Wednesday, June 24, 2015

तो क्यूं विराट को ढो रही है टीम इंडिया


माना की आप युवा हो। यह भी मान लिया कि आपमें बहुत कुछ करने की क्षमता है। यह भी सच है कि आपने टीम इंडिया को बहुत कुछ दिया है। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि कप्तानी की लालच में आप इतना नीचे गिर जाओ। इंडियन टीम के ड्रेसिंग रूम से जो खबरें छन-छन कर बाहर आ रही है उसका साफ मतलब है कि इंडियन टीम दो भागों में बंट गई है। एक का नेतृत्व दिल्ली का मुंडा विराट कोहली कर रहा है, वहीं दूसरी टोली का नेतृत्व भारत का सर्वकालिक महान कप्तान महेंद्र सिंह धोनी कर रहा है। यहां यह भी कोट करना जरूरी है कि विराट कोहली के साथ जितने क्रिकेटर हैं उनमें अधिकतर अभिजात्य वर्ग से ताल्लुक रखते हैं और मुख्यत: वैसे स्टेट से विलांग करते हैं जहां के प्लेयर्स का दबदबा हमेशा टीम इंडिया में रहा है। वहीं दूसरी तरफ धोनी खुद एक लोअर मीडिल क्लास फैमिली से आते हैं और स्टेट भी ऐसा है जहां के प्लेयर बमुश्किल नेशनल और इंटरनेशनल लेवल तक पहुंच पाते हैं। धोनी से पहले तो बिहार-झारखंड से एक कीर्ति आजाद को छोड़ दिया जाए तो हमें कोई नाम याद नहीं जिसने इंटरनेशनल लेवल पर अपनी अलग पहचान कायम की।

वह तो धोनी की प्रतिभा और उनकी जीवटता ही थी जिसने इतने दिनों तक टीम इंडिया में कायम रखा। नहीं तो छोटे शहरों से आए सैकड़ो क्रिकेटर ऐसे रहे जो प्रतिभावान होते हुए भी हाशिए पर डाल दिए गए। क्रिकेट और राजनीति के कांबिनेशन ने भारतीय टीम में दिल्ली का दबदबा हमेशा कायम रखने में मदद की। धोनी एक अपवाद रहे जिनके ऊपर न तो कभी कोई आरोप लगा और ही उनके साथ टीम चयन को लेकर विवाद जुड़ा। एक बार फिर दिल्ली की लॉबी ने विराट कोहली को आगे रखकर एक ऐसी चाल चली है जिसमें धोनी खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। शायद इसी असहजता ने उन्हें बांग्लादेश में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कुछ ऐसा कहने पर मजबूर कर दिया, जिसने धोनी की नाराजगी को जगजाहिर कर दिया। धोनी के समर्थन में सौरव गांगुली और बिशन सिंह बेदी जैसे क्रिकेटर भी सामने आए हैं। उप कप्तान के रहते हुए आर अश्वीन का प्रेस कांफ्रेंस करना भी बहुत कुछ इशारा कर देता है।

अगर किसी टीम में प्रदर्शन के दम पर किसी क्रिकेटर को रहने का अधिकार है तो सबसे पहले विराट कोहली को ही बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। हमेशा अपनी पर्सनल लाइफ (गर्ल फ्रेंड) को लेकर चर्चा में रहने वाले इस किक्रेटर की अगर पिछली पंद्रह-बीस पारियों का आंकलन किया जाए तो इन्हें इंडियन टीम में तो क्या दिल्ली की रणजी टीम में भी खेलने का अधिकार नहीं। फिल्ड में जिस तरह का एटीट्यूट विराट कोहली का रहता है वह अब तक के भारतीय क्रिकेट में कभी नहीं देखा गया। जितने भी कप्तान हुए उनमें संयम के साथ समझदारी भी रहती थी। पर विराट कोहली की नाराजगी हमेशा लाइव टेलिकास्ट कर रहे कैमरों की जद में रहती है। ऐसे में किस अधिकार से विराट कोहली को भारतीय टीम के कप्तान के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है यह समझ से परे है।

विराट कोहली ने इस साल के शुरुआत में हुए ट्राई सीरिज के दौरान चार पारियां खेली। इस वन डे ट्राई सीरिज के चार मैचों में विराट ने क्रमश: 9, 4, 3 और 8 रन किए। यानि कुल मिलाकर 24 रन। इसके तुरंत बाद वर्ल्ड कप का आगाज हो गया। पहले पुल मैच में 103 रन की पारी की बात छोड़ दी जाए तो पूरे टूर्नामेंट के दौरान कभी भी विराट कोहली में आत्मविश्वास नहीं दिखा। पुल बी के अन्य मैचों में विराट ने क्रमश: 46, 33, 33, 44 और 38 रन बनाए। क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल में तो विराट की हैसियत और गिर गई। इन दोनों बड़े मैचों में विराट का रन क्रमश: 3 और एक था।
2014 के इंग्लैंड दौरे पर भी विराट ने चार मैच खेले थे। इन चारों मैच में विराट ने 0, 40, 1 और 13 रन बनाए थे। अब कुछ ऐसा ही हाल बांग्लादेश में ट्राई सीरिज के दौरान हुआ। पहले मैच में एक रन, दूसरे मैच में 23 रन और तीसरे वन डे में 29 रन बनाकर कोई कैसे कप्तानी की दावेदारी कर सकता है या सपने देख सकता है यह समझ से परे है। कप्तान बनकर धोनी ने दिखा दिया था कि कप्तान सिर्फ कप्तानी ही नहीं कर सकता है, बल्कि टीम के लिए एक ऐसा एग्जांपल सेट कर सकता है जिससे दूसरे खिलाड़ी प्रेरणा ले सकें। अपनी कप्तानी के दौरान महेंद्र सिंह धोनी ने कई मैचों में भारतीय टीम को न केवल संकट से उबारा, बल्कि मैच विनर भी बने।

सवाल यह उठता है कि विराट कोहली ही कप्तान क्यों? क्योंकि वो भारतीय टीम में उप कप्तान हैं, और स्वाभाविक तौर से कप्तान का ताज उन्हें ट्रांसफर कर दिया जाए? भारतीय टीम में कई ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने न केवल बेहतर प्रदर्शन से खुद को हमेशा आगे रखा है बल्कि कई मौकों पर बेहतरीन एग्जांपल भी सेट किया है। इनमें प्रमुख नाम है रोहित शर्मा और शिखर धवन। आर अश्वीन को भी कमतर नहीं आंका जा सकता।

मैं तो कहता हूं विराट कोहली को अगले दस मैचों के लिए प्लेइंग इलेवन से बाहर कर दिया जाए। फिर देखिए टीम की अंदरुनी राजनीति कैसे हवा हो जाएगी। टीम का प्रदर्शन भी ठीक हो जाएगा। इसमें दो राय नहीं कि विराट कोहली एक प्रतिभावान खिलाड़ी हैं। उनमें बहुत खेल बचा हुआ है। पर जिस तरह विवादों ने जन्म लिया है ऐसी स्थिति में उनको खुद भी सामने आकर स्थितियों   को स्पष्ट करना चाहिए। पर वे जब भी सामने आते हैं टीम इंडिया के बारे में कम और अपनी गर्लफ्रेंड के बारे ज्यादा सफाई देते हैं। कई बार सफाई नहीं देते तो पत्रकारों को गालियां बक देते हैं। वह भी सार्वजनिक रूप से।

यह सच है कि टीम की ड्रेसिंग रूम में जो कुछ चलता है वह हम और आप जैसे सामान्य लोग नहीं जान सकते हैं। सिर्फ कयास ही लगाए जाते हैं। पर बॉडी लैंग्वेज, आपकी परफॉर्मेंस भी बहुत कह देती है। खासकर भारत में जहां क्रिकेट के एक-एक रन और एक-एक बॉल को पान की दुकान पर बैठा शख्स भी एनालेटिकल होकर देखता है, वैसे में इस वक्त कप्तान धोनी की मनोदशा का आंकलन करना इतना दुरुह भी नहीं है।

फिलहाल बांग्लादेश का दौरा आज समाप्त हो रहा है और जिंम्बावे का दौरा कैंसिल हो चुका है। इस बीच टीम इंडिया को आराम करने का काफी मौका है। एक नई सोच और राजनीति से ऊपर उठने में यह विश्राम काफी मदद करेगा। पर विराट कोहली यह सोचना चाहिए कि वे प्रदर्शन के दम पर टीम इंडिया के कप्तान बनें या राजनीति के दम पर। वहीं धोनी को यह सोचना चाहिए कि उनमें अभी काफी क्रिकेट बचा है। वह टीम इंडिया को इस तरह नहीं छोड़ सकते हैं। हां कप्तानी छोड़ने जैसी बात कह कर उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कप्तान जैसे पद का उन्हें लालच नहीं है। वह तो सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट खेलने के लिए पैदा हुए हैं और जब तक क्षमता है वह क्रिकेट ही खेलेंगे, पॉलिटिकल गेम नहीं।
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