Monday, December 11, 2017

यह अमेरिकी वर्चस्व का ‘ट्रंप’ स्ट्रोक है

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जब सत्ता संभाली थी उसके बाद से ही स्पष्ट हो गया था कि अरब वर्ल्ड में आने वाले समय में जोरदार हलचल रहेगी। यरुशलम को लेकर भी कुछ हल्के फुल्के बयान सामने आए थे। पर कोई यह कयास नहीं लगा सका था कि इतनी जल्दी इस अति संवेदनशील मुद्दे पर ट्रंप अपना मास्टर स्ट्रोक खेल देंगे। यरुशलम को इजरायल की राजधानी घोषित कर अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका अरब वर्ल्ड को लेकर क्या सोचना है। फिलहाल भारत के लिए मंथन का सही वक्त है कि वह इस डेवेलपमेंट पर क्या स्टैंड ले। इस्लामिक देशों ने अपना छिटपुट विरोध जताकर स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में अरब वर्ल्ड सहित एशिया के देशों में भयंकर गुटबाजी सामने आएगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही अपीलों को अनदेखा करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने यरुशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता दी। मान्यता देने के साथ ही ट्रंप ने तत्काल यह घोषणा भी कर दी कि अमेरिकी दूतावास तेल अवीव से यरुशलम शिफ्ट किया जाएगा। अमेरिका के इस कदम का इजरायल को छोड़कर फिलहाल किसी दूसरे देश ने समर्थन नहीं किया है। यूएन में भी अमेरिका इस मुद्दे पर अलग-थलग पड़ा है। यह एक ऐसा वैश्विक घटनाक्रम है जो आने वाले समय में नए तरीके से अमेरिका के वर्चस्व का इतिहास लिखेगा। यरुशलम का विवाद सिर्फ दो देशों का विवाद नहीं है, बल्कि तीन हजार साल से चली आ रही सभ्यताओं का विवाद है। एक झटके में अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने फैसले से भले ही विवाद को सुलझा लेने की बात कही है, लेकिन यह इतना भी आसान नहीं है।
अमेरिका के ट्रंप स्ट्रोक को समझने से पहले हमें यरुशलम के विवाद पर नजर दौड़ानी होगी। यरुशलम में यहूदियों, ईसाइयों और मुस्लिमों यानि तीनों सभ्यताओं का अनोखा मेल है। तीनों का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र भी यहीं है। यही कारण है कि यरुशलम सिर्फ राजनीतिक मुद्दा न होकर अति संवेदनशील धार्मिक मुद्दा भी है। इजरायल पूरे यरुशलम पर अपना दावा करता आया है। 1967 के युद्ध के बाद इजरायल ने यरुशलम के पूर्र्वी हिस्से पर भी अपना कब्जा कर लिया। वहीं फिलिस्तीनियों का कहना है कि यह पूरा क्षेत्र उनका है। पूरे यरुशलम पर इजरायल का नियंत्रण होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई मामलों में इजरायल पिछड़ रहा है। ऐसे में उसकी पूरजोर कोशिश थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता मिल जाए। हालांकि इजरायल की पूरी सरकार यरुशलम से ही संचालित होती है। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर संसद और सुप्रीम कोर्ट तक यरुशलम में ही है। पर अभी तक जितने भी देशों के दूतावास हैं वो तेल अवीव में है। ऐसे में यरुशलम में अपना दूतावास शिफ्ट करने की घोषणा करने के साथ ही अमेरिका ने यरुशलम को अंतरराष्ट्रीय मान्यता देने की घोषणा कर दी है। इजरायल को छोड़ कर किसी भी अन्य देश ने अमेरिकी राष्ट्रपति के ताजा कदम का समर्थन नहीं किया है। सभी ने इसे ट्रंप का एकतरफा फैसला बताया है।
हो सकता है यह ट्रंप का एकतरफा फैसला ही हो। पर मंथन करने की जरूरत है कि आखिर ट्रंप ने इतना दुस्साहसिक कदम कैसे उठा लिया? क्या ट्रंप को इस बात का इल्म नहीं कि पूरे इस्लामिक वर्ल्ड में उनका यह कदम इस्लाम के खिलाफ उनकी नीति का एक हिस्सा माना जाएगा? दरअसल ट्रंप ने यह घोषणा कर एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक खेला है जिसका परिणाम आने वाले समय में नजर आएगा। फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने तो सीधे तौर पर कहा है कि मध्य पूर्व में शांति के लिए मध्यस्थ के तौर पर ट्रंप ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। फैसले के कारण पहले से अस्थिर इस क्षेत्र में नए सिरे से अशांति पैदा हो सकती है। तुर्की और ईरान ने भी ट्रंप के कदम की कड़ी आलोचना की है। तुर्की ने इसे गैर जिम्मेदाराना और गैरकानूनी फैसला बताया है, जबकि ईरान ने कहा है कि इस कदम से मुसलमान भड़केंगे। 
अब सवाल उठता है कि ट्रंप ने यह फैसला किसके दम पर और क्यों लिया है। वास्तव में बाहर से देखने पर अरब वर्ल्ड और इजरायल एक दूसरे के दुश्मन नजर आते हैं, लेकिन भीतर खाने बहुत कुछ पक रहा है। सऊदी अरब और इजरायल के बीच कभी कूटनीतिक रिश्ते नहीं रहे, लेकिन ईरान दोनों का साझा दुश्मन है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। इसी कदम पर चलते हुए दोनों देश मध्य पूर्व में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहते हैं। अमेरिका को यह सबसे मुफीद वक्त लगा, क्योंकि पूरे अरब वर्ल्ड में इस वक्त फूट चल रही है। अरब क्षेत्र में अलगाव की स्थिति बनी हुई है। अरब लीग और गल्फ कोआॅपरेशन काउंसिल में भी अलगाव हो चुका है। एक तरफ सऊदी अरब है तो दूसरी तरफ कतर है, जबकि तीसरी तरफ बाकी अरब देश हैं। सऊदी अरब में भी गृहयुद्ध की स्थिति है। उत्तराधिकारी को लेकर वहां लड़ाई चरम पर है। हाल यह है कि मौजूदा किंग अपने बेटे को राजा बनाने की कोशिश में हैं, इसलिए दूसरे महत्वपूर्ण किंग दावेदार सऊदी की जेल में बंद हैं। मुस्लिम देशों के लिए सऊदी अरब हमेशा से ही नेता की भूमिका निभाता आया है, ऐसे में वह अभी इस स्थिति में नहीं है कि अमेरिकी विरोध का नेतृत्व कर सके। इसके अलावा ज्यादातर इस्लामिक देश इस वक्त गृह युद्ध का दंश झेल रहे हैं। सीरिया, इराक, लीबिया सहित कई अन्य अरब देशों में इतनी शक्ति नहीं बची है कि वह गृह युद्ध के बीच यरुशलम को लेकर क्रांति का कोई झंडा उठाए। अमेरिका ने मौके का फायदा उठाया है। सऊदी अरब हो, पूरा खाड़ी क्षेत्र हो या फिर मिस्र हो। ये सारे राष्ट्र सुरक्षा को लेकर पूरी तरह अमेरिका पर ही निर्भर हैं, ऐसे में वे अमेरिका से सीधा पंगा नहीं लेंगे। छिपटपुट विरोध प्रदर्शन की बात छोड़ दें तो किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि वह अमेरिका के सामने विरोध दर्ज कराए। सिर्फ मिस्र ही एक ऐसा देश था जो अमेरिका से आंखें मिला सकता था, लेकिन मिस्र का इजरायल के साथ शांति समझौता है, ऐसा उसके विरोध की कोई संभावना नहीं। जॉर्डन भी इजरायल के साथ बेहतर संबंध रखने को इच्छुक है।
फिलहाल इस्लामिक भावनाओं के मद्देनजर कुछ कट्टरपंथी संगठन विभिन्न इस्लामिक देशों में प्रदर्शन कर रहे हैं और अमेरिका को देख लेने की धमकी दे रहे हैं, पर यह विरोध भी क्षणिक ही साबित होगा। क्योंकि अमेरिका के विरोध के लिए बड़े इस्लामिक मूवमेंट की जरूरत पड़ेगी, फिलहाल इसकी संभावना कम ही है। इस्लामिक मूवमेंट के लिए किंग अब्दुल्ला जैसे किसी पराक्रमी किंग की जरूरत है, जबकि इस समय गृहयुद्ध में उलझे इस्लामिक देशों में कोई नेतृत्वकर्ता दूर तक नजर नहीं आता। इस्लामिक संगठनों का विरोध भी सिर्फ धार्मिक ही है। इसे कट्टरता से भी जोड़ा जा सकता है, क्योंकि यरुशलम में ही मक्का के बाद मुस्लिमों का दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र है। फिलिस्तीन कभी भी अरब देशों के राजनीतिक एजेंडे में नहीं है। इनका सबसे बड़ा दुश्मन ईरान है। ऐसे में अमेरिकी शह पाकर इजरायल ही एक ऐसा देश है जो सीधे तौर पर ईरान से पंगा ले सकता। 

ट्रंप के कदम के बाद पूरी दुनिया की नजर एशिया पर लगी है। खासकर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या कदम उठाते हैं इस पर कयास लगाए जा रहे हैं, क्योंकि हाल ही में मोदी ने इजरायल की यात्रा कर इतिहास रचा था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत किसकी ओर है, अमेरिका और इजरायल के साथ या फिर अरब वर्ल्ड के साथ। ट्रंप की इस्लाम विरोधी छवि अब भी कायम है, जबकि भारतीय प्रधानमंत्री ने हाल के वर्षों में तमाम मुस्लिम देशों खासकर सऊदी अरब, कतर और ओमान की यात्रा कर अरब वर्ल्ड में एक बेहतर छवि बनाने का प्रयास किया है। सऊदी अरब के साथ मोदी के गर्मजोशी के रिश्ते पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र भी बन चुका है। ऐसे में भारत के हर एक कदम पर दुनिया की नजर है। फिलहाल मोदी शांत हैं। उनकी तरफ से इस मामले पर कोई ट्वीट या बयान नहीं आया है। पूरी दुनिया फिलहाल इस बात के लिए फिक्रमंद है कि अगर अरब देशों में अशांति होती है तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ेगा। वैश्विक मंदी से जूझ रहे देशों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक होगी।
चलते-चलते
यरुशलम मामले पर जहां एक तरफ पूरी दुनिया की नजर मोदी पर है, वहीं मोदी शांत हैं। जबकि बीजेपी के फायर ब्रांड नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने साफ तौर पर कहा है कि भारत को भी अपना दूतावास यरुशलम शिफ्ट कर देना चाहिए। हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय का बयान बेहद संतुलित है। भारत ने स्पष्ट किया है कि भारत का रुख स्वतंत्र और सतत है जो हमारे हितों एवं दृष्टिकोण के आधार पर बना है और यह किसी अन्य तीसरे देश के द्वारा तय नहीं किया गया है।

Monday, December 4, 2017

आर्थिक विकास का राजनीतिकरण घाटे का सौदा

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति के तमाम मुद्दे होते हैं। इन मुद्दों पर अल्पकालिक और दीर्घकालिक रणनीति बनाकर राजनीतिक पार्टियां अपनी रोटी सेंकती हैं। पर आर्थिक विकास दर का मुद्दा हमेशा से ही घाटे का सौदा साबित होता है, क्योंकि यह एक ऐसा मुद्दा है जो न जाने कब कौन सी करवट बैठ जाए। हाल के दिनों में (खासकर नोटबंदी के बाद) प्रमुख विपक्षी दलों ने इसे मुद्दा बनाया। पहली तिमाही का परिणाम जब आया तब विकास दर 5.7 के आंकड़ों के साथ बैक गेयर में थी। कांग्रेस सहित तमाम पार्टियों ने इसे तत्काल लपक लिया। अब दूसरी तिमाही के रिजल्ट आते ही यही पार्टियां बैकफुट पर हैं। वह भी गुजरात जैसे महत्वपूर्ण चुनाव के वक्त। मंथन करने का वक्त है कि क्या इस तरह के विकास दर को मुद्दा बनाकर हम भारत के लोगों का ध्यान भटकाने का काम करना चाह रहे हैं या फिर सच में भारत के विकास में सहयोग देना चाहते हैं।
आर्थिक विकास दर में उतार चढ़ाव एक सामान्य सी बात होती है। इसीलिए सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृद्धि दर में कभी गिरावट आए तो इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। इस पर मातम मनाने से कोई सार्थक परिणाम नहीं आने वाला। कांग्रेस का इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि पार्टी में इतने बड़े-बड़े आर्थिक धुरंधरों के रहते पार्टी ने बिना विचार विमर्श किए गुजरात चुनाव में जीडीपी को मुद्दा बनाकर पेश किया। तीन महीने पहले जब केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आर्थिक आंकड़े जारी किए तो कांग्रेस को लगा कि इससे बड़ा मुद्दा नहीं हो सकता। उस वक्त जीडीपी की विकास दर गिरकर 5.7 फीसदी पर आ गई थी। विपक्षी पार्टियों ने इसे सीधे तौर पर नोटबंदी का नतीजा बता दिया। लोगों के बीच ऐसा भ्रम फैलाने की कोशिश की जाने लगी कि मोदी सरकार ने भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी भूल कर दी है। केंद्र सरकार को घेरने के लिए पूरी ताकत झोंक दी गई। गुजरात चुनाव के लिए तो जैसे बैठे बिठाए एक मुद्दा मिल गया। नोटबंदी और जीएसटी के बाद वैसे भी गुजरात का व्यापारी वर्ग केंद्र सरकार से थोड़ा नाराज था। विपक्षी पार्टियों को लगा कि अर्थव्यवस्था के इस सबसे बड़े मायाजाल में व्यापारियों के अलावा सामान्य लोगों को भी उलझा दिया जाए। आर्थिक रणनीतिकारों के अनुसार यह किसी भी पार्टी की सबसे बड़ी भूल है कि वह आर्थिक मामलों का इतना हल्के से राजनीतिकरण करे।
अब विपक्षी पार्टियों की राजनीति औंधे मूंह गिर गई है। खासकर गुजरात चुनाव के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह विपक्षी पार्टियों की सबसे बड़ी भूल है। एक तरफ जहां सभी विपक्षी पार्टियां जीडीपी में गिरावट को लेकर मोदी सरकार पर हमलावर थीं, वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार यह आश्वस्त करने में जुटी थी कि यह शुरुआती झटका है, जो आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा।
अब जबकि सीएसओ ने दूसरी तिमाही के आंकड़े जारी कर दिए हैं तो कहा जा सकता है सरकार का आश्वासन सौ फीसदी सही था। सीएसओ द्वारा जारी आंकड़ों में आर्थिक विकास दर 6.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन क्षेत्रों में छह फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है उसमें मैन्यूफैक्चरिंग, बिजली, गैस, जल आपूर्ति, होटल परिवहन एवं संचार तथा प्रसारण से जुड़ी सेवाएं शामिल हैं। आर्थिक विश्लेषण के आधार पर प्रमाणित हो गया है कि उत्पादन और उपभोग दोनों ही मामलों में अर्थव्यवस्था की रफ्तार आगे बढ़ी है।
गुजरात चुनाव में केंद्र सरकार की नाकामियों के गिनाने के क्रम में सबसे ऊपर जीडीपी की चर्चा की जा रही थी। ऐसे में अब बीजेपी ने हालिया पेश आंकड़ों को प्रमुखता से बताना शुरू कर दिया है। पर सबसे अहम बात मंथन के लिए यह है कि सामान्य नागरिक को इस तरह के आंकड़ों में कोई दिलचस्पी नहीं होती है। राजनीतिक पार्टियों को भी यह अच्छी तरह पता है कि इस तरह के आंकड़े घटते बढ़ते रहते हैं। इससे सरकार की चाल पर भले ही असर पड़े, लेकिन सामान्य नागरिक की सेहत पर खास असर नहीं होता है। पर यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सियासी होड़ में जुटे विरोधी दल और उसके बड़े-बड़े नेता ऐसे मामलों पर राजनीति शुरू कर देते हैं। राजनीति में विरोध के लिए दीर्घकालिक नजरिया अपनाने की जरूरत होती है। आर्थिक मामले हमेशा से ही अल्पकालिक होते हैं। सभी दलों में कुछ बड़े अर्थशास्त्री होते हैं जो इस तरह के आर्थिक मामलों को मुद्दा बनाने के लिए वृहत तैयारी करते हैं। पर अफसोस इस बात का है कि हाल के दिनों में परिस्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं। मुद्दों की तलाश में भटक रही विपक्षी पार्टियां हर एक बात में मुद्दा खोज ले रही हैं।

भारत की आर्थिक व्यवस्था का विश्लेषण किया जाए तो हाल ही में विश्व बैंक की ईज आॅफ डूइंग बिजनेस (कारोबार में आसानी) सूची में भारत ने 30 पायदान की जबरदस्त छलांग लगाई है। अंतरराष्टÑीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भी अपनी सूची में भारत का दर्जा बढ़ाया। इसके बाद एक अन्य रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने अपनी रिपोर्ट में इस बात को माना कि भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत है। जब आधार सशक्त हो, तो अर्थव्यवस्था का विकसित होना स्वाभाविक परिणाम होता है। अब सीएसओ की दूसरी तिमाही के आंकड़ों ने आर्थिक विकास की कहानी को सामने ला दिया है। हालांकि केंद्र सरकार के लिए भी यह अतिउत्साह का मुद्दा नहीं होना चाहिए। केंद्र सरकार के मंत्रियों को भी इस तरह के मुद्दों को लेकर संयमित बयान देने चाहिए, क्योंकि ये उतार चढ़ाव होते रहेंगे। भविष्य में अगर यह आंकड़े कम हुए तो मुंह छिपाना मुश्किल हो जाएगा। केंद्र सरकार संयम बरतते हुए अपने विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित करे इससे बेहतर परिणाम आने की संभावना बढ़ेगी। यह सही है कि गुजरात विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ऐसे सकारात्मक आंकड़ों का सामने आना बीजेपी के लिए उत्साहवर्द्धक है। बीजेपी इसे भुना भी रही है। पर राजनीतिक लाभ हानि के बजाय देश हित में इसपर मंथन किए जाने की जरूरत है। मैंने पहले भी अपने इस कॉलम में इस बात पर चर्चा की थी कि भारत इस वक्त आर्थिक प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है। नोटबंदी और जीएसटी जैसा ऐतिहासिक फैसला इन्हीं आर्थिक प्रयोगों की देन है। इन आर्थिक प्रयोगों का सकारात्मक परिणाम दीर्घकालिक होगा। ऐसे में बेवजह राजनीतिक दलों को इन आर्थिक प्रयोगों का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए। देशहित में हमें इन आर्थिक प्रयोगों में गंभीरता और सकारात्मक तरीके से योगदान करना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि परिणाम सार्थक होंगे।
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चलते-चलते
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जीडीपी इस वक्त गुजरात में चुनावी मुद्दा बना है। बीजेपी के लिए दूसरे तिमाही का परिणाम भले ही खुशहाली प्रदान करने वाला है। पर चैन से बैठने का यह कदापि समय नहीं है। बीजेपी का घोषित लक्ष्य आठ प्रतिशत और उससे ज्यादा है। ऐसे में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

Tuesday, November 14, 2017

न बंगाल न ओडिशा, बिहार के रसगुल्ले का जवाब नहीं

भले ही रसगुल्ले को लेकर चल रही रोचक कानूनी लड़ाई बंगाल ने जीत ली है। भले ही ओडिशा को रसगुल्ले की लड़ाई में पटखनी देते हुए ममता बनर्जी ने इसे पूरे बंगाल की जीत बताई हो। पर मेरे लिए तो अपने बिहार के रसगुल्ले से स्वादिष्ट कहीं और का रसगुल्ला नहीं लगता। रसगुल्ला खाना बेहद आसान है। पर जब बंगाल और ओडिशा के बीच चल रही कानूनी लड़ाई की बारिकियों से आप रूबरू होंगे तो अचंभित रह जाएंगे कि रसगुल्ला का स्वादिष्ट होना इतना अधिक तीखा हो सकता है। "मुसाफिर" आपको आज रसगुल्ले के हर एक पहलू से रूबरू करवाएगा, साथ ही बताएगा क्यों बिहार का रसगुल्ला सभी पर भारी है।
पहले बात, रसगुल्ले को लेकर चली लंबी कानूनी लड़ाई की
रसगुल्ले का आविष्कार ओडिशा में हुआ या पश्चिम बंगाल में इसको लेकर दोनों राज्यों के बीच वर्षों से कानूनी लड़ाई चली आ रही है। इस लड़ाई की शुरुआत ओडिशा ने की थी। वर्ष 2010 में एक मैग्जीन ने राष्टÑीय मिठाई को लेकर सर्वे करवाया था, जिसमें रसगुल्ले को राष्टÑीय मिठाई के रूप में पेश किया गया। उस वक्त इसने काफी सुर्खियां बटोरी। इसके बाद से ही ओडिशा सरकार रसगुल्ले पर अपनी दावेदारी पेश करता रहा। यहां तक तो ठीक था, पर जब वर्ष 2015 में ओडिशा के विज्ञान व तकनीकी मंत्री प्रदीप कुमार पाणिग्रही ने रसगुल्ले पर आधिकारिक बयान दे दिया तब विवाद बढ़ गया। पाणिग्रही ने न केवल आधिकारिक बयान दिया, बल्कि रसगुल्ले को लेकर जीआई यानि ज्योग्रॉफिकल इंडिकेशन टैग हासिल करने के लिए आवेदन करवा दिया। ओडिशा सरकार की इस पहल के बाद बंगाल सरकार ने कड़ा कदम उठाया। बंगाल की तरफ से मोरचा लिया खाद्य और प्रसंस्करण मंत्री अब्दुर्रज्जाक मोल्ला। उन्होंने रसगुल्ले के आविष्कार पर बंगाल का एकाधिकार बताते हुए अपील दायर कर दी।
क्या होता है जीआई टैग?
दरअसल जीआई यानि ज्योग्रॉफिकल टैग किसी वस्तु की वह भौगोलिक पहचान होती है जो उस वस्तु के उद्गम स्थल को बताती है। कहने का मतलब है कि वह वस्तु सबसे पहले कहां मिली या बनाई गई इसका आधिकारिक सर्टिफिकेट मिल जाता है। ओडिशा सरकार ने रसगुल्ले को राज्य की भौगोलिक पहचान से जोड़ने का जैसे ही कदम उठाया विवाद पैदा हो गया। दोनों राज्यों ने इसे अपनी अस्मिता का प्रश्न बताते हुए सरकारी समितियों तक का गठन कर दिया। लंबी कानूनी लड़ाई में दावों और दस्तावेजों के बीच बंगाल का पलड़ा भारी पड़ा। फाइनली पश्चिम बंगाल जीआई टैग हासिल करने में कामयाब रहा। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे पूरे बंगाल की जीत बताते हुए ट्वीट किया और राज्य के लोगों को बधाई दी।
ओडिशा के रसगुल्ले ने मुझे चौंकाया था
मैं साल 2001 में ओडिशा गया था। राज्य के जिस कोने में गया रसगुल्ले की सुलभता ने अंचभित किया। बचपन से समझता आया था कि रसगुल्ला मतलब बंगाल। पर ओडिशा में रसगुल्ले के स्वाद, रंग और सुलभता ने दुकानदारों से बात करने को मजबूर कर दिया। जगन्नाथपुरी प्रवास के दौरान मैंने एक दुकानदार से सवाल पूछ ही लिया कि ऐसा क्या है कि यहां हर दुकान में रसगुल्ला मौजूद है, जबकि यह तो बंगाल में सबसे अधिक मिलता है। दुकानदार ने पहले तो ऊपर से नीचे तक मुझे ताड़ा, फिर बोला रसगुल्ला हमारा है बंगाल का नहीं। उस दुकानदार ने अपनी बातों को और अधिक प्रमाणिकता देने के लिए यहां तक कह दिया कि ओडिशा से रसगुल्ला बंगाल तक सप्लाई किया जाता है। सच बताऊं तो मुझे अंदर ही अंदर हंसी आई, पर दुकानदार के तेवर देखकर चुप रहा।
उस वक्त एंड्रायड फोन और इंटरनेट की सुलभता का जमाना नहीं था। रांची लौटने पर जब अपने संस्मरण (डायरी) लिख रहा था तो रसगुल्ले की बातें भी लिखी। फिर एक दिन दफ्तर में इंटरनेट सर्फिंग के दौरान रसगुल्ले पर जानकारी हासिल की। जानकर बेहद आश्चर्य हुआ और उस दुकानदार की बात में भी दम लगा, जब मैंने यह पढ़ा कि कटक और भुवनेश्वर के बीच एक छोटी सी जगह पहाला में रसगुल्ले की होलसेल मार्केट है। उस रास्ते से हम भी गुजरे थे, पर रुके नहीं थे। हाईवे के दोनों तरफ मिठाई की दुकानें सजी थीं। पढ़ा कि कैसे वर्षों से पहाला में सड़क के दोनों किनारों पर रसगुल्ले की थोक मार्केट सजती है और यहां के रसगुल्ले देश के कोने कोने में जाते हैं। आज भी पहाला रसगुल्ले के लिए बेहद प्रसिद्ध है।
क्यों ओडिशा ने किया था दावा?
ओडिशा में रसगुल्ले की कहानी धर्म से जुड़ी है। यहां की सरकार का दावा है कि करीब छह सौ वर्षों से यह मिठाई यहां मौजूद है। ओडिशा सरकार और वहां के इतिहासकार इसे भगवान जगन्नाथ को चढ़ाए जाने वाले भोग ‘खीर मोहन’ से जोड़कर देखते हैं। विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा के समापन पर भी भगवान जगन्नाथ द्वारा मां लक्ष्मी को रसगुल्ला भेंट करने की प्रथा सैकड़ों साल पुरानी है। इस दिन को निलाद्री विजय कहा जाता है और इस दिन महालक्ष्मी को रसगुल्ले का भोग लगाना अतिआवश्यक माना जाता है। माना जाता है कि खीर मोहन ही रसगुल्ले का जन्मदाता है। एक दूसरा तर्क पहाला गांव को लेकर है। भुवनेश्वर के छोटे से गांव पहाला में पशुओं की अधिक संख्या के कारण दूध की पर्याप्त उपलब्धता थी। दूध इतना अधिक होता था कि यूं ही बर्बाद हो जाता था। ऐसे में यहां के लोगों ने छेना बनाने की विधि का इजात किया। इसी छेने से मिठाई बनाने की परंपरा शुरू   हुई। इस मिठाई में रसगुल्ले ने अपनी विशिष्ट पहचान कायम कर ली। आज के इस दौर में भी इसमें दो राय नहीं कि पहाला गांव का रसगुल्ला सर्वश्रेष्ठ है। आज भी पहाला ओडिशा में रसगुल्ला सप्लाई का मुख्य केंद्र है। यहां से बंगाल सहित देश के अन्य राज्यों में भी रसगुल्ले की सप्लाई होती है। हां, एक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि ओडिशा के किसी भी धार्मिक या ऐतिहासिक दस्तावेज में दूध, मक्खन, दही, खीर के अलावा छेना का जिक्र नहीं है। रसगुल्ला बनाने के लिए छेना का होना उतना की जरूरी है जितना दही जमाने के लिए दूध का।
क्यों प्रसिद्ध है बंगाल का रसगुल्ला?
धार्मिक दुनिया में खीर मोहन के प्रसाद से आगे बढ़कर रसगुल्ले तक की कहानी को भले ही ओडिशा सरकार ने मान्यता दे रखी है, पर बंगाल की कहानी इससे कहीं जुदा है। बंगाल के इतिहास में इस बात का स्पष्ट तौर पर उल्लेख मिलता है कि यहां के निवासी नबीन चंद्र दास ने वर्ष 1868 में रसगुल्ला बनाने की शुरुआत की थी। बंगाल में रसगुल्ला को रोसोगुल्ला कहा जाता है। बंगाल में जब डच और पुर्तगालियों ने आना शुरू किया तो उन्होंने दूध के जरिए छेना बनाने की कला का जिक्र किया। नबीन चंद्र दास जो मूलत: हलवाई का काम करते थे उन्होंने इस विधि को अपनाया। छेना को मिठाई का रूप में परिवर्तित करने के कारण ही नबीन चंद्र का नाम इतिहास के पन्नों में कोलंबस आॅफ रोसोगुल्ला के रूप में अंकित हो गया। बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भी रसगुल्ला को लेकर चली कानूनी लड़ाई में नबीन चंद्र दास के वंशजों की मदद ली। इस वक्त बंगाल में नबीन चंद्र दास के वंशज केसी दास प्राइवेट लिमिटेड नाम से अपनी फर्म का संचालन करते हैं। यह मिठाई की दुकानों की एक चेन है जो रसगुल्लों के लिए प्रसिद्ध है। नबीन चंद्र दास के वंशजों ने रसगुल्ले की परंपरा को आगे बढ़ाया।
बंगालियों ने नकार दिया था रसगुल्ले को
बताया जाता है कि नबीन चंद्र दास ने  कोलकाता के जोराशंको में अपनी पहली मिठाई की दुकान खोली। पर बंगाल के लोगों ने रसगुल्ले के स्वाद को नकार दिया। उनकी जीभ पर संदेश का स्वाद चढ़ा था। जल्द ही यह दुकान बंद कर देनी पड़ी। दो साल बाद उन्होंने रसगुल्ले पर तमाम प्रयोग के बाद दूसरी दुकान बागबाजार में खोली। उन्होंने छेने के गोले को चीनी की चाश्नी में पिरोकर जब लोगों को पेश की तो लोगों ने इसे हाथो-हाथ लिया। चीनी की रस में डूबे होने के कारण ही बंगाल के लोगों ने इसे अपनी बोलचाल की भाषा में रोसोगुल्ला कहा। अर्थात रस में डूबा हुआ गुल्ला।
हर राज्य में बदलता गया रोसोगुल्ले का स्वरूप
कोलकाता से निकला रोसोगुल्ला विभिन्न राज्यों में अपने नए स्वरूप में अवतरित होता गया। कोलकात्ता से सटे बिहार में यह रसगुल्ला कहलाया, जबकि उत्तरप्रदेश में राजभोग। राजस्थान में इसे रसभरी या रसबरी के नाम से मान्यता मिली तो कई दूसरे प्रदेशों में इसे रसमलाई कहा जाने लगा।
बिहार के रसगुल्ले का जवाब नहीं
बंगाल और ओडिशा की तरह बिहार के कोने कोने में रसगुल्ला सुलभ है। छोटी दुकान हो बड़ी दुकान आपको बिहार का रसगुल्ला निराश नहीं करेगा। जब छोटा था तो ननिहाल नरपतगंज में गर्मी की छुट्टियां बितती थी। मेरे छोटे मामा की शादी कटिहार में हुई है। कटिहार में बंगालियों की अच्छी तादात है। वहां के कल्चर में भी बंगाल की छाप है। ऐसे में रोसोगुल्ला का स्वाद अपने आप अनूठा हो जाता है। छोटी मामी भी गर्मी की छुट्टियों में रांची से नरपतगंज आ जाती थीं। ऐसे में कटिहार से उनके पापा खूब सारे आम के साथ वहां की फेमस मिठाई लेकर नरपतगंज आते थे। हमें आम से अधिक रसगुल्ले का इंतजार रहता था। मिट्टी की हांडी में उस रसगुल्ले का स्वाद आज भी जीभ पर है। इसी तरह मुजफ्फरपुर के भारत जलपान और महाराजा स्वीट्स के रसगुल्ले का स्वाद जिसने एक बार चख लिया वह उसका मूरीद हो जाता है। आरा के रसगुल्ले का स्वाद हो या फिर बिहारशरीफ के रसगुल्ले का। नालंदा का रसगुल्ला हो या फिर लखीसराय के बढ़ैया का। बिहार में जिधर निकल जाएं हर जगह का रसगुल्ला अपनेपन का अहसास दिलाता है।
हाल ही में नया स्वाद मिला है
रसगुल्ला से विशेष लगाव रहा है। हाल ही में पंचकूला में रसगुल्ले का नया स्वाद मिला है। आकार में विशालकाय इस रसगुल्ले से रूबरू करवाया स्वामी संपूर्णानंद जी महाराज ने। अपने आश्रम में एक दिन प्रसाद के रूप में उन्होंने जब इस विशालकाय रसगुल्ले को दिया तो मैं हैरान रह गया। हैरान पहले तो उसके विशालकाय स्वरूप को लेकर था, बाद में उसके स्वाद ने भी अचंभित किया। विश्वास नहीं हो रहा था कि पंचकूला जैसे शहर में भी जहां बंगाली सभ्यता संस्कृति नाम मात्र की है वहां इतना बेहतरीन रसगुल्ला कैसे मिल सकता है। अब मैं उस रसगुल्ले का मूरीद हूं। आज ही आॅफिस में रसगुल्ले के खबर की चर्चा के दौरान साथियों से वादा किया है कि उस स्पेशल रसगुल्ले का स्वाद जल्द ही सभी को चखाऊंगा।

फिलहाल आप भी जश्न मनाइए कि रसगुल्ला रोसोगुल्ला ही रहेगा। बंगाल का ही रहेगा। अगर आर्टिकल का स्वाद मिठा लगा है तो दूसरों को भी इसका स्वाद चखाएं अर्थात शेयर करें। 

Monday, November 13, 2017

इंटरनेट भी है और डाटा भी, पर सुरक्षा का क्या?

भारत में एक तरफ जहां इंटरनेट यूजर्स की संख्या में जबर्दस्त बढ़ोतरी हो रही है, वहीं उसी रफ्तार में साइबर क्राइम भी बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने डिजिटल इंडिया का नारा देकर गांव-गांव तक इंटरनेट की उपलब्धता सुनिश्चित कराने का वादा किया है। सरकार इस दिशा में काम कर भी रही है। पर क्या सिर्फ इंटरनेट की उपलब्धता दे देना ही काफी है। अभी इस बात पर विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है कि आने वाले समय में इंटरनेट की सुगमता हमें किस तरह की परेशानियों की तरफ धकेलने वाली है। इस वक्त हमारा पूरा जोर इंटरनेट यूजर्स को बढ़ाने और हर एक सरकारी व्यवस्था को डिजिटलाइज करने पर लगा है। साथ ही साथ मंथन करने का वक्त है कि वर्चुअल वर्ल्ड में हमारा डाटा कितना सुरक्षित है। हमारे भारत में मजबूत डाटा संरक्षण कानून की जरूरत लंबे वक्त से महसूस की जा रही है। पर अफसोस इस बात का है कि इतना लंबा वक्त गुजर जाने पर भी हम डाटा संरक्षण कानून को अब तक मूर्त रूप नहीं दे सके हैं।
अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, चीन, जर्मनी, आॅस्ट्रेलिया सहित करीब चालीस देशों में मजबूत डाटा संरक्षण कानून मौजूद है। पड़ोसी देश चीन में तो इतना मजबूत कानून है कि वहां ट्वीटर जैसा वैश्विक सोशल मीडिया प्लटेफॉर्म तक प्रतिबंधित है। हाल ही में आॅस्ट्रेलिया ने भी अपने कानून को और भी मजबूती प्रदान करते हुए कई कड़े कदम उठाए हैं। इसमें सबसे बड़ा कदम बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर है। 14 साल से कम उम्र के बच्चों के फेसबुक और ट्वीटर इस्तेमाल को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है। वहां की एक कमेटी ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें बाल यौन शोषण को रोकने के लिए ऐसे प्रतिबंध को जरूरी बताया गया था। आॅस्ट्रेलिया के पास अपना मजबूत कानून था, जिसके कारण उसे इसे लागू करने में जरा भी देर नहीं लगी।
भारत में इंटरनेट को लेकर स्थिति आश्चर्यजनक रूप से विपरीत है। एक तरफ यहां की सरकार इंटरनेट के इस्तेमाल पर पूरा जोर दे रही है। वहीं दूसरी तरफ इस इंटरनेट का उपयोग और उससे होने वाली विसंगतियों की तरफ पर्याप्त ध्यान केंद्रित नहीं कर रही है। डिजिटल इंडिया के इस युग में इंटरनेट पर आपका डाटा कितना असुरक्षित है यह बताने की जरूरत नहीं है। अभी हाल ही में आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर जिस तरह वाद विवाद शुरू हुआ उसमें सरकार की तैयारियों की पोल खुल गई। यह बहस अभी थमी नहीं है। आने वाले समय में अभी और भी बहस होगी।
भारत में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल इंटरनेट पर मौजूद हमारे व्यक्तिगत डाटा के संरक्षण और सुरक्षा को लेकर है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि मौजूद समय में भारत में डाटा संरक्षण को लेकर कोई कानून ही नहीं है। न ही कोई संस्था है जो डाटा की गोपनीयता की सुरक्षा प्रदान करती हो। हां इतना जरूर है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 43-ए के तहत डाटा संरक्षण के लिए उचित दिशा निर्देश दिए गए हैं। पर ये निर्देश सिर्फ कागजों तक ही सीमित माने जाते हैं। जानकारों का कहना है कि जबतक ठोस डाटा संरक्षण कानून का गठन नहीं होता ये निर्देश अप्रभावी और अपर्याप्त हैं।
भारत में इस वक्त इंटरनेट को लेकर सर्वाधित दुरुपयोग हो रहे हैं। यहां तक कि जातीय हिंसा फैलाने और आतंकी घटनाओं तक में इंटरनेट का उपयोग किया जा रहा है। जातीय उन्माद फैलाने में इंटरनेट का उपयोग इतना अधिक हो रहा है कि आए दिन किसी न किसी राज्य में सरकार को इंटरनेट सेवा कुछ समय या दिन के लिए बंद करनी पड़ रही है। हाल के महीनों में जम्मू कश्मीर, हरियाणा, बिहार और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने कई मौकों पर इंटरनेट सेवा कई दिनों तक बाधित रखी। सरकार का मानना था कि अगर इंटरनेट सेवा बंद नहीं की जाती तो हिंसा और अधिक बढ़ी और कंट्रोल से बाहर हो जाती।
यह अलार्मिंग सिचुएशन है। छोटी सी छोटी घटना इंटरनेट की सुलभता के कारण कितनी हिंसात्मक हो जा रही है यह मंथन की बात है। इंटरनेट के दुरुपयोगी पकड़े जाने पर भी आसानी से कानूनी शिकंजे से छूट जाते हैं। सोशल मीडिया के जरिए इस तरह का दुरुपयोग हाल के दिनों में काफी बढ़ा है। सबसे अधिक प्रभावित महिला और बच्चे हो रहे हैं। बिना कानूनी संरक्षण के इस तरह के दुरुपयोग पर पूरी तरह लगाम नहीं लगाया जा सकता है। भारत उन देशों की कतार में है जहां आने वाले समय में इंटरनेट ही सबकुछ होगा। हर काम का डिजिटलाइजेशन हो रहा है। सरकारी तंत्र पूरी तरह कंप्यूटर और इंटरनेट पर आधारित हो गया है। ऐसे में आधार और बायोमेट्रिक्स सुविधाओं पर बहस लाजिमी है। सुप्रीम कोर्ट भी सरकार को इन मुद्दों पर कठघरे में खड़ा कर चुकी है। कई बार सवाल पूछे जा चुके हैं। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल इंडिया का जो सपना देखा है वह निश्चित रूप से भारत को कई दम आगे ले जाने वाला होगा। आने वाले समय में इससे बेहतर कुछ दूसरा नहीं हो सकता है। पर यह सपना सार्थक तब होगा जब हम आम लोगों में यह विश्वास दिलाने में कामयाब होंगे कि इंटरनेट पर आप सुरक्षित हैं। आपका डाटा सुरक्षित है। आपका निजी जीवन सुरक्षित है। यह विश्वास तभी कायम हो सकता है जब भारत का अपना एक ठोस डाटा संरक्षण कानून वजूद में हो।
चलते-चलते
भारत सरकार ने डाटा संरक्षण कानून के लिए इसी साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बीएन कृष्णा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था। यह कमेटी भारत में डाटा संरक्षण के लिए उपयोगी कानून पर मंथन कर ही है। उम्मीद की जा रही है अगले महीने तक कमेटी अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौंप देगी। कमेटी अपनी रिपोर्ट में क्या कहेगी यह तो आने वाला समय बताएगा, फिलहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि कमेटी की रिपोर्ट पर सरकार तत्काल कार्रवाई करते हुए एक उपयोगी डाटा संरक्षण कानून को लागू करेगी।

Monday, October 30, 2017

इशारों को अगर समझो, ताज को ताज रहने दो

विश्व की अमूल्य धरोहरों में से एक ताजमहल को पूरी दुनिया मोहब्बत की निशानी के तौर पर मानती, समझती और देखती आ रही है। विश्व के किसी भी कोने में अगर यह सवाल पूछा जाए तो शायद एक ही जवाब होगा, ताजमहल प्यार की निशानी है। एक सामान्य भारतीय नागरिक को भी इसके हिंदु और मुस्लिम प्रतीक से कोई सरोकार नहीं। क्योंकि प्यार का कोई मजहब नहीं होता। कोई जाति नहीं होती। पर सियासत में वोट की राजनीति हमेशा से ही ऐतिहासिकता पर भारी पड़ी है। कभी ऊंट सही करवट बैठ लेता है कभी गलत करवट ले लेता है।
राममंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद ने जिस तरह पूरे भारत के हिंदुओं और मुस्लिमों को पृथक करते हुए अपने-अपने धर्म के प्रति एकजुट कर दिया था, क्या अब एक बार फिर उसी तरह की सियासती कार्ड खेलने का प्रयास किया जा रहा है? यह सवाल मंथन करने के लिए इसलिए मजबूर कर रहा है क्योंकि जिस तरह उत्तर प्रदेश में इस विवाद को हवा दी गई वह अपने आप में आश्चर्यजनक है। बेहद प्लांड तरीके से इसे अंजाम तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। पहले यूपी पर्यटन के कैलेंडर से ताजमहल को गायब कर दिया गया। फिर सालाना बजट से भी इसे निकाल दिया गया। इसके बाद प्रदेश के सबसे विवादित नेताओं और हिंदुओं के तथाकथित बड़े चेहरों का धड़ाधड़ बयान आने लगा। इन सभी प्रकरणों ने यह तथ्य स्थापित करने में मदद कर दी कि ताजमहल और तेजोमहालय शिवमंदिर का विवाद बेहद प्लांड था। फिलहाल जिस तरह यूपी के मुख्यमंत्री ने आनन फानन में ताजहमल का दौरा किया, भगवा वस्त्र पहने वहां झाड़ू लगाई और ताजमहल से जुड़ी नई परियोजनाओं के लिए तत्काल 370 करोड़ रुपए के बजट की घोषणा की वह अपने आप में साबित करता है कि डैमेज कंट्रोल की यह बड़ी कवायद थी।
बीजेपी की थिंक टैंक यूपी में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के बाद से ही भविष्य (2019 लोकसभा चुनाव) के लिए बड़ा सियासती दांव खेलने में जुटी है। ऐसे में मोहब्बत की निशानी से जुड़े विवाद को भी इसी सियासती दांव के नजरिए से देखा जाने लगा है। हालांकि डैमेज कंट्रोल की कवायद ने अहसास दिला दिया है कि यह सियासती दांव फिलहाल उल्टा पड़ गया है। सबसे आश्चर्यजनक है योगी आदित्यनाथ द्वारा ताज को भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं होने का बयान देना फिर उसी ताज का दर्शन कर वहां झाड़ू लगाना। बीजेपी के थिंक टैंक के साथ-साथ हम भारतीयों को भी मंथन जरूर करना चाहिए कि हम किस राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं।
ताजमहल के साए में अबतक करोड़ों लोगों ने मोहब्बत की कसमें खाई होंगी। करोड़ों लोगों की मोहब्बत परवान चढ़ी होगी। हर दूसरे दिन किसी विदेशी जोड़े के ताज के साए में शादी करने की खबरें आती हैं। बावजूद इसके हम अपनी इस अमूल्य धरोहर को राजनीतिक रोटी सेंकने का जरिया कैसे बना सकते हैं। ताजमहल और तेजोमहालय का विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन इस बार जिस तरह इसका राजनीतिकरण किया जा रहा है वह हमारे लिए बेहद शर्मनाक है। 
इतिहास हमेशा से ही हमें तर्क वितर्क की इजाजत देता है। या यूं कहें कि मौका देता है। हजारों ऐसे उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं जब इतिहासकारों ने अपनी-अपनी तरह से इतिहास की व्याख्या की और हमारे विचारों को बदलने में अहम भूमिका निभाई। मेरे पिताजी इतिहास के प्रोफेसर रहे हैं। उन्होंने इतिहास की कई किताबें लिखीं। आज भी उनके सानिध्य में कई शोधार्थी काम कर रहे हैं। मैं भी इतिहास का विद्यार्थी रहा हूं। इसलिए इतिहास को करीब से देखने और समझने का मौका मिला। पिताजी ने जब अपनी पहली किताब लिखी तो वह गांधी के चंपारण आंदोलन पर थी। हम भाई-बहन काफी छोटे थे, पर अच्छी तरह याद है कि उस किताब को लिखने के लिए पिताजी ने कितना लंबा वक्त चंपारण के गांवों में गुजारा। जब बड़ा हुआ तो चंपारण के इतिहास से जुड़ी हजारों किताबों को सामने पाया। कंफ्यूज था कि किसे पढ़ूं। किसे सही मानूं। क्योंकि हर एक किताब में नई कहानी, नई बातें और कुछ नए तथ्यों से रूबरू हो रहा था। कुछ आजादी से पहले के इतिहासकारों की किताबें थीं, कुछ आजादी के बाद की और कुछ गांधी की मृत्यु के बाद के इतिहासकारों की किताबें थीं। सब अपने-अपने चश्मे से चंपारण को देख रहे थे। संयोग देखिए मेरा एक मित्र भी चंपारण का शोधार्थी बन गया। उसने अपनी पीएचडी कंप्लीट की। उसने कई नए तथ्यों का अपने शोधग्रंथ में समावेश किया।
कहने का तात्पर्य है इतिहास की प्रमाणिकता होने के बावजूद उसमें कल्पनाशीलता इतना अहम किरदार निभाती है कि आपके विचार बदल सकते हैं। इतिहासकारों की भी अपनी विचारधारा है, जिसके आधार पर वो अपनी लेखनी चलाते हैं। इसीलिए शायद एक इतिहासकार ही दूसरे इतिहासकार के तथ्यों को घटिया और बेतुका बताता है। कुछ ऐसा ही ताजहमल के साथ हुआ। आधुनिक भारत के बड़े इतिहासकारों में पुरुषोत्तम नागेश ओक का नाम आता है। उनकी किताब ताजमहल एक हिंदू टेंपल ने भारतीय लोगों को एक थ्योरी दी। यह थ्योरी है कि ताजमहल कोई मोहब्बत की निशानी नहीं, बल्कि वह एक शिवमंदिर था। उन्होंने ही बताया कि ताजमहल का वास्तविक नाम तेजोमहालय था और इस शिवमंदिर को जयपुर के राजा मानसिंह प्रथम ने बनवाया था। इसे ही मोडिफाई किया गया और ताजमहल का नाम दिया गया।
अपने इन दावों के आधार पर उन्होंने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया। लंबे वाद विवाद के बाद वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके दावों को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे को पूरी तरह ओक साहब का दिमागी कीड़ा बताया। वर्ष 2005 में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया था जिसमें यह दावा किया गया था कि ताजमहल को 1196 में हिंदू राजा परमार देव ने बनवाया था। 

जब विद्यार्थी था तो पिताजी का यह कथन हमेशा से दिलो दिमाग में बैठ गया। पापा का कहना है कि इतिहास को कभी भी वर्तमान के चश्मे से मत देखो। इतिहास को इतिहास के नजरिए से देखो फिर इसे पढ़ने, कहने और लिखने में मजा आएगा। ताजमहल को लेकर उस वक्त के इतिहासकारों, विदेशी यात्रियों के संस्मरण और लेखकों ने जो कुछ भी लिखा है उसे पूर्ण सत्य मानकर भले ही हम न चलें, लेकिन इतना तो जरूर है कि स्थापित तथ्यों से इतनी अविवेकपूर्ण छेड़छाड़ भी न करें। बीजेपी की थिंक ब्रिग्रेड ताजलमहल और तेजोमहालय में विवाद पैदा कर क्या हासिल करना चाह रही है इस पर मंथन करने की जरूरत है। देश के मूड को देखते हुए योगी सरकार ताज को लेकर फिलहाल बैकफुट पर है। बीजेपी की थींक ब्रिग्रेड भी अगर यह इशारा समझ चुकी है तो फिर ताज को ताज ही रहने दिया जाए इसी में सभी की भलाई है, क्योंकि ताजमहल राममंदिर की तरह वोट नहीं दिला सकती। मंथन हमें और आपको भी करना है कि अनावश्यक के विवादों में खुद को न झोंकें।
चलते-चलते
मेरे प्रिय शायर मुनौव्वर राणा की चंद पंक्तियां आप सभी पाठकों के मंथन के लिए हैं...
मोहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है
सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है।।
तवायफ की तरह अपने गलत कामों के चेहरे पर
हुकूमत मंदिर-मस्जिद का पर्दा डाल देती है।।

Tuesday, October 24, 2017

विकास = भात-भात कहकर बच्ची ने तोड़ा दम

जब से यह खबर देखी और पढ़ी मन अंदर से विचलित हो गया। कितना दर्दनाक होगा वह पल जब एक बच्ची ने अपनी मां के सामने भात-भात कहते हुए दम तोड़ दिया होगा। कितनी बेबश होगी वह मां जो अपने कलेजे के टुकड़े को अपनी आंखों के सामने तिल-तिल मरता देख रही होगी। यह सोचकर ही रूह कांप जाती है कि आज के इस सभ्य और 21वीं सदी के समाज में भी कोई भूख और कुपोषण से काल का ग्रास बन सकता है। पर झारखंड के सिमडेगा जिले में एक बच्ची की मौत ने मंथन करने पर विवश कर दिया है कि आखिर क्या कारण है कि हम अपनी आधारभूत जरूरतों को पूरा करने में भी नाकाम हो रहे हैं।
सिमडेगा में जिस 11 साल की बच्ची ने दम तोड़ा उसकी मां ने जब पूरी कहानी बयां कि तो एक अजीब सी स्तब्ध कर देने वाली बातों का खुलासा हुआ। मां ने बताया कि हमारी बेटी के भूख मिटाने का साधन मिड डे मील था। दुर्गा पूजा की छुट्टियों के कारण कई दिनों से स्कूल बंद था। राशन कार्ड के जरिए पीडीएस स्कीम के तहत जो राशन मिलता था वह कई महीनों से बंद कर दिया गया था। क्योंकि सरकार का आदेश था राशन कार्ड को आधार कार्ड से लिंक करवाओ। पिछले आठ दिनों से घर में अन्न का एक दाना नहीं था। और अंतत: उस बच्ची ने मां के सामने भात-भात कहते दम तोड़ दिया। भूख से उसका पेट अकड़ गया था।
यह खबर निश्चित तौर पर सोचने और समझने पर हमें मजबूर कर देती है। ऐसी खबरों पर मंथन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वैश्विक भूखमरी सूचकांक यानी ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) में भारत कई कदम और नीचे उतर गया है। हाल ही में जारी हुए जीएचआई के सूचकांक में भारत का स्थान 119 देशों में 100वें नंबर पर है। यह चिंता का सबब इसलिए भी है क्योंकि वर्ष 2016 में भारत का स्थान 97वां था, जो तीन स्थान और पीछे खिसक गया है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता है। यह कैसी विडंबना है कि हम जहां एक तरफ डिजिटल भारत की परिकल्पना लिए आगे बढ़ रहे हैं वहीं हमारे यहां भूख से मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। मंथन जरूरी इसलिए भी है क्योंकि इस ग्लोबल इंडेक्स में उत्तर कोरिया, बांग्लादेश और इराक जैसे देश भी भारत से ऊपर हैं।
वॉशिंगटन स्थित इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) द्वारा हर साल भूखमरी सूचकांक बनाया जाता है। इस सूचकांक में भारत हमेशा से नीचे रहता आया है। केंद्र सरकार लगातार भारत की जमीनी समस्याओं को दूर करने के लिए प्रयासरत हैं। तमाम सरकारी एजेंसियां भी इस काम में लगी हैं। हर साल करोड़ों रुपए का बजट भी जारी होता है। हर मंच से भारत से भूखमरी और कुपोषण समाप्त करने का वादा किया जाता है। फिर भी अगर हमारी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है तो यह गंभीर विषय है। कहां चूक हो रही है। क्या केंद्र सरकार अपनी नीतियों के कार्यान्वयन में मात खा रही है, या फिर आज भी नोडल एजेंसियों से भ्रष्टाचार खत्म नहीं किया जा सका है। ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर गंभीरता से मंथन जरूरी है। आईएफपीआरआई ने भारत के परिपे्रक्ष्य में एक और गंभीर विषय की तरफ ध्यान दिलाया है। यह है यहां की विषम अर्थव्यवस्था। रिपोर्ट के अनुसार भारत की एक फीसदी आबादी के पास देश के कुल धन का आधे से ज्यादा हिस्सा है। 
इस विषमता का आशय यह है कि जो धन देश में पैदा हो रहा है उसका ज्यादातर हिस्सा कुछ धनाढ्य लोगों के हाथों में सिमट कर रह जाता है। कहने का तात्पर्य है कि देश तो धनी हो रहा है, लेकिन उसका लाभ देश के बहुसंख्य लोगों को नहीं मिल रहा है। हमारी आधी से अधिक आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। इन बुनियादी सुविधाओं में सबसे बड़ा मसला भूख मिटाने का है। जिस देश में दो वक्त की रोटी से अगर हमारी बहुसंख्य आबादी वंचित रह जा रही है वहां हम सिर्फ बुलेट ट्रेन चलाकर विकास का सपना नहीं बुन सकते हैं। केंद्र सरकार ने कई वर्ष पहले जब पोलियो उन्मूलन का संकल्प लिया था जो एक नारा दिया था। वह नारा था एक भी बच्चा छूट गया, समझो सुरक्षा चक्र टूट गया। कुछ ऐसा ही भूखमरी के मामले में हैं। अगर आज के इस विकासात्मक समाज में भूख से एक इंसान की मौत होती है तो समझिए हम विकास के किस पायदान पर मौजूद हैं। केंद्र सरकार, राज्य सरकार, विभिन्न नोडल और सरकारी एजेंसियों के अलावा भारत की सवा सौ करोड़ आबादी को भी इस पर मंथन करने की जरूरत है। 
भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि खुद की भूख मिटाने के साथ उन असंख्य लोगों के बारे में सोचे जहां दो वक्त चुल्हा नहीं जल रहा है। डस्टबिन में खाना फेंकने से पहले यह जरूर सोचे कि कई बच्चे आज भूखे सो रहे होंगे। देश की संपूर्ण आबादी को अन्न उपलब्ध करवाने के लिए केंद्र सरकार अपनी पूरी ताकत झोंक दे। यही सही मायने में सरकारी तंत्र की जीत है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर जीएचआई जैसे आंकड़ों में हमारे पिछड़ने का मतलब साफ है। हम चाहे जितनी भी तरक्की कर लें, पर भूख से होने वाली एक भी मौत हमारे सभ्य और विकसित होने पर तमाचा ही है। क्या हम कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि सभी को दो वक्त की रोटी मयस्सर हो। आप भी मंथन करें।

Monday, October 9, 2017

भारत के अर्थिक मोर्चे पर प्रयोगों का दौर

आर्थिक मोर्चे पर भीषण प्रयोगों के दौर से गुजर रही केंद्र की मोदी सरकार ने दीपावली के पहले कुछ फैसलों से मार्केट को थोड़ी राहत देने का प्रयास किया है। इस राहत को भले ही फौरी सहायता राशि के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन मार्केट एक्सपर्ट्स की राय है कि यही फौरी राहत आने वाले समय में मार्केट के लिए स्थायित्व प्रदान करने वाली साबित होगी। राजनीतिक पंडितों की राय में गुजरात चुनाव की तैयारी में जुटी केंद्र सरकार ने खासकर व्यापारियों के हितों की रक्षा में अपना मास्टर स्ट्रोक खेला है। कारण चाहे जो भी हो पर मंथन का समय जरूर है कि इतने भीषण प्रयोगों के दौर से गुजर रही केंद्र सरकार के पास क्या इतना समय है कि वह अपने कार्यकाल में देश के अंदर अर्थव्यवस्था के उस सार्थक माहौल को स्थापित कर सके जिसकी परिकल्पना नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के साथ हुई थी।
नोटबंदी लागू हुए करीब एक साल पूरा होने जा रहा है। इस बीच नोटबंदी को लेकर जितने प्रयोग केंद्र सरकार ने किए वह विश्व इतिहास में शायद इससे पहले कभी नहीं हुआ। हर दूसरे दिन नए और पुराने नोटों को लेकर नए-नए नियमों को लागू किया गया। लोग इतने कंफ्यूज हुए कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि करना क्या है और छोड़ना क्या है। बैंकों की हालत और भी बेकार थी। न वहां ग्राहकों को समझाने वाला कोई था और न समझने वाला। संभलते संभलते महीनों गुजर गए। नोटबंदी से क्या हासिल हुआ और क्या नुकसान इसका सटिक जवाब न तो केंद्र सरकार के पास है न विपक्षी दलों के पास। सिर्फ अनुमान के आधार पर वार और पलटवार हो रहा है।
केंद्र सरकार से पूछा जाता है कि नोटबंदी से क्या कालाधन पूरी तरह खत्म हो गया? क्या टेरर फंडिंग पर पूरी तरह लगाम लग गई? क्या बैंकों की वित्तीय हालत सुधर गई? क्या रातों रात बैंक कर्जमुक्त हो गए? कितना कालाधान बैंकों में आया? अभी तक केंद्र सरकार का जवाब गोलमोल ही रहा है। कोई भी तथ्यात्मक आंकड़ा जनता के सामने नहीं आया है। दूसरी तरफ विपक्षी दल सिर्फ एक ही रट लगाए रहते हैं कि नोटबंदी भारत का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला है। कई बार तो इसे करीब 45 लाख करोड़ रुपए का घोटाला भी कोट करते हैं। कैसे हुआ यह घोटाला? कैसे हम इसे स्थापित करेंगे कि नोटबंदी एक घोटाला है? कैसे हम इस घोटाले के लिए केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करेंगे? तमाम सवालों के जवाब के लिए जवाब आता है समय आने पर इसका खुलासा किया जाएगा।
नोटबंदी से स्थिति थोड़ी सामान्य होने की हालत में आती इससे पहले ही केंद्र सरकार ने जीएसटी का एक ऐसा जिन्न मार्केट में उतार दिया जिसके नाम से ही लोगों की जेब ढिली होने लगी। न कोई अधिकारी इसे समझ पा रहा, न व्यापारी। आम आदमी का हाल तो सबसे बुरा रहा। बस एक ही बात रटाई जाने लगी कि पहले हम अलग-अलग टैक्स देते थे। अब एक ही टैक्स देना होगा। यह पाठ सिर्फ एक लाइन था, लेकिन सामान्य लोगों के लिए इस पाठ को समझना और याद करना जिन्नों के देवता का साक्षात्कार करने जैसा ही है। सब कंफ्यूज हैं। सरकार ने क्या किया है। सरकार को क्या करना है। अधिकारी क्या कर रहे हैं। उन्हें क्या करना है। व्यापारी क्या करेंगे क्या नहीं करेंगे। छोटे व्यापारी कहां है। कहां जाएंगे। आम आदमी की बात तो सबसे जुदा है ही। वह तो होटल और रेस्टोरेंट में बिल पर सी-जीएसटी और एस-जीएसटी का नाम पढ़कर बिल काउंटर पर लड़ने मरने को उतारू है कि मोदी जी तो कहते हैं सिर्फ एक टैक्स है। फिर यह सी-जीएसटी और एस-जीएसटी क्या बला है।
अब जब धीरे-धीरे आम आदमी को सी-जीएसटी और एस-जीएसटी का मतलब समझ आने लगा है तो दशहरे के बाद दीपावली की मार्केटिंग में वह जीएसटी का फायदा खोजने में जुट गया है। उसे वहां कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा है। वह अखबारों में प्रकाशित हो रहे सरकारी विज्ञापनों को पढ़कर खुश हो रहा है कि जीएसटी लागू होने से क्या-क्या चीज सस्ती हो गई है। भले ही मार्केट में उसे कुछ समझ में आए न आए, लेकिन जैसे ही व्यापारी यह बोलता है कि बिल कच्चा चाहिए कि पक्का। वह तुरंत समझ जाता है कि उसे बिल न कच्चा चाहिए न पक्का। उसे तो सामान सस्ता चाहिए। पक्की बिल मांगने पर जैसे ही दुकानदार उसे 28 परसेंट टैक्स का फंडा समझता है, ग्राहक पैर पीछे खींच लेता है और दांते निपोड़ कर बस इतना कह देता है। छोड़िए बिल का चक्कर। थोड़ा सस्ता मिल जाए तो बिल काहे का।
दो दिन पहले ही जीएसटी काउंसिल की 22वीं बैठक के बाद मोदी सरकार ने जीएसटी को लेकर चल रहे प्रयोगों के दौर में एक और प्रयोग जोड़ दिया है। अब कंपोजिशन स्कीम की लिमिट बढ़ाना, रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया को मासिक के बजाए तिमाही आधार पर भरना अनिवार्य करना और कुछ वस्तुओं पर टैक्स की दरों को कम करना प्रमुखता से शामिल है। इससे पहले भी जीएसटी काउंसिल की 21 बैठक हो चुकी है। हर बार कोई न कोई नया नियम लागू किया जाता है। यानि प्रयोगों का दौर आने वाले समय में भी चालू रहेगा। फिलहाल जो रियायतें मिली हैं उसमें राजनीतिक गंध आने लगा है। शायद यही कारण है कि अपने दो दिवसीय गुजरात यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का मुख्य फोकस जीएसटी को लेकर ही था।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रयोग होना अच्छी बात है। शायद इसी कारण भारतीय जनता ने भी प्रयोग के तौर पर पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी को अपार समर्थन देकर गद्दी सौंपी थी। पर जिस तरह यह लोकतांत्रित सरकार आर्थिक मोर्चे पर प्रयोगों में जुटी है उसका रिजल्ट भी लोग देखना चाहते हैं। आम आदमी को आंकड़ों की जादूगरी से मतलब नहीं होता है। उसे सीधे-सपाट शब्दों में अपना आर्थिक नुकसान और फायदा देखना होता है। अगर सही अर्थों में नोटबंदी और जीएसटी के जिन्न ने आमलोगों को मजबूत तरीके से आर्थिक फायदा पहुंचाया है तो सरकार का यह कर्तव्य है कि वह सीधे-सपाट शब्दों में ही भारत की जनता को उसके फायदे गिनवाए। नहीं तो नोटबंदी और जीएसटी आने से पहले भी लोग दुकान पर कच्चे और पक्के बिल के झोलझाल में फंसते थे और आज भी स्थिति उससे जुदा नहीं है।

चलते-चलते
गुजरात दौरे पर पहुंचे पीएम मोदी ने जीएसटी काउंसिल की 22वीं बैठक का हवाला देते हुए कहा है कि जीएसटी से जुड़े फैसले की वजह से देश में 15 दिन पहले दीपावली आ गई। हमने पहले ही कहा था कि एक बार लागू करने के बाद तीन महीने तक अध्ययन करेंगे। जहां जहां कमियां होंगी, जो शिकायतें होंगी, व्यवहारिकता में कमी होगी, उसे दूर किया जाएगा। हम नहीं चाहते कि देश का कारोबारी फाइलों, बाबुओं और साहबगीरी में फंस जाए। उम्मीद की जानी चाहिए पीएम मोदी अब 23वीं बैठक का इंतजार किए बिना देश को जीएसटी के और भी फायदे गिनवाने में कामयाब हों।

Monday, October 2, 2017

इस प्लांड मर्डर को रोकने की पहल करें

आज दो अक्टूबर है। पूरा राष्ट्र आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन मना रहा है। हर तरफ जश्न का माहौल है, पर राष्ट्रीय राजधानी के बेहद नजदीक के तीन घरों में मातम है। यह मातम है उन घरों के तीन सदस्यों के प्लांड मर्डर के कारण। गांधी जयंती के इस मौके पर आप भी कह रहे होंगे कि मैं यह क्या हत्या की बात लेकर बैठक गया। पर आज के दिन से बेहतर कोई मौका नहीं हो सकता है कि मैं इस प्लांड मर्डर की चर्चा करूं। यह वह प्लांड मर्डर है जिसके विरुद्ध महात्मा गांधी ने लंबा संघर्ष किया था। वे इस तरह के प्लांड मर्डर के न केवल विरोधी थे, बल्कि यह भी कहा करते थे कि यह मानव जाति का सबसे घिनौना रूप है। आज अगर गांधी जिंदा होेते तो वो हैरान रह जाते कि इतनी तरक्की करने के बावजूद औसतन प्रतिदिन करीब तीन से चार लोग तमाम तरह की सीरवरेज की सफाई के दौरान दम घूंटने से मर जा रहे हैं। 
सीवरेज में सफाई के दौरान मरने वालों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। सफाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) के आंकड़े बताते हैं कि प्रतिवर्ष दो से ढ़ाई हजार लोग इससे प्रभावित होते हैं। अधिकतर की मौत हो जाती है। ऐसा तब है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक अमानवीय कृत बताते हुए इसे पूरी तरह बैन कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सीवरेज के अंदर जाकर सफाई करने पर न केवल पूरी तरह से रोक लगा दी थी, बल्कि इस कार्य के दौरान मारे गए लोगों के परिजनों को दस लाख रुपए का मुआवजा भी घोषित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीवरेज में उतरने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि वहां आक्सीजन न के बराबर होगा। वहां अत्यंत घातक हाईड्रोजन सल्फाइड, मेथेन, कार्बनडाइआॅक्साइड और कार्बन मोनोआॅक्साइड की मौजूदगी किसी की जान लेने के लिए काफी है। फिर ऐसे में कोई भी एजेंसी किसी सफाईकर्मी को बिना सुरक्षा उपकरणों के कैसे वहां भेज सकती है। इससे होने वाली मौत को मर्डर की श्रेणी में माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अगर विभिन्न राज्य सरकारों की नाकामी के कारण लोग मारे जा रहे हैं तो इसे मर्डर नहीं प्लांड मर्डर कहा जाना ही बेहतर है।
अभी 48 घंटे पहले ही राष्ट्रीय  राजधानी से चंद किलोमीटर दूर गुुरुग्राम में सीवर की सफाई के दौरान तीन मजदूरों की दर्दनाक मौत ने मंथन करने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हम कब तक इस प्लांड मर्डर को देखने के लिए मजबूर रहेंगे। भारतीय संसद ने भी मैन्युअल स्कैवन्जर्स रीहैबिलिटेशन एक्ट के जरिए इस प्रथा को रोकने का भरपूर प्रयास किया है। 2013 में यह एक्ट पास हुआ, लेकिन आज तक किर्सी भी राज्य सरकार ने इस एक्ट को सीरियसली नहीं लिया है। हाल यहां तक खराब हैं कि हर साल सबसे अधिक मौत राष्ट्रीय  राजधानी दिल्ली और उसके आसपास ही होते हैं। इससे भी बूरा यह है कि विभिन्न राज्य सरकारों ने इस एक्ट को लेकर कभी गंभीरता नहीं दिखाई। परिणामस्वरूप सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों का आंकड़ा दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है।
भारत में 1993 से ही सीवरेज की मैन्यूअल सफाई पर रोक है। बाद में 2013 में इस संबंध में एक्ट भी पारित कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट तौर पर सभी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को कहा कि वर्ष 1993 के बाद जितनी भी मौतें सीवरेज में मैन्यूअल सफाई के दौरान हुई उन सभी के परिजनों को दस-दस लाख मुआवजा दिया जाए। सफाई के दौरान होने वाली मौतों को साफ तौर पर मर्डर माना गया। मंथन का वक्त है कि इतने सारे कदम उठाए जाने के बावजूद आखिर ये प्लांड मर्डर क्यों नहीं रोके जा रहे हैं। इसके लिए हम किसे जिम्मेदार ठहराएं। राज्य सरकार या उसकी एजेंसियां इसके लिए जिम्मेदार हैं या फिर सीधे तौर पर केंद्र सरकार। कटघरे में सभी हैं क्योंकि यह एक राष्ट्रीय  समस्या के तौर पर मौजूद है और इसका हल भी राष्ट्रीय स्तर पर ही निकालने की जरूरत है।

याद करिए। आज से 30-40 साल पहले का वक्त। जब सिर पर मैला ढोते हम किसी व्यक्ति को देखते तो कैसा महसूस होता था। यह एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होती थी। आज अगर कोई दिख जाए तो हमारा रिएक्शन कैसा होगा जरा इसकी कल्पना करें। महात्मा गांधी ने ताउम्र ऐसी प्रथाओं को दूर करने का आह्वान किया। वे बेहतर मानवीय जीवन के हिमायती थे। अपने तमाम संदेशों में उन्होंने ऐसी प्रथाओं को जड़ से खत्म करने का आह्वान किया। आज स्थिति में सौ फीसदी तो नहीं, लेकिन 98 फीसदी जरूर सुधार है। आज सिर पर मैला ढोने की प्रथा लगभग समाप्त हो चुकी है। पर दूसरी तरफ सीवरेज में जाकर सफाई करने की मजबूरी ने हमें मंथन करने पर मजबूर कर दिया है।
भारत विकास के एक बेहतर मुकाम पर है। सीवरेज सफाई के लिए देशी और विदेशी तकनीक का बेहतर इस्तेमाल भी हो रहा है। फिर क्यों हम प्लांड मर्डर होने दे रहे हैं। क्या राज्य सरकारें और उनकी नोडल एजेंसियां इसके लिए जिम्मेदारी तय नहीं कर सकती हैं। क्यों नहीं मैन्युअल सफाई को पूरी तरह खत्म करने की दिशा में हम सार्थक प्रयास करें। आज दो अक्टूबर है। आज के दिन विभिन्न राज्य सरकार और केंद्र सरकार दो कदम आगे बढ़े। हर जगह विभिन्न नोडल एजेंसियों और उनके ठेकेदारों द्वारा सीवरेज सफाई का काम करवाया जाता है। उनकी जिम्मेदारी तय करते हुए आदेश पारित किए जाएं कि बहुत मजबूरी होने पर ही किसी कर्मचारी को सीवरेज में उतारा जाए। बिना सुरक्षा उपकरण, गैस मास्क के कोई भी कर्मचारी सीवरेज में नहीं उतारा जाए। किसी भी तरह की दुर्घटना के लिए संबंधित सफाई एजेंसी ही जिम्मेदार होगी। अगर सीवरेज में सफाई के दौरान किसी की मौत होती है तो संबंधित एजेंसी को ही एक हफ्ते के अंदर परिजनों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित दस लाख रुपए का मुआवजा देना होगा।
इसमें दो राय नहीं है कि सीवरेज एक ऐसा जाल है जिसे ठीक करने में हम सौ फीसदी मशीनों पर निर्भर नहीं रह सकते हैं। मजबूरी है कि हम मैन्यूअली काम करवाएं। पर क्या इससे भी इनकार किया जा सकता है कि प्रत्येक राज्य सरकार मैन्यूअली वर्क करवाने के लिए एक अलग विंग स्थापित करे। इसके अंदर मजदूरों को बेहतर ट्रेनिंग दे। सुरक्षा उपकरणों का एक बेहतर संसाधन उपलब्ध करवाएं। क्यों नहीं स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और अर्बन डेवलपमेंट में ही हम सीवरेज ट्रीटमेंट के आधुनिकीकरण को भी जोड़ दें। इसके लिए किसी अतिरिक्त बजट की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। तमाम ऐसे उपाय हैं जिसे स्थापित कर हम इस प्लांड मर्डर को रोक सकते हैं।
पूरी दुनिया में सीवरेज सफाई को लेकर बड़ा अभियान चल रहा है। ग्लोबल रूप में इसे कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है इसे समझने के लिए यह काफी है कि भारत में सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े बेजवाड़ा विल्सन को मैगसेसे जैसा प्रतिष्ठित अवॉर्ड तक मिल चुका है। 

आज गांधी जयंती से बड़ा मौका कोई दूसरा नहीं हो सकता कि हम संकल्प लें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर पूरे देश में गांधी जयंती पर सफाई अभियान के लिए बड़ी पहल की गई है। पूरे देश की जनता भारत सरकार के साथ है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को सीवरेज सफाई के दौरान होने वाली अमानवीय कृत को रोकने की दिशा में भी सार्थक आह्वान करने की जरूरत है। पूरा देश उनकी बात सुन रहा है। ऐसे में वे कुछ ऐसा करें कि राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी समझें और इस प्लांड मर्डर को रोकें।
चलते चलते
कुछ दिन पहले एक खबर आई थी कि केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने सफाई कर्मचारियों की मौत को गंभीरता से लिया है। अब मैन्युअल स्कैवन्जर्स रीहैबिलिटेशन ऐक्ट, 2013 में बदलाव पर मंथन किया जा रहा है। इस ऐक्ट में संसोधन करते हुए एजेंसियों और ठेकेदारों को जिम्मेदार बनाया जाएगा। बहुत सी कमियों को दूर करते हुए ऐक्ट को और भी सशक्त बनाया जाएगा। अगर सच में ऐसा है तो बदलाव का यही समय है।

Monday, September 11, 2017

संत और बाबा परंपरा के अंतर को समझना होगा


भारतीय इतिहास के कई स्वर्णिम युगों में सनातम धर्म की परंपराओं ने एक अलग मान और सम्मान का काम किया है। युगों-युगों से इस सनातनी परंपरा ने हमारे हिन्दु धर्म को मजबूत और सुसंस्कृत बनाने का काम किया है। जब आदि शंकराचार्य ने पूरे भारतवर्ष में अखाड़ा परंपरा की नींव डाली थी तो उस वक्त शायद किसी ने परिकल्पना भी नहीं की होगी कि इस अखाड़ा परंपरा के समकक्ष डेरा परंपरा शुरू हो जाएगी। और एक वक्त ऐसा आएगा कि इन्हीं डेरा परंपराओं के स्वयंभू बाबा सनातन धर्म के साधू-संतों और सन्यासियों को भी अपने कुकर्मों और अधर्मों से अपवित्र करना शुरू कर देंगे। मंथन का वक्त है कि हम अपने सनातन धर्मों को छोड़कर क्यों ऐसे डेरों और बाबाओं की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।
इस बीच स्वयंभू बाबाओं और सनातन धर्म की परंपराओं के बीच की लकीर को स्पष्ट करते हुए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने बड़ा कदम उठाया है। परिषद ने रविवार को धर्म नगरी इलाहाबाद में बड़ी बैठक करते हुए देश भर के 14 फर्जी बाबाओं की लिस्ट जारी की है। अखाड़ा परिषद के लिए भी इस लिस्ट को जारी करना बड़ी चुनौती होगी। पर अखाड़ा परिषद ने साधूवाद की इन्होंने देर से ही सही एक सार्थक कदम उठाया है। इलाहाबाद में अखाड़ा कार्यकारिणी की बैठक के बाद जारी इस लिस्ट में आसाराम उर्फ आशुमल शिरमानी, राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर, सचिदानंद गिरी उर्फ सचिन दत्ता, गुरमीत राम रहीम, ओम बाबा उर्फ विवेकानंद झा, निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह, इच्छाधारी भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी, स्वामी असीमानंद, ऊं नम: शिवाय बाबा, नारायण सार्इं, रामपाल, खुशी मुनि, बृहस्पति गिरि और मलकान गिरि समेत कुल 14 नाम शामिल हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के इस साहसिक फैसले ने निश्चित तौर पर भारत में धर्म के नाम पर चल रहे आडंबर, झूठ और फरेब पर एक बड़ी और उद्देश्यपूर्ण बहस को जन्म दे दिया है। लंबे समय से धर्म के इस महाजाल पर बहस होती आ रही है, लेकिन शायद यह पहली बार है कि इतना बड़ा और सार्थक फैसला लिया गया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद में देश के सभी 13 अखाड़े शामिल हैं। 
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी

लिस्ट जारी करने के बाद अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी ने कहा है कि काफी दिनों से फर्जी बाबाओं के द्वारा धर्म के नाम पर दहशत फैलाया जा रहा था। इन बाबाओं द्वारा बलात्कार, शोषण और देश की भोली भाली जनता को ठगने की खबरें आती रही हैं। कई बाबाओं के मामले में तो अदालत भी फैसला दे चुकी है। इन लोगों के कारण ही हिन्दू धर्म, संत समाज और सनातन परंपरा की बदनाम होती है। इसलिए परिषद ने ये फैसला लिया है कि वह स्वयं फर्जी बाबाओं की लिस्ट जारी कर दें, ताकि जनता उनसे सचेत रहें। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह कोई अंतिम सूची नहीं है। भविष्य में भी ऐसी सूचियां आएंगी जिससे आम जनता भी सचेत रहे।
अखाड़ा परिषद ने तो स्पष्ट तौर पर फर्जी बाबाओं के नाम उजागर कर दिए हैं। हो सकता है बहुत से लोगों को इस लिस्ट पर आपत्ति भी हो। इसकी भी आशंका है कि इन फर्जी बाबाओं के समर्थक किसी हिंसक घटना को अंजाम देने पर उतारू हो जाएं। पर मंथन करने की जरूरत है कि धर्म के नाम पर ऐसी ठेकेदारी करने वालों पर हम आंख मूंद कर कैसे विश्वास कर लेते हैं। कैसे हमारी ही बदौलत ये बाबा अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाते हैं और हमारी मासूमियत का फायदा उठाते हैं। ग्लैमरस लाइफ स्टाइल, देश विरोधी हरकतों को करते हुए कैसे ये स्वयंभू भगवान के रूप में हमारे सामने आते हैं और हम भी आंखों पर धर्म का काला चश्मा लगाए इन पर अंध भक्ति प्रदर्शित करने लगते हैं।
जगद्गुरु पंचानंद गिरी
जूना अखाड़ा के जगद्गुरु पंचानंद गिरी कहते हैं धर्म-आस्था हमारी सनातन परंपरा हैं, जिसमें हम अपने आराध्य देव की आराधना करते हैं। उन्हें पूजते हैं और उनके आशीर्वाद से हम फलीभूत होते हैं। पर सनातन धर्म में डेरा और स्वयंभू बाबा परंपराओं का कहीं भी स्थान नहीं है। इन डेरों के स्वामी खुद को भगवान मान लेते हैं और अपने भक्तों को धर्म का ऐसा चश्मा लगा देते हैं जिसमें कुछ दूसरा नजर नहीं आता है। हमें ऐसे बाबाओं और डेरों से सावधान रहने की जरूरत है। 
संपूर्णानंद ब्रहचारी 

वहीं अग्नि अखाड़ा के सचिव संपूर्णानंद ब्रहचारी कहते हैं अखाड़ा परिषद ने जो साहसिक कदम उठाया है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। हमें समझने की जरूरत है कि संत समाज का हिन्दू धर्म और संस्कृति में एक अहम स्थान है। पर हमारी परंपरा में स्वयंभू बाबाओं का कोई स्थान नहीं। लोगों को इस बात को समझने की जरूरत है कि सनातन परंपरा और डेरा परंपरा या स्वयंभू परंपरा में कितना अंतर है। एक तरफ सनातन परंपरा है जिसने हिन्दू धर्म की स्थापना से लेकर इसे सींचने और सहेजने का काम किया है। जबकि स्वयंभू परंपरा का संचालन करने वाले डेराओं के बाबाओं ने धर्म के नाम पर एक ऐसा प्रदूषण फैलाया है जो हमारे समाज को धर्म से ही दूर कर रहा है। हमें समझने की जरूरत है।
आदि शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म के उत्थान और रक्षार्थ कई बड़े कदम उठाए। ऐसे ही एक कदम था सात अखाड़ों की स्थापना। इन अखाड़ों में महानिवार्णी अखाड़ा, निरंजनी आखाड़ा, जूना अखाड़ा, अटल आखाड़ा, आवाह्न अखाड़ा, अग्नि और आनंद अखाड़ा प्रमुख है। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी सनातन धर्म पर हमले हुए हैं इन अखाड़ों के साधू संतों ने अपनी सार्थक भूमिका का निर्वहन किया है। यहां तक कि अंग्रेजों के शासन के समय भी अंग्रेज इन अखाड़ों और साधू संतों की बातों को सुनते और समझते थे। इन्हें सम्मान देते थे। पर हाल के वर्षों में जिस तरह बाबाओं ने अपनी बाबागिरी और धर्म के नाम पर लूट खसोट का मायाजाल बिछाया है वह अकल्पनिय है।
इन बाबाओं की लिस्ट जारी कर अखाड़ा परिषद ने भारतीय समाज के लिए एक मार्गदर्शक का काम किया है। हालांकि अखाड़ा परिषद को भारतीय सनातन परंपरा को पवित्र रखने के लिए ऐसे ही कई और कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सबसे जरूरी है ऐसे बाबाओं, धर्मगुरुओं, पीठाधिश्चरों, स्वयंभू संतों को चेतावनी जारी करना जिसमें स्पष्ट तौर पर इस बात जिक्र हो कि धर्म के नाम पर अगर किसी ने लोगों को गुमराह करने की कोशिश की तो उसे हरगीज स्वीकार नहीं किया जाएगा। डेरा सच्चा सौदा के सर्वेसर्वा राम रहीम के कुकर्मों का सामने आना इस बात का प्रमाण है कि कैसे ये स्वयंभू संत धर्म और आस्था के नाम पर लोगों के सेंटिमेंट से खिलवाड़ कर रहे हैं। मंथन करें और सचेत रहें।

Monday, August 14, 2017

शर्म है कि किसी को शर्म आती नहीं

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में पिछले 72 घंटे में 65 मासूमों की मौत हो जाती है। आरोपों प्रत्यारोपों का दौर चलता है। पर किसी को शर्म नहीं आ रही है। शर्म के लिए कई बातें हैं, पर इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है कि एक तरफ हम अपनी आजादी के 71वें साल में प्रवेश कर रहे हैं और दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के स्वास्थ मंत्री बेशर्मी से यह बयान दे रहे हैं कि अगस्त के महीने में बच्चे मरते ही हैं। आजादी के इस मौके पर हम उन मासूम बच्चों की याद में जश्न मनाने से परहेज करें और मंथन करें कि क्यों हम आज भी उसी दौर में जीने को विवश हैं जिस दौर में मेडिकल सुविधाओं में अभाव में हमारे पूर्वज तमाम तरह के रोगों को अपनी नियति मान कर जीते थे। जो बयान उत्तर प्रदेश के स्वास्थ मंत्री ने दिया वही बातें हमारे नाना दादा कहा करते थे। बारिश का मौसम है, जाड़े का मौसम है अब मौत आने वाली है। 
हर किसी को मौत तो आनी ही है। आएगी ही। यही एक साशस्वत है। परम सत्य है कि सभी को एक न एक दिन यहां से जाना है। जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है। पर विडंबना इस बात की है कि एक शर्म है जो किसी को नहीं आ रही है। शर्म उन्हें भी नहीं आ रही है जिन्होंने उत्तर प्रदेश में इतने दिनों तक राज किया। चाहे वह अखिलेश यादव की सरकार हो या मायावती की। उन्होंने सरकार की तरफ से प्रदेश में स्वास्थ सुविधाओं का कितना ख्याल रखा। अगर यह बात सत्य है कि आॅक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी को पिछले कई वर्षों से बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो उस वक्त सरकार किसकी थी?
शर्म तो कांग्रेस के उन महान नेताओं को भी नहीं आ रही है जो बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में पिछले कई सालों से इंसेफेलाइटिस से मौत की आगोश में समा रहे हजारों मासूमों के परिजनों के आंसू पोछने आज तक नहीं गए। वे गोरखपुर में बच्चों की मौत की खबर फैलते ही लाव लश्कर के साथ हॉस्पिटल पहुंच गए। गोरखपुर इसलिए पहुंच गए क्योंकि वह उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह जिला है। राजनीति लाभ पूरा मिलेगा, शायद यही लालच रही होगी। मुजफ्फरपुर इसलिए नहीं पहुंच पाए क्योंकि वहां मासूमों की लाशों पर राजनीति नहीं हो सकती थी।
शर्म उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को भी नहीं आ रही है। बेशर्मी की सारी हदों को पार करते हुए प्रदेश के स्वास्थ मंत्री अगस्त माह में होने वाले बच्चों की मौतों का आंकड़ा बता रहे हैं। वह यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि यह मौतें सामान्य हैं। कोई नई बात नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी अपने सिपहसलारों के भरोसे बयान देने मैदान में उतरे। पर शर्म उन्हें भी नहीं आई। जिस योगी आदित्यनाथ के डर से गोरखपुर में गलत काम करने वाले थर-थर कांपते थे। आज उसी योगी आदित्यनाथ की जुबान बंद है। वोट की राजनीति में कोई बखेड़ा न हो जाए, इसलिए वे भी नपातुला बोल गए। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए मौत किस तरह हुई इस पर फोकस बनाए रखा। उन्हें भी शर्म नहीं आई कि जिस योगी में लोग दबंग मुख्यमंत्री की छवि देखते हैं। जिस योगी पर उन्हें भरोसा है कि वो अपनी कड़क प्रशासनिक क्षमता से सबकुछ ‘टाइट’ कर देगा, आज वही योगी घुटनों पर बैठा है।
यह कैसे संभव है कि जिस मेडिकल कॉलेज को लेकर स्थानीय मीडिया लगातार आगाह करता आ रहा हो, उस मेडिकल कॉलेज की स्थिति उसी गृह जिले के मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंची हो। यह भी कैसे संभव है कि उसी मेडिकल कॉलेज में कुछ दिन पहले पहुंचे मुख्यमंत्री को आने वाले संभावित खतरों के प्रति आगाह नहीं किया गया हो। अगर सही में योगी आदित्यनाथ को किसी ने आगाह नहीं किया तो इससे बड़ी शर्म की बात नहीं हो सकती। अगर सही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बच्चों की मौत पर शर्म है तो नाप दें ऊपर से नीचे तक के तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों को जिन्होंने ऐसा होने दिया। दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा का डायलॉगमारने वाले मुख्यमंत्री को अपनी दबंगता का परिचय देने का इससे मुफीद समय नहीं हो सकता।
शर्म मीडिया को भी आनी चाहिए जो इस संवेदनशील मुद्दे में भी हिंदू और मुस्लिम एंगल खोज लेती है। चुंकि प्रदेश के मुखिया की छवि कट्टर हिंदूवादी नेता के रूप में है, इसीलिए वहां के एक मुस्लिम डॉक्टर को बिना तथ्यों के जांच पड़ताल के हीरो बना देती है। अब जब यह तथ्य सामने आ चुका है कि डॉक्टर कफील अहमद भी इस पूरे प्रकरण का एक प्रमुख दोषी है तो मीडिया के जांबाज रिपोर्टर क्या अपनी गलती पर शर्म करेंगे? यह मीडिया के लिए भी मंथन का समय है कि वह तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करे और लोगों को दिग्भ्रमित होने से बचाए। शायद इसीलिए शनिवार को गोरखपुर पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मीडिया से अपील की और कहा कि आप हवा-हवाई रिपोर्टिंग न करें।
किस-किस की शर्म की बातें करें। कल हम अपनी स्वतंत्रता के 71वें साल में प्रवेश करने जा रहे हैं। हर एक क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ने वाले हमारे देश में अगर आज भी सैकड़ों मासूस बेहतर स्वास्थ सुविधाओं के आभाव में अकाल मौत मर रहे हैं इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है। हो सकता है गोरखपुर में मरने वाले बच्चों के परिजनों को वहां की सरकार करोड़ों रुपए मुआवजे के तौर पर बांट दे। हो सकता है दिल्ली की केंद्र सरकार भी अपनी तरफ से करोड़ों रुपए का फंड राहत के तौर पर भेज दे। पर क्या हम इस बात के लिए खुद को तैयार कर सकेंगे कि स्वतंत्रता के इस जश्न के मौके पर उन मासूमों के परिजनों के खून के आंसू कैसे रोके जाएं।
हम सभी को मंथन करना है। सिर्फ फेसबुक और व्हॉट्एप पर मासूमों की याद में डीपी बदलने से किसी को शर्म नहीं आने वाली। शर्म अगर आएगी तो वह अपनी अंतरात्मा को झकझोरने से। आजादी की शाम से पहले यह खबर पूरी दुनिया में पहुंच चुकी है कि कैसे हमारे मासूम आज भी सिस्टम की फेल्योरनेस से तिल-तिल कर मरने को बेबस हैं। आजादी का यह मौका जायज न होने दें। कुछ शर्म करें। शर्म करेंगे तभी कुछ हल निकलेगा। यही उन मासूमों के प्रति श्रद्धांजलि होगी।
जय हिंद

Monday, July 24, 2017

सिर्फ गृहणी नहीं, ‘वित्त मंत्री’ हैं घरेलू महिलाएंं

भारतीय न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी बातों में एक सबसे बड़ी कमी यह है कि कई महत्वपूर्ण फैसले बिना किसी शोर शराबे के भीड़ में गुम हो जाती हैं। जबकि ऐसे फैसले नजीर के तौर पर पेश किए जाने की जरूरत होती है। चर्चा भी इसलिए जरूरी होती है क्योंकि इससे बड़े बदलाव की कहानी शुरू की जा सकती है। एक ऐसा ही फैसला कुछ दिन पहले मद्रास हाईकोर्ट ने दिया है। कोर्ट ने घरेलू महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा है कि एक घरेलू महिला को भी वेतन प्राप्ति का पूरा अधिकार है। वह घर की वित्त मंत्री होती है। उसे भी वेतन दिया जाए। इतना ही नहीं कोर्ट ने न केवल अपना फैसला सुनाया, बल्कि एक घरेलू महिला को उसके 24 घंटे के काम की पारिश्रमिक भी तय की। यह पारिश्रमिक तीन हजार रुपए तय की गई है। इस फैसले की पूरी चर्चा आज आपसे करूंगा, ताकि आप भी मंथन करें और एक घरेलू महिला के पूरे जीवन चक्र को सम्मान दें।
इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है पुड्डूचेरी शहर से। वहां 2009 में मालती नाम की महिला की मौत बिजली के खुले तार की वजह से हो जाती है। पुड्डूचेरी बिजली बोर्ड को महिला के पति को मुआवजे के तौर पर पांच लाख मुआवजा देना था। बोर्ड ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। गुहार लगाई कि चुंकि महिला एक घरेलू महिला थी, जिसके कारण उसकी कोई आय भी नहीं थे, ऐसे में मुआवजे की रकम बहुत ज्यादा है इसे कम की जाए। भारतीय न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी मामले में फैसला देने के लिए एक घरेलू महिला के कार्यों का मुल्यांकन किया जाना था।
मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति केके शशिधरन और न्यायमूर्ति एम मुरलीधरन की एक डिवीजन बेंच ने पूरे मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान तमाम तर्क पेश किए गए, लेकिन अंतिम फैसला घरेलू महिलाओं के पक्ष में आया। कोर्ट ने महिलाओं के अप्रत्यक्ष कार्यों और देखभाल का मूल्यांकन किया और उसे स्वीकृत किया। कोर्ट ने माना कि मालती एक डेडिकेटेड वाइफ थी। अपने दो बच्चों के प्रति भी वह समर्पित थी। वह घर की वित्त मंत्री थी। वह एक शेफ थी। वह घर की चार्टेड अकाउंटेंट थी। अपने घर की इनकम और खर्चे को नियंत्रित करती थी। एक पति ने अपनी घरेलू कंपनी का सबसे वफादार कर्मचारी खो दिया। दो बच्चों ने अपनी मां का प्यार खो दिया। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि वह सिर्फ एक घरेलू महिला थी। इसीलिए उस महिला को एक कामकाजी महिला के रूप में देखा जाए और उसे हर मुआवजे का अधिकार है।
मद्रास हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए न केवल मालती को न्याय दिलाया, बल्कि गृहणियों के लिए एक ऐसा आधार तैयार कर दिया है जो आने वाले समय में काफी सकारात्मक बदलाव की तरफ ले जाएगा। भारतीय पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं अपने अस्तित्व के लिए हमेशा से ही संघर्ष करती आई हैं। आज भारतीय महिलाएं अपने सर्वश्रेष्ठ समय में जी रही हैं, जहां उन्हें हर वो अधिकार प्राप्त है जिसके लिए वो लंबे वक्त से संघर्ष कर रही थीं। समाज के हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी पहचान कायम की है। बॉर्डर की रक्षा करने के साथ-साथ वो हवाई जहाज उड़ा रही हैं।
मल्टीनेशनल कंपनियों के सर्वोच्य पदों पर बैठकर भी उन्होंने अपनी प्रतिभाएं दिखाई हैं। पर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आज इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए बहसें हो रही हैं। बड़े-बड़े सेमिनार आयोजित किए जा रहे हैं। जब भी महिला सशक्तिकरण की बातें होती हैं तो यह जरूर महसूस होता है कि क्या सच में आज भी सशक्तिकरण पर चर्चा जरूरी है। महिला सशक्तिकरण पर काम करने वाली एक एक एनजीओ ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें इस बात का जिक्र किया गया कि आज की आधुनिक महिलाएं महिला सशक्तिकरण पर चर्चा को बेकार मानती हैं। उनका मानना है कि उन्हें सभी अधिकार मिले हैं। वे इस दम पर आगे बढ़ रही हैं। बेहतर मुकाम हासिल कर रही हैं। हां यह जरूर है कि भारतीय घरेलू महिलाओं की स्थिति आज भी चिंतनीय जरूर है।
भारतीय घरेलू महिलाएं आज भी खुद को उपेक्षित महसूस करती हैं। समाज की मुख्यधारा से वे खुद को अलग समझती हैं। कई मौकों पर ऐसा देखने को मिला है कि घरेलू महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पर मद्रास हाईकोर्ट ने देर से ही सही एक ऐसी सार्थक बहस को जन्म दिया है जिसमें घरेलू महिलाओं को भी उनके कार्यों की बदौलत एक बेहतर स्थिति में देखने का मौका मिला है। एक घरेलू महिला के दिन की शुरुआत सुबह पांच बजे से शुरू होकर देर रात तक रहता है। उन्हें कोई वीकली आॅफ नहीं मिलता। हर दिन उनकी ड्यूटी होती है। पूरे देश में छुट्टी हो पर एक घरेलू महिला अपने परिवार, बच्चों के लिए ड्यूटी पर रहती है। ऐसे अनगिनत काम हैं जिनका कभी मूल्यांकन नहीं किया गया। 

मद्रास हाईकोर्ट ने घरेलू महिलाओं के अनगिनत काम को भी ‘काम’ यानी रोजगार की श्रेणी में माना है। यह घरेलू महिलाओं के लिए प्रति एक बेहतर दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है। कोर्ट ने मंथन करने के लिए हमें प्रेरित किया है कि हम अपनी घरेलू मां, पत्नी, बहन के कार्यों का सम्मान करें। फिलहाल कोर्ट ने एक घरेलू महिला के कार्यों का मुल्यांकन करते हुए मालती के केस में उसका वेतन तीन हजार रुपए मासिक तय किया। भले ही यह रकम काफी कम है, पर कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए बहुत कुछ कह दिया है। कोर्ट ने एक घरेलू महिला के अवैतनिक और गैर मान्यताप्राप्त कार्य को श्रम की श्रेणी में ला दिया है। एक घरेलू महिला को भी कामकाजी महिला की तरह सम्मान दिलाने का प्रयास किया है।

Thursday, July 13, 2017

हट बुड़बक ! हमको समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है

एक साधारण छात्र नेता से सफर शुरू कर कोई राजनीति के इतने ऊपरी पायदान तक कैसे पहुंच सकता है यह कोई लालू यादव से सीख सकता है। छल कपट की राजनीति से ऊपर उठकर लालू यादव ने राजनीति की नई विधा का सृजन किया। यह विधा थी घोटाला करो, बदनाम हो जाओ और फिर राजनीति के शिखर पर पहुंच जाओ। बाद में मायावती, जयललिता जैसे कई नेताओं ने लालू से सीख लेते हुए खुद को स्थापित किया। लालू ने न केवल इस विधा का सृजन किया, बल्कि इसमें इतने सारे प्रयोग कर डाले की भारतीय जांच एजेंसियां लंबे समय तक सिर्फ और सिर्फ लालू यादव पर रिसर्च करें तो इसे उनके पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। फिलहाल जांच एजेंसियों ने काफी मशक्कत के बाद लालू यादव और उनके कुनबे के काले कारनामों की परत दर परत उखाड़ते हुए पूरी दुनिया को बता दिया है कि लालू यादव को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। हां यह मंथन का भी समय है कि लालू यादव जैसे राजनीतिज्ञ कैसे पाप पर पाप करते हुए घोटाले पर घोटाले करते हुए और भी मजबूत होते गए।
यह भारतीय राजनीति के इतिहास के उन काले अध्यायों का काल है जो आने वाले समय में राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों के लिए पाठ्य पुस्तक में शामिल हो सकता है। लालू यादव की पूरी जीवनी ही एक रिसर्च सब्जेक्ट बन सकती है कि कैसे एक कॉलेज का साधारण सा छात्र नेता अरबों खरबों का घोटाला करते हुए भी अपनी पहचान बनाए रखने में कामयाब रहता है। बिहार में लंबे समय तक राज करते हुए लालू यादव जब चारा घोटाले के मुख्य आरोपी बने तो राजनीतिक विरोधियों ने इसे लालू यादव युग का अंत बताया। पर सभी राजनीतिज्ञ पंडितों को पछाड़ते हुए लालू यादव और भी मजबूती के साथ राजनीति में आए। बिहार में जहां एक तरफ अपनी पत्नी को प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करवाया, वहीं आगे बढ़ते हुए केंद्र की राजनीति में आ गए। यह लालू यादव का राजनीतिक रसूख ही था कि तमाम घोटालों में मुख्य आरोपी होने के बावजूद केंद्र में रेल मंत्री जैसा अहम पद पाया। रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने जो कुछ भी किया उसे कई विदेशी यूनिवर्सिटी ने भी सराहा। यहां तक कहा गया कि विदेशी यूनिवर्सिटी के छात्र लालू यादव का मैनेजमेंट फंडा समझने के लिए लगातार भारत आ रहे हैं।
रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने रातों रात रेलवे का कायापलट कर दिया। जबर्दस्त घाटे में चल रहा रेल मंत्रालय केंद्र सरकार का सबसे कमाऊ पूत बन गया। यह सच में आश्चर्यजनक बदलाव था जिसे पूरी दुनिया देख रही थी। पूरा देश लालू पर गर्व करने लगा था कि एक हंसी ठिठोली करने वाला राजनेता इतना बड़ा मैनेजमेंट गुरु भी बन सकता है। रेलवे स्टेशन पर लिट्टी चोखा और कुल्हड़ वाली चाय का कांसेप्ट लाकर लालू चंद महीनों में सभी के दिलों पर राज करने लगे। उनके मैनेजमेंट गुरु वाले रूप ने उनके घोटाले वाले चरित्र को पूरी तरह ढंक दिया था। पर आज जब उनके सीबीआई, ईडी और तमाम जांच एजेंसियां लालू यादव और उनके कुनबे की प्रॉपर्टी को खंगाल रही है तो समझ में आ रहा है कि लालू न केवल असाधारण व्यक्तित्व के धनी हैं बल्कि उनके मैनेजमेंट को समझना इतना भी आसान नहीं। लालू के रेलमंत्रित्व काल के काले कारनामों का चिठ्ठा ज्यों ज्यों खुल रहा है लालू यादव और उनके कुनबे की परेशानियां भी बढ़ रही हैं।
लालू उन नेताओं में शामिल रहे हैं जो जितनी मुश्किलों में रहा है दोगुनी ताकत से वापसी करता है। सुप्रीम कोर्ट ने जब लालू यादव के राजनीतिक करियर पर 11 साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया था तो कहा जाने लगा था कि लालू यादव तो गया। उन हालातों में लालू यादव के कई करीबी साथियों ने भी उनका और राष्टÑीय जनता दल (राजद) का दामन छोड़ दिया। बिहार में बदली राजनीतिक परिस्थितियों के बीच जब विधानसभा चुनाव में विकास पुरुष नीतीश कुमार को राजद के साथ गठबंधन करना पड़ा तो राजनीतिक पंडित भी चौंक गए। पर लालू यादव को पता था कि उन्हें क्या करना है। अपने दोनों बेटों को राजनीति में उतार कर लालू यादव ने वह मास्टर स्ट्रोक खेला जिससे राजनीति के पिच पर जमे जमाए खिलाड़ी धूल चाटने लगे। बिहार विधानसभा चुनाव में बंपर सीट हासिल कर लालू यादव ने जता दिया कि भले ही वह राजनीति का वनवास झेल रहे हैं पर बिहार में उनका ही राज है। लालू ने एक बार फिर जता दिया कि लालू सिर्फ नाम ही काफी है।
अब राजनीति ने एक बार फिर करवट ली है। लालू और उनका पूरा कुनबा एक ऐसे रडार पर है जहां हर तरफ मुश्किलें ही मुश्किलें हैं। लालू एंड कंपनी के तमाम ठिकानों पर सीबीआई और ईडी की दबिश चल रही है। लालू के बेटे और बिहार के उप मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। बेटी और दामाद पर भी शिकंजा कसा जा चुका है। बिहार के कई घोटालों में लालू यादव और उनके दोनों बेटों का नाम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सामने आ चुका है। ऐसे में बिहार की राजनीति फिर से लालू और उनके आसपास झूल रही है।
नीतीश कुमार दूर बैठकर तमाशा देख रहे हैं और भविष्य की रणनीति पर मंथन कर रहे हैं। बीजेपी लालू यादव एंड कंपनी पर शब्द वाण से वार करते हुए राजनीति पर गिद्द दृष्टि टिकाए बैठी है।   कांग्रेस लालू यादव को प्रत्यक्ष रूप से सांत्वना दे रही है। ऐसे में राजनीतिक पंडितों को भी मंथन जरूर करना चाहिए। लालू एंड कंपनी क्या इन झंझावतों से खुद को बच पाएगी? क्या बिहार में नीतीश कुमार राजद के साथ अब लंबे समय तक बने रहेंगे? क्या फिर से बिहार में नीतीश और बीजेपी साथ आ रहे हैं? ये कुछ ऐसे ज्वलंत प्रश्न हैं जो वक्त का इंतजार कर रहे हैं। इन सवालों का जवाब तो वक्त आने पर ही मिलेगा। पर इतना जरूर है कि इतिहास गवाह है कि जब-जब लालू यादव पर इस तरह के हमले हुए हैं वो और मजबूती के साथ सत्ता के केंद्र में आते रहे हैं। टीवी चैनलों पर दिख रहे लालू यादव के तेवर यह बताने के लिए काफी हैं कि उन्हें अब किसी का डर नहीं। तमाम घोटालों में हजारों सबूत होने के बावजूद जब भारत की न्याय व्यवस्था उन्हें अधिक दिनों तक सलाखों के पीछे नहीं रख सकी तो ये आरोप उनके सामने क्या हैं। हां इतना जरूर है कि लालू के दो युवा पुत्रों की राजनीति जो अभी ठीक से शुरू भी न हो सकी थी वो मंझधार में जरूर है।

Thursday, June 29, 2017

एक शाम नाथुला दर्रा के नाम ... जब मेघा जी की चीनियों से हुई झड़प

चीनी सैनिक के साथ मेघा।
इन दिनों चीन से भारत के संबंध कुछ बेहतर नहीं चल रहे हैं। चीन और भारत दोनों की सामरीक दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण नाथुला दर्रा (पास) भी चर्चा में है। कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों को भी यहीं रोक दिया गया है। अगर आप कभी बाघा बॉर्डर जाएंगे तो आपके चंद कदम की दूरी पर पाकिस्तानी फौज नजर आ जाएगी। ठीक इसी तरह जब आप नाथुला दर्रा से ऊपर भारत की सबसे अंतिम सैन्य पोस्ट पर जाएंगे तो आप चीनी सैनिकों के बेहद करीब होंगे। इतने करीब की आप उनसे हाथ तक मिला सकते हैं। गले मिलकर फोटो भी खींचवा सकते हैं। पर इसी मेल मिलाप के दौरान मेरे साथ गर्इं मेरी वाइफ मेघा की चीनियों के साथ झड़प हो गई। भारतीय सैनिकों ने भी साथ दिया। जीत की मुस्कान के साथ मेघा ने जश्न मनाया। आज उस कहानी को कलमबद्ध कर रहा हूं, इसलिए कि यह बता सकूं कि चीनियों की फितरत क्या है?
बात मार्च 2011 की है। मैं और मेघा (मेरी वाइफ) सिक्किम की राजधानी गंगटोक घूमने गए थे। मैंने मेघा को नहीं बताया था कि हम वहां से काफी ऊंचाई पर स्थित नाथुला पास भी जाएंगे। जानता था पहले बता दिया तो प्रोग्राम में फेरबदल भी करवाया जा सकता है। खैर गंगटोक की सुनहरी वादियों का दो दिनों तक लुत्फ उठाकर मैंने अचानक तीसरे दिन मेघा को सुबह सुबह बताया कि आज हम नाथुला पास जाने वाले हैं। चीन के बॉर्डर पर। मेघा ने नाथुला पास के बारे में बहुत कुछ पढ़ रखा था, इसीलिए ठंड में भी उसका पारा हाई हो गया। जब मैंने बताया कि मैंने गंगटोक आते ही वहां जाने के लिए अप्लाई कर दिया है, आौर कल शाम कंफर्मेशन भी आ गई है। हमें 11 बजे वाली टैक्सी से जाना है। बुझे मन से मेघा तैयार हुई।

नाथुला पास पर चीनी सैन्य पोस्ट के ठीक सामनेपोज देती मेघा।

आप लोगों के लिए बता दूं कि नाथुला पास जाने के लिए आपको भारत सरकार से अनुमति लेनी होती है। गंगटोक में ही टूरिस्ट डिपार्टमेंट के पास आपको अपनी दो-दो रंगीन फोटो, फोटो युक्त आईडी जमा करानी होती है। अपना फोन नंबर और होटल या जहां आप ठहरे हैं वहां का पता देना पड़ता है। 24 घंटे बाद कंफर्मेशन आता है। जरूरी नहीं कि आपको वहां जाने की अनुमति मिल ही जाए। विदेशियों का वहां जाना प्रतिबंधित है। नाथुला पास को सिल्क रूट के नाम से भी जाना जाता है। इसी रास्ते से चीनी यात्री ह्यूनसांग, फाहियान और मार्कोपोलो जैसे प्रतिभाशाली लोगों ने भारत में प्रवेश किया था। इन्होंने भारतीय विविधता की खोज की और भारत और चीन के बीच दोस्ती की नींव डाली। इस नींव में सबसे बड़ी दरार भारत-चीन के 1962 की लड़ाई के बाद पड़ी। लड़ाई के बाद इस अति महत्वपूर्ण रुट को पूरी तरह बंद कर दिया गया था। दोनों देशों की फौजें हमेशा अपनी भृगुटी ताने आमने सामने की पोस्ट पर मौजूद रहती। वर्ष 2006 में तमाम प्रयासों के बाद यह रूट दोबारा शुरू हुआ। इस रूट के खुलने के बाद भारत के साथ-साथ चीन का व्यापारिक वर्ग भी बेहद खुश हुआ। इस खुशी का परिणाम हम आज भारत के गली मोहल्लों की दुकानों में भी देख रहे हैं। हर जगह चीन के दो नंबर के प्रोडक्ट मौजूद हैं।
नाथुला पास के रास्ते में एक पड़ाव।

खैर हम खुशनसीब थे कि हमें नाथुला पास जाने का मौका मिल गया था। नाथुला पास सिक्कम की राजधानी गंगटोक से मात्र 58 किलोमीटर की दूरी पर है। नाथुला दरअसल हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा है जो भारत के सिक्किम और तिब्बत की चुम्बी घाटी को जोड़ता है। नाथुला दो तिब्बती शब्द नाथु (Listenings Ears) और ला (Pass)
से मिलकर बना है। हमने पता कर लिया था कि वहां काफी अधिक ठंड होगी, इसलिए हम पूरी तैयारी के साथ तय समय पर टूरिस्ट इंफॉर्मेशन सेंटर पहुंच गए। ठीक 11 बजे टैक्सी भी आ गई। सबकी सीट अलॉटेड थी, क्योंकि टैक्सी का भाड़ा पहले ही ले लिया गया था। अगर आप शेयर्ड टैक्सी से नहीं जाना चाहते तो आपको करीब 8 से दस हजार रुपए खर्च करने होंगे,  इसमें यात्रा परमिट शामिल नहीं होगी। हमने शेयर्ड टैक्सी का आॅप्शन लिया था, क्योंकि हम दो ही लोग थे और उस जगह से अनजान थे। किसी अनजान जगह जाने के लिए शेयर्ड टैक्सी का आॅप्शन बेस्ट होता है क्योंकि आपके साथ अधिक लोग होते हैं, और यह इकोनॉमिकल भी होता है। शेयर्ड टैक्सी का भाड़ा 8 सौ रुपए प्रति व्यक्ति था, जिसमें यात्रा परमिट भी शामिल था।
नाथुला पास की यात्रा शुरू होने के करीब दस मिनट बाद ही हमें इस बात का अहसास हो गया था कि यह कोई आम यात्रा नहीं है। शहर से ऊपर निकलते ही बेहद संकरी सड़कों ने हमारा स्वागत किया। सांस थाम देने वाली इन सड़कों पर हमारी टैक्सी यूं सरपट भाग रही थी जैसे हम फार्मूला वन की ट्रैक पर चल रहे हों। हिंदी गाना सुनते हुए सिक्कम का वह टैक्सी ड्राइवर इतने इत्मीनान से गाड़ी चला रहा था कि हम हैरान थे। करीब 58 किलोमीटर की यात्रा हमें चार घंटे में पूरी करनी थी। दिल की धड़कनों को काबू करते हुए हमारा पहला पड़ाव आया छांगू लेक। खतरनाक रास्तों को देखते हुए यहां पहुंचना किसी एडवेंचर से कम नहीं। एकबारगी मुझे भी यही लगा था कि कहीं यहां का प्रोग्राम बनाकर मैंने कुछ गलत तो नहीं कर लिया। छांगु लेक समुद्र से 12300 फीट ऊपर है। यहां करीब आधे घंटे का ठहराव था। सैलानियों की यहां अच्छी खासी भीड़ थी। यॉक के ऊपर बैठकर तस्वीर खिंचवाने की चाहत ने हमें यहां रोक दिया था। मैगी यहां की खास डिश है। इसे कई तरह से बनाया जाता है। समुद्र तल से हजारों मीटर ऊपर गरमा गरम मैगी खाने का स्वाद ही अलग था। मैगी खाने के बाद हमारी यात्रा दोबारा शुरू हुई। 25 किलोमीटर का सफर फिर शुरू हुआ।

नाथुला पास के रास्ते में एक पड़ाव।
अब हर तरफ फौज की उपस्थिति नजर आने लगी थी। फौजी गाड़ियां और बर्फ से आच्छादित पड़ाड़ियों के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था। बिना बैरिकेट के मौजूद सड़क से नीचे देखने की हिम्मत नहीं थी, इसीलिए मैंने अपनी जगह बदल ली थी। नाथुला पास पहुंचने के पांच किलोमीटर हमारी गाड़ी रोक दी गई। भारतीय फौज के जवानों ने बताया कि मौसम की चेतावनी जारी की गई है। भारी बर्फबारी की संभावना है। आपको यहीं से लौटना होगा। हम बेहद निराश हो गए। पर मेघा और उसकी एक दोस्त (यह दोस्त टैक्सी में बनी थी)। नाम मुझे ठीक से याद नहीं, हां यह याद है कानपुर की कोई मुस्लिम फैमिली थी। मैं और मेरे सहयोगी जब फौजियों को राजी नहीं कर सके, तब इन दोनों सखियों ने मोरचा लिया। दोनों ने उसे पोस्ट के सबसे सीनियर अधिकारी को करीबन हड़काने के अंदाज में बोलना शुरू कर दिया। हम इतनी दूर से आए हैं। जब खतरनाक रास्ते हमारा हौसला नहीं बिगाड़ सके तो आप हमें ऊपर जाने से कैसे रोक सकते हैं। मेघा ने कहा कि हम झेल लेंगे बर्फबारी, आप हमें जाने दें। हम ज्यादा देर ऊपर नहीं रुकेंगे, जाएंगे और चले आएंगे। महिलाओं से बहस में कोई जीत नहीं सकता। भारतीय सैनिक भी नहीं। हमें ऊपर जाने की अनुमति मिल गई। सिर्फ एक घंटे के लिए।
चीन से बिल्कुल आमनेसामने की पोस्ट पर मैं और मेघा।

नाथुला पहुंचना मेरे सपने के पूरा होने जैसे ही था। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ। सर्द हवाओं ने हमें घेर रखा था। ऐसा लग रहा था मानों शरीर में कुछ बचा ही नहीं है। तमाम गर्म कपड़ों के बावजूद हम कांप रहे थे। सीढ़ियों से चढ़कर हमें ऊपरी पोस्ट तक जाना था। करीब चालीस पचास सीढ़ी चढ़कर आखिर हम वहां पहुंच चुके थे जहां तक पहुंचने के लिए इतने पापड़ बेले थे। 14200 फीट की ऊंचाई पर भारतीय सैन्य पोस्ट और चीनी सैन्य पोस्ट के बीच सिर्फ आधी फीट ऊंची दीवार थी। दीवार के ऊपर नाम मात्र के कंटीली तार लगे थे। सामने चीनी सैनिक बिना किसी हथियार के इधर-उधर टहल रहे थे। हल्की बर्फबारी भी शुरू हो चुकी थी। भारतीय सैनिक वहां हम जैसे मौजूद कुछ पर्यटकों को कंटीली तार से दूर रहने की सलाह देते हुए पोस्ट के बारे बता रहे थे। कैप्टन रैंक के अधिकारी को मेघा ने घेर रखा था और पूरे नाथुला का इतिहास और भूगोल की जानकारी ले रही थी। तभी एक चीनी सैनिक कंटीले तार के पास आ गया। मेघा ने तत्काल उसे भी घेर लिया। न उस चीनी सैनिक को अंग्रेजी आ रही थी और न मेघा को चीनी भाषा समझ में आ रही थी। पर उस सैनिक ने इतना जरूर समझ लिया कि यह भारतीय महिला उससे हाथ मिलाना चाह रही थी। चीनी सैनिक जहां था वहां से ठीक हाथ मिलाना संभव नहीं थी, इसीलिए वह दीवार के ऊपर चला आया। फिर क्या था मेघा ने उससे न केवल हाथ मिलाया, बल्कि तस्वीरें भी खिंचवाई। वह बेहद खुश था। इसी बीच उसका दूसरा साथी भी आ गया। उस चीनी को थोड़ी अंग्रेजी आती थी। उसने मेघा से पूछा कि डू यू वांट टू टेक समथिंग फ्रॉम अस। मेघा ने यस किया, तो उसने तत्काल सौ रुपए मांग लिए। मैं कुछ बोलता इससे पहले मेघा ने अपने पॉकेट से सौ रुपए निकालकर उसे दे दिए और इसके बदले उस चीनी सैनिक ने चीन के नोट मेघा को थमा दिए।
मेघा का चीनी सैनिक के साथ जीत का जश्न।

सौ रुपए के बदले एक युआन। मेघा की खुशी का ठिकाना नहीं था। पर तभी कैप्टन साहब ने मेघा को बता दिया कि उसने आपके सौ रुपए के बदले सिर्फ एक युआन दिया है। आपको करीब साठ रुपए का घाटा हो रहा है। फिर क्या था मेघा असली भारतीय महिला के रूप में आ गई। भिड़ गई उस चीनी सैनिक से। मेघा उससे और रुपए मांग रही थी और वह सैनिक आई हैव नो मोर मनी, आई हैव नो मोर मनी कहता हुआ इधर उधर झांक रहा था। मेघा भी कहां हार मानने वाली थी। उसने जब उसे डांटा तो उसने और पैसे निकाले। अबकी बार दो नोट थे। फिर भी सौ रुपए के बदले दस रुपए कम थे। मेघा ने उससे फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाकर किप द रेस्ट मनी का टोंट मारा और दोबारा तस्वीर खींचवाई। किसी भारतीय विरांगना तरह मेघा खुश नजर आ रही थी। मानो चीन को को युद्ध में हरा दिया। मेघा के ये तेवर देखकर कैप्टन साहब और उनकी टीम ने तालियों के साथ मेघा का स्वागत किया। साथ ही यह बताया कि ये चीनी सैनिक भारतीय पर्यटकों के साथ ऐसा ही करते हैं। पर पहली बार उनका सामना किसी वीर भारतीय महिला से हुआ जो अपना हक लेना जानती है। कैप्टन साहब ने मेरी और मेघा की भारतीय तिरंगे के साथ तस्वीर खींची। उन्होंने हमें चाय आॅफर की। पर हमारी टैक्सी वाली टीम नीचे जा चुकी थी, क्योंकि बर्फबारी तेज होती जा रही थी। हम बर्फबारी में फंस सकते थे।
जीत के बाद भारतीय सैनिकों ने किया मेघा का स्वागत।

मुझे भारतीय सैनिकों से बातचीत करने का काफी मन था, पर समय ने ऐसा करने नहीं दिया। हमने भारतीय सैनिकों के साथ तस्वीरें खिंचवाई और उनके इस कर्तव्यनिष्ठा, देशप्रेम और कठिन परिस्थितियों के बीच सीमा की चौकसी की ड्यूटी को सैल्यूट किया। इस बात की अफसोस रहा कि हम उस बाबा हरभजन सिंह के बंकर का दर्शन नहीं कर पाए, जिनके बारे में न जाने कितनी किंवदंतियां प्रचलित हैं। बाबा हरभजन सिंह के बारे में कभी विस्तार से लिखूंगा। आज भी भारतीय और चीनी सेना की यह मान्यता है कि बाबा हरभजन हर दिन यहां मौजूद रहते हैं। सेना में हर साल उनका प्रमोशन होता है और वे छुट्टियों में अपने घर भी जाते हैं। तेजी से बदल रहे मौसम के कारण हम उस बंकर तक नहीं पहुंच सके जहां उनका निवास है। इस उम्मीद के साथ हम वहां से रुख्सत हुए कि दोबारा यहां पहुंचेंगे और बाबा के दर्शन करेंगे और भारतीय सैनिकों के साथ कुछ घंटे बिताएंगे। आज छह साल होने जा रहे हैं दोबारा जाने का मौका नहीं मिला। पर नाथुला दर्रा पर हो रही घटनाओं ने वहां की याद ताजा कर दी।