Thursday, December 29, 2016

पोलॉर्ड तुम्हें नहीं पता तुमने क्या कर दिया


Mukesh alias Pollard in red cap
with his coach RaviShankar
क्रिकेट की दुनिया के कई रोमांच का आप कभी न कभी गवाह जरूर बने होंगे। पर आज जिस रोमांच के बारे में आपको बता रहा हूं, उसे पढ़ने के बाद आपको भी अहसास होगा कि
‘जो तूफानों में पलते जा रहे हैं
वहीं दुनिया बदलते जा रहे हैं’
रोमांच की यह कहानी है बिहार के मुजफ्फपुर की। लंगट सिंह कॉलेज के मैदान में इंटर कॉलेज क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान की कहानी है यह। इसी 27 दिसंबर को मैदान में फाइनल में पहुंचने के लिए आरडीएस कॉलेज मुजफ्फरपुर और एमएस कॉलेज मोतिहारी के बीच जंग छिड़ी थी। पहले बल्लेबाजी करते हुए एमएस कॉलेज ने आरडीएएस को 110 रन का टारगेट दिया। आसान से लक्ष्य का पीछा करते हुए आरडीएस कॉलेज की पारी मध्यक्रम में लड़खड़ा गई। पर मैदान में आरडीएस कॉलेज की तरफ से मौजूद मुकेश से सभी को उम्मीदें थीं। उम्मीद इसलिए थी क्योंकि मुकेश को लोग उसके असली नाम से कम और पोलॉर्ड के नाम से ज्यादा जानते हैं। जी हां वही जुनूनी क्रिकेटर कैरोन पोलॉर्ड। वेस्डइंडीज का वही पोलॉर्ड, जो कभी अपनी जादूई गेंदबाजी से कहर बरपाता है तो कभी अपनी तूफानी बैटिंग से बॉलर्स को रुला देता है। मुकेश भी कुछ ऐसा ही है।
आॅलराउंडर मुकेश के ऊपर सारा दबाव था। पर अचानक मैच के 21वें ओवर में एक दनदनाते हुए बाउंसर ने उसे पिच पर गिरा दिया। सिर पर बॉल लगने के कारण हम एक उभरते क्रिकेटर फिलिप ह्यूज के सदमे को झेल चुके हैं। इसलिए बताने की जरूरत नहीं कि जब एक सामान्य 70 -80 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से आती हुई बॉल सीधे आपकी कनपटी में लगती है तो क्या दशा होती है।
बॉल पोलॉर्ड के कनपटी के किनारे लगी थी। कनपटी पर लगी चोट ने उसे अचेत कर दिया। उसे आनन फानन में मैदान से बाहर लाया गया। फर्स्ट एड दिया गया। स्थिति थोड़ी सामान्य होने के बाद मैच दोबारा शुरू हुआ। पर आरडीएस कॉलेज का पोलॉर्ड मैदान में नहीं जा सका। मैदान के बाहर अपनी टीम के बीच लेटा पोलॉर्ड इस अवस्था में नहीं था कि वह दोबारा बैटिंग के लिए जा सके। अब स्थिति पलट चुकी थी। एक समय ऐसा आ गया जब आरडीएस कॉलेज की टीम हारने की कगार पर पहुंच गई।
टीम के सात विकेट गिर चुके थे। आठवां विकेट भी गिर गया। अब पूरी तरह मैच आरडीएस कॉलेज के हाथ से निकल गया था। पर आठवां विकेट गिरने के बाद पोलॉर्ड ने अपने साथियों को पैड पहनाने को कहा। आरडीएस कॉलेज के कोच सह फीजिकल डायरेक्टर रविशंकर के लाख मना करने के बावजूद पोलॉर्ड मैदान में उतरने की जिद पर अड़ गया। अंत में रविशंकर ने उसे इजाजत दे दी। साथियों ने जोरदार तालियों के साथ उसे मैदान में भेजा। पिच पर जाते ही पोलॉर्ड ने पहले तो एक-दो रन लेना शुरू किया। हर एक दो रन दौड़ने के बाद वह बैठ जाता था। कनपटी पर लगी चोट और असहनीय दर्द एवं थकावट के बावजूद वह खेल रहा था। हर रन के बाद हाथों को भींजते हुए शायद वह अपने अंदर की ऊर्जा को जागृत कर रहा था। फिर दोनों हाथों को कसकर जकड़ते हुए बैट थामता था। पर उसके मन में तो कुछ और ही चल रहा था। वह इंतजार कर रहा था उस बॉलर का जिसकी बॉल ने उसे अचेत कर दिया। यह उस जीवटता की जिंदा मिसाल है जिसे हम और आप सिर्फ फिल्मी परदे पर ही देखते हैं। आमीर खान की सर्वकालिक फिल्मों में से एक ‘लगान’ के क्लाइमेक्स में भी आपने यह सीन देखी होगी। पर वहां सबकुछ स्क्रिीप्टेड था। वह रील लाइफ थी, यहां रीयल लाइफ का ‘भूवन’ मैदान में था। रीयल लाइफ के इस भूवन ने मैच का रुख पलट दिया था। अंतिम ओवर में तक टीम को जीत की कगार पर ले आया। अंतिम छह गेंद पर टीम को पांच रनों की दरकार थी।
Cricket Team R.D.S College. 

आखिर वह बॉलर भी पोलॉर्ड के सामने आ गया। बॉलर था फैजल गनी। विजी ट्रॉफी के स्टार बॉलर रहे फैजल की तेज गेंद ने पोलॉर्ड को अंदर से हिला दिया था। पर जिस कांफिडेंस से पोलॉर्ड ने खुद को स्ट्राइक एंड पर रखा था वह देखने लायक था। तेज रफ्तार से आ रहे फैजल की पहली गेंद पर पोलॉर्ड ने दनदनाते हुए ऐसा पंच मारा कि बॉल बाउंड्री के बाहर चली गई। मैदान के बाहर दर्शक जोश से चिल्ला रहे थे और मैदान में खामोशी पसरी थी। अब जीत एक रन दूर थी। अगली ही गेंद पर पोलॉर्ड ने दोगूनी रफ्तार से बॉल को बाउंड्री पार पहुंचा दिया।
इस बाउंड्री के जरिए पोलॉर्ड ने वह कर दिखाया जिसकी जितनी मिसाल दी जाए कम है। यह उस जीवटता का चौका था जो हमारे अंदर विश्वास जगाती है। यह उस जीवटता का चौका था जिसके जरिए हम अपने भय पर काबू पाते हैं। और यह उस जीवटता का चौका था जिसे आज का युवा भूलने लगा है।
चोट के बावजूद 29 रनों की नाबाद पारी खेलकर पोलॉर्ड ने आरडीएस के सिर जीत का सेहरा बांध दिया। मैच का विनिंग स्कोर करते हुए पोलॉर्ड वहीं पिच पर लेट गया। शायद पोलॉर्ड को भी नहीं पता नहीं था आज उसने क्या कर दिया है।
मेरे लिए तो यह इतना सुखद पल है जिसे सुनकर मैं मुजफ्फरपुर से बारह सौ किलोमीटर दूर बैठ कर भी रोमांचित हो रहा हूं। आज सुबह मित्र रविशंकर से लंबी बातचीत हुई। उसी ने पोलॉर्ड की पूरी कहानी सुनाई। मुझे लगा मुजफ्फरपुर के इस पोलॉर्ड के जीवटता की कहानी आप सभी को भी सुनाई जाए। इसीलिए लिख डाली। मुजफ्फरपुर शहर में इन   दिनों इस रीजन का सबसे बड़ा क्रिकेट लीग हो रहा है। एमपीएल के आयोजकों के पास अगर मेरा यह मैसेज पहुंचे तो मैं निवेदन करना चाहूंगा कि पोलॉर्ड को सार्वजनिक मंच से सम्मानित करके उसकी हौसलाआफजाई करें।
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि मुजफ्फरपुर जैसे बड़े शहर जहां कई बड़े अखबारों की प्रींटिंग यूनिट है वहां कैसे पोलॉर्ड की कहानी लोगों तक नहीं पहुंची। एक अखबार ने जरूर पोलॉर्ड के उस दिन की आजीवन न भूलने वाली पारी को थोड़ी जगह दी। पर दावे के साथ कह सकता हूं यह पारी पोलॉर्ड को ताउम्र हौसला और प्रेरणा देगी। पोलॉर्ड की इस पारी को जिसने भी वहां देखा होगा उन्हें भी यह पारी लंबे समय तक प्रेरणा देगी। उम्मीद करता हूं मुजफ्फरपुर का यह पोलॉर्ड जिसे आप तस्वीर में लाल कैप पहने देख रहे हैं आने वाले समय में अपनी इसी जीवटता के दम पर टीम इंडिया का कैप पहने।  रवि ने बताया कि पोलॉर्ड की कनपटी पर चोट के कारण गहरा दाग बन गया है। यह दाग खत्म हो या न हो पर दुआ करनी चाहिए कि पोलॉर्ड अपना यह हौसला कभी न खोए।
कभी मुजफ्फरपुर जाऊंगा तो इस पोलॉर्ड से जरूर मिलूंगा, क्योंकि पता नहीं क्यों मुझे इस पोलॉर्ड में अपना बचपन नजर आ रहा है। अपने क्रिकेट जीवन की कहानी फिर कभी।

Monday, December 26, 2016

राजनीति से बहुत ऊपर है शिवाजी का कद

 
भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई करीब तीन हजार छह सौ करोड़ रुपए की लागत के एक ऐसे प्रोजेक्ट का गवाह बनने जा रही है जो आने वाले समय में महाराष्टÑ की राजनीति का आधार बन सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों मुंबई में अरब सागर के बीच छत्रपति शिवाजी महाराज के स्मारक की नींव रख दी है। सागर के उफान मारते पानी के बीच बनने वाला यह स्मारक आने वाले दिनों में महाराष्टÑ की राजनीति में क्या उफान लाएगा यह तो आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल इस स्मारक के विरोध में भी स्वर उठने लगे हैं। पर यह वक्त बीजेपी सहित तमाम दूसरी राजनीतिक पार्टियों और महाराष्टÑ से जुड़े संगठनों के लिए मंथन का वक्त है कि क्या शिवाजी का कद इतना छोटा है कि उन्हें राजनीति में झोंक दिया जाना चाहिए? पूरे विश्व के कोने-कोने में हमें तमाम ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जहां हम वहां की सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ वहां के युगपुरुषों की प्रतिमाएं मौजूद हैं।
भारत के भी कई राज्यों में हमें वहां के युगपुरुषों की प्रतिमाएं और स्मारक मिल जाएंगे। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं होते हैं। इन स्मारकों और प्रतिमाओं के सामने फोटो खिंचवाकर हम उन्हें अपने एलबम में सजाना शान की बात समझते हैं। ऐसे में अगर भारतीय अस्मिता की आन-बान और शान के प्रतीक माने जाने वाले शिवाजी का स्मारक बनाया जा रहा है तो विरोध के स्वर क्यों? दुनिया के सबसे ऊंचे स्मारक के रूप में इसे पहचाना जाएगा। क्या यह सुखद नहीं कि पूरे विश्व में अभी स्टेच्यू आॅफ लिबर्टी की जो पहचान है वह भारतीय अस्मिता के प्रतीक की तरफ शिफ्ट हो जाएगी।
अरब सागर में 32 एकड़ की चट्टान पर बनने वाले इस मराठा शासक की 192 मीटर ऊंची प्रतिमा दुनिया के किसी भी पर्यटक के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगी। एक बार में यहां दस हजार पर्यटक आ सकते हैं। इनमें वो दर्शक भी शामिल होंगे, जिन्होंने शिवाजी को न कभी पढ़ा होगा और न उनके बारे में जानते होंगे। पर एक बार यहां आने के बाद उन्हें भी शिवाजी महाराज के प्रति जानने की इच्छा जरूर होगी। क्या यह कम नहीं है कि इसी बहाने में हम भारतीय इतिहास के उस युगपुरुष को याद कर सकेंगे, जिन्होंने हिंदुस्तान का सिर कभी झुकने नहीं दिया।
भारतीय इतिहास में छात्रपति शिवाजी के शासन, उनके संघर्ष, उनके द्वारा किए कार्यों को बेहद सम्मानजनक स्थान मिला हुआ है। कई विदेशी सेनाओं ने तो शिवाजी के युद्ध नीति पर बकायदा अध्ययन कर रखा है। वियतनाम के सैन्य इतिहास में शिवाजी को भगवान की तरह पूजा जाता रहा है। एक बार वहां के सेनाध्यक्ष ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि अमेरिका के साथ इतना लंबा संघर्ष सिर्फ और सिर्फ छत्रपति शिवाजी की युद्ध तकनीक के आधार पर ही संभव हो सका था। शिवाजी महाराज ने छद्म युद्ध की जो तकनीक इजात की थी वह आज भी अतुलनिय है। भारतीय सैन्य इतिहास में तो शिवाजी को भारतीय नौसेना का पितामह कहा जाता है।
ब्रिटिश इतिहास में दर्ज है कि शिवाजी की सेना में 85 फ्रिगेड यानि लड़ाई के लिए छोटे जहाज और करीब तीन बड़े जहाज मौजूद थे। जिस शिवाजी के नाम से दुश्मनों की रूह कांप जाती थी अगर उस शिवाजी महाराज को भारतीय आन-बान के प्रतीक के रूप में इतना ऊंचा दर्जा दिया जा रहा है तो आपत्ति क्यों? दरअसल शिवाजी के स्मारक और स्टेच्यू के विरोध के पीछे कई तर्कपूर्ण कारण भी मौजूद हैं। केंद्र सरकार और महाराष्टÑ सरकार को इन तर्कपूर्ण कारणों पर भी ध्यान देना चाहिए। पूरे महाराष्टÑ सहित कई क्षेत्रों में शिवाजी के ऐतिहासिक किले मौजूद हैं, जो बेहद खराब स्थिति में हैं। यही नहीं शिवाजी से जुड़ी कई यादें भी देखरेख के आभाव में विलुप्त हो चुकीहैं, या विलुप्त होने की कगार पर है। कभी भी किसी केंद्र सरकार ने और न ही राज्य सरकार ने इन किलों, स्मारकों और यादों को सहेजने का जज्बा दिखाया और न सम्मान दिया।
भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीयत पर शक भी इसीलिए किया जा रहा है क्योंकि जितनी भी सरकारें आईं हैं उन्होंने शिवाजी को राजनीति के चश्मे में ही देखने की कोशिश की है। हर चुनाव में छत्रपति शिवाजी को राजनीति के अखाड़े में उतार दिया जाता है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से नरेंद्र मोदी द्वारा किए जा रहे शिलान्यास पर भी राजनीति हो रही है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिस शिवाजी के स्मारक का शिलान्यास महाराष्टÑ की देवेंद्र फर्नांडिस की सरकार और प्रधानमंत्री मोदी ने धूमधाम से किया है, उस स्मारक की परिकल्पना कभी कांग्रेस ने की थी। वर्ष 2004 में कांग्रेस और एनसीपी की सरकार ने इस स्मारक की घोषणा की थी। लंबे समय से स्मारक की यह फाइल दफ्तरों में धूल फांकती रही। हर बार चुनावी मौसम में यह फाइल मुद्दों के रूप में वोटर्स के सामने आई। चुनावी मौसम बीत जाने के बाद फिर से शिवाजी इतिहास के पन्नों में ही दफन होते रहे। अब लंबे समय बाद इतिहास का पन्ना शिलान्यास तक पहुंचा है। बताया जा रहा है कि चंद महीनों में महाराष्टÑ में महापालिकाओं के चुनाव व्यापक स्तर पर होने जा रहे हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो सिर्फ 41.8 प्रतिशत वोट बीजेपी को मिले थे। ऐसे में यह बात भी उठ रही है कि कहीं एक बार फिर से शिवाजी के   विशालकाय स्मारक की परिकल्पना सिर्फ परिकल्पना ही बनकर न रह जाए। नोटबंदी के बाद वैसे भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा है। तीन महीने बाद बजट का मौसम भी शुरू हो जाएगा। ऐसे में करीब तीन हजार छह सौ करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट के लिए बजट कहां से आएगा।
शिवाजी स्मारक के शिलान्यास से पहले मुंबई में कई जगहों पर शिवसेना और बीजेपी का पोस्टर वार भी पूरे देश ने देखा है। बीजेपी के पोस्टर में न तो बाबा साहब और न ही उद्धव ठाकरे को जगह मिली। वहीं शिवसेना ने इस स्मारक को बाबा साहब का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया है। ऐसे में शक की कोई गुंजाइश नहीं बचती कि यह प्रोजेक्ट सिरे चढ़ भी सकेगा की नहीं। वैसे भी अभी महाराष्टÑ में बाबा साहब अंबेडकर स्मारक की राजनीति शुरू नहीं हुई है। बीजेपी सरकार पर दबाव रहेगा कि जितना भव्य शिवाजी मेमोरियल होगा उतना ही भव्य डॉ अंबेडकर स्मारक भी होना चाहिए। पर मंथन जरूर करना चाहिए कि इन सभी राजनीतिक दबावों, राजनीतिक स्वार्थ और वाद-विवाद से ऊपर हमारे युग पुरुषों की पहचान कायम होनी चाहिए की नहीं। इन युगपुरुषों का कद राजनीति से कई गुना ऊपर स्थापित है।

Friday, December 23, 2016

तैमूर के बहाने : एक है हिटलर

Hitler 

ऐसा नहीं है कि भारतीय इतिहास के सबसे कु्र शासकों में से एक तैमूर लंग के बाद भारत में किसी बच्चे का नाम तैमूर नहीं रखा गया हो। कल ही दिल्ली से राजीव भाई ने बताया कि बिहार में उनके गांव आरा में एक तैमूर है जो कच्छा बनियान बेचता है। अगर भारत के विभिन्न राज्यों खासकर मुस्लिम बहुल वाले राज्यों की वोटर लिस्ट चेक की जाए तो सैकड़ों तैमूर मिल जाएंगे। पर करिना-सैफ ने अपने बेटे का नाम तैमूर क्या रख लिया है हर तरफ बवाल मचा है। इन्हीं सबके बीच व्हॉट्स ऐप पर मैसेज आया कि ..नाम में क्या रखा है निर्भया कांड के दरिंदे के नाम के साथ राम जुड़ा है।
सही बात है नाम में क्या रखा है। अब भला किसी का नाम हिटलर रख देने से कोई हिटलर थोड़े ही हो जाता है। तैमूर के बहाने मुझे हिटलर की याद आ गई। याद आई तो फेसबुक पर उसकी चर्चा कर दी। लीजिए हाजीर है ‘एक है हिटलर’... यह उस ‘विद्रोही’ हिटलर की कहानी है जिसका जन्म पश्चिम चंपारण की उस धरती पर हुआ, जहां से गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। अद्भूत है गांधी और हिटलर का संयोग।

जब मैंने कच्छा ठीक से पहनना शुरू किया था उसी वक्त हिटलर से मुलाकात हुई थी। कहने का मतलब है वह ‘अंडरवियर फ्रेंड लिस्ट’ में है। मेरे ख्याल से वह 1983-84 का साल था, जब हम लोग मुजफ्फरपुर के मझौलिया रोड स्थित वर्मा कैंपस में शिफ्ट हुए थे। हमारे घर से ठीक बगल वाला घर संस्कृत के टीचर ‘माट साहब’ का था। ‘माट साहब’ मास्टर साहब का अपभ्रंश था। हम लोग उन्हें चाचा जी कहते है। गारंटी के साथ कह सकता हूं कि चाचा जी का ओरिजनल नाम (अचलेश्चर त्रिपाठी) चुनिंदा लोग ही जानते थे। पूरे शहर में वे ‘संस्कृत वाले माट साहब’ के नाम से ही जाने जाते थे। पूरे मुजफ्फरपुर में उनके जैसा संस्कृत पढ़ाने वाला कोई शिक्षक नहीं था। यही कारण था कि हर साल हजारों की संख्या में उनके यहां संस्कृत पढ़ने के लिए स्टूडेंट्स पहुंचते थे।
हम लोग जब उस घर में शिफ्ट हुए थे, तब पहली बार हिटलर नाम सुना था। हम छोटे बच्चे थे, इसलिए इतिहास वाले हिटलर के बारे में पता नहीं था। हां पापा मेरे हिस्ट्री के प्रोफेसर थे तो उन्हें इस बात से जरूर आश्चर्य हुआ था कि इतना छोटा बच्चा हिटलर कैसे हो सकता है। खैर वक्त के साथ-साथ हम थोड़े बड़े हुए। जब स्कूल पहुंचे तो इतिहास वाले हिटलर से सामना हुआ। इतिहास में हिटलर को पढ़ने के बाद जिज्ञासा हुई कि आखिर हमारे बचपन के मित्र का नाम हिटलर कैसे रखा गया।
यह तो वह हिटलर था, जो हमारे साथ गली क्रिकेट खेलते बड़ा हो रहा। यह तो वह हिटलर है जिसे हम जब चाहें तब गले में हाथ डालकर पटक दें। यह तो वह हिटलर है जो क्रिकेट में आउट होते ही अपनी बैट का दम दिखाते घर चल दे। क्योंकि मोहल्ले का एकलौता बैट उसी के पास था। इसी के दम पर वह दो बार आउट होता था। मुथैय्या मुरलीधरन की तरह थ्रो के एक्शन में स्पीन बॉल फेंककर यह हिटलर खुद को अनिल कुंबले से कम नहीं समझता था। यह तो वह हिटलर है जिसे पिताजी की तेज आवाज से सूसू आ जाए। वह हिटलर तानाशाह था, जिसके नाम से दुनियां कांपती थी और यह हिटलर ....
एक किस्सा सुनाता हूं। मुझे अच्छी तरह याद है हमलोग उस वक्त सातवीं क्लास में पढ़ते थे। हिटलर के घर में ही हम कैरम खेल रहे थे। कैरम खेलने में हम इतने मशगुल थे कि हमें पता ही नहीं चल सका था कि चाचा जी स्कूल से घर आ गए हैं और ड्राइंग रूम में विराजमान हैं। चाची ने हिटलर को खाने के लिए बोला और हिटलर का जवाब आया ‘अरे यार’ खा लेंगे। हिटलर का इतना बोलना था कि घर में भूचाल आ गया। चाचा जी अचानक से प्रकट हुए। आव देखा न ताव हिटलर को दोनों हाथों से दबोच कर कैरम पर पटक मारा। बोले तय कर लो कि यह तुम्हारी मां है या यार। कसम खाकर बोलता हूं, आज भी जब किसी को यार बोलता हूं चाचा जी का वह गुस्सा याद आ जाता है। और दावे से कह सकता हूं कि हिटलर भी जब यह यार शब्द बोलता होगा उसे पिता जी की पटखनी याद आती होगी। 
तो यह हिटलर किताबों और इतिहास वाले हिटलर से बिल्कुल जुदा था। फिर भी यह जिज्ञासा बनी रही कि आखिर किसी बच्चे का नाम हिटलर कैसे हो सकता है। चाचा जी से पूछने की तो हमारी हिम्मत थी नहीं। दिन बीतते गए हम लोग हाईस्कूल पहुंच गए। तब शायद पहली बार हमें हिटलर का असली नाम पता चल सका रुद्रेश्वर त्रिपाठी। कहां शिव जी का साक्षात नाम और कहां हिटलर। फिर हिटलर के चाचा जी जो उनके साथ ही रहते थे (अब इस दुनिया में नहीं रहे) उन्होंने इस नाम का खुलासा किया। उन्होंने बताया था कि जब हिटलर छोटा था (हम लोगों से मिलने से पहले की बात) तब बात-बात में गुस्सा हो जाता था। हर बात में रूठना तो जैसे उसकी आदत बन गई थी। एक दिन बातों ही बातों में उन्होंने उसे हिटलर नाम दे दिया। फिर यह नाम रुद्रेश्वर के साथ ऐसा जुड़ा कि आज तक उसके असली नाम से लोग उसे कम और हिटलर के नाम से ज्यादा जानते हैं।

संयोगवश कॉलेज में मैंने इतिहास सब्जेक्ट ले लिया। हिटलर नाम में दिलचस्पी भी बढ़ी। इसी दौरान हिटलर की आत्मकथा मीनकैम्फ भी पढ़ने का मौका मिला। यह आत्मकथा खुद हिटलर ने लिखी थी, मीनकैम्फ का मतलब था ‘मेरा संघर्ष’। इस आत्मकथा को   पढ़ने का बाद जब मेरी मां हिटलर की मां को आवाज देती थीं और कहती थीं कि ...हिटलर की मम्मी सुनती हैं..सच कहता हूं बड़ा मजा आता था। फिर तो हर एक शब्द पर गौर करने लगा।
हिटलर की मम्मी, हिटलर के पापा, हिटलर के भैया, हिटलर के चाचा, हिटलर के दादा, हिटलर की दादी, हिटलर की चाची कहने का मतलब है मुझे हिटलर के पूरे खानदान से मिलने का मौका मिला। कई बार हिटलर के पुस्तैनी घर भी गया। हिटलर मेरी दीदी बॉबी दीदी को ही अपनी बहन मानता था। जब राखी के लिए वह हिटलर को राखी बांधती थी तो हमलोग कहते थे, तुम विश्व इतिहास के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर को राखी बांध रही हो। न जाने ऐसी ही कितनी अनगिनत यादें हिटलर और उसके नाम से जुड़ी हैं।
पर अभी भी सवाल मौजूं है कि आखिर क्या नाम का प्रभाव किसी के स्वभाव पर पड़ता है?
इन सबके बीच हिटलर के दादा जी की चर्चा जरूरी है। महात्मा गांधी के परम भक्त हिटलर के दादा सही में सभी के दादा थे। वक्त के ऐसे पाबंद कि मुर्गा बांग देना भूल जाए, लेकिन दादाजी का सुबह चार बजे उठना जरूरी था। नियम कायदे के जबर्दस्त पक्के। खान पान के उतने ही शौकिन। पान उनकी जान थी। एक शब्द में कहा जाए तो कंप्लीट दादा जी थे। हिटलर की अपने पिताजी के नाम से भले ही सूसू निकल जाए पर हिटलर की उनके दादा जी से जबर्दस्त पटती थी। दूसरी तरफ हिटलर के पिताजी सहित पूरा खानदान दादा जी के नाम से थर थर कांपता था। चाची की स्थिति तो यह थी कि अगर दादा जी ड्राइंग रूम में बैठे हों तो वह उस रूम से भी नहीं गुजरती थीं। वो तो उनके ससुर जी थे, पर मेरी मां भी हिटलर के दादा जी के रौब से कांपती थीं। दादा जी का यह रुतबा कहें या खौफ, ताउम्र उनके सामने किसी ने ऊंची आवाज में बात करने की हिम्मत नहीं दिखाई। पूरे घर के असली तानाशाह वही थे। घर को बांध कर कैसे रखा जा सकता है यह उन्हें पता था। मजाल नहीं था कि उनकी मर्जी के बिना घर का पत्ता भी हिल सके। कई बार दबी जुबान में दादाजी की तानाशाही चर्चा की विषय भी बनी थी।
हिटलर तो एक प्रतीक बन गया। जिद्दीपने का। लड़ाई का। बात बात में गुस्सा होने का। मजाक-मजाक में रखा गया हिटलर नाम रुद्रेश्वर की जिंदगी के साथ जुड़ गया। कॉलेज और यूनिवर्सिटी में भी रुद्रेश्वर अपने असली नाम से कभी नहीं जाना गया। यह नाम उसपर इतना हावी हुआ कि बाद में किसी ने नोटिस भी नहीं लिया कि आखिर पश्चिमी चंपारण के एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ गोरा चिट्टा बालक हिटलर कैसे बन गया। आज भी सभी उसे हिटलर ही पुकारते हैं। मुझे पता नहीं हिटलर की बेगम प्रियंवदा उसे क्या बुलाती है। पर सोच कर गुदगुदी हो रही है कि जब हिटलर गुस्सा करता होगा तो उसे भी हंसी जरूर आती होगी कि किस ‘हिटलर’ से पाला पड़ गया। बड़ा होकर हिटलर का बेटा भी उसके नाम पर क्या रिएक्ट करेगा, यह देखना और सूनना मजेदार होगा। पर यह सब बचपने की बात है। हिटलर आज एक सफल बैंकर है। अपने शहर मुजफ्फरपुर में ही सरकारी बैंक में ऊंचे पद पर है। उसका एक बेहद सुंदर परिवार है। नाम में कुछ रखा नहीं होता, कर्म प्रधान होता है।
सैफ और करीना से प्यार करने वाला मैं एक फैन बेहद प्यार से रखा गया तैैमूर नाम दिल से स्वीकारता हूं। ऊपर वाले से दुआ है कि तैमूर अपने मां और पिता जी की तरह सफल बने। अंत में उस तैमूर का शुक्रिया जिसके बहाने आपको हिटलर की कहानी सुनने को मिली।