Friday, June 26, 2015

शर्म उनको मगर आती नहीं


एक बार फिर उत्तराखंड के पहाड़ों पर विपदा आन पड़ी है। सरकारी तंत्र के होनहारों ने हजारों तीर्थ यात्रियों को संकट में ला खड़ा किया है। बार-बार  की चेतावनी के बाद भी उत्तराखंड सरकार चेत नहीं रही है। बिना किसी ठोस बंदोबस्त के चार धाम और हेमकुंड साहिब की यात्रा को जारी करने को रजामंदी दे रही है। नतीजा सामने है। हजारों यात्रियों की जान संकट में है। पूरे देश की नजर उत्तराखंड पर टिक गई है। इतना सब होने के बावजूद उत्तराखंड सरकार के कारिंदे ऐसे हैं जिन्हें शर्म नहीं आ रही है।
दरअसल उत्तरखंड में बार-बार आ रही आपदा को समझने के लिए हमें इसके भौगोलिक विस्तार को गहराई से समझने की जरूरत है। जून 2013 में आ चुकी आपदा ने हमें चेता दिया था कि अगर पहाड़ों के साथ ज्यादा छेड़छाड़ की गई तो प्रकृति हमेशाअपना रौद्र रूप दिखाएगी। ऐसा भी नहीं है कि इससे पहले पहाड़ों में आपदा नहीं आई है, पर हाल के वर्षों में आ रही आपदाओं ने अपना नया रूप दिखाया है। नदियों ने अपना बहाव बदल दिया है। चाहे वह सोनप्रयाग हो या अगस्त्यमुनी या फिर रुद्रप्रयाग हो या चमोली, हर जगह नदियों ने अपना वर्षों पुराना रास्ता अख्तियार कर लिया है। कहा भी जाता है नदियां अपना मूल रास्ता कभी नहीं भूलती हैं। जिस तरह पहाड़ों में सभी नियमों की अनदेखी कर बेतहाशा निर्माण कार्य हो रहे हैं उसने पहले ही संकेत दे दिए थे कि आने वाला समय पहाड़ों के लिए भारी पड़ने वाला है। विकास के नाम पर नदियों के रास्ते तक अतिक्रमण का शिकार हुए। 2013 की आपदा में अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी ने जब अपना विकराल रूप दिखाया उसने सबकुछ उलट पुलट कर रख दिया। हाल यहां तक खराब हुए कि कई-कई किलोमीटर तक राष्टÑीय राजमार्ग नदियों के मुख्य बहाव की जद में आ गए।
उत्तराखंड को पुनर्जिवित करने के लिए हजारों करोड़ रुपए के मदद आए। पर विधानसभा के पटल पर रखी गई कैग रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किस तरह इन पैसों का दुरुपयोग हुआ। किस तरह हजारों करोड़ रुपयों को पानी में बहा देने के लिए छोड़ दिया गया। उत्तराखंड को पुनर्जिवित करने के लिए सबसे बड़ी जरूरत थी कि इसका बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जाए। जमीनी शुरुआत करने की जरूरत थी। पहाड़ को पहाड़ के नजरिए से देखते हुए पुनर्निमाण करने की प्लानिंग करनी थी। पर हुआ इसका उल्टा। सरकार का मुख्य उद्देश्य बन गया जैसे-तैसे चार धाम यात्रा शुरू करवा दी जाए। पुनर्निर्माण की जगह पूरा फोकस यात्रा शुरू करने पर कर दिया गया। 2014 में भी इसी तरह यात्रा शुरू हुई। उस साल भी सरकारी तैयारियों की पोल खुल गई। पर इससे भी सरकार ने कुछ सीख नहीं ली।
परिवर्तन बस इतना हुआ कि उत्तराखंड से पिता-पूत्र का शासन समाप्त हुआ। विजय बहुगुणा और उनके पुत्र साकेत बहुगुणा की राजशाही खत्म हुई और उसकी जगह हरीश रावत को कमान सौंपी गई। पहाड़ के लोगों के बीच उम्मीद की किरण जगी। चुंकि हरीश रावत को ठेठ पहाड़ी माना जाता है, इसीलिए उम्मीद थी कि वे पहाड़ के दर्द को समझेंगे। पर अफसोस ऐसा हो नहीं सका। वे भी उसी चाकरी से घिरे रहे जिन्होंने बहुगुणा के समय पहाड़ का शोषण किया और राहत और पुनर्निर्माण के नाम पर हजारों करोड़ रुपए डकार गए।
वक्त ने एक बार फिर पलट कर उत्तराखंड सरकार की तरफ देखा है। सत्ता परिवर्तन के ठीक एक साल बाद फिर पहाड़ कराह रहा है। पहाड़ को पुनर्जिवित करने के नाम पर हर जगह अस्थाई पुल बना दिए गए। जैसे-जैसे सड़क निर्माण कर दिए गए। सड़क भी चार धाम मुख्य यात्रा मार्ग के ही बनाए गए। जब पता था कि नदियां जब उभान पर आएंगी ये अस्थाई पुल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगे। बावजूद इसके न तो इनकी क्वालिटी पर ध्यान दिया गया और न ही स्थायित्व का ख्याल रखा गया। नतीजा यह हुआ कि हल्की बारिश में ही उत्तराखंड की हालत खराब हो गई। राष्टÑीय राजमार्गों की हालत भी खराब हो चुकी है। जगह-जगह हुई लैंड स्लाइडिंग ने यात्रियों के रास्ते रोक रखे हैं।
इसमें दो राय नहीं कि चारों धाम सहित हेमकुंड साहिब भारतीय सनातन धर्म के आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। हर साल लाखों यात्री यहां की यात्रा करना चाहते हैं। इन यात्राओं से सरकार को भी हजारों करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। पर मंथन का वक्त है कि क्या हम सिर्फ धार्मिक यात्राओं की दृष्टि से ही उत्तराखंड को देखें। या फिर इसे देखने का नजरिया बदलने की जरूरत है। उत्तराखंड को वास्तव में एक ऐसे ठोस तरीके से सजाने संवारने की जरूरत है जो लंबे समय तक कायम रह सके। क्या हुआ कि अगर एक दो साल यात्रा नहीं होगी तो। इससे कोई खास फर्क तो नहीं पड़ा जाएगा। 2013 की घटना के बाद से तो वैसे भी पूरा देश भयभीत है। फिर क्या जरूरत है करोड़ों रुपए विज्ञापन पर खर्च कर पूरे देश से यात्रियों को वहां बुलाने की।
न आपके पास प्लानिंग है, न आपके पास व्यवस्था है और न ही आपके पास ठोस निर्माण का व्यवस्थित ढांचा है। ऐसे में सभी यात्राओं को कुछ साल के लिए बंद कर ठोस निर्माण पर ध्यान दें तब जाकर ही हम अगले पचास साठ साल के लिए निश्ंिचत हो सकते हैं, नहीं तो हर साल ऐसे ही विपदा आएगी और हमारी जान संकट में रहेगी। पहाड़ के लोग तो हर वक्त त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही हैं, उत्तराखंड सरकार दूसरे राज्यों के लोगों को   भी क्यों सता रही है इसका जवाब कोई नहीं दे रहा है। कुछ तो शर्म करो उत्तराखंड सरकार। अब भी मंथन का वक्त है। अभी मंथन नहीं किया तो वक्त अपना हिसाब तो जरूर लेगा ही। तैयार रहना।


Wednesday, June 24, 2015

तो क्यूं विराट को ढो रही है टीम इंडिया


माना की आप युवा हो। यह भी मान लिया कि आपमें बहुत कुछ करने की क्षमता है। यह भी सच है कि आपने टीम इंडिया को बहुत कुछ दिया है। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि कप्तानी की लालच में आप इतना नीचे गिर जाओ। इंडियन टीम के ड्रेसिंग रूम से जो खबरें छन-छन कर बाहर आ रही है उसका साफ मतलब है कि इंडियन टीम दो भागों में बंट गई है। एक का नेतृत्व दिल्ली का मुंडा विराट कोहली कर रहा है, वहीं दूसरी टोली का नेतृत्व भारत का सर्वकालिक महान कप्तान महेंद्र सिंह धोनी कर रहा है। यहां यह भी कोट करना जरूरी है कि विराट कोहली के साथ जितने क्रिकेटर हैं उनमें अधिकतर अभिजात्य वर्ग से ताल्लुक रखते हैं और मुख्यत: वैसे स्टेट से विलांग करते हैं जहां के प्लेयर्स का दबदबा हमेशा टीम इंडिया में रहा है। वहीं दूसरी तरफ धोनी खुद एक लोअर मीडिल क्लास फैमिली से आते हैं और स्टेट भी ऐसा है जहां के प्लेयर बमुश्किल नेशनल और इंटरनेशनल लेवल तक पहुंच पाते हैं। धोनी से पहले तो बिहार-झारखंड से एक कीर्ति आजाद को छोड़ दिया जाए तो हमें कोई नाम याद नहीं जिसने इंटरनेशनल लेवल पर अपनी अलग पहचान कायम की।

वह तो धोनी की प्रतिभा और उनकी जीवटता ही थी जिसने इतने दिनों तक टीम इंडिया में कायम रखा। नहीं तो छोटे शहरों से आए सैकड़ो क्रिकेटर ऐसे रहे जो प्रतिभावान होते हुए भी हाशिए पर डाल दिए गए। क्रिकेट और राजनीति के कांबिनेशन ने भारतीय टीम में दिल्ली का दबदबा हमेशा कायम रखने में मदद की। धोनी एक अपवाद रहे जिनके ऊपर न तो कभी कोई आरोप लगा और ही उनके साथ टीम चयन को लेकर विवाद जुड़ा। एक बार फिर दिल्ली की लॉबी ने विराट कोहली को आगे रखकर एक ऐसी चाल चली है जिसमें धोनी खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। शायद इसी असहजता ने उन्हें बांग्लादेश में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कुछ ऐसा कहने पर मजबूर कर दिया, जिसने धोनी की नाराजगी को जगजाहिर कर दिया। धोनी के समर्थन में सौरव गांगुली और बिशन सिंह बेदी जैसे क्रिकेटर भी सामने आए हैं। उप कप्तान के रहते हुए आर अश्वीन का प्रेस कांफ्रेंस करना भी बहुत कुछ इशारा कर देता है।

अगर किसी टीम में प्रदर्शन के दम पर किसी क्रिकेटर को रहने का अधिकार है तो सबसे पहले विराट कोहली को ही बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। हमेशा अपनी पर्सनल लाइफ (गर्ल फ्रेंड) को लेकर चर्चा में रहने वाले इस किक्रेटर की अगर पिछली पंद्रह-बीस पारियों का आंकलन किया जाए तो इन्हें इंडियन टीम में तो क्या दिल्ली की रणजी टीम में भी खेलने का अधिकार नहीं। फिल्ड में जिस तरह का एटीट्यूट विराट कोहली का रहता है वह अब तक के भारतीय क्रिकेट में कभी नहीं देखा गया। जितने भी कप्तान हुए उनमें संयम के साथ समझदारी भी रहती थी। पर विराट कोहली की नाराजगी हमेशा लाइव टेलिकास्ट कर रहे कैमरों की जद में रहती है। ऐसे में किस अधिकार से विराट कोहली को भारतीय टीम के कप्तान के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है यह समझ से परे है।

विराट कोहली ने इस साल के शुरुआत में हुए ट्राई सीरिज के दौरान चार पारियां खेली। इस वन डे ट्राई सीरिज के चार मैचों में विराट ने क्रमश: 9, 4, 3 और 8 रन किए। यानि कुल मिलाकर 24 रन। इसके तुरंत बाद वर्ल्ड कप का आगाज हो गया। पहले पुल मैच में 103 रन की पारी की बात छोड़ दी जाए तो पूरे टूर्नामेंट के दौरान कभी भी विराट कोहली में आत्मविश्वास नहीं दिखा। पुल बी के अन्य मैचों में विराट ने क्रमश: 46, 33, 33, 44 और 38 रन बनाए। क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल में तो विराट की हैसियत और गिर गई। इन दोनों बड़े मैचों में विराट का रन क्रमश: 3 और एक था।
2014 के इंग्लैंड दौरे पर भी विराट ने चार मैच खेले थे। इन चारों मैच में विराट ने 0, 40, 1 और 13 रन बनाए थे। अब कुछ ऐसा ही हाल बांग्लादेश में ट्राई सीरिज के दौरान हुआ। पहले मैच में एक रन, दूसरे मैच में 23 रन और तीसरे वन डे में 29 रन बनाकर कोई कैसे कप्तानी की दावेदारी कर सकता है या सपने देख सकता है यह समझ से परे है। कप्तान बनकर धोनी ने दिखा दिया था कि कप्तान सिर्फ कप्तानी ही नहीं कर सकता है, बल्कि टीम के लिए एक ऐसा एग्जांपल सेट कर सकता है जिससे दूसरे खिलाड़ी प्रेरणा ले सकें। अपनी कप्तानी के दौरान महेंद्र सिंह धोनी ने कई मैचों में भारतीय टीम को न केवल संकट से उबारा, बल्कि मैच विनर भी बने।

सवाल यह उठता है कि विराट कोहली ही कप्तान क्यों? क्योंकि वो भारतीय टीम में उप कप्तान हैं, और स्वाभाविक तौर से कप्तान का ताज उन्हें ट्रांसफर कर दिया जाए? भारतीय टीम में कई ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने न केवल बेहतर प्रदर्शन से खुद को हमेशा आगे रखा है बल्कि कई मौकों पर बेहतरीन एग्जांपल भी सेट किया है। इनमें प्रमुख नाम है रोहित शर्मा और शिखर धवन। आर अश्वीन को भी कमतर नहीं आंका जा सकता।

मैं तो कहता हूं विराट कोहली को अगले दस मैचों के लिए प्लेइंग इलेवन से बाहर कर दिया जाए। फिर देखिए टीम की अंदरुनी राजनीति कैसे हवा हो जाएगी। टीम का प्रदर्शन भी ठीक हो जाएगा। इसमें दो राय नहीं कि विराट कोहली एक प्रतिभावान खिलाड़ी हैं। उनमें बहुत खेल बचा हुआ है। पर जिस तरह विवादों ने जन्म लिया है ऐसी स्थिति में उनको खुद भी सामने आकर स्थितियों   को स्पष्ट करना चाहिए। पर वे जब भी सामने आते हैं टीम इंडिया के बारे में कम और अपनी गर्लफ्रेंड के बारे ज्यादा सफाई देते हैं। कई बार सफाई नहीं देते तो पत्रकारों को गालियां बक देते हैं। वह भी सार्वजनिक रूप से।

यह सच है कि टीम की ड्रेसिंग रूम में जो कुछ चलता है वह हम और आप जैसे सामान्य लोग नहीं जान सकते हैं। सिर्फ कयास ही लगाए जाते हैं। पर बॉडी लैंग्वेज, आपकी परफॉर्मेंस भी बहुत कह देती है। खासकर भारत में जहां क्रिकेट के एक-एक रन और एक-एक बॉल को पान की दुकान पर बैठा शख्स भी एनालेटिकल होकर देखता है, वैसे में इस वक्त कप्तान धोनी की मनोदशा का आंकलन करना इतना दुरुह भी नहीं है।

फिलहाल बांग्लादेश का दौरा आज समाप्त हो रहा है और जिंम्बावे का दौरा कैंसिल हो चुका है। इस बीच टीम इंडिया को आराम करने का काफी मौका है। एक नई सोच और राजनीति से ऊपर उठने में यह विश्राम काफी मदद करेगा। पर विराट कोहली यह सोचना चाहिए कि वे प्रदर्शन के दम पर टीम इंडिया के कप्तान बनें या राजनीति के दम पर। वहीं धोनी को यह सोचना चाहिए कि उनमें अभी काफी क्रिकेट बचा है। वह टीम इंडिया को इस तरह नहीं छोड़ सकते हैं। हां कप्तानी छोड़ने जैसी बात कह कर उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कप्तान जैसे पद का उन्हें लालच नहीं है। वह तो सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट खेलने के लिए पैदा हुए हैं और जब तक क्षमता है वह क्रिकेट ही खेलेंगे, पॉलिटिकल गेम नहीं।

Saturday, June 20, 2015

थैंक्स पापा, इस बेहतर जिंदगी के लिए

पुत्र का खत, पिता के नाम 


 पापा आपको तो पता भी नहीं होगा कि आज के दिन (21 जून ) जब आपकी मैरिज एनिवर्सरी होती है, इसी दिन फादर्स डे भी होता है। आज तक हमने कभी फादर्स डे सेलिब्रेट नहीं किया। जब हम छोटे बच्चे थे उस वक्त इस तरह के स्पेशल डे का प्रचलन नहीं होता था। हमने भी नहीं जाना कि फादर्स डे क्या होता है। हम कितने खुशनसीब थे कि अपने पापा के लिए एक खास दिन नहीं निकालना पड़ता था। हमारे लिए तो हर दिन फादर्स डे ही होता था। हर दिन हम आपके साथ सेलिब्रेट करते थे।

बचपन में आपके सिर से पके हुए बाल उखाड़कर कटोरी में जमा करना। फिर एक पैसे के हिसाब से उसे काउंट करना। उस हिसाब के अनुसार आपसे मेहनताना लेकर आईसक्रीम वाले और पेड़े वाले बाबा का इंतजार करना। कभी-कभी चनाचुर गरम वाले की भी बारी आती थी। हमारे लिए तो वही खुशी फादर्स डे सेलिब्रेशन की तरह थी। हमारे लिए तो आप वर्ल्ड के बेस्ट पापा लगते थे जब शाम में सब्जी लाने के साथ-साथ आप गरमा गरम समोसे भी ले आते थे। खुशी इतनी होती थी कि शब्दों में बयां करना मुश्किल होता था।

हम कैसे भूल सकते हैं, मां द्वारा की जाने वाली सुताई। आपको ड्राइंग रूम में बंद करके मां मुझे और भईया को अंदर वाले कमरे में ले जाकर पीटती थी। आपको इसलिए इस सुताई कांड से बाहर रखा जाता था कि आप उल्टे मां पर ही भड़क जाते थे। हमारी सुताई कांड के बाद मां का आपसे झगड़ना कि आप तो कुछ बोलते ही नहीं हैं। आपके नहीं बोलने का ही नतीजा है कि दोनों भाई बिगड़ रहे हैं। पर आपका अपनी किताबों और फाइल से नजर न उठाना। चुपचाप पढ़ते रहना। यह सब हमारे जख्मों पर मरहम की तरह लगता था।

आपका संघर्ष भी हमने देखा है। हम मुजफ्फरपुर में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे और आप हमसे दूर अपने हथुआ स्थित कॉलेज में दूसरी जिंदगी जी रहे थे। सप्ताह में तीन दिन वहां और चार दिन हमारे साथ। यह सिलसिला करीब 22 सालों तक चला। आपके क्लास का रूटीन हमें भी याद हो गया था। कब आप जाएंगे, किस दिन आएंगे, हम मैथ के पहाड़ों की तरह रट चुके थे। जब हम छोटे थे, हमारे पास कोई साधन नहीं था तब हम भयानक ठंड और बरसात में भी आपको सुबह छह बजे की ट्रेन पकड़ने के लिए जाते देखते थे। मां सुबह-सुबह आपके लिए नाश्ता और दोपहर का खाना भी पैक कर देती थी। कई बार हम मां से पूछते भी थे कि दोपहर के बाद रात का खाना कौन देगा? मां मुस्कुरा देती थी और कहती थी पापा खुद बना लेंगे।
तीन दिन के क्लास के बाद आप जब लौटते थे तो घर आने की जल्दी में आप सीवान से शाम की ट्रेन पकड़ते थे, कई बार ट्रेन लेट होने के कारण आप देर रात घर पहुंचते थे। रात दस के बाद रिक्शा वाले आने से मना कर देते थे, तो आप पैदल ही घर तक सात किलोमीटर दूरी तय करते थे। हम कैसे भूल सकते हैं आपका वो संघर्ष।

वैसे तो यूनिवर्सिटी में 180 दिन का एकेडमिक सेशन होता था, उस पर से हड़ताल हमारे लिए किसी सौगात से कम नहीं होती थी, क्यों उन दिनों आप घर पर ही होते थे। आपका साइकिल चलाना भी हमें कई बार काफी अखरता था। जब दूसरे प्रोफेसर्स को हम स्कूटर, मोटरसाइकिल और कार पर देखते थे तो जलन होती थी। आप भी तो प्रोफेसर हैं फिर आपके पास क्यों नहीं। पर हमें पता था कि आपने कभी वो काम नहीं किया जो दूसरे प्रोफेसर्स करते थे। कोई ट्यूशन नहीं, कोई कोचिंग नहीं। आपका कॉलेज और हमारे साथ बिताए गए आपके पलों से अनमोल आपके लिए कुछ दूसरा नहीं था। आपकी ईमानदारी और काम के प्रति लगन ने हमें बहुत कुछ सीखाया। इसी के बदौलत हम आज अपने दम पर स्थापित हैं।

 मुझे अच्छी तरह याद है जब हमारे घर में पहला स्कूटर आया था। मंटू मामा के दोस्त सूरज मामा इंडियन ओवरसिज बैंक के मैनेजर बनकर मुजफ्फरपुर आए थे। जब आप उनके बैंक अपनी साइकिल से जाते थे तो वो आप पर नाराज होते थे। कहते थे, क्या जीजा जी आप स्कूटर तो ले ही सकते हैं। पर आप हंस कर टाल देते थे। पर दो-तीन महीने बाद उन्होंने जबर्दस्ती लोन देकर आपको स्कूटर खरीदवा दिया था। आपने भी इस लालच से खरीद लिया था कि दीदी की शादी में दहेज दे देंगे।
आपने तो सिर्फ दो दिन ही चलाने की कोशिश की। फिर न तो आपने सीखने की चाहत दिखाई और न ही हमने फोर्स किया। क्योंकि हम आजादी से स्कूटर उड़ा सकते थे। आपने भी कभी हमें नहीं टोका। आप अपनी साइकिल पर ही मस्त रहे। हां इतना जरूर था कि आपकी डेली रुटीन बन गई थी कि अपनी साइकिल के साथ स्कूटर को चमकाना। आपको इस बात की चिंता रहती थी कि स्कूटर पुरानी न हो जाए, नहीं तो दहेज में कौन लेगा।
स्कूटर आने के बाद आपको सुबह-सुबह स्टेशन छोड़ने के लिए हमारा सुबह जागने का सिलसिला शुरू हो गया था। पर कई बार आप ठंड को देखते हुए मना भी कर देते थे। पैदल ही निकलने के लिए तैयार हो जाते थे। पर स्कूटर आने के बाद मैंने और भईया ने कभी आपको पैदल नहीं जाने दिया। भईया तो कई बार आपको रात में स्टेशन से लेने भी पहुंच जाता था। मुझे रात में जाने की इजाजत नहीं होती थी। पर आपने कभी न छोड़ने की बात कही और न स्टेशन से लेकर आने का आॅर्डर दिया। आपका ही दिया संस्कार है कि हम सभी में आज भी वो प्यार और सम्मान कायम है। हम एक दूसरे से इतनी दूर होकर भी एक अनमोल डोर में बंधे हैं।

हमारी पढ़ाई-लिखाई और हमारे बेहतर भविष्य के लिए आपने जो त्याग किया उसकी कोई कीमत नहीं चुकाई जा सकती है। मुझे आज तक याद नहीं जब आपने कभी मेरे ऊपर हाथ उठाया हो या दीदी को कभी डांटा हो। हां भईया के ऊपर आपका गुस्सा आज भी याद है। जब भईया आपके मना करने के बावजूद उस दिन क्रिकेट खेलने चला गया था। वहां उसके नाक पर चोट आई थी। प्रमोद चाचा ने उसे डॉक्टर से दिखलाया और घर ले आए। चोट के कारण भईया को दर्द काफी हो रहा था और उसे सुला दिया गया था। चुंकि शाम का वक्त था और मच्छर काफी थे इसीलिए दीदी ने मच्छरदानी लगा दी थी। मां को तो जितना कुछ कहना था   उन्होंने कह दिया था पर हम सभी आपके आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। हमें नहीं पता था कि दवाई लाने जा रहे प्रमोद चाचा ने आपको पूरे प्रकरण की जानकारी पहले ही दे दी है। आप घर में घुसते ही भईया पर चिल्लाए और उसके रूम में जाकर मच्छरदानी के ऊपर से चप्पलों की बरसात कर दी। आपको भी पता था कि मच्छरदानी के ऊपर से चोट नहीं लगने वाली, लेकिन मां के शब्दवाण से बचने के लिए आपने अपना रौद्र रूप दिखाया। फिर शांत हो गए। मैं और दीदी एक दूसरे को देखकर मन ही मन मुस्करा रहे थे और भईया तो ऐसे बन रहा था कि उसे जैसे कुछ पता ही नहीं अभी-अभी क्या हुआ। पापा आपके गुस्से में भी आपका प्यार हमें संबल देता है।

आपने अपनी जिंदगी में जितना संघर्ष किया उसका अंश मात्र भी हम कर लें तो बहुत होगा। आज भी आपसे बात किए हमें कई-कई दिन हो जाते हैं। मां से ही बात होती है। पर हमें पता है मां आपको सबकुछ बताती है और हम भी आपके बारे में मां से ही पूछ लेते हैं। ऐसा क्यों है यह आज तक समझ नहीं पाया। पर यह भी सच ही है कि बेटी पापा से और बेटे मां से ज्यादा करीब होते हैं।

पाप आज आपके और मां के लिए जब मैंने सेकेंड एसी का टिकट कटवाया तो मां बिगड़ने लगी। कहने लगी क्या जरूरत थी सेकेंड एसी की, थर्ड एसी से ही चले जाते। क्यों बेकार में ज्यादा पैसे खर्च कर दिए। कहने को तो मैं मां को बहुत कुछ कहता पर इतना ही कह पाया कि बहुत संघर्ष किए हैं तुमने और पापा ने अपनी जिंदगी में। अब जब सबकुछ से निश्ंिचत हो गई हो तो क्या हो गया अगर तुमने सेकेंड एसी में सफर कर लिया। मां का जवाब भी सुन लीजिए उन्होंने क्या कहा, हमारा क्या हम तो तुम लोगों के लिए ही जी रहे हैं। मां ने यह कह तो दिया पर मुझे आपका और मां का मेरे, भैया और दीदी के लिए किया गया त्याग, तप और संघर्ष ऐसा है, जिसका ऋण कभी नहीं चुकाया जा सकता। लव यू पापा। आपका और मां का साया जबतक हमारे साथ है हमारे साथ कभी बुरा नहीं हो सकता। आज हम जो कुछ भी हैं आपके द्वारा दिए गए संस्कार, प्यार और विश्वास की बदौलत हैं। थैंक्स आपने हमें इतनी बेहतर जिंदगी दी।

Friday, June 19, 2015

तो मत करिए योग, कोई जबर्दस्ती तो नहीं

हर तरफ योग की चर्चा है। ऐसा लग रहा है विश्व योग दिवस के रूप में हम एक ऐसे युग में प्रवेश करने जा रहे हैं जहां सभी स्वस्थ होंगे। हेल्दी होंगे, फिट होंगे, तंदरुस्त होंगे, जो भी आप कह लें, वे सब होंगे। पर इन सबके होने के बीच विरोध के स्वर इस तरह उठ रहे हैं जैसे कोई आपसे जबर्दस्ती कर रहा हो। क्या सच में कोई जबर्दस्ती किसी से कोई काम करवा सकता है। यह जानते हुए भी कि यह चीज आपकी भलाई के लिए है, फिर भी हम कहां मानते हैं।

हर महीने भारत में हजारों लोग रोड एक्सीडेंट में सिर्फ इसलिए मर जाते हैं क्योंकि उन्होंने हेल्मेट नहीं पहनी होती है। कुछ ऐसा ही आंकड़ा फोर व्हीलर वालों के साथ है। सीट बेल्ट न बांधने के कारण रोड एक्सीडेंट के दौरान मरने वालों की संख्या अधिक होती है। ओवर स्पीड गाड़ी न चलाएं, रेड लाइट क्रॉस न करें न जाने कितने नियम कायदे बने हैं। ये सभी हमारी सुरक्षा के लिए ही बने हैं। पर जरा मंथन करिए। हममें से कितने लोग हैं जो इसे हमारी सुरक्षा मान कर पहनते हैं या पालन करते हैं। यह हम सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि हमारे अंदर पुलिस का थोड़ा बहुत डर रहता है। पुलिस के चालान से बचने के लिए हम हेल्मेट पहनते हैं, सीट बेल्ट बांधते हैं।

हम यह जानते हैं कि हेल्मेट न पहनने का क्या-क्या नुकसान हो सकता है। कैसे कोई कीड़ा अचानक से हमारे चेहरे से टकराकर हमें घायल कर सकता है। कैसे हवा के झोंकों के साथ कोई नुकिली चीज हमारे चेहरे और आंख से टकराकर हमें अंधा बना सकती है। कैसे सूर्य की तेज रोशनी में हमारा सिर गर्म होकर तपने लगता है। पर हमें इससे ज्यादा फिक्र इस बात की होती है कि हमारे रेशमी बाल न खराब हो जाएं। अगर पुलिस के चालान का डर न हो तो शायद ही कोई हेल्मेट पहने। हेल्मेट बनाने और बेचने वाले चाय और पान की दुकान खोलने को मजबूर हो जाएं।  चालान का डर न हो तो सीट बेल्ट बांधना तक नहीं आएगा किसी को। रेडलाइट का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। हर चीज हमारी सुरक्षा और हमारी सुविधा के लिए ही है। पर फिर भी हमें इसे मानने के लिए कड़े नियमों की जरूरत है। हम मानते नहीं हैं, हमें मनाना पड़ता है। वह भी जबर्दस्ती। डंडे की जोर पर।

ऐसे में अगर किसी ने योग करने की बात कह दी तो क्या बुरा किया। कोई आपको आपके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का प्रयास कर रहा है। बता रहा है कि हजारों रुपए जिम में फेंकने के बजाय अगर थोड़ा वक्त योग के लिए निकाल लिया जाए तो हम कितने स्वस्थ रह सकते हैं। पर हमें इसमें भी राजनीति नजर आने लगती है। भाई जब आप अपने सिर और अपने जान की सुरक्षा के लिए भी नियमों में बंधे हैं तो फिर यह कैसी दलील की आपसे योग जबर्दस्ती करने को कहा जा रहा है। एक वक्त था जब भारत को योगियों और जोगियों का देश कहा जाता था। पर अब इसी योग ने वैश्विक पहचान कायम कर ली है। भारत के हजारों बाबाओं का रोजगार इसीलिए दिन दुनी राज चौगुनी प्रगति कर रहा है क्योंकि उनके विदेशी भक्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पश्चिमी सभ्यता में योग को जिंदगी का सबसे अहम अंग मान लिया गया है।

मेडिशन एस्क्वॉयर में प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी जब भाषण दे रहे थे तो निर्जला व्रत पर थे। नवरात्र चल रहा था। तमाम जगहों पर नरेंद्र मोदी गए पर अन्न और जल ग्रहण नहीं किया। विदेशी अखबारों ने नरेंद्र मोदी के इस तप पर विशेष आर्टिकल लिखा। बताया कि कैसे एक प्रधानमंत्री योग के दम पर इतनी शक्ति प्राप्त कर लेता है कि दस दिन बिना रुके, बिना थके अपना काम करता है। यह योग और विकास के बीच की कड़ी नहीं तो क्या है।
हरिद्वार और ऋषिकेश में आपको हर दिन हजारों विदेशी पर्यटक मिल जाएंगे। अगर उनसे बात करने का मौका मिले और उनसे आप पूछें कि भारत क्यों आए हैं, तो दस में से आठ के जवाब यही मिलेंगे कि ध्यान और योग सीखने। जिस पश्चिमी सभ्यता ने योग को इस तरह आत्मसात करने की दिशा में कदम उठाया है वहीं हम योग पर टिप्पणी करके इसे नीचा दिखाने का प्रयास करते नजर आते हैं।  योग को भी धर्म के बंधन में बांध कर कुछ तथाकथित सेक्यूलर लोगों ने एक ऐसा उदाहरण पेश किया है जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है।

आप पर योग करने के लिए नियमों की बंदिशें तो नहीं लगाई जा रही है। सूर्य नमस्कार करने के लिए जेल में डालने की तो धमकी तो नहीं दी रही है। सुबह सैर पर निकलने के लिए आपको घर से तो नहीं निकाला जा रहा है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर घबराने की क्या जरूरत है। आप मत जाइए योग करने, कोई जबर्दस्ती तो नहीं है। हेल्मेट नहीं लगाइए आपकी मर्जी। सीट बेल्ट मत बांधिए आपकी च्वाइस। योग मत करिए आपका मन। पर एक बार मंथन जरूर करिए, क्या हमारी जिंदगी और इससे जुड़ी सुरक्षा सिर्फ नियमों में बांध कर ही होनी चाहिए।

Thursday, June 18, 2015

उत्तराखंड त्रासदी : अब बचाने से बड़ी थी जलाने की चुनौती

 शवों का सामूहिक दाह संस्कार से पूर्व पुलिसकर्मियों ने अंतिम सलामी दी।
चाहने वालों ने कोशिश तो बहुत की लेकिन
खो गया मैं तो ढूंढ न पाया मुझको!
सख्त हैरत में पड़ी थी मौत, ये जुमला सुनकर
आ, अदा करना है सांसों का किराया मुझको !!


केदारघाटी में पड़े जहां-तहां पड़े हजारों शव शायद अपने सांसों का किराया इसलिए मांग रहे थे क्योंकि उन्हें मुक्ति चाहिए थी। सबसे बड़ा सवाल यही तो था आपदा के बाद, आखिर उन्हें मुक्ति कौन देगा। इसका जिम्मा दिया गया उत्तराखंड पुलिस और एनडीआरफ की टीम को। बेहद खराब मौसम, रास्तों का अता पता नहीं, कनेक्टिविटी की प्रॉब्लम, भोजन की दिक्कत, इन सबके बीच उत्तराखंड पुलिस को काम करना था।

अब तक की पत्रकारिता में मैंने जब भी पुलिस का चेहरा देखा था तो बड़ा की कुरुप चेहरा ही देखा था। कभी शवों को लात से टटोलती पुलिस की तस्वीरों को देखा था, कभी मृतकों के परिवारों से असभ्य भाषा में बात करते देखा था। यह पहली बार था जब मैं ही क्या पूरे भारत को पुलिस का एक ऐसा मानवीय चेहरा नजर आया, जिसने लोगों की सोच को बदल कर रख दिया। क्या डीआईजी, क्या एसपी और क्या कांस्टेबल। सभी का एक ही मकसद बन गया था मृतकों का अंतिम संस्कार।

उत्तराखंड पुलिस की गुलदार टीम के 19 जांबाजों को भी इस काम में लगाया गया था। इस टीम में पहाड़ों में काम करने का अनुभव करने वाले विशेष प्रशिक्षण प्राप्त जवान थे। इनका काम था ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों में शवों की खोज करना और उन्हें एक जगह जमा करना। फिर इसकी सूचना दूसरी टीम को देना। उत्तराखंड पुलिस की दूसरी टीम शवों का एक साथ दाहसंस्कार करती थी। इस काम में सबसे बड़ी चुनौती थी मौसम मनमानी। जबर्दस्त ठंड और बारिश ने भी जवानों के हौसले को कम नहीं होने दिया। मुश्किल यह भी थी कि पहाड़ों में मौजूद लकड़ियां बारिश से पूरी तरह भींग चुकी थी। इससे अंतिम क्रिया नहीं की जा सकती थी। केदारनाथ मंदिर परिसर में भी हजारों शव इधर-उधर बिखरे पड़े थे। सड़ गल रहे इन शवों से उठ रहे दुर्गंध ने आवारा हिंसक पशुओं को भी आमंत्रित कर दिया था। चुनौती यह थी कि अगर इन शवों का जल्दी दाहसंस्कार न किया गया तो महामारी फैल जाएगी।इस चुनौती में एक बार फिर सहारा बनी इंडियन एयर फोर्स। एयर फोर्स के बड़े हेलिकॉप्टर से शवों के सामूहिक दाह संस्कार के लिए लकड़ियां भेजे जाने का निर्णय हुआ। गौचर स्थित एयर बेस पर किसी तरह सूखी लकड़ियां पहुंचाई जाती थी फिर वहां से इन लकड़ियों को हेलिकॉप्टर में डाल कर केदारघाटी पहुंचाने का काम शुरू हुआ।

डीआईजी संजय गुंज्याल को इस टीम को लीड करने की जिम्मेदारी मिली थी। इस जांबाज पुलिस अधिकारी ने अपने सहयोगियों के साथ कई दिनों तक केदारघाटी में खतरनाक विपरीत परिस्थितियों के बीच कैंप किया। खुद शवों को उठाकर चिता सजाई। सामूहिक चिताओं को राजकीय सम्मान देते हुए अपने साथियों के साथ उन्हें अंतिम सलामी दी। फिर उनका संस्कार किया। कई दिनों तक यही प्रक्रिया चलती रही। पहले शवों को खोजा जाता था, फिर उन्हें एकत्र किया जाता था और अंतिम विदाई दी जाती थी।

डीआईजी संजय गुंज्याल, डीआईजी जीएस मातोर्लिया, डीआईजी अमित सिन्हा,  एसएसपी निलेश आनंद भरण, एसपी प्रदीप कुमार राय, एसपी मणिकांत मिश्रा, एसपी नवनीत भुल्लर, एसपी स्वतंत्र सिंह ये कुछ ऐसे नाम थे जो अपनी टीम के साथ आपदा के समय हीरो की तरह उभरे। न नाम की चाहत, न टीवी पर चेहरा चमकाने की ख्वाहिश, न अखबार के पन्नों में जगह की तमन्ना और न कोई अवार्ड की हसरत। बेहद खतरनाक परिस्थितियों ने इन्होंने अपने कर्तव्य को अंजाम दिया। तत्कालीन डीजीपी सत्यव्रत बंसल ने भी अपनी लीडरशिप क्वालिटी की बेहतरीन मिसाल कायम की। हर वक्त अपनी टीम के संपर्क में रहे और समय-समय पर गाइड करते रहे। अपने नाम और अपने काम को हमेशा मीडिया से दूर रखा।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र और इतिहास के साथ-साथ संस्कृत में शिक्षा प्राप्त एडिशनल एसपी मणिकांत मिश्रा ने तो केदारघाटी में मिले शवों के अंतिम संस्कार से पहले मंत्रों का जाप करने जैसा कार्य भी किया। दाह संस्कार के दौरान किए जाने वाले मंत्रों का उच्चारण कर मणिकांत मिश्रा ने अपने सहयोगियों के दिलों में अनोखी जगह बना ली। मणिकांत मिश्रा के इस कार्य के बारे में उनके ही एक सहयोगी ने बाद में देहरादून में बताया था। हालांकि उत्तराखंड पुलिस की इस तरह के कार्यों की चर्चा कभी मीडिया ही हेडलाइन नहीं बन सकी। और न ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए यह टीआरपी थी। पर उत्तराखंड पुलिस के इस तरह के सैकड़ों प्रयास आज भी गुमनाम हैं।

एक और चुनौती थी शवों के अंतिम संस्कार के पहले उनका डीएनए सैंपल लेना। क्योंकि अगर इन्हें नहीं लिया जाता तो उनकी पहचान करना असंभव था। देहरादून से एक टीम इसी काम के लिए केदारघाटी में कैंप कर रही थी। क्योंकि अपने से बिछड़ चुके लोगों को कम से कम यह तो संतोष दिलाया जा सके कि उनके अपने सच में उनसे बहुत दूर जा चुके हैं और पूरे रीति रिवाज से उनका अंतिम संस्कार भी किया जा चुका है।

इसी बीच कुछ दिनों बाद जब हालात सामान्य हुए और दोबारा केदारनाथ मंदिर में पूजा अर्चना शुरू करवाई गई तो उत्तराखंड सरकार ने इसे पूरे तामझाम के साथ मीडिया में प्रचारित करने का प्रयास किया। राजधानी देहरादून से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टीम को हेलिकॉप्टर में लाद-लाद कर केदारमंदिर तक पहुंचाया गया। पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कैमरों ने मंदिर में पूजा अर्चना की जगह उन तस्वीरों को   दिखाना शुरू किया, जिसे देखकर पूरे भारत में रोष की लहर दौड़ गई। मीडिया के कैमरों ने दिखाया कि अब भी जगह-जगह शव पड़े हैं। यह आरोप प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो चुका था कि उत्तराखंड पुलिस सही तरीके से शवों का दाह संस्कार नहीं कर रही है। पर सच्चाई जानने का किसी ने प्रयास नहीं किया था।

सच्चाई यह थी कि कई शव हजारों टन पत्थरों के नीचे दबे थे। बोल्डर्स इतने बड़े-बड़े थे कि उन्हें मानवीय हाथों से हटाना असंभव था। शव इस कदर दबे थे कि उन्हें किसी तरह निकाला नहीं जा सकता था। इसके लिए जेसीबी मशीनों की जरूरत थी। इन भारी मशीनों को हेलिकॉप्टर से इतनी तंग घाटी में उतारना संभव नहीं था। जिसके कारण उत्तराखंड पुलिस लाचार थी। टीवी पर शवों की खबर चलते ही उत्तराखंड सरकार के हाथ पांव फूल गए। जिस नियत से उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स को पूरे ताम झाम के साथ घाटी में उतारा था वह दांव उल्टा पड़ चुका था। हालांकि इसका असर यह हुआ कि दोबारा से पुलिस टीम को घाटी की ओर रवाना कर दिया गया। यह बात उत्तराखंड सरकार भी जानती थी और उत्तराखंड पुलिस भी कि इस तरह बिना संसाधन के घाटी में जाना समय की बर्बादी है। पर पूरे देश की भावनाएं जुड़ी थी, उत्तराखंड पुलिस एक बार फिर घाटी में थी।

आज भी घाटी में कंकालों का मिलना जारी है। लंबे समय तक यह जारी भी रहेगा, क्योंकि जिंदगी की चाहत में लोग ऐसी ऊंचाइयों तक पहुंच गए थे जहां सामान्य परिस्थितियों में कोई जाने की सोच भी नहीं सकता है।

शवों के दाह संस्कार के लिए  गौचर स्थित एयरफोर्स बेस पर हेलिकॉप्टर में लकङियां लादी जाती थी।

खराब मौसम के बीच इन सूखी लकङियों को केदारघाटी में पहुंचाना अपने आप में बड़ी चुनौती थी।

बेहद सख्त माने जाने वाले डीआईजी संजय गुंज्याल का यह मानवीय रूप किसी ने नहीं देखा था।

  अपने कामों से एडिशन एसपी मणिकांत मिश्रा (बीच में) ने अपने सहयोगियों के दिल में एक खास जगह बनाई।

जहां-तहां बिखड़े पड़े शवों का हाल यह था कि उन्हें बहुत दूर ले जाया भी नहीं जा सकता था। ऐसे में इन शवों का उस स्थान पर ही दाह संस्कार कर दिया गया।



Wednesday, June 17, 2015

आपदा बनी पत्रकारिता की पाठशाला

यह तस्वीर दैनिक जागरण के फोटो जर्नलिस्ट राजू ने ली थी। आपदा के कहर के बाद पहाड़ की चुनौती की यह जीवंत तस्वीर थी।
किसी भी पत्रकार के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जो उसके लिए पाठशाला बन जाती है। 2013 की उत्तराखंड त्रासदी कुछ ऐसी ही पाठशाला साबित हुई। ऊपरवाला न करे इस तरह की पाठशाला में दोबारा जाने का किसी को मौका मिले। पर इस एक पाठशाला ने उत्तराखंड के तमाम पत्रकारों की जिंदगी बदल कर रख दी। खबरों को देखने, समझने और उसे प्रजेंट करने का हर तरह से एक नया नजरिया मिला। बड़े से बड़े प्रिंट के पत्रकार हों या टीवी जर्नलिस्ट, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहां से की जाए और खत्म कहां की जाए। भयानक आपदा से बचकर आए हर एक शख्स के साथ दस-दस कहानियां थीं। पहाड़ों का दर्द भी था और सरकार की नाकामियां भी थीं। उत्तराखंड के पत्रकारों और फोटो पत्रकारों को दिल से नमन, जो उन्होंने उस वक्त रिपोटिंग की वह पत्रकारिता के लिए मिसाल बनी। हालांकि इन्हीं रिपोर्टिंग में कुछ ऐसी खबरों ने भी जगह बना ली, जिसने पत्रकारिता को गहराई तक शर्मिंदा किया। आज केदारनाथ त्रासदी की दूसरी किस्त में कुछ ऐसे ही साहसिक रिपोर्टिंग और शर्मशार करने वाली रिपोर्टिंग की चर्चा।

18 जून की शाम के बाद से राजधानी देहरादून के तमाम न्यूज रुम में त्रासदी के अलावा दूसरी खबरों की चर्चा ही नहीं बची थी। हर तरफ से छन-छन कर आ रही सूचनाओं का समंदर था, जिसमें से खबर निकालना चुनौती से कम नहीं था। तमाम अखबारों के रिपोर्ट्स की टीम भी 19 जून की सुबह पहाड़ों की ओर रवाना हो चुकी थी। इन रिपोर्ट्स के साथ तमाम तरह की समस्याएं थीं। पहाड़ों में पहुंचने के सभी रास्ते बंद थे। फोन और बिजली के लाइन ठप थे। अपनी गाड़ियों से रवाना हुए कुछ रिपोर्ट्स बीच रास्ते में फंस चुके थे। देहरादून के जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से भारतीय सेना का रेस्क्यू आॅपरेशन शुरू हो चुका था। सहस्त्रधारा हैलीपैड पर प्राइवेट एविएशन के हेलिकॉप्टर रेस्क्यू कर रहे थे। जुगाड़ और पैरवी करके जैसे-तैसे कुछ पत्रकार हेलिकॉप्टर से फाटा और गौचर तक पहुंचने में कामयाब भी हो गए थे। पर वहां से आगे जाने का न तो रास्ता था और न साहस। सबकुछ तबाह को चुका था। सबसे अधिक चुनौती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने थी। उनके पास फुटेज के नाम पर ऋषिकेश में गंगा का रौद्र रूप था। और इसी रौद्र रूप में बह चुके स्वर्गाश्रम के भगवान शिव की प्रतिमा की मोबाइल फुटेज। वहीं से लाइव रिपोर्टिंग शुरू थी।

दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे बड़े अखबारों के स्ट्रींगर्स पहाड़ों में मौजूद थे। पर उनके पास भी खबरों को पहुंचाने का संसाधन सीमित हो चुका था। फिर भी उन्होंने जो किया उसने पत्रकारिता के लिए एक मिसाल कायम की। अमर उजाला ने आपदा की कवरेज के लिए पहाड़ों के पत्रकारों को कई महीने बाद देहरादून में सम्मानित भी किया। नोएडा से देहरादून पहुंचे अमर उजाला के वरिष्ठ संपादक उदय कुमार ने जी भर कर स्ट्रींगर्स की तरीफ की। कई को नगद  देकर सम्मानित भी किया गया। अपने पत्रकारिता जीवन में स्ट्रींगर्स के प्रति इतना सम्मान मैंने पहली बार देखा था। अघोषित तौर पर स्ट्रींगर्स को पत्रकारिता में सबसे नीचले पायदान पर रखा जाता है। पर उत्तराखंड की आपदा में इन्हीं नीचले पायदान पर रहे लोगों ने बता दिया कि पत्रकारिता में कभी कोई नीचला पायदान नहीं होता है। सभी पायदान समान ही होते हैं। कोई ऊपर से शुरू होता है कोई नीचे से।

मुझे अच्छी तरह याद है अमर उजाला के अगस्त्यमुनि सेंटर के संवाददाता की कहानी। उसका नाम था दिनेश जमलोकी। आपदा ने उसका घर, खेत सबकुछ तबाह कर दिया था। जैसे-तैसे वह अपने परिवार को बचा सका था। किसी का घर तबाह हो जाए, खाने को मोहताज हों, बेघर हों इससे बड़ी दुख की घड़ी क्या हो सकती है। पर सलाम पत्रकारिता के उस जज्बे को। दिनेश ने पहले अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। फिर लगातार पंद्रह दिन तक बिना थके, बिना रुके रिपोर्टिंग की। ऐसी-ऐसी जीवंत रिपोर्ट भेजी जिसे अमर उजाला ने प्रमुखता से प्रकाशित किया।

करीब तीन दिन बाद जब बारिश थमी और पहाड़ के कुछ रास्ते खुले तब जाकर मीडिया की टीम धीरे-धीरे पहाड़ों तक पहुंचने में कामयाब रही। जैसे-जैसे मीडिया पहाड़ों में ऊपर की ओर जा रही थी, वैसे-वैसे खबरों के तेवर बदलते जा रहे थे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल सबसे ज्यादा खराब था। ओवी वैन लेकर टीवी पर अक्सर दिखने वाले बड़े चेहरों का बस एक ही मकसद हो गया था कि सबसे पहले केदारनाथ कौन पहुंचता है। चुंकि इन तीन-चार दिनों के बीच अखबारों के माध्यम से यह स्थापित हो चुका था कि आस्था के सबसे बड़े केंद्र केदारनाथ में ही सर्वाधिक नुकसान हुआ है। हर चैनल में बाद में यही ब्रेकिंग खबर चली, हम सबसे पहले पहुंचे केदारनाथ मंदिर। हमारे चैनल पर देखिए केदारनाथ की पहली तस्वीर। हमारे रिपोर्ट्स ने जान की बाजी  लगा दी यहां तक पहुंचने में। कुछ ऐसे ही स्लग के साथ ब्रेकिंग न्यूज में आपदा पीड़ितों की कहानी दब गई। हालांकि इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सक्रियता नहीं दिखाई होती तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी की जीवंत सच्चाई पूरी दुनिया नहीं देख सकती।

पर इस सच्चाई से भी जी नहीं चुराया जा सकता कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का  भौड़ापन और नंगापन भी साक्षात दिखा। एक बड़े चैनल के बड़े पत्रकार ने तो वह कर दिया जो लंबे समय तक याद रखा जाएगा। बांग्लादेश के पहाड़ों में हुए बस एक्सीडेंट की फूटेज को लाइव कवरेज में कंवर्ट करके लाइव रिपोर्ट दिखा दी। पांच-छह घंटे तक चली इस रिपोर्ट के बाद जब चैनल को अहसास हुआ तो तुरंत रिपोर्ट हटा दी गई। यह वीडियो 18 जून से ही सोशल मीडिया में चल रही थी। इसी को लाइव करके चला दिया गया था। बस खाई में गिर रही थी और चैनल का रिपोर्टर लाइव रिपोर्ट कर रहा था। टीवी पत्रकारिता के पतन की यह हद थी।

ठीक इसी तरह खुद को नेशनल अखबार कहने वाले अखबार ने केदारनाथ में लूट की खबरों का प्रमुखता से छापा। बताया कि वहां नेपाली युवक  शवों के साथ किस तरह गंदा खेल रहे हैं। महिलाओं की लाश से गहने चुराए जा रहे हैं। अंगुलियों में पहनी अंगुठी उतारने के लिए चाकू से अंगुली काट दी जा रही है। हद तो यह हो गई कि एक महिला के शव के अंगुली को काटती एक तस्वीर भी प्रकाशित कर दी गई। बाद में उत्तराखंड सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और अखबार को माफी मांगनी पड़ी।

इस तरह के सैकड़ों उदाहण थे आपदा के दौरान जब पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती आपके सामने थी। एक तरफ जहां ऐसे शर्मशार करने वाले उदाहरण सामने थे, वहीं दूसरी तरफ देहरादून के फोटो पत्रकारों की जीवंत तस्वीरें भी थीं। दैनिक जागरण के फोटो जर्नलिस्ट राजू पुशोला की एक ऐसी ही तस्वीर ने पहाड़ की चुनौतियों को साक्षात दिखा दिया था। आपदा के दौरान पहाड़ों से आने वाली एक-एक तस्वीर अपने आप में कई सौ शब्दों की कहानी बयां करने के लिए काफी थी। मीडिया फुटेज में भी शब्दों का स्थान ना मात्र का ही था। इन तस्वीरों और फुटेज को देखकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

आपके लिए मेरे पर्सनल आर्काइव से कुछ तस्वीरें। साभार : दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के फोटो जर्नलिस्ट चाचा उर्फ राजेश बड़थ्वाल, राजू पुशोला और अरुण सिंह। 


अपनों को खोने का दर्द क्या होता है, अरुण सिंह की इस एक तस्वीर ने बयां कर दी थी।

केदारनाथ में त्रासदी का क्या हाल था, यह चाचा द्वारा खींची गई इस तस्वीर में नजर आ रही है। ध्यान से देखने पर आप पाएंगे कि चार धाम सीजन में हजारों की भीड़ वाले इस मंदिर में सिर्फ एक काला कुत्ता विचर रहा है।

कई क्षेत्रों में कस्बों के बीच में नदियों का मुख्य प्रवाह आ गया था।

Tuesday, June 16, 2015

इस एक तस्वीर ने यूं बताई थी केदारघाटी की सच्चाई

कौन भूल सकता है 16 जून की उस याद को, जब उत्तराखंड के चारों धाम पर एक साथ प्रकृति ने अपना कहर बरपाया था। मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी, यमुना सभी नदियां अपने रौद्र रूप में थी। कई हजार लोगों की मौत का गवाह बना था उत्तराखंड। अपनों से बिछड़ने का दर्द क्या होता है ये उन लोगों से बेहतर कोई समझ नहीं सकता जो आज भी अपनों का इंतजार कर रहे हैं।

आज 16 जून को दो साल हो गए। उत्तराखंड सरकार भी आज उस त्रासदी को याद कर संवेदना प्रकट कर रही है। पर सच्चाई यही है कि उस समय की असंवेदनशील उत्तराखंड सरकार ने 16 जून की घटना को छिपा कर रखा था। वह तो भला हो सेना के उस टोही हेलिकॉप्टर का जिसने बेहद खतरनाक हो चुके मौसम के बावजूद केदारघाटी का जायजा लेने का साहस दिखाया था। सेना के हेलिकॉप्टर में सवार वह शख्स आज भी गुमनाम है, जिसने एक ऐसी तस्वीर खींची जिसके बाद पूरा देश रो पड़ा। यही वह तस्वीर थी जो तबाही के 48 घंटे बाद पहली बार 18 जून की शाम देहरादून की मीडिया तक पहुंची।

मुझे आज भी याद है 18 जून की वह शाम जब न्यूज रूम में सहयोगियों के साथ बैठा था। उत्तराखंड सरकार के ही एक अधिकारी ने मेल से तस्वीर भेजी और मैसेज किया देखिए और अनुमान लगा लीजिए तबाही का। सच में हैरान करने वाली तस्वीर थी। फोटो डाउनलोड करते ही आह निकल गई। क्या सच में इतनी बड़ी तबाही है? यह तस्वीर सच्ची है या फैब्रिक्रेटेड? इन दो सवालों को अपने वरिष्ठ सहयोगियों दिलीप बिष्ट, मयंक राय, अरुण सिंह के पास छोड़कर मैं जागरण के संपादक कुशल कोठियाल जी के पास चला गया। उन्हें भी चंद मिनट पहले ही यह तस्वीर मिली थी। और वे अपने सहयोगियों को इस तस्वीर की सच्चाई पता लगाने का निर्देश दे रहे थे। खैर कुछ मिनटों बाद ही स्पष्ट हो गया कि यह तबाही की वास्तविक तस्वीर है। इसके बाद पूरे न्यूज रूम का माहौल ही बदल गया। खबरें तो 17 जून की सुबह से ही आने लगी थी कि केदारघाटी सहित चारों धाम में भयंकर तबाही मची है। पर तबाही की सच्चाई सिर्फ अनुमानों पर आधारित थी। पहाड़ों में फोन की कनेक्टीविटी बर्बाद हो चुकी थी। किसी से न तो मोबाइल पर संपर्क किया जा सकता था और न लैंड लाइन पर। प्रमुख जिलों में मौजूद कुछ संवाददाताओं ने किसी तरह जुगाड़ करके राजधानी में तबाही की खबरें जैसे-तैसे पहुंचाई थी। ऋषिकेश और हरिद्वार में उफनाती गंगा ने पहाड़ों की कहानी को थोड़ा बहुत कहने का प्रयास जरूर किया था। पर इस तस्वीर ने सबकुछ बदल कर रख दिया। देहरादून से प्रकाशित सभी अखबारों के न्यूज रूम में 18 जून की शाम इसी तस्वीर की चर्चा थी। खबरों की प्लानिंग से लेकर, प्रजेंटशन तक सभी कुछ बदल गया। आनन फानन में रात में ही सभी अखबारों में टीम का गठन कर दिया गया जो सुबह उत्तराखंड के पहाड़ों के लिए रवाना हो जाएंगे। अलग आपदा डेस्क बना दी गई। पूरे राज्य में फैले रिपोर्ट्स को हाई-अलर्ट मोड पर कर दिया गया। सबकुछ बदल गया। 19 जून को तस्वीरें और तबाही की जबर्दस्त खबरों के प्रकाशन के बाद उत्तराखंड सहित पूरे भारत की सांसे थम गई थी।

एक तरफ जहां वह एक तस्वीर त्रासदी की सच्चाई बयां कर रही थी, वहीं तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी था। उत्तराखंड की बहुगुणा सरकार इस तस्वीर से दूर भाग रही थी। लाखों लोगों को मंझधार में छोड़कर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपने लाव लश्कर के साथ 17 जून की शाम ही नई दिल्ली में प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के दरबार में भीख का कटोरा लेकर पहुंच गए थे। हद ये था कि उत्तराखंड सरकार इतनी दिन हीन बनी थी कि उसके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि फौरी तौर पर सहायता के लिए कदम उठाया जाए। सरकार को यह तो मालूम चल ही गया था कि तबाही कैसी है, तभी तो भागे-भागे दिल्ली दरबार पहुंच गए थे सहायता राशि मांगने।

उत्तराखंड सरकार की गिनती स्वतंत्र भारत के अब तक के सबसे असफल सरकारों में की जानी चाहिए जो पूरे प्रदेश को संकट में छोड़कर आर्थिक सहायता के लिए दिल्ली में बैठी थी। हर साल पर्यटकों से करोड़ों रुपए की उगाही करने वाली सरकार के हाथ खाली थे। दो दिन बाद ही आई-नेक्स्ट ने यह खुलासा किया था कि 17-18 जून को ही उत्तराखंड की महान सरकार ने रीजिनल इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स को करोड़ों रुपए का विज्ञापन जारी किया था। आज तक यह सवाल अधूरा ही है कि यह विज्ञापन किस उद्देश्य से जारी किए गए थे। आई-नेक्स्ट के खुलासे के बाद भले ही ये विज्ञापन बाद में कैंसिल कर दिए गए थे, लेकिन इस एक घटना से साबित कर दिया था कि बहुगुणा और उनकी चौकरी ने कैसे उत्तराखंड को बर्बाद करने में कोई कोर कसर बांकि नहीं रखी।

पिछले कई दिनों से कई बड़े चैनलों पर उत्तराखंड आने के न्योते का विज्ञापन चल रहा है। बताया जा रहा है कि सबकुछ ठीक है। उत्तराखंड प्रगति के रास्ते पर चल पड़ा है। पर सच्चाई क्या है यह पहाड़ों में बसे उन लाखों लोगों से पूछा जाना चाहिए। पूछा जाना चाहिए कि अगर सबकुछ ठीक है तो पहाड़ों में लंबे समय से बसे गांव के गांव खाली क्यों हो गए हैं? क्यों देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी के औद्योगिक क्षेत्रों में पहाड़ के हजारों लोग दो जून रोटी के जुगाड़ के लिए भटक रहे हैं। क्यों पंजाब और   हरियाणा में उत्तराखंड के लोगों को मजदूरी करते आसानी से देखा जा रहा है? क्यों उत्तराखंड के पहाड़ का युवा देहरादून में दो हजार की नौकरी करने के लिए भी तैयार है?
हर साल यह जून का महीना आएगा जो हमें याद दिलाता रहेगा कि पूरा देश इस जून में कैसे जार-जार रोया था। हमारा यह रुदन, यह कंद्रण उन लाखों लोगों को उनके बिछड़े लोगों से तो नहीं मिलवा सकता, पर यह कंद्रण जरूर होना चाहिए ताकि उत्तराखंड सरकार हर उस दावे में अपना चेहरा देख सके कि उत्तराखंड में सबकुछ ठीक है। वास्तविकता तो यह है कि उत्तराखंड अपने विकास से करीब 20 साल पीछे जा चुका है। इसे संभलने और संवारने में मजबूत इरादों वाले लोगों की जरूरत है। पर अफसोस यह है कि आज भी उन पदों पर वही बैठे हैं जिन पर आपदा के समय घोटालों के कई आरोप लग चुके हैं। आपदा ने विजय बहुगुणा को तो कुर्सी से उतार दिया, पर हरीश रावत भी उन्हीं चांडल चौकड़ी से घिरे हैं जो उन्हें अपने चश्मे से सब कुछ हरा भरा दिखा रहे हैं।

Saturday, June 13, 2015

इस हमाम में सभी नंगे हैं

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी मंत्री को उसके पद पर रहते हुए इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि उसने फर्जी डिग्री ली है। मंत्रियों और नेताओं पर लगने वाले तमाम तरह के आरोपों, उन पर दर्ज मुकदमों में एक और नई कड़ी जुड़ चुकी है। यह मामला एक नजीर बन चुका है। भारतीय राजनीति के इतिहास और राजनेताओं पर अध्ययन करने के लिए एक नया चैप्टर मिल चुका है। इस चैप्टर पर काफी कुछ लिखा जा चुका है और बहुत कुछ आगे भी लिखा जाता रहेगा। कैसे एक आम आदमी से कोई नेता बनता है। कैसे चुनाव जीत कर वह मंत्री बनता है। और एक दिन फर्जीवाड़े पुलिस कस्टडी में ले लिया जाता है। हर जगह उसका जुलूस निकल रहा है। कई जगह उसके ऊपर अंडे और टमाटर फेंके जा रहे हैं। पर सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला है। क्या सिर्फ इस एक शख्स ने ऐसा कांड किया है या इस हमाम में सभी कहीं न कहीं नंगे ही हैं।
दिल्ली के कानून मंत्री जितेंद्र तोमर पर फर्जी डिग्री मामले में कानूनी शिकंजा कसता ही जा रहा है। तोमर ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस देश की जनता और कानून उसे कानून मंत्री बना सकता है, उसी देश का कानून उसका जुलूस भी निकलवा सकता है। उसके कानून और ग्रेजुएशन की दोनों डिग्री अभी तक के पुलिस इंवेस्टिगेशन में फर्जी पाई गई है। तोमर के भाग्य का फैसला चाहे जो आए पर इस एक ऐतिहासिक कांड ने नई सिरे से बहस छेड़ दी है। हालांकि बहस का मुद्दा सिर्फ और सिर्फ फर्जी डिग्रियां बन कर रह गई हैं। पर मंथन इस बात भी होना चाहिए कि आखिर इस तरह की डिग्री कैसे लाइसेंसी बन जाती है। कैसे इन डिग्रियों को मान्यता मिल जाती है। कुछ साल पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने ही एडवाइजरी जारी करके सभी राज्यों को सचेत किया था कि भारत में फर्जी डिग्रियों को बनाने वालों का बड़ा नेटवर्क काम रहा है। इसके बावजूद भी आज भी भारत में प्राइवेट संस्थानों और गैर सरकारी संगठनों में काम करने वाले करीब पचास प्रतिशत लोग फर्जी डिग्री के माध्यम से ही नौकरी कर रहे हैं। इस तरह की डिग्रियों पर नजर रखने वाली संस्था फर्स्ट एडवांटेज ने भी अपने सर्वे रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया था कि भारत में करीब पचास प्रतिशत लोग फर्जी डिग्रियों के माध्यम से नौकरी के लिए आवेदन करते हैं। यह फर्जी डिग्री कई तरह की होती है। चाहे अनुभव प्रमाण पत्र की बात हो, जाति प्रमाण पत्र हो या कोई अन्य प्रमाण पत्र। अधिकतर फर्जी बनाए गए होते हैं। हाल के वर्षों में एमबीए की डिग्री हो या पीएचडी की डिग्री सभी सुलभ हैं। ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि इस हमाम में सभी नंगे हैं। जो पकड़ा गया वो चोर और जो नहीं पकड़ा गया वह साधू।
मंथन इस बात पर होना चाहिए कि आखिर ऐसी नौबत ही क्यों आई है कि भारत में फर्जी डिग्रियों का मायाजाल इस कदर बिछ गया है। क्यों हर साल यूजीसी को देश भर के फर्जी विश्वविद्यालयों का लंबी लिस्ट जारी करनी पड़ती है। क्यों हर साल देश भर में डेढ़ से दो हजार कॉलेज खोले जा रहे हैं। क्यों नहीं सरकार इस पर नियंत्रण का प्रयास करती है। क्यों नहीं इस तरह की पॉलिसी बनाई जाती है कि राज्य सरकार के समन्यवय के साथ ऐसे फर्जी कॉलेज और यूनिवर्सिटी पर नकेल कसी जा सके। हर साल यूजीसी फर्जी कॉलेजों और यूनिवर्सिटी की लिस्ट जारी कर निश्चिंत हो जाती है। आज तक एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है कि भारत सरकार की किसी एजेंसी ने ऐसे फर्जी इंस्टीट्यूट पर कड़ी कार्रवाई की हो। न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार इसमें रुचि दिखाती है। सिर्फ लिस्ट जारी कर अपने दायित्व का निवर्हन कर लिया जाता है। लिस्ट भी वेबसाइट पर जारी करने की प्रथा है। पर इसे समझने को कोई तैयार नहीं है कि ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवेश से आने वाले छात्र इतने वेबसाइट और इंटरनेट फ्रेंडली नहीं हैं कि वे गहराई से छानबीन कर सकें। वे सिर्फ मनमोहक विज्ञापनों को देखकर आकर्षित होते हैं और इंस्टीट्यूट्स के मायाजाल में फंस जाते हैं।
इसके अलावा ऐसे गैंग भी सर्किय हैं जो पैसे खर्च कर घर बैठे डिग्री दे जाते हैं। ये डिग्री या तो किसी बड़ी यूनिवर्सिटी या कॉलेज के सर्टिफिकेट और नकली पेपर की हूबहू नकल होती है या किसी फर्जी संस्थान से जारी होने वाले डॉक्यूमेंट्स। बिहार हो या यूपी, साउथ का मामला हो या जम्मू कश्मीर का मामला। हर जगह ऐसे फर्जी लोगों की बहार है। लॉर्ड मैकाले ने जब भारत में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति की नींव डाली थी, तब उन्होंने कभी सोचा नहीं होगा कि भारत में एक समय ऐसा आएगा जब इस तरह की शिक्षा पद्धति की बातें बेमानी हो जाएंगी। घर बैठे ही डिग्रियां मिल जाएंगी और लोग आसानी से इन डिग्रियों के माध्यम से नौकरी भी पा लेंगे। अब भी वक्त है, वह भी ऐसे समय में जब केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री के ऊपर ही फर्जी डिग्री के आरोप लगते रहे हों, एक ऐसी व्यवस्था बनाने की जिसमें फर्जीवाड़े की कोई जगह ही न हो।

चलते-चलते
बैंकिंग सेक्टर में एक टर्म है ‘सिविल’। बैंकों की इस एकीकृत प्रणाली ने बैंकिंग सेक्टर के फर्जीवाड़े को काफी हद तक नियंत्रित कर दिया है। आपका किसी भी बैंक में एकाउंट हो सिविल के माध्यम से पल भर में अपके   जीवनभर के बैंकिंग लेन-देन का सारा ब्योरा कंप्यूटर स्क्रीन पर आ जाता है। तो क्या ऐसी व्यवस्था शिक्षा के क्षेत्र में नहीं हो सकती? मानव संसाधन मंत्रालय को एक पॉलिसी ही तो बनानी है। पूरे देश भर के शिक्षण संस्थानों को एकीकृत प्रणाली में बांधना बेहद जरूरी है।

Wednesday, June 10, 2015

कुत्ते - कमीने... एक-एक को चुन-चुन कर मारूंगा

हिंदी सिनेमा के परदे पर अपने वक्त के सुपरमैन धर्मेंद्र जब इस डॉयलॉग को बोलते थे तो युवाओं की रगों में बहता जवानी का खून  उफान मारने लगता था। चाहे शोले में जय के मरने के बाद उनका बोला गया इस तरह का डायलॉग हो या धरम वीर में अपनी मां की हत्या का बदला लेने के लिए धर्मेंद का विद्रोही रूप। खून में उबाल लाने के लिए यह डायलॉग आज भी काफी है। जिस दिन मणिपुर में भारतीय सेना के काफिले पर हमला हुआ था, उस दिन शहीद सैनिकों के दोस्तों का और भारतीय सेना में मौजूद हर एक जवान का दिल शायद यही डायलॉग दोहरा रहा होगा। ऐसा नहीं है कि इस तरह का उबाल पहले नहीं आया होगा। जब-जब आतंकियों और बॉर्डर पार के नापाक हरकतों के कारण भारत मां का कोई जांबाज शहीद होता होगा, तब-तब हर एक देशभक्त का खून इसी तरह खौलता होगा। मन में आता होगा, चुन-चुन कर मारने का विचार। अफसोस ऐसा हो नहीं पाता था।
पर यह पहली बार है कि 18 सैनिकों के बुरे तरह जले हुए शव देखकर खून खौला और कुत्ते कमीनों को एक-एक कर चुन-चुन कर मारा गया। भारतीय सेना के वीर जांबाजों को दिल से सलाम। म्यांमार की धरती की कोख में जा छिपे आतंकियों को जिस तरह हाईटेक संसाधनों जरिए खोजा गया और मार गिराया वह तारीफ-ए-काबिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने साफ संदेश दे दिया है कि सॉफ्ट कंट्री की छवि को अब भूल जाने का वक्त है। बॉर्डर पार बैठे लोग यह समझने की भूल न करें कि अब हम चुप बैठ जाएंगे। अब तो समय आ गया है कि छेड़ो मत, छेड़ोगे तो छोड़ेंगे नहीं।
लंबे समय से इसी तरह के काउंटर अटैक की डिमांड होती आ रही थी। ऐसा नहीं है कि इससे पहले बॉर्डर पार जाकर कोई कार्रवाई भारतीय सेना ने नहीं की है। वर्ष 1995 ने भारतीय सेना ने आॅपरेशन गोल्डन बर्ड नाम से उस वक्त के वर्मा और अब के म्यांमार में बड़ा आॅपरेशन चलाया था। पूर्वोत्तर के कई आतंकी संगठनों की रीढ़ तोड़ कर रख दी थी। इसके बाद वर्ष 2003-2004 में इंडियन आर्मी ने रॉयल भूटान आर्मी के साथ आॅपरेशन आॅल क्लीयर चलाया था। असम के सबसे बड़े आतंकी समूह यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आॅफ असम के करीब दो सौ उग्रवादियों को ढेर कर दिया गया था। साथ ही 40 आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया गया था।
पर यह भारतीय इतिहास का पहला वाक्या है जब भारतीय सेना के हमलावरों को तत्काल जवाब दिया गया है। इससे साफ संदेश गया है कि अब भारतीय सेना चुप नहीं रहेगी। कुछ दिन पहले रक्षा मंत्री पारिकर और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस तरह की घटनाओं की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि अगर वे एक गोली चलाएंगे तो हम गोलियों की बारिश कर देंगे। अगर वे एक मारेंगे तो हमारे जवान दस को मारने में सक्षम हैं। अब मौन रहने की नीति नहीं अपनाई जाएगी।
भारतीय राजनीति का यह एक बड़ा बदलाव है। एक तरफ जहां भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने एक साल के कार्यकाल में अनेक विदेश यात्राओं के जरिए दूसरे देशों और पड़ोसी मुल्कों के साथ बेहतर संबंध बनाने पर जोर दिया है, वहीं म्यांमार में त्वरीत कार्रवाई करके बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस कार्रवाई से भारतीय सेना का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है।
इन्हीं हालातों को बयां करते हुए किसी ने लिखा है कि ... ..झुको इतना की अदब के लिए काफी हो, इतना मत झुको कि कमर ही टूट जाए।
अदब तो हमारी संस्कृति में है, इसमें झुकने में कोई बुराई नहीं, पर अब झुकने के साथ-साथ अकड़ कर रहना भी जरूरी हो चुका है। बधाई उन जांबाजों को जिन्होंने उन मणिपुर के उन 18 शहीदों का न केवल बदला लिया, बल्कि भारतीय सेना की ताकत से पूरी दुनिया को रूबरू भी करवा दिया। खासकर उन पड़ोसियों को जो यह सोच कर बैठे हैं कि भारतीय राजनीति में वह दम नहीं कि हमला कर सके। 
इंडियन आर्मी को ग्रैंड सैल्यूट।

Monday, June 8, 2015

मुनि जी आपका नि:वस्त्र होना

आज शाम आॅफिस की कैंटिन बंद थी। अपने न्यूज एडिटर सुमित शर्मा के साथ आॅफिस के सामने नेशनल हाईवे के उस पार चाय की दुकान तक गया था। बगल में ही अंबाला-चंडीगढ़ रीजन का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित स्कूल है। अचानक वहां के मेन गेट पर हलचल होती है। चंद पलों में ही नि:वस्त्र चले आ रहे जैन मूनि नजर आते हैं। अगल-बगल चंद भक्तों की फौज के साथ पैदल चले आ रहे मुनि जी स्कूल में प्रवेश कर जाते हैं। नहीं पता स्कूल में मुनि जी के आने का क्या उद्देश्य होगा? नहीं पता कि स्कूल में वे प्रवचन देने आए हैं या फिर किसी अन्य काम से? पर इन सबके बीच कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे यह सबकुछ लिखने पर मजबूर किया। हो सकता है मेरा कुछ लिखना कुछ धर्मांध लोगों को अखरे। पर ‘कड़वे’ बोल तो जैन धर्म के सबसे बड़े मुनि जी भी बोलते हैं। वह भी टीवी पर। इसीलिए मुझे लगता है कि कड़वा बोलना अनुचित नहीं है।
              मैं बता रहा था स्कूल के सामने का दृश्य। मुनि जी के स्कूल में प्रवेश से ठीक पहले उनके सामने से दो महिलाएं भी गुजर रहीं थीं। अचानक वे दोनों सामने से नग्न चले आ रहे मुनि महाराज को देखकर वापस मुड़ गर्इं। यह शर्म और हया का ही परदा था कि जिस धर्म में आप जैसे जैन मुनियों को नि:वस्त्र देखने की आजादी है, वहीं दूसरे धर्मों में इस तरह के मामलों पर सार्वजनिक बातचीत करना भी असंस्कारी होने का प्रतीक माना जाता है। दोनों महिलाओं ने थोड़ी देर वापस चलने के बाद फिर अपनी राह जरूर पकड़ ली, पर यह सवाल भी छोड़ गई कि ऐसा क्यों है?
सामान्य धर्म का ज्ञाता भी इस बात को समझता है कि जब आपने मोक्ष प्राप्त कर लिया तो जीवन में सुख-दुख, रिश्ते-नाते, भोग-विलास, अपने-पराए की दीवारों के मायने खत्म हो जाते हैं। धर्म-गं्रथों में इस पर विस्तार से चर्चा की गई है। कुछ ऐसा ही जैन मुनियों के साथ है। माना जाता है कि आपने मोक्ष की राह पकड़ ली है। जिसके कारण दिगंबर बन चुके हैं, अर्थात दिक़ यानि दिशाएं ही आपका अंबर यानि वस्त्र हैं। शायद बहुत लोगों को पता न हो कि कितने कठिन तप और कठोर नियमों में आप बंधे होते हैं। पर छोटा सा सवाल जैन मुनियों से लाजमी है कि जब आपने मोक्ष की राह पकड़ ली है तो सार्वजनिक जीवन में इस तरह आपका विचरना कहां तक उचित है। हिंदु धर्म में ही नागा साधुओं की अपनी अलग दुनिया है। उन्हें तो कभी इस तरह सार्वजनिक जीवन में विचरते नहीं देखा जाता है। जिन्हें नागा साधु बनना होता है, या जो उनके कर्मकांडों से प्रभावित होते हैं वे उनके अखाड़ों में जाकर दीक्षा लेते हैं। वहीं रहते हैं, वहीं जीते हैं। कुंभ स्रान जैसे धार्मिक मौकों पर ही उनके सार्वजनिक दर्शन सुलभ होते हैं।
इतिहास का छात्र रहा हूं इसीलिए जैन धर्म के ऐहितासिक साक्ष्यों को पढ़ा और जाना है। पढ़ाई के दौरान ही मैंने जाना था कि जैन धर्म के 24 तीर्थकंर हुए। जिन्होंने जैन धर्म को प्रचारित और प्रसारित करने का काम किया। ऋषभदेव जी महाराज जिन्हें आदिनाथ भी कहा गया, से शुरू होकर भगवान महावीर तक जैन धर्म कैसे पहुंचा इसकी विस्तृत व्याख्या भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। इहितास बताता है कि जैन धर्म में ऋषभदेव, अजितनाथ, संभवनाथ, अभिनंदन, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चंद्रप्रभ, सुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयांस- नाथ, वासुपूज्य स्वामी, विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत स्वामी, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के रूप में 24 तीर्थंकर हुए। महावीर स्वामी के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर कई प्रमाण हैं। महावीर स्वामी के बाद कालांतर में जैन धर्म दो संप्रदायों में विभक्त हो गया। एक स्वेतांबर कहलाए, दूसरे दिगंबर कहलाए। स्वेतांबर संप्रदाय को मामने वाले मुनि स्वेत अंबर यानि सफेद वस्त्र धारण करते हैं, जबकि दिगंबर संप्रदाय के मुनि नग्न रहते हैं। दिशाएं ही उनका वस्त्र होती हैं।
हर धर्म और संप्रदाय की अपनी सीमाएं हैं। अपनी मान्यताएं हैं। अपनी प्रथा है और उन प्रथाओं को पालन करने के अपने नियम हैं। कम से कम भारत में किसी को इसकी इजाजत नहीं है कि वे किसी दूसरे धर्म या संप्रदाय के खिलाफ कोई टीका टिप्पणी कर दे। मुझे याद आ रही है कुछ साल पहले आगरा की वह घटना। जैन धर्म के दिगंबर संप्रदाय के एक बड़े मुनि महाराज जी का आगरा प्रवास था। शहर में प्रवेश के लिए उन्हें एक संप्रदाय विशेष बाहुल्य क्षेत्र से ले जाया गया था। चुंकि सामान्य अवस्था में किसी व्यक्ति को नग्न देखना कौतूहल का विषय हो जाता है। कुछ ऐसा ही वहां भी हुआ। संप्रदाय विशेष के लोगों ने मुनि महाराज की नग्न अवस्था पर टिका टिप्पणी कर दी। चंद दिनों बाद ही आगरा का माहौल ऐसा खराब हुआ कि एक हफ्ते तक वहां कर्फ्यू लगा रहा। सांप्रदायिक हिंसा में कई घर जल गए। लोग एक दूसरे के दुश्मन बन गए। पूरा शहर अशांत हो गया था।
यह सिर्फ टिका टिप्पणी का मसला भर नहीं है। यह सार्वजनिक जीवन का प्रश्न भी है। यह सच है कि जैन मुनियों को धार्मिक स्वतंत्रता मिली है कि वे नग्न अवस्था में सार्वजनिक जीवन में कहीं भी जा आ सकते हैं। पर यही काम जब कोई साधारण मनुष्य कर दे और किसी ने शिकायत कर दी तो उसके खिलाफ सार्वजनिक स्थल पर अश्लीलता फैलाने का मामला तक दर्ज हो सकता है। आईपीसी की धारा 294 में आपको जेल भेजा   जा सकता है। अगर किसी महिला के सामने आपने अश्लील हरकत की तो धारा 354 में आपके खिलाफ मुकदमा दर्ज होगा। यहां तक कि 81 पुलिस एक्ट में भी इसका प्रावधान है।
बात सिर्फ इतनी सी है कि जब आपने दीक्षा लेकर मोक्ष  प्राप्ती की राह पकड़ ली, तो फिर सार्वजनिक जीवन में आपके आने का क्या तात्पर्य है। क्यों आप स्कूलों और कॉलेजों में जाते हैं। हर धर्म की मान्यताएं अनंत हैं, पर यह भी स्वीकार करना होगा कि सिर्फ जैन धर्म को मानने वाले ही शहर में मौजूद नहीं हैं। उन्हें आपका इस तरह नग्न अवस्था में विचरण करना अखर सकता है। हो सकता है दिगंबर धर्म की मान्यताओं को मानने वाली महिलाओं को आपका नग्न होकर उनके सामने आना नहीं अखरे पर यह भी सच है कि दूसरे धर्म की महिलाओं के लिए यह काफी बड़ा परदा होता है। क्या सिर्फ धार्मिक मान्यताएं मानकर दूसरे संप्रदाय या धर्म को मानने वालों का चुप रहना मजबूरी है?
मोक्ष की तमाम परिभाषाएं हो सकती हैं, पर एक साधारण मनुष्य के तौर पर तो मैं तो सिर्फ यही मानता हूं कि जिसने सांसारिक मोह माया से मुक्ति पा ली उसने मोक्ष पा लिया। जब सांसारिक जीवन से आपने मुक्ति राह पकड़ ली है तो सार्वजनिक जीवन से भी आपको दूर हो जाना चाहिए। धर्म में तो वह शक्ति है कि हर किसी को अपनी ओर खींचती है। जिन्हें आपके पास आना है वे खुद आपके पास चलकर आएंगे। आपको उनको पास जाने की जरूरत नहीं है।आपका तप, आपकी कड़ी साधना, दैनिक जीवन में आपकी अनुशासनात्मक दिनचर्या अनुकरणीय है। इसका प्रभाव ही काफी है कि लोग आपके पास खींचे चले आएंगे। पर यूं आपका नि:वस्त्र विचरण करना कई बार सोचने पर मजबूर कर देता है।
और अंत में
(अगर मेरी बातों से किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती तो मैं उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं)

Sunday, June 7, 2015

क्या किसी कॉमिक्स कैरेक्टर को खोजा है आपने?

कभी अपने आस-पास देखने की कोशिश की है आपने। हर एक शख्स में आपको कोई न कोई कार्टून कैरेक्टर नजर आ जाएगा। बड़ा मजा आता है चुपचाप इन्हें देखने में। पुरानी यादों को ताजा करने का मौका भी मिल जाता है। कॉमिक्स की दुनिया की शुरुआत भले ही काफी पहले हो गई हो, लेकिन हमने अपने सिक्स्थ स्टैंडर्ड से इस दुनिया को जाना। जाना क्या ये कहिए आत्मसात कर लिया। आत्मसात ऐसा किया कि मां की सुताई आज तक याद है। पता नहीं क्यों मां को कॉमिक्स से इतनी एलर्जी थी।
यह क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया का ही मामला था, जिसे जितना मना करो हम उसके प्रति उतने की आकर्षित हो जाते हैं।
 80 और नब्बे के दसक में जब कॉमिक्स की दुनिया ने मार्केट में पकड़ मजबूत करनी शुरू की तब छोटे-छोटे कैरेक्टर बड़ा मजा देते थे। चाचा चौधरी और साबू की जोड़ी, मोटू पतलू की जोड़ी, बांकेलाल की मजेदार हरकतें, डोगा और नागराज का तुफानी कारनामा, पिंकी की शरारतें। हर एक कैरेक्टर में हम खुद को जोड़ लेते थे। हाल ऐसा था कि नया कॉमिक्स किस दिन मार्केट में आ रहा है, यह तक पता रहता था। भईया और मैं पापा द्वारा दिए गए चिल्लर को जमा करके रखते थे। गली वाली दुकान में कई बार तो एडवांस में पैसा जमा करा आते थे। कॉमिक्स के बाद डाइजेस्ट का समय आया। डाइजेस्ट थोड़ी मोटी होती थी। उसकी कहानी भी लंबी होती थी। कीमत भी अधिक होती थी। हम लोग घर पर मामा-मामी, मौसी, बुआ के आने का इंतजार करते रहते थे। जब वे जाते थे तो हमारे पॉकेट में दस-दस रुपए रख देते थे। हम ऊपरी तौर पर मना करते थे, लेकिन अंदर ही अंदर बड़े खुश होते थे। मन में एक ही बात होती थी, कॉमिक्स या डाइजेस्ट का जुगाड़। धीरे-धीरे कर हमारे घर में नागराज, बांकेलाल, चाचा-चौधरी सहित तमाम कार्टून कैरेक्टर्स की पूरी सीरिज जमा हो गई थी। जब भी मां हम पर गुस्साती थी तो एकाध कॉमिक्स की बली चढ़ जाती थी। कचरे के डब्बे में पड़े टुकड़ों को देखकर दिल बहुत रोता था। कई कॉमिक्स के टुकड़ों को तो हमने और भईया ने जोड़कर फिर से पुनर्जिवित करने का कारनामा भी बखूबी किया था।
आज भी मैं अपने आसपास के माहौल में इन्हीं दिल के सच्चे, दिमाग से चतुर और खुशियां बिखेरने वाले कैरेक्टर्स की खोज करता रहता हूं। हर एक में आप भी खोज कर देखिए कोई न कोई कैरेक्टर तो नजर आ ही जाएगा। मेरे ही आॅफिस में दो शख्स हैं। एक  (पुनीत) साबू की तरह लंबा-चौड़ा, तगड़ा और दूसरा (अंकित) चाचा चौधरी की तरह दुबला-पतला। दोनों को साथ में अगर आप देख लें तो हू-ब-हू मशहूर कार्टूनिस्ट प्राण द्वारा रचित कैरेक्टर ही नजर आएंगे। कई बार उन्हें देखकर मन ही मन खुश हो लेता हूं। बड़ा मजा आता है।
         टीवी पर पहले जीवंत कार्टून कैरेक्टर के रूप में हमने चार्ली चैपलिन को पहचाना। बिना कुछ बोले, सिर्फ अपनी हरकतों से कोई इतना हंसा सकता है, हंसा हंसा कर पागल कर सकता है, यह पहली बार चैपलिन ने ही किया। बाद में मिस्टर बिंस जैसे कैरेक्टर भी आए। पर आज जितनी तेजी से कार्टून चैनल्स की लाइन लगी है, उतनी ही तेजी से बच्चों में अजीब-अजीब हरकतों ने जन्म लेना शुरू कर दिया है। उस वक्त के कॉमिक्स के और आज के टीवी पर आ रहे कार्टून चैनल्स की तुलना कर लें तो जमीन आसमान का फर्क मिलता है। चाहे शिन चैन हो या डोरोमैन। सभी इश्क में पड़ रहे हैं। इत्ती सी छोटी उम्र में लड़कियों को इंप्रेस करने की बात करते हैं।  किसी पर शीन चैन का भूत सवार है तो कोई डोरेमान और नोबिता की तरह ही बोल रहा है। किसी दिन समय निकालकर इन कैरेक्टर्स पर गौर फरमाइए। एक भी ऐसा कैरेक्टर नजर नहीं आएगा जिसमें आज आप किसी का कोई अक्श खोज लें। कई कार्टून तो उन्हीं पुराने कॉमिक्स कैरेक्टर पर बेस्ड होकर ही चल रहे हैं।
कॉमिक्स आउटडेटेड हुआ तो कार्टून कैरेक्टर आए। कार्टून कैरेक्टर से भी बोर हो गए तो एक बार फिर कॉमिक्स कैरेक्टर पर बेस्ड कार्टून सीरिज चल रही है। इन दिनों मोटे-पतलू सबसे हिट है। अब तो इंतजार है कब बांकेलाल स्मॉल स्क्रीन पर प्रकट होगा। एक छोटा भाई है फिल्म इंडस्ट्री में। प्यार से हम उसे छोटा बाबू (शशि वर्मा) कहते हैं, उसी से कहूंगा भाई इस कैरेक्टर को भी टीवी के परदे पर उकेरो। अद्भूत मजा आएगा। फिलहाल जब तक वे कॉमिक्स के सारे कैरेक्टर आपको याद हैं तब तक उन्हें अपने आसपास खोजिए। यकीन मानिए, आज भी वे बड़ा मजा देंगे।

Saturday, June 6, 2015

कहां हैं मानवाधिकार का झंडा उठाने वाले?

मणिपुर में भारतीय सेना के 17 जवान शहीद हो गए। कई जवान जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। पिछले कुछ महीने में जम्मू कश्मीर में सेना पर लगातार घात लगाकर हमले हो रहे हैं। यहां भी जवान शहादत दे रहे हैं। पर लगातार आतंकियों से लोहा लेते हुए संदेश भी दे रहे हैं कि हम हर कीमत पर अपने वतन की रक्षा को तत्पर रहेंगे। इन शहादतों के बीच सबसे अहम है मानवाधिकार का झंडा उठाने वालों की खामोशी। किसी आतंकी की मौत या एनकाउंटर पर सबसे आगे आने वाले इन झंडेदारों की नजर में सैनिकों की शहादत की शायद कोई कीमत नहीं है। आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (अफस्पा) का लगातार विरोध कर रहे संगठनों को भी सैनिकों की शहादत नजर नहीं आती है। कैसे गुरिल्ला की तरह छिपकर वे सैनिकों पर हमला कर रहे हैं और बेरहम बन जा रहे हैं। यह उन्हें नजर नहीं आता है। यह कैसी सोच है। अफस्पा के खिलाफ विरोध का स्वर उठाने वालों के लिए मणिपुर की घटना आंख खोलने वाली होनी चाहिए।
म्यांमार की सीमा से लगा मणिपुर वर्षों से उग्रवाद का शिकार रहा है। अशांत क्षेत्र घोषित होने के बाद से ही यहां अफस्पा लागू किया गया था।  सेना को अफस्पा द्वारा मिले विशेषाधिकार की ही परिणाम है कि आज वहां थोड़ी बहुत शांति है। मणिपुर में उग्रवाद का लंबा इतिहास रहा है। यहां के उग्रवादी संगठनों में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और केवाईकेएल ज्यादा खतरनाक हैं। रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट (आरपीएफ) की ही हथियारबंद शाखा के रूप में पीएलए अस्तित्व में आया था। यह बताने की जरूरत नहीं कि बांग्लादेश या आम भारतीय की भाषा में कहें तो मिनी पाकिस्तान से कैसे आरपीएफ अपनी निर्वासित सरकार चला रहा है। आरपीएफ और उससे जुड़ी शाखाएं कभी भी भारत के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न करने में सक्षम है। 
जम्मू कश्मीर में जिस तरह आतंकी और अलगावादियों ने अलग कश्मीर का राग छेड़ रखा है ठीक उसी तरह मणिपुर की आजादी के लिए भी संघर्ष चल रहा है। साल 1978 से मणिपुर में सक्रिय उग्रवादी संगठन पीएलए मैती, नगा और कुकी कबीलों ने एक साथ आजादी का राग अलापना शुरू किया, जो आज तक जारी है। ऐसे में अगर भारतीय सेना ने यहां मोरचा नहीं लिया होता तो वहां के विनाश की कल्पना नहीं की जा सकती। हद तो यह है कि चीन जैसा अविश्वासी पड़ोसी भी मणिपुर के आतंकी संगठनों के जरिए भारत में अलगवाद की आग को सुलगाता रहा है। नब्बे के दशक में पीएलए को चीन की पीपुल लिबरेशन आर्मी ने ल्हासा में जबर्दस्त सैनिक प्रशिक्षण भी दे रखा है। हाल के वर्षों में म्यांमार में एनएससीएन इसके उग्रवादियों को अतिरिक्त प्रशिक्षण देता रहा है।
ऐसे में कैसे मणिपुर को सेना के मिले विशेषाधिकार से अलग करके देखा जा सकता है। शुरू से ही यहां के आतंकी संगठनों ने भरतीय सैनिकों को टारगेट कर रखा है। अगर भारतीय सेना को जम्मू कश्मीर और मणिपुर जैसे अशांत राज्यों में अफस्पा के जरिए विशेषाधिकार न मिले होते तो ये राज्य कब के हमसे अलग हो चुके होते। मानवाधिकार का झंडा उठाने वालों को सेना का जज्बा और उनकी शहादत तो नजर नहीं आती है, लेकिन अगर किसी आतंकी संगठन या उससे जुड़े लोगों को सेना मार गिराती है तो मानवाधिकार का हनन नजर आने लगता है। आंदोलन छेड़ दिए जाते हैं। मंथन इस बात पर नहीं होना चाहिए कि अफस्पा हटाया जाया जाना चाहिए या नहीं, मंथन तो इस बात पर होना चाहिए कि अगर ये कानून न हों तो भारत जैसा लोकतांत्रिक देश कितने हिस्सों में बंट जाएगा।
यह सही है कि सेना को मिले विशेषाधिकार के कारण जम्मू-कश्मीर हो या मणिपुर, यहां के स्थानीय लोगों को थोड़ी बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पर उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि अगर सेना न हो तो उनका क्या होगा। हर घर में आतंकी पनाह लिए होंगे, हर वक्त गोलियों की तड़तड़ाहट से शहर गूंजते रहेंगे। बहु-बेटियों की इज्जत सड़कों पर निलाम होती रहेगी।  हाल ही में अफस्पा को लेकर गृह मंत्रालय ने आवाज उठाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की समिति के पास पेश की गई जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी कमेटी की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करने की मांग गृह मंत्रालय की तरफ से की गई है। रेड्डी कमेटी ने अफस्पा को उत्पीड़न का प्रतीक बताते हुए निरस्त करने का सुझाव दिया है।
  दरअसल मणिपुर में असम राइफल्स की हिरासत में एक महिला थंगजाम मनोरमा का निधन हो गया था। इसके विरोध में वहां बड़ा आंदोलन हुआ। इरोम शर्मिला भी उसी वक्त से आमरण अनशन पर बैठी है। उसकी एक ही मांग है कि मणिपुर से अफस्पा हमेशा के लिए हटा दिया जाए। इसी मामले की जांच के लिए 2004 में जस्टिस रेड्डी कमिशन का गठन हुआ था। पांच सदस्यीय कमेटी ने जून 2005 में अपनी  147 पेज की रिपोर्ट में अफस्पा को निरस्त करने की सिफारिश की थी। यही रिपोर्ट अब प्रधानमंत्री के पास है।
गृह मंत्रालय के अलावा रक्षा मंत्रालय की नजर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कमेटी की तरफ लगी है। गृह मंत्रालय ने अपना स्टैंड क्लियर कर दिया है। चुंकि यह आतंरिक सुरक्षा का मामला है इसीलिए रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी स्पष्ट कर दिया है कि गृह मंत्रालय जबतक हमारी मदद चाहता है तो हम हर संभव मदद देते रहेंगे। इसी   बीच मणिपुर में बीस सैनिकों की शहादत ने अफस्पा की प्रासंगिता पर नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री का फैसला भविष्य में चाहे जो भी हो, पर इतना जरूर है कि जिस दिन भारतीय सेना को विशेषाधिकार से महरूम किया गया, उसी दिन से कश्मीर और मणिपुर जैसे अशांत राज्यों को भारतीय गणराज्य से अलग करके देखना शुरू कर देना होगा। और जहां तक शर्मिला और उनके जैसे मानवाधिकार संगठनों की बात है तो वे तो आंदोलन करते ही रहेंगे। क्या कभी किसी ने भारतीय सैनिकों की शहादत पर आंदोलन या आमरण अनशन किया है? क्या किसी ने इन शहीदों का बदला लेने के लिए आंदोलन किया है?