए भी इस लिस्ट को जारी करना बड़ी चुनौती होगी। पर अखाड़ा परिषद ने साधूवाद की इन्होंने देर से ही सही एक सार्थक कदम उठाया है। इलाहाबाद में अखाड़ा कार्यकारिणी की बैठक के बाद जारी इस लिस्ट में आसाराम उर्फ आशुमल शिरमानी, राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर, सचिदानंद गिरी उर्फ सचिन दत्ता, गुरमीत राम रहीम, ओम बाबा उर्फ विवेकानंद झा, निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह, इच्छाधारी भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी, स्वामी असीमानंद, ऊं नम: शिवाय बाबा, नारायण सार्इं, रामपाल, खुशी मुनि, बृहस्पति गिरि और मलकान गिरि समेत कुल 14 नाम शामिल हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के इस साहसिक फैसले ने निश्चित तौर पर भारत में धर्म के नाम पर चल रहे आडंबर, झूठ और फरेब पर एक बड़ी और उद्देश्यपूर्ण बहस को जन्म दे दिया है। लंबे समय से धर्म के इस महाजाल पर बहस होती आ रही है, लेकिन शायद यह पहली बार है कि इतना बड़ा और सार्थक फैसला लिया गया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद में देश के सभी 13 अखाड़े शामिल हैं। 
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी

लिस्ट जारी करने के बाद अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी ने कहा है कि काफी दिनों से फर्जी बाबाओं के द्वारा धर्म के नाम पर दहशत फैलाया जा रहा था। इन बाबाओं द्वारा बलात्कार, शोषण और देश की भोली भाली जनता को ठगने की खबरें आती रही हैं। कई बाबाओं के मामले में तो अदालत भी फैसला दे चुकी है। इन लोगों के कारण ही हिन्दू धर्म, संत समाज और सनातन परंपरा की बदनाम होती है। इसलिए परिषद ने ये फैसला लिया है कि वह स्वयं फर्जी बाबाओं की लिस्ट जारी कर दें, ताकि जनता उनसे सचेत रहें। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह कोई अंतिम सूची नहीं है। भविष्य में भी ऐसी सूचियां आएंगी जिससे आम जनता भी सचेत रहे।
अखाड़ा परिषद ने तो स्पष्ट तौर पर फर्जी बाबाओं के नाम उजागर कर दिए हैं। हो सकता है बहुत से लोगों को इस लिस्ट पर आपत्ति भी हो। इसकी भी आशंका है कि इन फर्जी बाबाओं के समर्थक किसी हिंसक घटना को अंजाम देने पर उतारू हो जाएं। पर मंथन करने की जरूरत है कि धर्म के नाम पर ऐसी ठेकेदारी करने वालों पर हम आंख मूंद कर कैसे विश्वास कर लेते हैं। कैसे हमारी ही बदौलत ये बाबा अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाते हैं और हमारी मासूमियत का फायदा उठाते हैं। ग्लैमरस लाइफ स्टाइल, देश विरोधी हरकतों को करते हुए कैसे ये स्वयंभू भगवान के रूप में हमारे सामने आते हैं और हम भी आंखों पर धर्म का काला चश्मा लगाए इन पर अंध भक्ति प्रदर्शित करने लगते हैं।
जगद्गुरु पंचानंद गिरी
जूना अखाड़ा के जगद्गुरु पंचानंद गिरी कहते हैं धर्म-आस्था हमारी सनातन परंपरा हैं, जिसमें हम अपने आराध्य देव की आराधना करते हैं। उन्हें पूजते हैं और उनके आशीर्वाद से हम फलीभूत होते हैं। पर सनातन धर्म में डेरा और स्वयंभू बाबा परंपराओं का कहीं भी स्थान नहीं है। इन डेरों के स्वामी खुद को भगवान मान लेते हैं और अपने भक्तों को धर्म का ऐसा चश्मा लगा देते हैं जिसमें कुछ दूसरा नजर नहीं आता है। हमें ऐसे बाबाओं और डेरों से सावधान रहने की जरूरत है। 
संपूर्णानंद ब्रहचारी 

वहीं अग्नि अखाड़ा के सचिव संपूर्णानंद ब्रहचारी कहते हैं अखाड़ा परिषद ने जो साहसिक कदम उठाया है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। हमें समझने की जरूरत है कि संत समाज का हिन्दू धर्म और संस्कृति में एक अहम स्थान है। पर हमारी परंपरा में स्वयंभू बाबाओं का कोई स्थान नहीं। लोगों को इस बात को समझने की जरूरत है कि सनातन परंपरा और डेरा परंपरा या स्वयंभू परंपरा में कितना अंतर है। एक तरफ सनातन परंपरा है जिसने हिन्दू धर्म की स्थापना से लेकर इसे सींचने और सहेजने का काम किया है। जबकि स्वयंभू परंपरा का संचालन करने वाले डेराओं के बाबाओं ने धर्म के नाम पर एक ऐसा प्रदूषण फैलाया है जो हमारे समाज को धर्म से ही दूर कर रहा है। हमें समझने की जरूरत है।
आदि शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म के उत्थान और रक्षार्थ कई बड़े कदम उठाए। ऐसे ही एक कदम था सात अखाड़ों की स्थापना। इन अखाड़ों में महानिवार्णी अखाड़ा, निरंजनी आखाड़ा, जूना अखाड़ा, अटल आखाड़ा, आवाह्न अखाड़ा, अग्नि और आनंद अखाड़ा प्रमुख है। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी सनातन धर्म पर हमले हुए हैं इन अखाड़ों के साधू संतों ने अपनी सार्थक भूमिका का निर्वहन किया है। यहां तक कि अंग्रेजों के शासन के समय भी अंग्रेज इन अखाड़ों और साधू संतों की बातों को सुनते और समझते थे। इन्हें सम्मान देते थे। पर हाल के वर्षों में जिस तरह बाबाओं ने अपनी बाबागिरी और धर्म के नाम पर लूट खसोट का मायाजाल बिछाया है वह अकल्पनिय है।
इन बाबाओं की लिस्ट जारी कर अखाड़ा परिषद ने भारतीय समाज के लिए एक मार्गदर्शक का काम किया है। हालांकि अखाड़ा परिषद को भारतीय सनातन परंपरा को पवित्र रखने के लिए ऐसे ही कई और कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सबसे जरूरी है ऐसे बाबाओं, धर्मगुरुओं, पीठाधिश्चरों, स्वयंभू संतों को चेतावनी जारी करना जिसमें स्पष्ट तौर पर इस बात जिक्र हो कि धर्म के नाम पर अगर किसी ने लोगों को गुमराह करने की कोशिश की तो उसे हरगीज स्वीकार नहीं किया जाएगा। डेरा सच्चा सौदा के सर्वेसर्वा राम रहीम के कुकर्मों का सामने आना इस बात का प्रमाण है कि कैसे ये स्वयंभू संत धर्म और आस्था के नाम पर लोगों के सेंटिमेंट से खिलवाड़ कर रहे हैं। मंथन करें और सचेत रहें।

Monday, August 14, 2017

शर्म है कि किसी को शर्म आती नहीं

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में पिछले 72 घंटे में 65 मासूमों की मौत हो जाती है। आरोपों प्रत्यारोपों का दौर चलता है। पर किसी को शर्म नहीं आ रही है। शर्म के लिए कई बातें हैं, पर इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है कि एक तरफ हम अपनी आजादी के 71वें साल में प्रवेश कर रहे हैं और दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के स्वास्थ मंत्री बेशर्मी से यह बयान दे रहे हैं कि अगस्त के महीने में बच्चे मरते ही हैं। आजादी के इस मौके पर हम उन मासूम बच्चों की याद में जश्न मनाने से परहेज करें और मंथन करें कि क्यों हम आज भी उसी दौर में जीने को विवश हैं जिस दौर में मेडिकल सुविधाओं में अभाव में हमारे पूर्वज तमाम तरह के रोगों को अपनी नियति मान कर जीते थे। जो बयान उत्तर प्रदेश के स्वास्थ मंत्री ने दिया वही बातें हमारे नाना दादा कहा करते थे। बारिश का मौसम है, जाड़े का मौसम है अब मौत आने वाली है। 
हर किसी को मौत तो आनी ही है। आएगी ही। यही एक साशस्वत है। परम सत्य है कि सभी को एक न एक दिन यहां से जाना है। जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है। पर विडंबना इस बात की है कि एक शर्म है जो किसी को नहीं आ रही है। शर्म उन्हें भी नहीं आ रही है जिन्होंने उत्तर प्रदेश में इतने दिनों तक राज किया। चाहे वह अखिलेश यादव की सरकार हो या मायावती की। उन्होंने सरकार की तरफ से प्रदेश में स्वास्थ सुविधाओं का कितना ख्याल रखा। अगर यह बात सत्य है कि आॅक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी को पिछले कई वर्षों से बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो उस वक्त सरकार किसकी थी?
शर्म तो कांग्रेस के उन महान नेताओं को भी नहीं आ रही है जो बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में पिछले कई सालों से इंसेफेलाइटिस से मौत की आगोश में समा रहे हजारों मासूमों के परिजनों के आंसू पोछने आज तक नहीं गए। वे गोरखपुर में बच्चों की मौत की खबर फैलते ही लाव लश्कर के साथ हॉस्पिटल पहुंच गए। गोरखपुर इसलिए पहुंच गए क्योंकि वह उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह जिला है। राजनीति लाभ पूरा मिलेगा, शायद यही लालच रही होगी। मुजफ्फरपुर इसलिए नहीं पहुंच पाए क्योंकि वहां मासूमों की लाशों पर राजनीति नहीं हो सकती थी।
शर्म उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को भी नहीं आ रही है। बेशर्मी की सारी हदों को पार करते हुए प्रदेश के स्वास्थ मंत्री अगस्त माह में होने वाले बच्चों की मौतों का आंकड़ा बता रहे हैं। वह यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि यह मौतें सामान्य हैं। कोई नई बात नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी अपने सिपहसलारों के भरोसे बयान देने मैदान में उतरे। पर शर्म उन्हें भी नहीं आई। जिस योगी आदित्यनाथ के डर से गोरखपुर में गलत काम करने वाले थर-थर कांपते थे। आज उसी योगी आदित्यनाथ की जुबान बंद है। वोट की राजनीति में कोई बखेड़ा न हो जाए, इसलिए वे भी नपातुला बोल गए। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए मौत किस तरह हुई इस पर फोकस बनाए रखा। उन्हें भी शर्म नहीं आई कि जिस योगी में लोग दबंग मुख्यमंत्री की छवि देखते हैं। जिस योगी पर उन्हें भरोसा है कि वो अपनी कड़क प्रशासनिक क्षमता से सबकुछ ‘टाइट’ कर देगा, आज वही योगी घुटनों पर बैठा है।
यह कैसे संभव है कि जिस मेडिकल कॉलेज को लेकर स्थानीय मीडिया लगातार आगाह करता आ रहा हो, उस मेडिकल कॉलेज की स्थिति उसी गृह जिले के मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंची हो। यह भी कैसे संभव है कि उसी मेडिकल कॉलेज में कुछ दिन पहले पहुंचे मुख्यमंत्री को आने वाले संभावित खतरों के प्रति आगाह नहीं किया गया हो। अगर सही में योगी आदित्यनाथ को किसी ने आगाह नहीं किया तो इससे बड़ी शर्म की बात नहीं हो सकती। अगर सही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बच्चों की मौत पर शर्म है तो नाप दें ऊपर से नीचे तक के तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों को जिन्होंने ऐसा होने दिया। दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा का डायलॉगमारने वाले मुख्यमंत्री को अपनी दबंगता का परिचय देने का इससे मुफीद समय नहीं हो सकता।
शर्म मीडिया को भी आनी चाहिए जो इस संवेदनशील मुद्दे में भी हिंदू और मुस्लिम एंगल खोज लेती है। चुंकि प्रदेश के मुखिया की छवि कट्टर हिंदूवादी नेता के रूप में है, इसीलिए वहां के एक मुस्लिम डॉक्टर को बिना तथ्यों के जांच पड़ताल के हीरो बना देती है। अब जब यह तथ्य सामने आ चुका है कि डॉक्टर कफील अहमद भी इस पूरे प्रकरण का एक प्रमुख दोषी है तो मीडिया के जांबाज रिपोर्टर क्या अपनी गलती पर शर्म करेंगे? यह मीडिया के लिए भी मंथन का समय है कि वह तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करे और लोगों को दिग्भ्रमित होने से बचाए। शायद इसीलिए शनिवार को गोरखपुर पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मीडिया से अपील की और कहा कि आप हवा-हवाई रिपोर्टिंग न करें।
किस-किस की शर्म की बातें करें। कल हम अपनी स्वतंत्रता के 71वें साल में प्रवेश करने जा रहे हैं। हर एक क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ने वाले हमारे देश में अगर आज भी सैकड़ों मासूस बेहतर स्वास्थ सुविधाओं के आभाव में अकाल मौत मर रहे हैं इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है। हो सकता है गोरखपुर में मरने वाले बच्चों के परिजनों को वहां की सरकार करोड़ों रुपए मुआवजे के तौर पर बांट दे। हो सकता है दिल्ली की केंद्र सरकार भी अपनी तरफ से करोड़ों रुपए का फंड राहत के तौर पर भेज दे। पर क्या हम इस बात के लिए खुद को तैयार कर सकेंगे कि स्वतंत्रता के इस जश्न के मौके पर उन मासूमों के परिजनों के खून के आंसू कैसे रोके जाएं।
हम सभी को मंथन करना है। सिर्फ फेसबुक और व्हॉट्एप पर मासूमों की याद में डीपी बदलने से किसी को शर्म नहीं आने वाली। शर्म अगर आएगी तो वह अपनी अंतरात्मा को झकझोरने से। आजादी की शाम से पहले यह खबर पूरी दुनिया में पहुंच चुकी है कि कैसे हमारे मासूम आज भी सिस्टम की फेल्योरनेस से तिल-तिल कर मरने को बेबस हैं। आजादी का यह मौका जायज न होने दें। कुछ शर्म करें। शर्म करेंगे तभी कुछ हल निकलेगा। यही उन मासूमों के प्रति श्रद्धांजलि होगी।
जय हिंद

Monday, July 24, 2017

सिर्फ गृहणी नहीं, ‘वित्त मंत्री’ हैं घरेलू महिलाएंं

भारतीय न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी बातों में एक सबसे बड़ी कमी यह है कि कई महत्वपूर्ण फैसले बिना किसी शोर शराबे के भीड़ में गुम हो जाती हैं। जबकि ऐसे फैसले नजीर के तौर पर पेश किए जाने की जरूरत होती है। चर्चा भी इसलिए जरूरी होती है क्योंकि इससे बड़े बदलाव की कहानी शुरू की जा सकती है। एक ऐसा ही फैसला कुछ दिन पहले मद्रास हाईकोर्ट ने दिया है। कोर्ट ने घरेलू महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा है कि एक घरेलू महिला को भी वेतन प्राप्ति का पूरा अधिकार है। वह घर की वित्त मंत्री होती है। उसे भी वेतन दिया जाए। इतना ही नहीं कोर्ट ने न केवल अपना फैसला सुनाया, बल्कि एक घरेलू महिला को उसके 24 घंटे के काम की पारिश्रमिक भी तय की। यह पारिश्रमिक तीन हजार रुपए तय की गई है। इस फैसले की पूरी चर्चा आज आपसे करूंगा, ताकि आप भी मंथन करें और एक घरेलू महिला के पूरे जीवन चक्र को सम्मान दें।
इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है पुड्डूचेरी शहर से। वहां 2009 में मालती नाम की महिला की मौत बिजली के खुले तार की वजह से हो जाती है। पुड्डूचेरी बिजली बोर्ड को महिला के पति को मुआवजे के तौर पर पांच लाख मुआवजा देना था। बोर्ड ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। गुहार लगाई कि चुंकि महिला एक घरेलू महिला थी, जिसके कारण उसकी कोई आय भी नहीं थे, ऐसे में मुआवजे की रकम बहुत ज्यादा है इसे कम की जाए। भारतीय न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी मामले में फैसला देने के लिए एक घरेलू महिला के कार्यों का मुल्यांकन किया जाना था।
मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति केके शशिधरन और न्यायमूर्ति एम मुरलीधरन की एक डिवीजन बेंच ने पूरे मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान तमाम तर्क पेश किए गए, लेकिन अंतिम फैसला घरेलू महिलाओं के पक्ष में आया। कोर्ट ने महिलाओं के अप्रत्यक्ष कार्यों और देखभाल का मूल्यांकन किया और उसे स्वीकृत किया। कोर्ट ने माना कि मालती एक डेडिकेटेड वाइफ थी। अपने दो बच्चों के प्रति भी वह समर्पित थी। वह घर की वित्त मंत्री थी। वह एक शेफ थी। वह घर की चार्टेड अकाउंटेंट थी। अपने घर की इनकम और खर्चे को नियंत्रित करती थी। एक पति ने अपनी घरेलू कंपनी का सबसे वफादार कर्मचारी खो दिया। दो बच्चों ने अपनी मां का प्यार खो दिया। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि वह सिर्फ एक घरेलू महिला थी। इसीलिए उस महिला को एक कामकाजी महिला के रूप में देखा जाए और उसे हर मुआवजे का अधिकार है।
मद्रास हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए न केवल मालती को न्याय दिलाया, बल्कि गृहणियों के लिए एक ऐसा आधार तैयार कर दिया है जो आने वाले समय में काफी सकारात्मक बदलाव की तरफ ले जाएगा। भारतीय पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं अपने अस्तित्व के लिए हमेशा से ही संघर्ष करती आई हैं। आज भारतीय महिलाएं अपने सर्वश्रेष्ठ समय में जी रही हैं, जहां उन्हें हर वो अधिकार प्राप्त है जिसके लिए वो लंबे वक्त से संघर्ष कर रही थीं। समाज के हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी पहचान कायम की है। बॉर्डर की रक्षा करने के साथ-साथ वो हवाई जहाज उड़ा रही हैं।
मल्टीनेशनल कंपनियों के सर्वोच्य पदों पर बैठकर भी उन्होंने अपनी प्रतिभाएं दिखाई हैं। पर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आज इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए बहसें हो रही हैं। बड़े-बड़े सेमिनार आयोजित किए जा रहे हैं। जब भी महिला सशक्तिकरण की बातें होती हैं तो यह जरूर महसूस होता है कि क्या सच में आज भी सशक्तिकरण पर चर्चा जरूरी है। महिला सशक्तिकरण पर काम करने वाली एक एक एनजीओ ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें इस बात का जिक्र किया गया कि आज की आधुनिक महिलाएं महिला सशक्तिकरण पर चर्चा को बेकार मानती हैं। उनका मानना है कि उन्हें सभी अधिकार मिले हैं। वे इस दम पर आगे बढ़ रही हैं। बेहतर मुकाम हासिल कर रही हैं। हां यह जरूर है कि भारतीय घरेलू महिलाओं की स्थिति आज भी चिंतनीय जरूर है।
भारतीय घरेलू महिलाएं आज भी खुद को उपेक्षित महसूस करती हैं। समाज की मुख्यधारा से वे खुद को अलग समझती हैं। कई मौकों पर ऐसा देखने को मिला है कि घरेलू महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पर मद्रास हाईकोर्ट ने देर से ही सही एक ऐसी सार्थक बहस को जन्म दिया है जिसमें घरेलू महिलाओं को भी उनके कार्यों की बदौलत एक बेहतर स्थिति में देखने का मौका मिला है। एक घरेलू महिला के दिन की शुरुआत सुबह पांच बजे से शुरू होकर देर रात तक रहता है। उन्हें कोई वीकली आॅफ नहीं मिलता। हर दिन उनकी ड्यूटी होती है। पूरे देश में छुट्टी हो पर एक घरेलू महिला अपने परिवार, बच्चों के लिए ड्यूटी पर रहती है। ऐसे अनगिनत काम हैं जिनका कभी मूल्यांकन नहीं किया गया। 

मद्रास हाईकोर्ट ने घरेलू महिलाओं के अनगिनत काम को भी ‘काम’ यानी रोजगार की श्रेणी में माना है। यह घरेलू महिलाओं के लिए प्रति एक बेहतर दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है। कोर्ट ने मंथन करने के लिए हमें प्रेरित किया है कि हम अपनी घरेलू मां, पत्नी, बहन के कार्यों का सम्मान करें। फिलहाल कोर्ट ने एक घरेलू महिला के कार्यों का मुल्यांकन करते हुए मालती के केस में उसका वेतन तीन हजार रुपए मासिक तय किया। भले ही यह रकम काफी कम है, पर कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए बहुत कुछ कह दिया है। कोर्ट ने एक घरेलू महिला के अवैतनिक और गैर मान्यताप्राप्त कार्य को श्रम की श्रेणी में ला दिया है। एक घरेलू महिला को भी कामकाजी महिला की तरह सम्मान दिलाने का प्रयास किया है।

Thursday, July 13, 2017

हट बुड़बक ! हमको समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है

एक साधारण छात्र नेता से सफर शुरू कर कोई राजनीति के इतने ऊपरी पायदान तक कैसे पहुंच सकता है यह कोई लालू यादव से सीख सकता है। छल कपट की राजनीति से ऊपर उठकर लालू यादव ने राजनीति की नई विधा का सृजन किया। यह विधा थी घोटाला करो, बदनाम हो जाओ और फिर राजनीति के शिखर पर पहुंच जाओ। बाद में मायावती, जयललिता जैसे कई नेताओं ने लालू से सीख लेते हुए खुद को स्थापित किया। लालू ने न केवल इस विधा का सृजन किया, बल्कि इसमें इतने सारे प्रयोग कर डाले की भारतीय जांच एजेंसियां लंबे समय तक सिर्फ और सिर्फ लालू यादव पर रिसर्च करें तो इसे उनके पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। फिलहाल जांच एजेंसियों ने काफी मशक्कत के बाद लालू यादव और उनके कुनबे के काले कारनामों की परत दर परत उखाड़ते हुए पूरी दुनिया को बता दिया है कि लालू यादव को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। हां यह मंथन का भी समय है कि लालू यादव जैसे राजनीतिज्ञ कैसे पाप पर पाप करते हुए घोटाले पर घोटाले करते हुए और भी मजबूत होते गए।
यह भारतीय राजनीति के इतिहास के उन काले अध्यायों का काल है जो आने वाले समय में राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों के लिए पाठ्य पुस्तक में शामिल हो सकता है। लालू यादव की पूरी जीवनी ही एक रिसर्च सब्जेक्ट बन सकती है कि कैसे एक कॉलेज का साधारण सा छात्र नेता अरबों खरबों का घोटाला करते हुए भी अपनी पहचान बनाए रखने में कामयाब रहता है। बिहार में लंबे समय तक राज करते हुए लालू यादव जब चारा घोटाले के मुख्य आरोपी बने तो राजनीतिक विरोधियों ने इसे लालू यादव युग का अंत बताया। पर सभी राजनीतिज्ञ पंडितों को पछाड़ते हुए लालू यादव और भी मजबूती के साथ राजनीति में आए। बिहार में जहां एक तरफ अपनी पत्नी को प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करवाया, वहीं आगे बढ़ते हुए केंद्र की राजनीति में आ गए। यह लालू यादव का राजनीतिक रसूख ही था कि तमाम घोटालों में मुख्य आरोपी होने के बावजूद केंद्र में रेल मंत्री जैसा अहम पद पाया। रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने जो कुछ भी किया उसे कई विदेशी यूनिवर्सिटी ने भी सराहा। यहां तक कहा गया कि विदेशी यूनिवर्सिटी के छात्र लालू यादव का मैनेजमेंट फंडा समझने के लिए लगातार भारत आ रहे हैं।
रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने रातों रात रेलवे का कायापलट कर दिया। जबर्दस्त घाटे में चल रहा रेल मंत्रालय केंद्र सरकार का सबसे कमाऊ पूत बन गया। यह सच में आश्चर्यजनक बदलाव था जिसे पूरी दुनिया देख रही थी। पूरा देश लालू पर गर्व करने लगा था कि एक हंसी ठिठोली करने वाला राजनेता इतना बड़ा मैनेजमेंट गुरु भी बन सकता है। रेलवे स्टेशन पर लिट्टी चोखा और कुल्हड़ वाली चाय का कांसेप्ट लाकर लालू चंद महीनों में सभी के दिलों पर राज करने लगे। उनके मैनेजमेंट गुरु वाले रूप ने उनके घोटाले वाले चरित्र को पूरी तरह ढंक दिया था। पर आज जब उनके सीबीआई, ईडी और तमाम जांच एजेंसियां लालू यादव और उनके कुनबे की प्रॉपर्टी को खंगाल रही है तो समझ में आ रहा है कि लालू न केवल असाधारण व्यक्तित्व के धनी हैं बल्कि उनके मैनेजमेंट को समझना इतना भी आसान नहीं। लालू के रेलमंत्रित्व काल के काले कारनामों का चिठ्ठा ज्यों ज्यों खुल रहा है लालू यादव और उनके कुनबे की परेशानियां भी बढ़ रही हैं।
लालू उन नेताओं में शामिल रहे हैं जो जितनी मुश्किलों में रहा है दोगुनी ताकत से वापसी करता है। सुप्रीम कोर्ट ने जब लालू यादव के राजनीतिक करियर पर 11 साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया था तो कहा जाने लगा था कि लालू यादव तो गया। उन हालातों में लालू यादव के कई करीबी साथियों ने भी उनका और राष्टÑीय जनता दल (राजद) का दामन छोड़ दिया। बिहार में बदली राजनीतिक परिस्थितियों के बीच जब विधानसभा चुनाव में विकास पुरुष नीतीश कुमार को राजद के साथ गठबंधन करना पड़ा तो राजनीतिक पंडित भी चौंक गए। पर लालू यादव को पता था कि उन्हें क्या करना है। अपने दोनों बेटों को राजनीति में उतार कर लालू यादव ने वह मास्टर स्ट्रोक खेला जिससे राजनीति के पिच पर जमे जमाए खिलाड़ी धूल चाटने लगे। बिहार विधानसभा चुनाव में बंपर सीट हासिल कर लालू यादव ने जता दिया कि भले ही वह राजनीति का वनवास झेल रहे हैं पर बिहार में उनका ही राज है। लालू ने एक बार फिर जता दिया कि लालू सिर्फ नाम ही काफी है।
अब राजनीति ने एक बार फिर करवट ली है। लालू और उनका पूरा कुनबा एक ऐसे रडार पर है जहां हर तरफ मुश्किलें ही मुश्किलें हैं। लालू एंड कंपनी के तमाम ठिकानों पर सीबीआई और ईडी की दबिश चल रही है। लालू के बेटे और बिहार के उप मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। बेटी और दामाद पर भी शिकंजा कसा जा चुका है। बिहार के कई घोटालों में लालू यादव और उनके दोनों बेटों का नाम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सामने आ चुका है। ऐसे में बिहार की राजनीति फिर से लालू और उनके आसपास झूल रही है।
नीतीश कुमार दूर बैठकर तमाशा देख रहे हैं और भविष्य की रणनीति पर मंथन कर रहे हैं। बीजेपी लालू यादव एंड कंपनी पर शब्द वाण से वार करते हुए राजनीति पर गिद्द दृष्टि टिकाए बैठी है।   कांग्रेस लालू यादव को प्रत्यक्ष रूप से सांत्वना दे रही है। ऐसे में राजनीतिक पंडितों को भी मंथन जरूर करना चाहिए। लालू एंड कंपनी क्या इन झंझावतों से खुद को बच पाएगी? क्या बिहार में नीतीश कुमार राजद के साथ अब लंबे समय तक बने रहेंगे? क्या फिर से बिहार में नीतीश और बीजेपी साथ आ रहे हैं? ये कुछ ऐसे ज्वलंत प्रश्न हैं जो वक्त का इंतजार कर रहे हैं। इन सवालों का जवाब तो वक्त आने पर ही मिलेगा। पर इतना जरूर है कि इतिहास गवाह है कि जब-जब लालू यादव पर इस तरह के हमले हुए हैं वो और मजबूती के साथ सत्ता के केंद्र में आते रहे हैं। टीवी चैनलों पर दिख रहे लालू यादव के तेवर यह बताने के लिए काफी हैं कि उन्हें अब किसी का डर नहीं। तमाम घोटालों में हजारों सबूत होने के बावजूद जब भारत की न्याय व्यवस्था उन्हें अधिक दिनों तक सलाखों के पीछे नहीं रख सकी तो ये आरोप उनके सामने क्या हैं। हां इतना जरूर है कि लालू के दो युवा पुत्रों की राजनीति जो अभी ठीक से शुरू भी न हो सकी थी वो मंझधार में जरूर है।