Monday, April 10, 2017

लंगट सिंह कॉलेज और बापू की यादें

गांधी कूप 



यह बात उन दिनों की है जब मुजफ्फरपुर में मेरा और मृणाल भईया का एडमिशन लंगट सिंह कॉलेज कैंपस में मौजूद बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस स्कूल में हुआ था। पहले यह स्कूल लंगट सिंह कॉलेज की मुख्य बिल्ंिडग के ठीक सामने मौजूद एनसीसी वाली वर्षों पुरानी बिल्ंिडग में था। इसी के सामने गांधी पार्क था, जहां बापू की बड़ी प्रतिमा मौजूद थी। एक साल बाद ही स्कूल लंगट सिंह कॉलेज के आर्ट्स ब्लॉक के सामने मौजूद लंबे से कॉरिडोर नुमा ब्लॉक में शिफ्ट हो गया। पता चला कि यह ब्लॉक सीआरपीएफ के अस्थाई ठिकाने के लिए बनाया गया था। खैर इसी बिल्डिंग में हमारा स्कूल शिफ्ट हो गया। एक समय लंगट सिंह कॉलेज का कैंपस इतना बड़ा था कि बाद में इसमें बिहार यूनिवर्सिटी की स्थापना हो गई। इसी यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर की देख रेख में बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस स्कूल की स्थापना हुई थी। यूनिवर्सिटी के कई रिटायर्ड प्रोफेसर हमारे स्कूल के शिक्षक थे।
हमारे इसी स्कूल के ठीक सामने एक कुआं था। जब हम लोग छोटे थे तो स्कूल आते और जाते वक्त नियम से एकाथ पत्थर इस कुएं में फेंक दिया करते थे। एक दूसरे कीदेखा देखी कई बच्चे इस कुएं को अपनी प्राइवेट प्रॉपर्टी समझ चुके थे। कुएं में पत्थर फेंकना तो जैसे हमारा सबसे फेवरेट टास्क था। क्योंकि पत्थर भी एंगल बनाकर काफी दूर से फेंकना होता था। कुआं सूखा हुआ था। इसकी हालत इतनी खराब थी कि कोई यहां बैठना भी पसंद न करे। एक दिन हमारे स्कूल में एक छोटा सा प्रोग्राम था। स्कूल का प्रबंधन चुंकि बिहार यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर्स के जिम्मे था, इसलिए सेमिनार में यूनिवर्सिटी के कई सीनियर प्रोफेसर्स भी मौजूद थे। लंगट सिंह कॉलेज के तत्कालीन प्रींसिपल (नाम याद नहीं)भी आए थे। प्रोग्राम के दौरान ही उन्होंने इस कुएं की चर्चा की। उन्होंने बताया कि जब गांधी जी 10 अप्रैल 1917 को पहली बार बिहार आए थे, तो उनका पहला पड़ाव मुजफ्फरपुर का यह ऐतिहासिक लंगट सिंह कॉलेज ही बना था। उन्होंने इसी कुएं का पानी पीया था और यहीं स्रान भी किया था।
LS College, Arial View

मुझे आश्चर्य हो रहा था कि जो कुआं हमारी निशानेबाजी का प्रतिनिधित्व कर रहा है वह कभी बापू के आगमन का गवाह रहा है। प्रोग्राम के दौरान हम बच्चों को अपने आसपास की जगह को साफ रखने का पाठ पढ़ाया जा रहा था और कुआं की चर्चा इसी संदर्भ में हो रही थी। यकीन मानिए इस प्रोग्राम के बाद कुंआ के प्रति हमारा सम्मान बढ़ गया। हमने इसके बाद कभी इस कुएं में पत्थर नहीं फेंका। स्कूल आते जाते वक्त इस सूखे कुएं के पास जाते जरूर थे। कुआं सूखकर एक गड्ढे के रूप में मौजूद था। एक साढ़े चार से पांच फीट का छात्र आराम से इस कुंए में उतर कर बिना किसी सहारे के ऊपर आ सकता था। आठवीं क्लास के बाद कई सालों तक इस कुएं में उतरने का हमें भी सौभाग्य प्राप्त हुआ क्योंकि क्रिकेट का मैदान इस कुआं की बगल में ही था। और अमूमन हमारी गेंद इसमें गिर जाया करती थी।
स्कूल खत्म हुआ। रिजल्ट ठीक ठाक ही था तो लंगट सिंह कॉलेज में एडमिशन भी मिल गया। कुआं इसी तरह मौजूद रहा। आर्ट्स लेने के कारण कुआं का साथ मिलता रहा, कुआं ठीक आर्ट्स ब्लॉक के सामने ही था। ग्रेजूएशन में इतिहास विषय लिया। कॉलेज के दिनों में ही जब गांधी के चंपारण सत्याग्रह को पढ़ने का मौका मिला तो गांधी के मुजफ्फरपुर, लंगट सिंह कॉलेज और इस कुएं की ऐतिहासिकता को और भी नजदीक से पढ़ने का मौका मिला।
एक बार पढ़ाई के दौरान भोजनंदन सर ने कुएं की चर्चा करते हुए इसकी ऐतिहासिकता के बारे में बताया था। उन्होंने बताया कि जब 10 अप्रैल को 1917 में बापू मुजफ्फरपुर पहुंचे तो उन्होंने लंगट सिंह कॉलेज में ही रहने की बात कही। उस वक्त लंगट सिंह कॉलेज के प्रोफेसर आचार्य कृपलानी भी उनके साथ थे। आनन फानन में कॉलेज हॉस्टल में उनके रात गुजारने की व्यवस्था की गई। पर सरकारी संस्थान होने के कारण किसी तरह के विवाद से बचने के लिए गांधी जी से अगले ही दिन वहां से निकल जाने का निवेदन किया गया। दूसरे दिन सुबह की दिनचर्या के दौरान गांधी जी आर्ट्स ब्लॉक के सामने स्थित इसी कुएं पर पहुंचे। यहां के शीतल जल ने उनका मन मोह लिया। खुद बाल्टी से पानी खींचकर उन्होंने पानी पीया और स्रान किया।  इसके बाद गांधी जी चंपारण की ओर प्रस्थान कर गए।

कॉलेज के युवा दिनों में मन में कसक उठती थी कुआं की दुर्दशा को देखकर। ऐतिहासिक कुआं हमारे सामने धीरे-धीरे और भी खराब होता गया। कॉलेज की पढ़ाई भी खत्म हुई पर कुआं जस का तस पड़ा रहा। एक बार कॉलेज में मैंने अपने इतिहास ब्लॉक के दोस्तों से भी कुआं को लेकर चर्चा भी की, प्लान भी बना कि कॉलेज प्रिंसिपल के पास कूंआ के रखरखाव को लेकर चर्चा की जाएगी। हिस्ट्री डिपार्टमेंट के शिक्षकों से भी सहयोग लेने की बात भी हुई। पर उसी दौरान डिपार्टमेंट में पढ़ाई को लेकर हम छात्रों ने क्रांति कर दी फिर यह प्लानिंग धरी की धरी रह गई। कॉलेज खत्म हुआ। दोस्त दूर हो गए। कॉलेज दूर हो गया। कुआं दूर हो गया।
बहुत दिनों बाद जब साल 2005-06 में कॉलेज कैंपस में जाने का मौका मिला कुआं देखकर दिल को जबर्दस्त सुकून मिला। कुआं पूरी तरह से नए रंग रूप में था। मुझे नहीं पता इसके जिर्णोद्धार के लिए किसने सोचा।   किसने इसकी ऐतिहासिकता को समझा। किसने इसे सहेजने की प्लानिंग की। पर उस शख्स को कोटि कोटि नमन जरूर करना चाहूंगा। जिला प्रशासन ने भी इस कुएं को स्मारक के रूप में घोषित कर दिया है। इसके बाद इसे संगमरमरी पत्थरों से कवर करते हुए इसकी घेराबंदी कर दी गई है। अब इस कुएं का नाम गांधी कूप हो गया है।
आज जब पूरा मुजफ्फपुर गांधी के रंग में रंगा है। चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने पर हर तरफ गांधी की चर्चा हो रही है। लंगट सिंह कॉलेज किसी दुल्हन की तरह सजा हुआ है। ऐसे में गांधी कूप भी अपनी ऐतिहासिकता पर गौरवांवित है। मैं शहर से 12 सौ किलोमीटर दूर बैठा हूं। इस ऐतिहासिक आयोजन को मिस कर रहा हूं। पर अपने शहर की आनबान और शान लंगट सिंह कॉलेज की सुंदरता अखबारों के ई-पेपर पर देखकर आह्लादित हूं। भोजनंदन बाबू को बापू की भूमिका में देखकर आनंदित हूं। एक बार उन्होंने कहा था कभी मौका मिला तो गांधी को जीने की तमन्ना है। सर को आज वह मौका मिल गया। बिहार सरकार और नितीश कुमार बधाई के पात्र हैं जिन्होंने इतने बड़े आयोजन को सार्थक किया है। जब लंगट सिंह कॉलेज में इतना बड़ा अयोजन हो रहा है तो उम्मीद करता हूं इससे भी भव्य आयोजन चंपारण की धरती पर हो रहा होगा।

कुछ ऐतिहासिक बातें लंगट सिंह कॉलेज के बारे में


  • स्वतंत्रता सेनानी और प्रसिद्ध समाजसेवी लंगट सिंह की पहल पर और उनके द्वारा दान की गई सैकड़ों एकड़ जमीन पर तीन जुलाई 1899 में लंगट सिंह कॉलेज की स्थापना हुई।
  • भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद लंगट सिंह कॉलेज के शिक्षक और प्रिंसिपल रहे।
  • आचार्य जेबी कृपलानी और राष्टÑकवि रामधारी सिंह दिनकर जैसे दिग्गजों ने भी कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दी।
  • गांधी जी ने इसी कॉलेज प्रांगण में अपनी चंपारण यात्रा की पूरी रूपरेखा तैयार की।    
  • लंगट सिंह कॉलेज की मुख्य बिल्ंिडग जिसका उद्घाटन 26 जुलाई 1922 को हुआ था वह आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की तर्ज पर बना है। 


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