Tuesday, April 25, 2017

लोकतंत्र के स्वाभिमान पर ‘मूत्रतंत्र’ से करारा प्रहार


उत्तर प्रदेश के चुनावी एजेंडे में किसानों की बात सबसे ऊपर थी। पंजाब में भी कमोबेश यही स्थिति थी। दोनों प्रदेश कृषि पर सर्वाधिक आश्रित हैं। दोनों ही प्रदेशों में किसानों की स्थिति दयनीय है। सर्वाधिक अन्न पैदा करने वाले इन दोनों राज्यों के किसानों की बातें हमेशा सुनी और समझी गई हैं। शायद यही कारण है कि चुनाव की तैयारी भी इन्हीं के इर्द गिर्द रची और बुनी जाती है। पर आज से ठीक 41 दिन पहले दिल्ली के लुटियन जोन से हजारों मील दूर से करीब 134 किसान जब यहां पहुंचते हैं तो लोग हैरान हो जाते हैं। पिछले 41 दिनों में इन किसानों ने अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए जिन-जिन तरीकों का सहारा लिया है, उसने मंथन करने पर मजबूर कर दिया है कि कब तक किसान चुनावी तवे की रोटी बने रहेंगे? क्या कभी इनका दर्द दिल्ली की लुटियन दरबार में सार्थक तरीके से सुनी जाएगी।
उत्तर प्रदेश के किसान थोड़े भाग्यशाली हैं, क्योंकि उन्हें मनचाही मुराद मिल गई। चुनाव के दौरान और उसके बाद वो जिस उम्मीद में जी रहे थे वह कमोबेश उन्हें हासिल हो गई। पंजाब के किसान अभी इंतजार में हैं कि कब उन्हें चुनाव के दौरान थमाई गई लॉलीपॉप खिलाई जाएगी। पर इसी बीच तमिलनाडु से दिल्ली पहुंचे 134 किसानों के दल ने 41 दिनों में कुछ ऐसा कर दिया है कि पूरे विश्व की नजर भारत की तरफ लग गई है। इन किसानों की तरह ही जब कुछ साल पहले मध्यप्रदेश के खंडवा इलाके के किसानों ने भी अपनी मांग मनवाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया था तब भी उनका यह विरोध प्रदर्शन विदेशी अखबारों में खूब उछला था। किसानों ने पानी के अंदर खड़े होकर लंबा संघर्ष किया। कुछ हद तक उनकी मांगों पर सरकार ने भी विचार किया। हालांकि यह बात अलग है कि आज फिर वहां के किसान उसी शर्मनाक स्थिति में पहुंच गए हैं। पर दिल्ली के जंतर मंतर पर ये किसान जिस तरह से अपनी मांगों को रख रहे हैं, उसने सभ्य समाज की चूलें हिला कर रख दी है। ज्यों-ज्यों इन किसानों के प्रदर्शन का दिन बढ़ता जा रहा है त्यों-त्यों इनके विरोध का तरीका भी सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा मार रहा है।
कभी सांप का मांस खाकर, कभी दिल्ली रेलवे स्टेशन से चूहे पकड़कर लाकर और उसे मूंह में थामकर, कभी पूरी तरह निवस्त्र होकर दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन करते दिख रहे इन किसानों को देखकर किसी को विश्वास भी नहीं हो रहा है कि क्या हमारे अन्नदाता इस बुरी स्थिति में पहुंच चुके हैं। इसी शनिवार को अपने प्रदर्शन के 39वें दिन जब इन किसानों ने अपना मूत्र एकत्र कर उसे पीकर अपना प्रदर्शन किया तो दिल्ली से लेकर तमिलनाडु की सरकार तक हिल गई। विदेशी मीडिया तक में भारतीय किसानों की इस दुखद और शर्मशार कर देने वाली हकीकत की चर्चा होने लगी। ये किसान अपने प्रदर्शन के दिन से ही तमिलनाडु से नरमंूड लेकर आए हैं और उसके साथ प्रदर्शन कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि ये नरमूंड उनके साथी किसानों के हैं। ये वे किसान थे जिन्होंने पिछले कुछ महीनों में कर्ज और तमाम अन्य समस्याओं के कारण अपनी जान दे दी।

अब सवाल उठता है कि ये 134 किसान अपने राज्य की ऐसी किन समस्याओं को लेकर दिल्ली आए हैं जहां उनकी बात किसी राजनेता, किसी मंत्री किसी सरकार के कान तक नहीं पहुंच रही है। क्या इनकी मांग इतनी गैर जरूरी है कि उस पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए? अगर इन किसानों की मांग इतनी ही गैर जरूरी है तो रविवार को ऐसी क्या स्थिति हो गई कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री माननीय ई पलानीसामी को जंतर मंतर पहुंचना पड़ गया। क्या सच में यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि किसानों ने अपना मूत्र पीकर एक ऐसा शर्मशार करने वाला संदेश दे दिया। या सच में किसानों की मांग में कुछ तो दम है। दरअसल दिल्ली के राजनीतिक गलियारे और मीडिया के चकाचौंध वाले कैमरे से काफी दूर होने के कारण आम लोगों को यह पता नहीं है कि तमिलनाडु पिछले 140 सालों में सबसे बड़े सूखे से जूझ रहा है। जयललिता के निधन के बाद खुद को बचाने में लगी सरकार के पास किसानों की बात सुनने का समय नहीं है। कभी पन्नीरसेल्वम, कभी शशीकला और कभी ई पलानीसामी के बीच फंसी राज्य सरकार खुद से इतनी परेशान है कि किसानों की आवाज उन तक पहुंच नहीं रही थी। वहां के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। दिल्ली पहुंचे किसानों ने तो यहां तक बताया है कि पिछले चंद महीनों में करीब 40 किसानों ने अपनी जान दे दी है। ऐसे में उनके पास दिल्ली पहुंचने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बच गया था। किसानों की सबसे प्रमुख मांग उनकी सुरक्षा को लेकर है। उनकी मांग है कि 60 से अधिक उम्र के किसानों को पेंशन की सुविधा दी जाए। किसानों की मदद के लिए सरकार सूखा राहत कोष का गठन करे। किसानों ने सरकारी बैंकों से जो लोन लिया है उसे माफ कर दिया जाए। साथ ही पानी की सुविधा के लिए विभिन्न नदियों को एक साथ जोड़ने की कोई बड़ी योजना बनाई जाए। 

किसानों की इन मांगों में एक भी मांग ऐसी नहीं है जिसे गैर जरूरी करार दिया जाए। बात सिर्फ इतनी सी है कि तमिलनाडु में फिलहाल कोई चुनाव नहीं है। नहीं तो तत्काल सभी राजनीतिक दल अपने मेनिफेस्टो में इन सभी मांगों को शामिल कर लेती। इसमें भी दो राय नहीं कि सभी मांगों को पूरा करने को लेकर जोर शोर से प्रचार करवाया जाता। पर विडंबना यह है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों की समस्याएं और उनकी मांगों को चुनावी लॉलीपॉप के रूप में देखा गया है। उत्तर प्रदेश और पंजाब इसके ताजा उदाहरण हैं। लंबे समय बाद यूपी में सत्ता में आई सरकार ने लोकसभा चुनाव को देखते हुए विधानसभा में किए चुनावी वादे पूरे कर लिए। किसानों के कर्ज माफ कर दिए गए। पंजाब अभी विचार विमर्श में ही लगा है। तमिलनाडु के किसानों ने मूत्र पीकर एक ऐसी समस्या पर मंथन करने की जरूरत पर बहस तेज कर दी है जिसे हम हमेशा इग्नोर करते हैं। यह अलार्मिंग कॉल है। मूत्रतंत्र ने लोकतंत्र के स्वाभिमान पर करारा प्रहार किया है।
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