Monday, April 10, 2017

किसानों की कर्जदारी से सरोकार क्यों नहीं?


हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सवाल किया है कि किसानों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया है कि एक महीने के अंदर वह कोर्ट को बताए कि विभिन्न राज्य सरकारों ने इस दिशा में क्या प्लानिंग की है। देश के किसानों को सुप्रीम कोर्ट का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने एक ऐसे मुद्दे पर केंद्र को तलब किया है जिसकी जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। वैसे तो स्वयंसेवी संगठन सिटीजन्स रिसोर्स एंड इनीसिएटिव ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका गुजरात के किसानों को लेकर दायर की थी। पर कोर्ट ने मामले को बेहद संवेदशील माना और इसका दायरा बढ़ा दिया। साथ ही सभी राज्य सरकारों को मंथन करने पर विवश कर दिया है कि क्या वे सच में किसानों के हित के लिए कुछ कर रहे हैं। खासकर आत्महत्या की प्रवृति को रोकने के लिए।

मंथन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जिस किसान के इर्द गिर्द पूरे भारत की राजनीति का पहिया घुमता रहता है वही किसान जमीनी स्तर पर अपनी किसानी से ही पीड़ित है। थक हार कर वह आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाता है। किसानी एक ऐसा पेशा बन चुका है जहां हर कदम पर दर्द ही दर्द है। शायद यही कारण है कि पिछले 25 सालों में दो लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है। आत्महत्या के मामले में महाराष्टÑ, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, तेलंगाना, हरियाणा, छत्तीसगढ़ ने तो पिछले पांच सालों में रिकॉर्ड तोड़ दिया है। बावजूद इसके किसी राज्य से अब तक अच्छी खबर नहीं आई है कि किसानों को एकमुश्त राहत देने के लिए राज्य सरकारों ने क्या किया है।

हाल ही में सम्पन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी किसानों की दरिद्रता का मुद्दा सबसे ऊपर था। खासकर पंजाब और उत्तरप्रदेश में किसानों की बदहाली को दूर करने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों ने बड़े-बड़े बयान दिए। कुछ ऐसा ही बयान हरियाणा विधानसभा चुनाव के वक्त भी दिए गए थे। सबसे बड़ा बयान किसानों की कर्जमाफी को लेकर था। हरियाणा की बीजेपी सरकार तीन साल बाद भी किसानों की कर्जमाफी के लिए प्लानिंग ही कर रही है। पंजाब की कैप्टन सरकार केंद्र की ओर टकटकी लगाए बैठी है कि वहां से राहत राशि आए तो वह कर्ज माफी की योजना बना सके। हां इन सबसे इतर उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने बेहद सार्थक और मजबूत फैसला लेते हुए चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादे को पूरा किया है। उत्तरप्रदेश के लाखों किसानों की कर्जमाफी की घोषणा ने किसानों को जरूर राहत पहुंचाने का काम किया है। इस कर्जमाफी को साहसिक कदम इसलिए भी बताया जा रहा है क्योंकि रिजर्व बैंक कभी कर्जमाफी के पक्ष में नहीं था। रिजर्व बैंक का मानना था कि इससे लोन क्रेडिट पर असर पड़ेगा। आने वाले समय में किसान लोन लेंगे फिर माफी की उम्मीद लगाए बैठे रहेंगे।
योगी सरकार के इस साहसिक कदम के बाद देश में किसानों की ऋण माफी को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है। सितंबर 2016 में राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कृषि राज्यमंत्री ने बताया था कि भारत के किसानों पर इस वक्त 12 लाख 60 हजार करोड़ रुपए का कर्जा है। इनमें से 9 लाख 57 हजार करोड़ का कर्जा कॉमर्शियल बैंकों ने किसानों को दिया है। उस वक्त भी कृषि राज्यमंत्री ने स्पष्ट किया था कि सरकार कर्ज माफ करने पर कोई विचार नहीं कर रही है, क्योंकि रिजर्व बैंक की राय है कि इससे कर्ज वसूली पर निगेटिव असर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट का सरकार से सवाल ऐसे ही नहीं है। कोर्ट के सामने कई ऐसे उदाहरण हैं जब कॉरपोरेट घरानों के ऋण माफी के लिए सरकारें आगे रही है। बैंकों ने भी खूब दरियादिली दिखाई है।
यह बातें वाकई समझ से परे है कि विभिन्न राज्यों के आत्महत्या कर रहे किसानों का कर्ज माफ कर देने से अच्छी अर्थ व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी, जबकि बड़े कॉरपोरेट घरानों की कर्जमाफी से आर्थिक विकास को गति मिलेगी। यह अर्थव्यवस्था की कैसी टर्मनोलॉजी है? भारत का एक सामान्य नागरीक भले ही अर्थव्यवस्था के गूढ मंत्रों को नहीं समझ सकता है, पर इतनी समझ तो जरूर है कि कर्ज तो कर्ज ही होता है। चाहे वह कॉरपोरेट घराने का कर्ज हो या एक निरीह किसान का। आरबीआई के पूर्व गवर्नर से लेकर एसबीआई की अध्यक्ष अरुंधति भट्टाचार्य भी किसानों की कर्जमाफी के पक्ष में नहीं हैं। सभी की एक राय है कि फसल ऋण माफी के्रडिट अनुशासन को बिगाड़ देती है। किसान हर समय ऋण माफी की आस लगाए रखेंगे। इसी संदर्भ में मुख्य आर्थिक सलाहकार के एक बयान पर भी गौर करना चाहिए। एक सेमिनार के दौरान अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा कि ‘‘सरकार को बड़े कॉरपोरेट कर्जदारों को राहत देने की जरूरत है। आपको उन कर्जों को माफ करने में सझम होना चाहिए, क्योंकि पूंजीवाद इसी तरह से काम करता है। लोग गलतियां करते हैं, उन्हें कुछ हद तक माफ किया जाना चाहिए।’’
अब मंथन का वक्त है कि अगर पूंजीवाद का फॉर्मूला यही है तो क्या किसानों के लिए यह फॉर्मूला लागू नहीं हो सकता? कॉरपोरेट घराने तो गलती करते हैं, जबकि हमारे देश का किसान कभी खराब फसल, कभी मौसम के सितम, कभी जानवरों के आतंक और कभी फसलों के रोग के कारण बर्बाद होता है। यह कैसी व्यवस्था है कि किसानों की कर्जमाफी पर चर्चा होने लगती है और कॉरपोरेट घरानों का ऋण ‘चुपके’ से माफ कर दिया जाता है। केवी थॉमस की अध्यक्षता वाली लोक लेखा समिति की ताजा रिपोर्ट कहती है कि बैंकों की कुल 6.8 लाख करोड़ रुपए की गैर निष्पादित संपत्तियां (एनपीए) में से 70 फीसदी बड़े और रसूखदार कॉरपोरेट घरानों के पास है। जबकि मुश्किल से एक प्रतिशत भारत के किसानों के पास है। 2008 में भी जब किसानों का साठ हजार करोड़ रुपए का ऋण माफ किया गया था तब भी बहस शुरू हो गई थी। जबकि किसी ने इस बात पर चर्चा नहीं कि पिछले एक दशक में करीब दस लाख करोड़ रुपए का कॉरपोरेट घरानों का ऋण किस तरह बट्टे खाते में डालकर निपटा दिया गया। हाल ही में क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग ने अपनी रिपोर्ट दी है। इसमें उसने कहा है कि 2011 से 2016 के बीच बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा लिए गए करीब 7.4 लाख करोड़ रुपए के कर्ज में से चार लाख करोड़ रुपए के कर्ज को माफ किया जा सकता है।

पूंजीवादी व्यवस्था में बड़े घरानों की ऋण माफी के लिए कई तरह के उपाय किए जाते हैं। ऐसा ही एक उपाय है बैड बैंक। बड़ी कंपनियों के बुरे कर्जों की समस्या का समाधान करने के लिए बैड बैंक में समस्त बकाया ऋण ट्रांसफर कर दिए जाते हैं। साथ ही पब्लिक सेक्टर रिहैबिलिटेशन एजेंसी (पारा) के जरिए भी ऐसे ऋणों का निपटारा कर दिया जाता है। पर अफसोस इस बात का है कि आजादी के इतने सालों बाद भी किसानों की ऋण माफी के लिए ऐसी किसी व्यवस्था पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया। मंथन जरूर करना चाहिए कि किसानों की आत्महत्या को रोकने के लिए ऐसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं बननी चाहिए? कर्नाटक, महाराष्टÑ, तेलंगाना, गुजरात, पंजाब और हरियाणा के किसान हर साल आत्हत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा रहे हैं। सरकारें खामोश हैं। कर्ज तले दबे किसान आस लगाए सरकार की ओर देख रहे हैं। यह मंथन का सबसे उचित समय है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने किसानों की आत्महत्या पर गंभीर सवाल उठाया है। जवाब देने के लिए ही सही राज्य सरकारें कुछ तो करे।
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