Monday, September 11, 2017

संत और बाबा परंपरा के अंतर को समझना होगा


भारतीय इतिहास के कई स्वर्णिम युगों में सनातम धर्म की परंपराओं ने एक अलग मान और सम्मान का काम किया है। युगों-युगों से इस सनातनी परंपरा ने हमारे हिन्दु धर्म को मजबूत और सुसंस्कृत बनाने का काम किया है। जब आदि शंकराचार्य ने पूरे भारतवर्ष में अखाड़ा परंपरा की नींव डाली थी तो उस वक्त शायद किसी ने परिकल्पना भी नहीं की होगी कि इस अखाड़ा परंपरा के समकक्ष डेरा परंपरा शुरू हो जाएगी। और एक वक्त ऐसा आएगा कि इन्हीं डेरा परंपराओं के स्वयंभू बाबा सनातन धर्म के साधू-संतों और सन्यासियों को भी अपने कुकर्मों और अधर्मों से अपवित्र करना शुरू कर देंगे। मंथन का वक्त है कि हम अपने सनातन धर्मों को छोड़कर क्यों ऐसे डेरों और बाबाओं की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।
इस बीच स्वयंभू बाबाओं और सनातन धर्म की परंपराओं के बीच की लकीर को स्पष्ट करते हुए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने बड़ा कदम उठाया है। परिषद ने रविवार को धर्म नगरी इलाहाबाद में बड़ी बैठक करते हुए देश भर के 14 फर्जी बाबाओं की लिस्ट जारी की है। अखाड़ा परिषद के लिए भी इस लिस्ट को जारी करना बड़ी चुनौती होगी। पर अखाड़ा परिषद ने साधूवाद की इन्होंने देर से ही सही एक सार्थक कदम उठाया है। इलाहाबाद में अखाड़ा कार्यकारिणी की बैठक के बाद जारी इस लिस्ट में आसाराम उर्फ आशुमल शिरमानी, राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर, सचिदानंद गिरी उर्फ सचिन दत्ता, गुरमीत राम रहीम, ओम बाबा उर्फ विवेकानंद झा, निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह, इच्छाधारी भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी, स्वामी असीमानंद, ऊं नम: शिवाय बाबा, नारायण सार्इं, रामपाल, खुशी मुनि, बृहस्पति गिरि और मलकान गिरि समेत कुल 14 नाम शामिल हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के इस साहसिक फैसले ने निश्चित तौर पर भारत में धर्म के नाम पर चल रहे आडंबर, झूठ और फरेब पर एक बड़ी और उद्देश्यपूर्ण बहस को जन्म दे दिया है। लंबे समय से धर्म के इस महाजाल पर बहस होती आ रही है, लेकिन शायद यह पहली बार है कि इतना बड़ा और सार्थक फैसला लिया गया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद में देश के सभी 13 अखाड़े शामिल हैं। 
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी

लिस्ट जारी करने के बाद अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी ने कहा है कि काफी दिनों से फर्जी बाबाओं के द्वारा धर्म के नाम पर दहशत फैलाया जा रहा था। इन बाबाओं द्वारा बलात्कार, शोषण और देश की भोली भाली जनता को ठगने की खबरें आती रही हैं। कई बाबाओं के मामले में तो अदालत भी फैसला दे चुकी है। इन लोगों के कारण ही हिन्दू धर्म, संत समाज और सनातन परंपरा की बदनाम होती है। इसलिए परिषद ने ये फैसला लिया है कि वह स्वयं फर्जी बाबाओं की लिस्ट जारी कर दें, ताकि जनता उनसे सचेत रहें। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह कोई अंतिम सूची नहीं है। भविष्य में भी ऐसी सूचियां आएंगी जिससे आम जनता भी सचेत रहे।
अखाड़ा परिषद ने तो स्पष्ट तौर पर फर्जी बाबाओं के नाम उजागर कर दिए हैं। हो सकता है बहुत से लोगों को इस लिस्ट पर आपत्ति भी हो। इसकी भी आशंका है कि इन फर्जी बाबाओं के समर्थक किसी हिंसक घटना को अंजाम देने पर उतारू हो जाएं। पर मंथन करने की जरूरत है कि धर्म के नाम पर ऐसी ठेकेदारी करने वालों पर हम आंख मूंद कर कैसे विश्वास कर लेते हैं। कैसे हमारी ही बदौलत ये बाबा अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाते हैं और हमारी मासूमियत का फायदा उठाते हैं। ग्लैमरस लाइफ स्टाइल, देश विरोधी हरकतों को करते हुए कैसे ये स्वयंभू भगवान के रूप में हमारे सामने आते हैं और हम भी आंखों पर धर्म का काला चश्मा लगाए इन पर अंध भक्ति प्रदर्शित करने लगते हैं।
जगद्गुरु पंचानंद गिरी
जूना अखाड़ा के जगद्गुरु पंचानंद गिरी कहते हैं धर्म-आस्था हमारी सनातन परंपरा हैं, जिसमें हम अपने आराध्य देव की आराधना करते हैं। उन्हें पूजते हैं और उनके आशीर्वाद से हम फलीभूत होते हैं। पर सनातन धर्म में डेरा और स्वयंभू बाबा परंपराओं का कहीं भी स्थान नहीं है। इन डेरों के स्वामी खुद को भगवान मान लेते हैं और अपने भक्तों को धर्म का ऐसा चश्मा लगा देते हैं जिसमें कुछ दूसरा नजर नहीं आता है। हमें ऐसे बाबाओं और डेरों से सावधान रहने की जरूरत है। 
संपूर्णानंद ब्रहचारी 

वहीं अग्नि अखाड़ा के सचिव संपूर्णानंद ब्रहचारी कहते हैं अखाड़ा परिषद ने जो साहसिक कदम उठाया है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। हमें समझने की जरूरत है कि संत समाज का हिन्दू धर्म और संस्कृति में एक अहम स्थान है। पर हमारी परंपरा में स्वयंभू बाबाओं का कोई स्थान नहीं। लोगों को इस बात को समझने की जरूरत है कि सनातन परंपरा और डेरा परंपरा या स्वयंभू परंपरा में कितना अंतर है। एक तरफ सनातन परंपरा है जिसने हिन्दू धर्म की स्थापना से लेकर इसे सींचने और सहेजने का काम किया है। जबकि स्वयंभू परंपरा का संचालन करने वाले डेराओं के बाबाओं ने धर्म के नाम पर एक ऐसा प्रदूषण फैलाया है जो हमारे समाज को धर्म से ही दूर कर रहा है। हमें समझने की जरूरत है।
आदि शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म के उत्थान और रक्षार्थ कई बड़े कदम उठाए। ऐसे ही एक कदम था सात अखाड़ों की स्थापना। इन अखाड़ों में महानिवार्णी अखाड़ा, निरंजनी आखाड़ा, जूना अखाड़ा, अटल आखाड़ा, आवाह्न अखाड़ा, अग्नि और आनंद अखाड़ा प्रमुख है। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी सनातन धर्म पर हमले हुए हैं इन अखाड़ों के साधू संतों ने अपनी सार्थक भूमिका का निर्वहन किया है। यहां तक कि अंग्रेजों के शासन के समय भी अंग्रेज इन अखाड़ों और साधू संतों की बातों को सुनते और समझते थे। इन्हें सम्मान देते थे। पर हाल के वर्षों में जिस तरह बाबाओं ने अपनी बाबागिरी और धर्म के नाम पर लूट खसोट का मायाजाल बिछाया है वह अकल्पनिय है।
इन बाबाओं की लिस्ट जारी कर अखाड़ा परिषद ने भारतीय समाज के लिए एक मार्गदर्शक का काम किया है। हालांकि अखाड़ा परिषद को भारतीय सनातन परंपरा को पवित्र रखने के लिए ऐसे ही कई और कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सबसे जरूरी है ऐसे बाबाओं, धर्मगुरुओं, पीठाधिश्चरों, स्वयंभू संतों को चेतावनी जारी करना जिसमें स्पष्ट तौर पर इस बात जिक्र हो कि धर्म के नाम पर अगर किसी ने लोगों को गुमराह करने की कोशिश की तो उसे हरगीज स्वीकार नहीं किया जाएगा। डेरा सच्चा सौदा के सर्वेसर्वा राम रहीम के कुकर्मों का सामने आना इस बात का प्रमाण है कि कैसे ये स्वयंभू संत धर्म और आस्था के नाम पर लोगों के सेंटिमेंट से खिलवाड़ कर रहे हैं। मंथन करें और सचेत रहें।

Monday, August 14, 2017

शर्म है कि किसी को शर्म आती नहीं

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में पिछले 72 घंटे में 65 मासूमों की मौत हो जाती है। आरोपों प्रत्यारोपों का दौर चलता है। पर किसी को शर्म नहीं आ रही है। शर्म के लिए कई बातें हैं, पर इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है कि एक तरफ हम अपनी आजादी के 71वें साल में प्रवेश कर रहे हैं और दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के स्वास्थ मंत्री बेशर्मी से यह बयान दे रहे हैं कि अगस्त के महीने में बच्चे मरते ही हैं। आजादी के इस मौके पर हम उन मासूम बच्चों की याद में जश्न मनाने से परहेज करें और मंथन करें कि क्यों हम आज भी उसी दौर में जीने को विवश हैं जिस दौर में मेडिकल सुविधाओं में अभाव में हमारे पूर्वज तमाम तरह के रोगों को अपनी नियति मान कर जीते थे। जो बयान उत्तर प्रदेश के स्वास्थ मंत्री ने दिया वही बातें हमारे नाना दादा कहा करते थे। बारिश का मौसम है, जाड़े का मौसम है अब मौत आने वाली है। 
हर किसी को मौत तो आनी ही है। आएगी ही। यही एक साशस्वत है। परम सत्य है कि सभी को एक न एक दिन यहां से जाना है। जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है। पर विडंबना इस बात की है कि एक शर्म है जो किसी को नहीं आ रही है। शर्म उन्हें भी नहीं आ रही है जिन्होंने उत्तर प्रदेश में इतने दिनों तक राज किया। चाहे वह अखिलेश यादव की सरकार हो या मायावती की। उन्होंने सरकार की तरफ से प्रदेश में स्वास्थ सुविधाओं का कितना ख्याल रखा। अगर यह बात सत्य है कि आॅक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी को पिछले कई वर्षों से बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो उस वक्त सरकार किसकी थी?
शर्म तो कांग्रेस के उन महान नेताओं को भी नहीं आ रही है जो बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में पिछले कई सालों से इंसेफेलाइटिस से मौत की आगोश में समा रहे हजारों मासूमों के परिजनों के आंसू पोछने आज तक नहीं गए। वे गोरखपुर में बच्चों की मौत की खबर फैलते ही लाव लश्कर के साथ हॉस्पिटल पहुंच गए। गोरखपुर इसलिए पहुंच गए क्योंकि वह उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह जिला है। राजनीति लाभ पूरा मिलेगा, शायद यही लालच रही होगी। मुजफ्फरपुर इसलिए नहीं पहुंच पाए क्योंकि वहां मासूमों की लाशों पर राजनीति नहीं हो सकती थी।
शर्म उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को भी नहीं आ रही है। बेशर्मी की सारी हदों को पार करते हुए प्रदेश के स्वास्थ मंत्री अगस्त माह में होने वाले बच्चों की मौतों का आंकड़ा बता रहे हैं। वह यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि यह मौतें सामान्य हैं। कोई नई बात नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी अपने सिपहसलारों के भरोसे बयान देने मैदान में उतरे। पर शर्म उन्हें भी नहीं आई। जिस योगी आदित्यनाथ के डर से गोरखपुर में गलत काम करने वाले थर-थर कांपते थे। आज उसी योगी आदित्यनाथ की जुबान बंद है। वोट की राजनीति में कोई बखेड़ा न हो जाए, इसलिए वे भी नपातुला बोल गए। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए मौत किस तरह हुई इस पर फोकस बनाए रखा। उन्हें भी शर्म नहीं आई कि जिस योगी में लोग दबंग मुख्यमंत्री की छवि देखते हैं। जिस योगी पर उन्हें भरोसा है कि वो अपनी कड़क प्रशासनिक क्षमता से सबकुछ ‘टाइट’ कर देगा, आज वही योगी घुटनों पर बैठा है।
यह कैसे संभव है कि जिस मेडिकल कॉलेज को लेकर स्थानीय मीडिया लगातार आगाह करता आ रहा हो, उस मेडिकल कॉलेज की स्थिति उसी गृह जिले के मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंची हो। यह भी कैसे संभव है कि उसी मेडिकल कॉलेज में कुछ दिन पहले पहुंचे मुख्यमंत्री को आने वाले संभावित खतरों के प्रति आगाह नहीं किया गया हो। अगर सही में योगी आदित्यनाथ को किसी ने आगाह नहीं किया तो इससे बड़ी शर्म की बात नहीं हो सकती। अगर सही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बच्चों की मौत पर शर्म है तो नाप दें ऊपर से नीचे तक के तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों को जिन्होंने ऐसा होने दिया। दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा का डायलॉगमारने वाले मुख्यमंत्री को अपनी दबंगता का परिचय देने का इससे मुफीद समय नहीं हो सकता।
शर्म मीडिया को भी आनी चाहिए जो इस संवेदनशील मुद्दे में भी हिंदू और मुस्लिम एंगल खोज लेती है। चुंकि प्रदेश के मुखिया की छवि कट्टर हिंदूवादी नेता के रूप में है, इसीलिए वहां के एक मुस्लिम डॉक्टर को बिना तथ्यों के जांच पड़ताल के हीरो बना देती है। अब जब यह तथ्य सामने आ चुका है कि डॉक्टर कफील अहमद भी इस पूरे प्रकरण का एक प्रमुख दोषी है तो मीडिया के जांबाज रिपोर्टर क्या अपनी गलती पर शर्म करेंगे? यह मीडिया के लिए भी मंथन का समय है कि वह तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करे और लोगों को दिग्भ्रमित होने से बचाए। शायद इसीलिए शनिवार को गोरखपुर पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मीडिया से अपील की और कहा कि आप हवा-हवाई रिपोर्टिंग न करें।
किस-किस की शर्म की बातें करें। कल हम अपनी स्वतंत्रता के 71वें साल में प्रवेश करने जा रहे हैं। हर एक क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ने वाले हमारे देश में अगर आज भी सैकड़ों मासूस बेहतर स्वास्थ सुविधाओं के आभाव में अकाल मौत मर रहे हैं इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है। हो सकता है गोरखपुर में मरने वाले बच्चों के परिजनों को वहां की सरकार करोड़ों रुपए मुआवजे के तौर पर बांट दे। हो सकता है दिल्ली की केंद्र सरकार भी अपनी तरफ से करोड़ों रुपए का फंड राहत के तौर पर भेज दे। पर क्या हम इस बात के लिए खुद को तैयार कर सकेंगे कि स्वतंत्रता के इस जश्न के मौके पर उन मासूमों के परिजनों के खून के आंसू कैसे रोके जाएं।
हम सभी को मंथन करना है। सिर्फ फेसबुक और व्हॉट्एप पर मासूमों की याद में डीपी बदलने से किसी को शर्म नहीं आने वाली। शर्म अगर आएगी तो वह अपनी अंतरात्मा को झकझोरने से। आजादी की शाम से पहले यह खबर पूरी दुनिया में पहुंच चुकी है कि कैसे हमारे मासूम आज भी सिस्टम की फेल्योरनेस से तिल-तिल कर मरने को बेबस हैं। आजादी का यह मौका जायज न होने दें। कुछ शर्म करें। शर्म करेंगे तभी कुछ हल निकलेगा। यही उन मासूमों के प्रति श्रद्धांजलि होगी।
जय हिंद

Monday, July 24, 2017

सिर्फ गृहणी नहीं, ‘वित्त मंत्री’ हैं घरेलू महिलाएंं

भारतीय न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी बातों में एक सबसे बड़ी कमी यह है कि कई महत्वपूर्ण फैसले बिना किसी शोर शराबे के भीड़ में गुम हो जाती हैं। जबकि ऐसे फैसले नजीर के तौर पर पेश किए जाने की जरूरत होती है। चर्चा भी इसलिए जरूरी होती है क्योंकि इससे बड़े बदलाव की कहानी शुरू की जा सकती है। एक ऐसा ही फैसला कुछ दिन पहले मद्रास हाईकोर्ट ने दिया है। कोर्ट ने घरेलू महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा है कि एक घरेलू महिला को भी वेतन प्राप्ति का पूरा अधिकार है। वह घर की वित्त मंत्री होती है। उसे भी वेतन दिया जाए। इतना ही नहीं कोर्ट ने न केवल अपना फैसला सुनाया, बल्कि एक घरेलू महिला को उसके 24 घंटे के काम की पारिश्रमिक भी तय की। यह पारिश्रमिक तीन हजार रुपए तय की गई है। इस फैसले की पूरी चर्चा आज आपसे करूंगा, ताकि आप भी मंथन करें और एक घरेलू महिला के पूरे जीवन चक्र को सम्मान दें।
इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है पुड्डूचेरी शहर से। वहां 2009 में मालती नाम की महिला की मौत बिजली के खुले तार की वजह से हो जाती है। पुड्डूचेरी बिजली बोर्ड को महिला के पति को मुआवजे के तौर पर पांच लाख मुआवजा देना था। बोर्ड ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। गुहार लगाई कि चुंकि महिला एक घरेलू महिला थी, जिसके कारण उसकी कोई आय भी नहीं थे, ऐसे में मुआवजे की रकम बहुत ज्यादा है इसे कम की जाए। भारतीय न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी मामले में फैसला देने के लिए एक घरेलू महिला के कार्यों का मुल्यांकन किया जाना था।
मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति केके शशिधरन और न्यायमूर्ति एम मुरलीधरन की एक डिवीजन बेंच ने पूरे मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान तमाम तर्क पेश किए गए, लेकिन अंतिम फैसला घरेलू महिलाओं के पक्ष में आया। कोर्ट ने महिलाओं के अप्रत्यक्ष कार्यों और देखभाल का मूल्यांकन किया और उसे स्वीकृत किया। कोर्ट ने माना कि मालती एक डेडिकेटेड वाइफ थी। अपने दो बच्चों के प्रति भी वह समर्पित थी। वह घर की वित्त मंत्री थी। वह एक शेफ थी। वह घर की चार्टेड अकाउंटेंट थी। अपने घर की इनकम और खर्चे को नियंत्रित करती थी। एक पति ने अपनी घरेलू कंपनी का सबसे वफादार कर्मचारी खो दिया। दो बच्चों ने अपनी मां का प्यार खो दिया। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि वह सिर्फ एक घरेलू महिला थी। इसीलिए उस महिला को एक कामकाजी महिला के रूप में देखा जाए और उसे हर मुआवजे का अधिकार है।
मद्रास हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए न केवल मालती को न्याय दिलाया, बल्कि गृहणियों के लिए एक ऐसा आधार तैयार कर दिया है जो आने वाले समय में काफी सकारात्मक बदलाव की तरफ ले जाएगा। भारतीय पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं अपने अस्तित्व के लिए हमेशा से ही संघर्ष करती आई हैं। आज भारतीय महिलाएं अपने सर्वश्रेष्ठ समय में जी रही हैं, जहां उन्हें हर वो अधिकार प्राप्त है जिसके लिए वो लंबे वक्त से संघर्ष कर रही थीं। समाज के हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी पहचान कायम की है। बॉर्डर की रक्षा करने के साथ-साथ वो हवाई जहाज उड़ा रही हैं।
मल्टीनेशनल कंपनियों के सर्वोच्य पदों पर बैठकर भी उन्होंने अपनी प्रतिभाएं दिखाई हैं। पर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आज इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए बहसें हो रही हैं। बड़े-बड़े सेमिनार आयोजित किए जा रहे हैं। जब भी महिला सशक्तिकरण की बातें होती हैं तो यह जरूर महसूस होता है कि क्या सच में आज भी सशक्तिकरण पर चर्चा जरूरी है। महिला सशक्तिकरण पर काम करने वाली एक एक एनजीओ ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें इस बात का जिक्र किया गया कि आज की आधुनिक महिलाएं महिला सशक्तिकरण पर चर्चा को बेकार मानती हैं। उनका मानना है कि उन्हें सभी अधिकार मिले हैं। वे इस दम पर आगे बढ़ रही हैं। बेहतर मुकाम हासिल कर रही हैं। हां यह जरूर है कि भारतीय घरेलू महिलाओं की स्थिति आज भी चिंतनीय जरूर है।
भारतीय घरेलू महिलाएं आज भी खुद को उपेक्षित महसूस करती हैं। समाज की मुख्यधारा से वे खुद को अलग समझती हैं। कई मौकों पर ऐसा देखने को मिला है कि घरेलू महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पर मद्रास हाईकोर्ट ने देर से ही सही एक ऐसी सार्थक बहस को जन्म दिया है जिसमें घरेलू महिलाओं को भी उनके कार्यों की बदौलत एक बेहतर स्थिति में देखने का मौका मिला है। एक घरेलू महिला के दिन की शुरुआत सुबह पांच बजे से शुरू होकर देर रात तक रहता है। उन्हें कोई वीकली आॅफ नहीं मिलता। हर दिन उनकी ड्यूटी होती है। पूरे देश में छुट्टी हो पर एक घरेलू महिला अपने परिवार, बच्चों के लिए ड्यूटी पर रहती है। ऐसे अनगिनत काम हैं जिनका कभी मूल्यांकन नहीं किया गया। 

मद्रास हाईकोर्ट ने घरेलू महिलाओं के अनगिनत काम को भी ‘काम’ यानी रोजगार की श्रेणी में माना है। यह घरेलू महिलाओं के लिए प्रति एक बेहतर दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है। कोर्ट ने मंथन करने के लिए हमें प्रेरित किया है कि हम अपनी घरेलू मां, पत्नी, बहन के कार्यों का सम्मान करें। फिलहाल कोर्ट ने एक घरेलू महिला के कार्यों का मुल्यांकन करते हुए मालती के केस में उसका वेतन तीन हजार रुपए मासिक तय किया। भले ही यह रकम काफी कम है, पर कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए बहुत कुछ कह दिया है। कोर्ट ने एक घरेलू महिला के अवैतनिक और गैर मान्यताप्राप्त कार्य को श्रम की श्रेणी में ला दिया है। एक घरेलू महिला को भी कामकाजी महिला की तरह सम्मान दिलाने का प्रयास किया है।

Thursday, July 13, 2017

हट बुड़बक ! हमको समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है

एक साधारण छात्र नेता से सफर शुरू कर कोई राजनीति के इतने ऊपरी पायदान तक कैसे पहुंच सकता है यह कोई लालू यादव से सीख सकता है। छल कपट की राजनीति से ऊपर उठकर लालू यादव ने राजनीति की नई विधा का सृजन किया। यह विधा थी घोटाला करो, बदनाम हो जाओ और फिर राजनीति के शिखर पर पहुंच जाओ। बाद में मायावती, जयललिता जैसे कई नेताओं ने लालू से सीख लेते हुए खुद को स्थापित किया। लालू ने न केवल इस विधा का सृजन किया, बल्कि इसमें इतने सारे प्रयोग कर डाले की भारतीय जांच एजेंसियां लंबे समय तक सिर्फ और सिर्फ लालू यादव पर रिसर्च करें तो इसे उनके पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। फिलहाल जांच एजेंसियों ने काफी मशक्कत के बाद लालू यादव और उनके कुनबे के काले कारनामों की परत दर परत उखाड़ते हुए पूरी दुनिया को बता दिया है कि लालू यादव को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। हां यह मंथन का भी समय है कि लालू यादव जैसे राजनीतिज्ञ कैसे पाप पर पाप करते हुए घोटाले पर घोटाले करते हुए और भी मजबूत होते गए।
यह भारतीय राजनीति के इतिहास के उन काले अध्यायों का काल है जो आने वाले समय में राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों के लिए पाठ्य पुस्तक में शामिल हो सकता है। लालू यादव की पूरी जीवनी ही एक रिसर्च सब्जेक्ट बन सकती है कि कैसे एक कॉलेज का साधारण सा छात्र नेता अरबों खरबों का घोटाला करते हुए भी अपनी पहचान बनाए रखने में कामयाब रहता है। बिहार में लंबे समय तक राज करते हुए लालू यादव जब चारा घोटाले के मुख्य आरोपी बने तो राजनीतिक विरोधियों ने इसे लालू यादव युग का अंत बताया। पर सभी राजनीतिज्ञ पंडितों को पछाड़ते हुए लालू यादव और भी मजबूती के साथ राजनीति में आए। बिहार में जहां एक तरफ अपनी पत्नी को प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करवाया, वहीं आगे बढ़ते हुए केंद्र की राजनीति में आ गए। यह लालू यादव का राजनीतिक रसूख ही था कि तमाम घोटालों में मुख्य आरोपी होने के बावजूद केंद्र में रेल मंत्री जैसा अहम पद पाया। रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने जो कुछ भी किया उसे कई विदेशी यूनिवर्सिटी ने भी सराहा। यहां तक कहा गया कि विदेशी यूनिवर्सिटी के छात्र लालू यादव का मैनेजमेंट फंडा समझने के लिए लगातार भारत आ रहे हैं।
रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने रातों रात रेलवे का कायापलट कर दिया। जबर्दस्त घाटे में चल रहा रेल मंत्रालय केंद्र सरकार का सबसे कमाऊ पूत बन गया। यह सच में आश्चर्यजनक बदलाव था जिसे पूरी दुनिया देख रही थी। पूरा देश लालू पर गर्व करने लगा था कि एक हंसी ठिठोली करने वाला राजनेता इतना बड़ा मैनेजमेंट गुरु भी बन सकता है। रेलवे स्टेशन पर लिट्टी चोखा और कुल्हड़ वाली चाय का कांसेप्ट लाकर लालू चंद महीनों में सभी के दिलों पर राज करने लगे। उनके मैनेजमेंट गुरु वाले रूप ने उनके घोटाले वाले चरित्र को पूरी तरह ढंक दिया था। पर आज जब उनके सीबीआई, ईडी और तमाम जांच एजेंसियां लालू यादव और उनके कुनबे की प्रॉपर्टी को खंगाल रही है तो समझ में आ रहा है कि लालू न केवल असाधारण व्यक्तित्व के धनी हैं बल्कि उनके मैनेजमेंट को समझना इतना भी आसान नहीं। लालू के रेलमंत्रित्व काल के काले कारनामों का चिठ्ठा ज्यों ज्यों खुल रहा है लालू यादव और उनके कुनबे की परेशानियां भी बढ़ रही हैं।
लालू उन नेताओं में शामिल रहे हैं जो जितनी मुश्किलों में रहा है दोगुनी ताकत से वापसी करता है। सुप्रीम कोर्ट ने जब लालू यादव के राजनीतिक करियर पर 11 साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया था तो कहा जाने लगा था कि लालू यादव तो गया। उन हालातों में लालू यादव के कई करीबी साथियों ने भी उनका और राष्टÑीय जनता दल (राजद) का दामन छोड़ दिया। बिहार में बदली राजनीतिक परिस्थितियों के बीच जब विधानसभा चुनाव में विकास पुरुष नीतीश कुमार को राजद के साथ गठबंधन करना पड़ा तो राजनीतिक पंडित भी चौंक गए। पर लालू यादव को पता था कि उन्हें क्या करना है। अपने दोनों बेटों को राजनीति में उतार कर लालू यादव ने वह मास्टर स्ट्रोक खेला जिससे राजनीति के पिच पर जमे जमाए खिलाड़ी धूल चाटने लगे। बिहार विधानसभा चुनाव में बंपर सीट हासिल कर लालू यादव ने जता दिया कि भले ही वह राजनीति का वनवास झेल रहे हैं पर बिहार में उनका ही राज है। लालू ने एक बार फिर जता दिया कि लालू सिर्फ नाम ही काफी है।
अब राजनीति ने एक बार फिर करवट ली है। लालू और उनका पूरा कुनबा एक ऐसे रडार पर है जहां हर तरफ मुश्किलें ही मुश्किलें हैं। लालू एंड कंपनी के तमाम ठिकानों पर सीबीआई और ईडी की दबिश चल रही है। लालू के बेटे और बिहार के उप मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। बेटी और दामाद पर भी शिकंजा कसा जा चुका है। बिहार के कई घोटालों में लालू यादव और उनके दोनों बेटों का नाम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सामने आ चुका है। ऐसे में बिहार की राजनीति फिर से लालू और उनके आसपास झूल रही है।
नीतीश कुमार दूर बैठकर तमाशा देख रहे हैं और भविष्य की रणनीति पर मंथन कर रहे हैं। बीजेपी लालू यादव एंड कंपनी पर शब्द वाण से वार करते हुए राजनीति पर गिद्द दृष्टि टिकाए बैठी है।   कांग्रेस लालू यादव को प्रत्यक्ष रूप से सांत्वना दे रही है। ऐसे में राजनीतिक पंडितों को भी मंथन जरूर करना चाहिए। लालू एंड कंपनी क्या इन झंझावतों से खुद को बच पाएगी? क्या बिहार में नीतीश कुमार राजद के साथ अब लंबे समय तक बने रहेंगे? क्या फिर से बिहार में नीतीश और बीजेपी साथ आ रहे हैं? ये कुछ ऐसे ज्वलंत प्रश्न हैं जो वक्त का इंतजार कर रहे हैं। इन सवालों का जवाब तो वक्त आने पर ही मिलेगा। पर इतना जरूर है कि इतिहास गवाह है कि जब-जब लालू यादव पर इस तरह के हमले हुए हैं वो और मजबूती के साथ सत्ता के केंद्र में आते रहे हैं। टीवी चैनलों पर दिख रहे लालू यादव के तेवर यह बताने के लिए काफी हैं कि उन्हें अब किसी का डर नहीं। तमाम घोटालों में हजारों सबूत होने के बावजूद जब भारत की न्याय व्यवस्था उन्हें अधिक दिनों तक सलाखों के पीछे नहीं रख सकी तो ये आरोप उनके सामने क्या हैं। हां इतना जरूर है कि लालू के दो युवा पुत्रों की राजनीति जो अभी ठीक से शुरू भी न हो सकी थी वो मंझधार में जरूर है।

Thursday, June 29, 2017

एक शाम नाथुला दर्रा के नाम ... जब मेघा जी की चीनियों से हुई झड़प

चीनी सैनिक के साथ मेघा।
इन दिनों चीन से भारत के संबंध कुछ बेहतर नहीं चल रहे हैं। चीन और भारत दोनों की सामरीक दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण नाथुला दर्रा (पास) भी चर्चा में है। कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों को भी यहीं रोक दिया गया है। अगर आप कभी बाघा बॉर्डर जाएंगे तो आपके चंद कदम की दूरी पर पाकिस्तानी फौज नजर आ जाएगी। ठीक इसी तरह जब आप नाथुला दर्रा से ऊपर भारत की सबसे अंतिम सैन्य पोस्ट पर जाएंगे तो आप चीनी सैनिकों के बेहद करीब होंगे। इतने करीब की आप उनसे हाथ तक मिला सकते हैं। गले मिलकर फोटो भी खींचवा सकते हैं। पर इसी मेल मिलाप के दौरान मेरे साथ गर्इं मेरी वाइफ मेघा की चीनियों के साथ झड़प हो गई। भारतीय सैनिकों ने भी साथ दिया। जीत की मुस्कान के साथ मेघा ने जश्न मनाया। आज उस कहानी को कलमबद्ध कर रहा हूं, इसलिए कि यह बता सकूं कि चीनियों की फितरत क्या है?
बात मार्च 2011 की है। मैं और मेघा (मेरी वाइफ) सिक्किम की राजधानी गंगटोक घूमने गए थे। मैंने मेघा को नहीं बताया था कि हम वहां से काफी ऊंचाई पर स्थित नाथुला पास भी जाएंगे। जानता था पहले बता दिया तो प्रोग्राम में फेरबदल भी करवाया जा सकता है। खैर गंगटोक की सुनहरी वादियों का दो दिनों तक लुत्फ उठाकर मैंने अचानक तीसरे दिन मेघा को सुबह सुबह बताया कि आज हम नाथुला पास जाने वाले हैं। चीन के बॉर्डर पर। मेघा ने नाथुला पास के बारे में बहुत कुछ पढ़ रखा था, इसीलिए ठंड में भी उसका पारा हाई हो गया। जब मैंने बताया कि मैंने गंगटोक आते ही वहां जाने के लिए अप्लाई कर दिया है, आौर कल शाम कंफर्मेशन भी आ गई है। हमें 11 बजे वाली टैक्सी से जाना है। बुझे मन से मेघा तैयार हुई।

नाथुला पास पर चीनी सैन्य पोस्ट के ठीक सामनेपोज देती मेघा।

आप लोगों के लिए बता दूं कि नाथुला पास जाने के लिए आपको भारत सरकार से अनुमति लेनी होती है। गंगटोक में ही टूरिस्ट डिपार्टमेंट के पास आपको अपनी दो-दो रंगीन फोटो, फोटो युक्त आईडी जमा करानी होती है। अपना फोन नंबर और होटल या जहां आप ठहरे हैं वहां का पता देना पड़ता है। 24 घंटे बाद कंफर्मेशन आता है। जरूरी नहीं कि आपको वहां जाने की अनुमति मिल ही जाए। विदेशियों का वहां जाना प्रतिबंधित है। नाथुला पास को सिल्क रूट के नाम से भी जाना जाता है। इसी रास्ते से चीनी यात्री ह्यूनसांग, फाहियान और मार्कोपोलो जैसे प्रतिभाशाली लोगों ने भारत में प्रवेश किया था। इन्होंने भारतीय विविधता की खोज की और भारत और चीन के बीच दोस्ती की नींव डाली। इस नींव में सबसे बड़ी दरार भारत-चीन के 1962 की लड़ाई के बाद पड़ी। लड़ाई के बाद इस अति महत्वपूर्ण रुट को पूरी तरह बंद कर दिया गया था। दोनों देशों की फौजें हमेशा अपनी भृगुटी ताने आमने सामने की पोस्ट पर मौजूद रहती। वर्ष 2006 में तमाम प्रयासों के बाद यह रूट दोबारा शुरू हुआ। इस रूट के खुलने के बाद भारत के साथ-साथ चीन का व्यापारिक वर्ग भी बेहद खुश हुआ। इस खुशी का परिणाम हम आज भारत के गली मोहल्लों की दुकानों में भी देख रहे हैं। हर जगह चीन के दो नंबर के प्रोडक्ट मौजूद हैं।
नाथुला पास के रास्ते में एक पड़ाव।

खैर हम खुशनसीब थे कि हमें नाथुला पास जाने का मौका मिल गया था। नाथुला पास सिक्कम की राजधानी गंगटोक से मात्र 58 किलोमीटर की दूरी पर है। नाथुला दरअसल हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा है जो भारत के सिक्किम और तिब्बत की चुम्बी घाटी को जोड़ता है। नाथुला दो तिब्बती शब्द नाथु (Listenings Ears) और ला (Pass)
से मिलकर बना है। हमने पता कर लिया था कि वहां काफी अधिक ठंड होगी, इसलिए हम पूरी तैयारी के साथ तय समय पर टूरिस्ट इंफॉर्मेशन सेंटर पहुंच गए। ठीक 11 बजे टैक्सी भी आ गई। सबकी सीट अलॉटेड थी, क्योंकि टैक्सी का भाड़ा पहले ही ले लिया गया था। अगर आप शेयर्ड टैक्सी से नहीं जाना चाहते तो आपको करीब 8 से दस हजार रुपए खर्च करने होंगे,  इसमें यात्रा परमिट शामिल नहीं होगी। हमने शेयर्ड टैक्सी का आॅप्शन लिया था, क्योंकि हम दो ही लोग थे और उस जगह से अनजान थे। किसी अनजान जगह जाने के लिए शेयर्ड टैक्सी का आॅप्शन बेस्ट होता है क्योंकि आपके साथ अधिक लोग होते हैं, और यह इकोनॉमिकल भी होता है। शेयर्ड टैक्सी का भाड़ा 8 सौ रुपए प्रति व्यक्ति था, जिसमें यात्रा परमिट भी शामिल था।
नाथुला पास की यात्रा शुरू होने के करीब दस मिनट बाद ही हमें इस बात का अहसास हो गया था कि यह कोई आम यात्रा नहीं है। शहर से ऊपर निकलते ही बेहद संकरी सड़कों ने हमारा स्वागत किया। सांस थाम देने वाली इन सड़कों पर हमारी टैक्सी यूं सरपट भाग रही थी जैसे हम फार्मूला वन की ट्रैक पर चल रहे हों। हिंदी गाना सुनते हुए सिक्कम का वह टैक्सी ड्राइवर इतने इत्मीनान से गाड़ी चला रहा था कि हम हैरान थे। करीब 58 किलोमीटर की यात्रा हमें चार घंटे में पूरी करनी थी। दिल की धड़कनों को काबू करते हुए हमारा पहला पड़ाव आया छांगू लेक। खतरनाक रास्तों को देखते हुए यहां पहुंचना किसी एडवेंचर से कम नहीं। एकबारगी मुझे भी यही लगा था कि कहीं यहां का प्रोग्राम बनाकर मैंने कुछ गलत तो नहीं कर लिया। छांगु लेक समुद्र से 12300 फीट ऊपर है। यहां करीब आधे घंटे का ठहराव था। सैलानियों की यहां अच्छी खासी भीड़ थी। यॉक के ऊपर बैठकर तस्वीर खिंचवाने की चाहत ने हमें यहां रोक दिया था। मैगी यहां की खास डिश है। इसे कई तरह से बनाया जाता है। समुद्र तल से हजारों मीटर ऊपर गरमा गरम मैगी खाने का स्वाद ही अलग था। मैगी खाने के बाद हमारी यात्रा दोबारा शुरू हुई। 25 किलोमीटर का सफर फिर शुरू हुआ।

नाथुला पास के रास्ते में एक पड़ाव।
अब हर तरफ फौज की उपस्थिति नजर आने लगी थी। फौजी गाड़ियां और बर्फ से आच्छादित पड़ाड़ियों के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था। बिना बैरिकेट के मौजूद सड़क से नीचे देखने की हिम्मत नहीं थी, इसीलिए मैंने अपनी जगह बदल ली थी। नाथुला पास पहुंचने के पांच किलोमीटर हमारी गाड़ी रोक दी गई। भारतीय फौज के जवानों ने बताया कि मौसम की चेतावनी जारी की गई है। भारी बर्फबारी की संभावना है। आपको यहीं से लौटना होगा। हम बेहद निराश हो गए। पर मेघा और उसकी एक दोस्त (यह दोस्त टैक्सी में बनी थी)। नाम मुझे ठीक से याद नहीं, हां यह याद है कानपुर की कोई मुस्लिम फैमिली थी। मैं और मेरे सहयोगी जब फौजियों को राजी नहीं कर सके, तब इन दोनों सखियों ने मोरचा लिया। दोनों ने उसे पोस्ट के सबसे सीनियर अधिकारी को करीबन हड़काने के अंदाज में बोलना शुरू कर दिया। हम इतनी दूर से आए हैं। जब खतरनाक रास्ते हमारा हौसला नहीं बिगाड़ सके तो आप हमें ऊपर जाने से कैसे रोक सकते हैं। मेघा ने कहा कि हम झेल लेंगे बर्फबारी, आप हमें जाने दें। हम ज्यादा देर ऊपर नहीं रुकेंगे, जाएंगे और चले आएंगे। महिलाओं से बहस में कोई जीत नहीं सकता। भारतीय सैनिक भी नहीं। हमें ऊपर जाने की अनुमति मिल गई। सिर्फ एक घंटे के लिए।
चीन से बिल्कुल आमनेसामने की पोस्ट पर मैं और मेघा।

नाथुला पहुंचना मेरे सपने के पूरा होने जैसे ही था। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ। सर्द हवाओं ने हमें घेर रखा था। ऐसा लग रहा था मानों शरीर में कुछ बचा ही नहीं है। तमाम गर्म कपड़ों के बावजूद हम कांप रहे थे। सीढ़ियों से चढ़कर हमें ऊपरी पोस्ट तक जाना था। करीब चालीस पचास सीढ़ी चढ़कर आखिर हम वहां पहुंच चुके थे जहां तक पहुंचने के लिए इतने पापड़ बेले थे। 14200 फीट की ऊंचाई पर भारतीय सैन्य पोस्ट और चीनी सैन्य पोस्ट के बीच सिर्फ आधी फीट ऊंची दीवार थी। दीवार के ऊपर नाम मात्र के कंटीली तार लगे थे। सामने चीनी सैनिक बिना किसी हथियार के इधर-उधर टहल रहे थे। हल्की बर्फबारी भी शुरू हो चुकी थी। भारतीय सैनिक वहां हम जैसे मौजूद कुछ पर्यटकों को कंटीली तार से दूर रहने की सलाह देते हुए पोस्ट के बारे बता रहे थे। कैप्टन रैंक के अधिकारी को मेघा ने घेर रखा था और पूरे नाथुला का इतिहास और भूगोल की जानकारी ले रही थी। तभी एक चीनी सैनिक कंटीले तार के पास आ गया। मेघा ने तत्काल उसे भी घेर लिया। न उस चीनी सैनिक को अंग्रेजी आ रही थी और न मेघा को चीनी भाषा समझ में आ रही थी। पर उस सैनिक ने इतना जरूर समझ लिया कि यह भारतीय महिला उससे हाथ मिलाना चाह रही थी। चीनी सैनिक जहां था वहां से ठीक हाथ मिलाना संभव नहीं थी, इसीलिए वह दीवार के ऊपर चला आया। फिर क्या था मेघा ने उससे न केवल हाथ मिलाया, बल्कि तस्वीरें भी खिंचवाई। वह बेहद खुश था। इसी बीच उसका दूसरा साथी भी आ गया। उस चीनी को थोड़ी अंग्रेजी आती थी। उसने मेघा से पूछा कि डू यू वांट टू टेक समथिंग फ्रॉम अस। मेघा ने यस किया, तो उसने तत्काल सौ रुपए मांग लिए। मैं कुछ बोलता इससे पहले मेघा ने अपने पॉकेट से सौ रुपए निकालकर उसे दे दिए और इसके बदले उस चीनी सैनिक ने चीन के नोट मेघा को थमा दिए।
मेघा का चीनी सैनिक के साथ जीत का जश्न।

सौ रुपए के बदले एक युआन। मेघा की खुशी का ठिकाना नहीं था। पर तभी कैप्टन साहब ने मेघा को बता दिया कि उसने आपके सौ रुपए के बदले सिर्फ एक युआन दिया है। आपको करीब साठ रुपए का घाटा हो रहा है। फिर क्या था मेघा असली भारतीय महिला के रूप में आ गई। भिड़ गई उस चीनी सैनिक से। मेघा उससे और रुपए मांग रही थी और वह सैनिक आई हैव नो मोर मनी, आई हैव नो मोर मनी कहता हुआ इधर उधर झांक रहा था। मेघा भी कहां हार मानने वाली थी। उसने जब उसे डांटा तो उसने और पैसे निकाले। अबकी बार दो नोट थे। फिर भी सौ रुपए के बदले दस रुपए कम थे। मेघा ने उससे फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाकर किप द रेस्ट मनी का टोंट मारा और दोबारा तस्वीर खींचवाई। किसी भारतीय विरांगना तरह मेघा खुश नजर आ रही थी। मानो चीन को को युद्ध में हरा दिया। मेघा के ये तेवर देखकर कैप्टन साहब और उनकी टीम ने तालियों के साथ मेघा का स्वागत किया। साथ ही यह बताया कि ये चीनी सैनिक भारतीय पर्यटकों के साथ ऐसा ही करते हैं। पर पहली बार उनका सामना किसी वीर भारतीय महिला से हुआ जो अपना हक लेना जानती है। कैप्टन साहब ने मेरी और मेघा की भारतीय तिरंगे के साथ तस्वीर खींची। उन्होंने हमें चाय आॅफर की। पर हमारी टैक्सी वाली टीम नीचे जा चुकी थी, क्योंकि बर्फबारी तेज होती जा रही थी। हम बर्फबारी में फंस सकते थे।
जीत के बाद भारतीय सैनिकों ने किया मेघा का स्वागत।

मुझे भारतीय सैनिकों से बातचीत करने का काफी मन था, पर समय ने ऐसा करने नहीं दिया। हमने भारतीय सैनिकों के साथ तस्वीरें खिंचवाई और उनके इस कर्तव्यनिष्ठा, देशप्रेम और कठिन परिस्थितियों के बीच सीमा की चौकसी की ड्यूटी को सैल्यूट किया। इस बात की अफसोस रहा कि हम उस बाबा हरभजन सिंह के बंकर का दर्शन नहीं कर पाए, जिनके बारे में न जाने कितनी किंवदंतियां प्रचलित हैं। बाबा हरभजन सिंह के बारे में कभी विस्तार से लिखूंगा। आज भी भारतीय और चीनी सेना की यह मान्यता है कि बाबा हरभजन हर दिन यहां मौजूद रहते हैं। सेना में हर साल उनका प्रमोशन होता है और वे छुट्टियों में अपने घर भी जाते हैं। तेजी से बदल रहे मौसम के कारण हम उस बंकर तक नहीं पहुंच सके जहां उनका निवास है। इस उम्मीद के साथ हम वहां से रुख्सत हुए कि दोबारा यहां पहुंचेंगे और बाबा के दर्शन करेंगे और भारतीय सैनिकों के साथ कुछ घंटे बिताएंगे। आज छह साल होने जा रहे हैं दोबारा जाने का मौका नहीं मिला। पर नाथुला दर्रा पर हो रही घटनाओं ने वहां की याद ताजा कर दी।  


Monday, June 26, 2017

हे पार्थ! जात न पूछो महामहीम की

महाभारत के युद्ध का एक प्रसंग है। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर वीर अर्जुन मैदान में पहुंचते हैं, हर तरफ अपनों को देखकर उनका मन विचलित हो जाता है। वह अपना धनुष और वाण नीचे रख देते हैं। अर्जुन को इस तरह परेशान देख उनके सारथी कृष्ण पूछते हैं क्या हुआ पार्थ? सामने दुश्मनों को देखकर तुम्हें क्या हो गया? अर्जुन कुछ नहीं बोलते। कातर दृष्टि से अपने सारथी को देखते हैं। आंखों ही आंखों में बहुत कुछ पूछ लेते हैं। फिर भी कृष्ण इंतजार करते हैं अर्जुन के बोलने का। कुछ देर बाद अर्जुन बोलते हैं कैसे मैं अपनों पर ही वाणों की वर्षा करूंगा? कैसे मैं इन्हें मृत होते देख सकता हूं? कृष्ण मुस्कुराते हैं और कहते हैं युद्ध के मैदान में अगर तुम यह देखोगे कि सामने वाला कौन है, उसकी पहचान क्या है, उसकी जाति क्या है, हमारे खून से उसका रिश्ता क्या है, फिर युद्ध कभी नहीं जीत सकते। इसी प्रसंग के साथ कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। जिसे हम हमेशा पढ़ते और पढ़ाते रहते हैं। अब जरा मंथन करिए भारतीय संविधान के सर्वोच्च पद पर हो रहे चुनाव पर।
राष्ट्रपति चुनाव के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अपने-अपने मोहरे मैदान में उतार दिए हैं। युद्ध के मैदान की तरह दोनों तरफ से शब्दवाणों से हमले हो रहे हैं। कोई पीछे नहीं हट रहा है। सब अपने ही हैं। सब दलित ही हैं। सब भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का भोग कर रहे हैं। महाभारत के युद्ध की तरह ही यहां पर भी सबकुछ स्क्रिपटेड है। महाभारत के युद्ध में एक ही परिवार के लोग एक दूसरे पर वाणों से हमला कर रहे थे। राष्ट्रपति चुनाव में दलित नाम के तीर से संविधान के सभी नागरिक एक दूसरे पर शब्दवाणों से घायल कर रहे हैं। भारतीय संविधान लहूलुहान हो रहा है। पर किसी को चिंता नहीं। कुरुक्षेत्र की धरती खून से लाल हो रही थी, यहां संविधान की मान्यताओं को छलनी किया जा रहा है।
यह कैसी विडंबना है कि भारतीय गणतंत्र के सबसे सर्वोच्च पद का चुनाव जातिगत आधार पर हो रहा है। राष्ट्रपति प्रत्याशी की सभी काबिलियत गौण है। उसकी शिक्षा-दिक्षा। उसकी परवरिश, मानवीय पहलू, संवेदनात्मक रवैया सबकुछ रद्दी की टोकरी में है। प्रत्याशी की सबसे बड़ी योग्यता है कि वह दलित हैं। दलित समुदाय से आते हैं। चलो यह भी मान लिया जाए कि दलित होना सबसे बड़ी योग्यता है। पर क्या कोई दोनों पक्षों से यह पूछ सकता है कि हुजूर यह भी लगे हाथ बता दें कि दोनों प्रत्याशियों ने दलितों के उत्थान के लिए आज तक क्या-क्या किया है? कितने दलितों का कल्याण किया है? दलितों के लिए बनने वाली पॉलिसी और उसके इंप्लीमेंट में दोनों प्रत्याशियों का क्या-क्या योगदान रहा है? फिर किस तरह भारत के नागरिक इस बात को स्वीकार कर लेंगे कि एक दलित को राष्ट्रपति बना देने से भारतीय संविधान अपने सर्वोत्तम काल में चला जाएगा। भारत के दलितों का उत्पीड़न कम हो जाएगा। मंथन करिए क्या ऐसे ही भारतीय संविधान का सर्वश्रेष्ठ काल बनेगा, जब सभी बड़े दल यह कहते फिर रहे हैं कि मेरा दलित राष्ट्रपति प्रत्याशी तुम्हारे दलित प्रत्याशी से ज्यादा दलित है।

भारत के पहले राष्ट्रपति कौन थे, इसका जवाब तुरंत आपको मिल जाएगा। लोग आसानी से बोल देंगे भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे। पर उनकी जात क्या थी यह कम लोग ही बता पाएंगे। गुगल बाबा भी उनकी जात बताने में हिचकिचाएंगे। आज की नौजवान पीढ़ी तो यह भी नहीं जानती होगी कि बिहार के जिस छोटे से गांव में रहकर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी कि वहां क्या दलित और क्या सवर्ण सभी की स्थिति एक जैसी ही थी। भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जाति भी बहुत खोजबीन करने के बाद आपको पता चलेगी। पर उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में जो काम किया वह सभी को पता है।
भारत के राष्ट्रपति का पद अपने आप में एक विराट गरिमा समेटे हुए है। पर विडंबना देखिए दोनों ही प्रत्याशी जो बेहद ही शालीन, उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, उन्हें किस कदर जातिगत राजनीति में धकेल दिया गया है। सोशल मीडिया में हर तरफ दोनों प्रत्याशियों को लेकर तमाम आपत्तीजनक पोस्ट पढ़ने को मिल रहे हैं। आज तक के भारतीय इतिहास में ऐसी परिस्थति कभी सामने नहीं आई कि राष्ट्रपति का चुनाव इस तरह जातिगत हो जाएगा। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सभी छोटे बड़े दलों ने आम चुनावों में भले ही दलित वोट की राजनीति को सर्वोपरि रखा, लेकिन राष्ट्रपति जैसे गरिमामयी चुनाव से इस दलित राजनीति को अलग रखा। अब सबकुछ खुला खेल है। क्या विधायक का चुनाव और क्या राष्टÑपति का। युद्ध के मैदान और सत्ता की राजनीति में सबकुछ जायज है।
पुनश्च, कृष्ण ने अर्जुन से कहा पार्थ तुम यह मत देखो सामने कौन है, सिर्फ यह समझो वो दुश्मन हैं और तुम्हें उनका संहार करना है। इसके लिए तुम्हें जो तीर चलाना है चलाओ। जिस गति से उनपर वार करना है करो। यही धर्म कहता है। युद्धनीति यही है। महाकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी कालजयी रचना जयद्रथ वध के प्रसंग में लिखते हैं... 
अधिकार खो कर बैठे रहना, यह महा दुष्कर्म है,
न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है।
इस तत्व पर ही कौरवों से पाण्डवों का रण हुआ,
जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ।।
सब लोग हिलमिल कर चलो, पारस्परिक ईर्ष्या तजो,
भारत न दुर्दिन देखता, मचता महाभारत न जो।।
हो स्वप्नतुल्य सदैव को सब शौर्य सहसा खो गया,
हा ! हा ! इसी समराग्नि में सर्वस्व स्वाहा हो गया।
दुर्वृत्त दुर्योधन न जो शठता-सहित हठ ठानता,
जो प्रेम-पूर्वक पाण्डवों की मान्यता को मानता,
तो डूबता भारत न यों रण-रक्त-पारावार में,
ले डूबता है एक पापी नाव को मझधार में।
हा ! बन्धुओं के ही करों से बन्धु-गण मारे गये !
हा ! तात से सुत, शिष्य से गुरु स-हठ संहारे गये। 
 
मंथन करने का वक्त है। हम किसके लिए राष्ट्रपति का चुनाव कर रहे हैं। अपने स्वार्थ के लिए। दलितों के उत्थान के लिए। भारतवर्ष के गौरवमयी इतिहास को बचाने के लिए। या फिर महाभारत के युद्ध की तरह अपने ही बंधु बांधव को एक दूसरे से लड़वाने के लिए। कांग्रेस इस तरह की राजनीति के लिए कुख्यात रही है, जिसका परिणाम वह इस वक्त भुगत रही है। लंबे समय बाद जब भारत की जनता ने बीजेपी को सत्ता की कमान सौंपी है तो उससे भी इसी तरह की राजनीति की उम्मीद लोगों को नहीं है। भारत के युवा नई सोच के साथ राजनीति को देख रहे हैं। ऐसे में तमाम दलों को मंथन के साथ-साथ संभलने की भी जरूरत है। नहीं तो तेरा दलित मेरे से ज्यादा दलित है का रट लगाए हम अपने ही अपनों को मारते रह जाएंगे।

Saturday, June 24, 2017

हां, हम सब ‘ट्यूबलाइट’ ही तो हैं


सलमान खान और कबीर खान की जोड़ी को एक बार फिर बधाई, एक बेहतरीन सब्जेक्ट पर बेहद सार्थक फिल्म बनाने के लिए। नाम को सार्थक करते हुए इस फिल्म ने जितना भी कहा है बेहतर कहा है। ‘यकीन’ मानिए एक ट्यूबलाइट के जरिए कबीर खान और सलमान खान ने हमें अपने दिमाग की बत्ती जलाने के लिए विवश कर दिया है। संदर्भ भले ही भारत चीन की सन 62 की लड़ाई का लिया है, लेकिन जो वो कहना चाहते हैं बड़ी ही साफगोई के साथ कह दिया है। ट्यूबलाइट को दो सब्जेक्ट या संदर्भ में देखें।
पहला ::
दिल्ली में नार्थ-ईस्ट के लोगों को जब चिंकी कहकर बुलाया जाता है तो क्या आप सोंच सकते हैं उन्हें कैसा महसूस होता होगा। फिल्म में भी जब एक चीनी महिला अपने बच्चे को बचाने के लिए जब यह कहती है कि भारत से हमें भी उतना ही प्रेम है जितना तुम्हें, लेकिन हमें सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। उसी महिला का बेटा जिसे लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘गू’ कहकर बुलाता है लक्ष्मण से ऊंची आवाज में भारत माता की जय कहता तो यकीन मानिए आज के सारे संदर्भों की परतें अपने आप ही खुल जाती है। क्या बेहतरीन अंदाज में कबीर खान ने एक छोटे से बच्चे से भारत माता की जय कहवाकर वो सबकुछ कह दिया जो वह कहना चाह रहे थे।
हम सच में आज ट््यूबलाइट ही हो चुके हैं। कश्मीर में मस्जीद के सामने डीएसपी को मार दे रहे हैं, दिल्ली से सटे बल्लभगढ़ में एक युवा की हत्या कर दे रहे हैं। दिल्ली में चिंकी कहकर नॉर्थ इस्ट के लोगों को दूसरे देश के होने का बोध करवा रहे हैं। फेसबुक, ट्यूटर और व्हॉट्सएप पर बहकते हुए न जाने क्या क्या कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि न जी हम तो आज एलईडी लाइड हैं। भक्क से जल जाएंगे और खूब रोशनी कर देंगे। भक्क से देशभक्त बन जाएंगे और भक्क से बड़े विचारक। अरे हम ट्यूबलाइट हैं। एलईडी लाइट बनने में वक्त लग गया, लगता है हमें भी एलईडी लाइट बनने में अभी वक्त लगने वाला है।

फिल्म का दूसरा सब्जेक्ट एक कम बुद्धि वाले लक्ष्मण सिंह बिष्ट से जुड़ा है। जो बात तो सभी समझता है, लेकिन थोड़ी देर से समझता है, जिसके कारण उसे सभी ट्यूबलाइट कहते हैं। फिल्म इसी ट्यूबलाइट और उसके छोटे भाई भरत सिंह बिष्ट के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म की कहानी को बहुत दमदार नहीं कहा जा सकता है। दर्शक इसे खुद से कोरिलेट करने में थोड़ा झिझक सकते हैं। फिल्म के लोकेशन बेहद खूबसूरत हैं। यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि हमारे अपने ही देश में इतने खूबसूरत लोकेशन मौजूद हैं फिर भी फिल्मकार विदेशों की तरफ भटकते रहते हैं। हां यह जरूर है कि उत्तराखंड के स्वर्ग कहे जाने वाले कुमांऊ को फिल्म में पूरी तरह से इग्नोर किया गया है। सिर्फ कुमांऊ के नाम का इस्तेमाल कर फिल्म को देश की सबसे पुरानी सैन्य यूनिट कुमांऊ रेजिमेंट से जोड़ा गया है। थोड़ी बहुत बोली जिसमें ‘भूला’ (स्थानीय भाषा में भाई) शब्द को अच्छे अंदाज से प्रस्तुत किया गया है।
ओवरआॅल फिल्म एक अच्छी पारिवारिक फिल्म है। पारिवारिक इसलिए कि हर उम्र के लोग अपने बड़ों-छोटों-हमउम्र आदि..आदि के साथ देख सकते हैं। कहीं आपको शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आप अगर थोड़ा भी इमोशनल हैं तो रुमाल जरूर साथ लेकर जाएं, क्योंकि फिल्म के कई हास्य दृश्यों में भी आपकी आंखें नम हो जाएंगी। अक्सर फिल्मों में बड़े भाई को छोटे के लिए लड़ते हुए आप देखते आए होंगे। पर जब ट्यूबलाइट यानि लक्ष्मण बिष्ट के लिए उसका छोटा भाई भरत सिंह बिष्ट स्कुल वाली थर्मस से क्लसमेट का मूंह सूजा देता है तब भी आप की आंखें नम हो जाएंगी। फिल्म के गाने तो आप सुन ही चुके हैं, कुछ बताने की जरूरत नहीं है। हां एक गाना सबसे बेहतरीन है जो आप थियेटर में ही सुन सकेंगे।
कुल मिलाकर आप यह फिल्म जरूर देखें। हर एंगल से महसूस करें। हां, अपने अंदर के भी ट्यूबलाइट को देखने का प्रयास करें।
और अंत में .. नाच मेरी जान हो के मगन तूं, छोड़ के सारे किंतु परंतु।


Monday, May 15, 2017

कश्मीरी युवाओं को संदेश देकर अमर हो गए उमर


कश्मीर की घाटियों में जहां मांओं की कोख से कई आतंकी जन्म ले रहे हैं, वहीं इन मांओं ने एक से बढ़कर एक सूरवीर दिए हैं। उन्हीं में से एक वीर का नाम था शहीद लेफ्टिनेंट उमर फैयाज। उमर फैयाज से जुड़ी कई इनसाइड स्टोरी है, लेकिन सबसे बड़ी कहानी यही है कि तमाम धमकियों के बावजूद उन्होंने भारत मां की सेवा का रास्ता अख्तियार किया। आज भले ही उमर फैयाज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी शहादत ने कश्मीर के युवाओं को बड़ा संदेश देकर उमर को अमर कर दिया है। साथ ही सियासतजदांओं को मंथन करने पर मजबूर कर दिया है कि कश्मीर को सिर्फ एक नजर से देखने की जरूरत नहीं है।
आज से 26 साल पहले भी उमर फैयाज की तरह एक अधिकारी की हत्या आतंकियों ने की थी। वह साल 1991 का था। उस वक्त हालात इतने खराब नहीं थे। फिर भी आतंकी संदेश देना चाहते थे कि अगर कश्मीर के युवाओं ने सेना या पुलिस का साथ दिया तो उनका क्या हाल होगा। बड़गाम में लेफ्टिनेंट कर्नल और उनके भतीजे को अगवा कर लिया गया था, बाद में उनकी हत्या कर दी गई। इस वारदात के 26 साल बाद आतंकियों ने वही स्ट्रेटजी अपनाई है। युवा लेफ्टिनेंट को शादी के घर से अगवा कर लिया गया। रात भर प्रताड़ना देने के बाद सुबह काफी नजदीक से उन्हें गोली मार दी गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि उमर की हत्या से पहले से उसे काफी प्रताड़ित किया गया था।
उमर की हत्या से बड़ा सवाल पैदा हुआ है। सवाल है कि आखिर आतंकी क्या चाहते हैं? आखिर 26 साल बाद किसी सैन्य अधिकारी को अगवा कर मार कर वे क्या संदेश देना चाहते हैं। वह भी उस सैन्य अधिकारी को जो उनके ही गांव का था। उनकी ही कौम का था। उनके ही बीच से निकला हुआ था। दरअसल यह बदलते कश्मीर का सच है। आज जम्मू कश्मीर में दो तरह के हालात हैं। पहला हालात वह है जो आए दिन टीवी चैनलों पर दिखाया जाता है। पत्थरबाज लड़के और लड़कियों की वीडियो धड़ाधड़ वायरल की जा रही हैं। क्या वहां पत्थर पहले नहीं फेंके जाते थे? पर इस तरह वीडियो वायरल नहीं होते थे। हाल के महीनों में देखा जाए तो इस तरह के वीडियो से सोशल मीडिया अटा पड़ा है। टीवी पर भी इस तरह के वीडियो दिखाकर लंबी-लंबी बहसों का दौरा शुरू हो जाता है। आखिर ऐसा कैसे हो गया। क्या यह सब अचानक है या फिर प्लांड तरीके से यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि कश्मीर में स्थितियां लगातार और अधिक खराब हो रही हैं।

पर यह अर्द्धसत्य है। लेफ्टिनेंट उमर की हत्या ने साबित कर दिया है कि तस्वीर का दूसरा पहलू और भी बड़ा है, जो बहस का मुद्दा नहीं बन पा रहा है। न ही यह सोशल मीडिया और टीवी मीडिया पर नजर आ रहा है। दरअसल हाल के दिनों में जिस तरह सेना की भर्ती और पुलिस भर्ती में स्थानीय युवाओं की भीड़ उमड़ रही है उसने आतंकियों के होश उड़ा रखे हैं। इतनी अधिक तादात में युवाओं की उमड़ रही भीड़ ने काफी बड़ा संदेश दे दिया है। लेफ्टिनेंट उमर की हत्या इसी का परिणाम है। आतंकी यह संदेश देना चाह रहे हैं कि अगर यहां के युवाओं ने सेना में जाने की सोची तो उनके साथ भी यही होगा। शहीद लेफ्टिनेंट को भी सेना में जाने से रोका गया था। उसे धमकी दी गई थी।
अब सवाल यह है कि क्यों नहीं भारत सरकार कश्मीर के उस पक्ष को मीडिया में बहस का मुद्दा बनने देना चाह रही है। क्यों नहीं वैसी वीडियो को वायरल करवा दिया जा रहा है जिसमें पूरी दुनिया देखे की यहां के युवा सिर्फ पत्थर फेंकना नहीं जानते हैं, वे भारत के लिए जान देने को भी तैयार हैं। क्यों नहीं सेना भर्ती और पुलिस भर्ती के लिए घंटों लाइन में लगे युवाओं की तस्वीरें सोशल मीडिया में आ रही हैं। दहशतगर्त और अलगाववादी अगर पत्थरबाज लड़के और लड़कियों के वीडियो वायरल कर यह दिखाने की कोशिश कर हैं कि देखिए यहां के युवा सरकार, प्रशासन, पुलिस और सेना से कितने नाराज हैं। तो ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता कि सरकार उन युवाओं की भीड़ के वीडियो वायरल करे जिसमें पूरी दुनिया उन्हें रोजगार और बेहतर जिंदगी के लिए लाइन में घंटों खड़ा देखे। सरकार को मंथन करना चाहिए। 

मंथन इस बात पर भी होना चाहिए कि कश्मीर की लड़ाई अब बंदूक और गोलियों से अधिक मनोवैज्ञानिक बन चुकी है। कश्मीर में अगर एक तरफ गोलियों और बमों के धमाकों में कमी आई है तो कैसे पत्थरबाजों का गुट सामने आ गया। जिस तरह मूंह पर कपड़े बांधे कश्मीरी लड़कियों की तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं यह और भी अधिक चिंताजनक स्थिति है। अब इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है कि वहां के दहशतगर्त कश्मीर को लेकर मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ने की स्थिति में हैं। पूरी दुनिया को वह दिखाना चाह रहे हैं कि कश्मीर में हालात बहुत खराब हैं। युवा नाराज हैं। स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं नाराज हैं।
कश्मीर को लेकर सरकार को फिर से नए नजरिए से सोचने की जरूरत है। कश्मीर में हालात काबू में हैं इसीलिए लाल चौक पर पिछली बार धमाका कब हुआ था यह किसी को याद नहीं, लेकिन मनौवैज्ञानिक तौर पर हम कश्मीर से दूर होते जा रहे हैं। भावनात्मक तौर पर भी पूरी दुनिया में कश्मीरी युवाओं की बेहद कू्रर तस्वीर उभर रही है। पर शहीद उमर फैयाज ने खुद को बलिदान कर कश्मीर के युवाओं को बड़ा संदेश दे दिया है। यह वह संदेश है जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

Monday, May 8, 2017

अगर तू दोस्त है तो फिर खंजर क्यूं है हाथों में

यह महज संयोग नहीं हो सकता कि जिस आम आदमी पार्टी को दिल्ली फतह के बाद देश में तीसरे राजनीतिक विकल्प के रूप में देखा जाना लगा था, वह चंद दिनों में ही अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने को मजबूर हो रही है। हाल के दिनों में हर तरफ मिली करारी हार के बाद पार्टी के अपने ही लोग एक दूसरे के खिलाफ खंजर निकाल कर खड़े हैं। एक तरफ दोस्त और दोस्ती की दुहाई देकर एक दूसरे को बचाने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बगावती तेवर भी सबको सोचने पर मजबूर कर रहा है। जिस तरह शनिवार को आप के कभी विश्वासपात्र रहे कपिल मिश्रा ने आम आदमी पार्टी के सर्वे सर्वा के खिलाफ मोर्चा खोला है उसने मंथन करने पर मजबूर कर दिया है कि क्या इन्हीं दिनों के लिए दिल्ली के लोगों ने आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत दिया था?
यह सर्वविदित था कि पंजाब चुनाव और उसके बाद दिल्ली नगर निगम चुनाव के बाद आप के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगेंगे। पर यह प्रश्नचिह्न इतनी जल्दी लगेगा इसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। पार्टी की नकारात्मक और आरोप-प्रत्यारोप वाली राजनीति ने पहले की इसकी छवि को जोरदार नुकसान पहुंचाया था। रही सही कसर दिल्ली नगर निगम चुनाव में निकल गई। पूरी तरह हिटलरशाही का तमगा हासिल कर चुके पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह चुनाव प्रचार में दिल्ली के लोगों को हड़काने वाले अंदाज में वोट देने की अपील की थी, उसी दिन तय हो गया था कि आने वाले दिनों में आप का भविष्य क्या होगा। आप की छवि देश को बांटने वाली राजनीति और अवसरवादी राजनीति का पर्याय बन चुकी है। इन सभी को दरकिनार भी कर दिया जाए तो जिस भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए आम आदमी पार्टी ने राजनीतिक गद्दी मांगी थी अब उसी पार्टी पर भ्रष्टाचार के आंकठ में डूबने के आरोप लग रहे हैं।
कभी आम आदमी पार्टी के सबसे विश्वासपात्र लोगों में गिने जाने वाले कपिल मिश्रा को जैसे ही उनके पद से हटाने का ऐलान हुआ उन्होंने अपनी भड़ास ट्वीट से निकाली। टैंकर घोटाले में शनिवार को उन्होंने बड़ा खुलासा करने की बात कही थी। रविवार को उनके खुलासे ने राजनीति में भूचाल ला दिया। कपिल मिश्रा ने सीधे-सीधे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर नगद रुपए लेने का आरोप जड़ दिया है। कपिल ने आरोप लगाया है कि अरविंद केजरीवाल ने उनके सामने सतेंद्र जैन से दो करोड़ रुपए लिए। अब इस आरोप में कितना दम है यह तो आने वाला वक्त तय करेगा, लेकिन इस आरोप ने दिल्ली की राजनीति को अंदर से हिला कर रख दिया है। सबसे ज्यादा झटका तो दिल्ली की जनता को लगा है, क्योंकि इसी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए उन्होंने आम आदमी पार्टी को सिर आंखों पर बैठाया था।
वर्ष 2015 और 2017 के बीच सिर्फ दो साल में अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने दिल्ली में अपना करीब पचास प्रतिशत जनाधार खो दिया है। 2015 के विधानसभा चुनाव में जहां 54.3 प्रतिशत मतों के साथ आप प्रचंड वेड से सत्ता में आई थी, वहीं 2017 के निगम चुनाव में यह प्रतिशत मात्र 26.2 प्रतिशत पर आकर रूक गया है। ऐसे में मंथन करना जरूरी है कि आखिर ऐसा क्या किया है आम आदमी पार्टी ने कि दिल्ली की जनता का उन्होंने विश्वास खो दिया है।
दरअसल यह एक दिन की कहानी नहीं है। इस पतन की कहानी उसी दिन शुरू हो गई थी जब अरविंद केजरीवाल ने अघोषित रूप से खुद को सबसे बड़ा ईमानदार व्यक्ति प्रचारित और प्रसारित करवाते हुए पार्टी पर कब्जा कर लिया था। पार्टी बनने से पूर्व इस युवा संगठन में जितने भी बड़े चेहरे थे सभी को एक-एक कर बाहर निकालकर केजरीवाल ने पार्टी में हिटलरशाही के एक नए युग की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने अपने आसपास चाटुकारों की ऐसी फौज खड़ी कर ली, जो अच्छे और बूरे की पहचान न कर सके। अन्ना हजारे के साथ राष्टÑवाद के नाम पर देश को आंदोलित करने वाले लोगों ने जब भारत मां तेरे हजार टुकड़े होंगे का समर्थन किया तब लगने लगा कि पार्टी अपने उद्देश्य से भटक चुकी है। सेना के जिस सर्जिकल स्ट्राइक पर पूरा देश गर्व कर रहा था उस सर्जिकल स्ट्राइक पर पहला सवालिया निशान लगाने वाले केजरीवाल ही थे। केजरीवाल ने खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा होने वाला एक मात्र व्यक्ति के रूप में देखना शुरू कर दिया। यही कारण था कि मोदी के नाम पर उनकी राजनीति शुरू होती थी और मोदी के नाम पर उनकी राजनीति खत्म होती थी। पंजाब और गोवा चुनाव में इसकी परिणति सामने आई। इससे पहले मोदी के खिलाफ लोकसभा चुनाव में केजरीवाल बनारस तक पहुंच गए थे। सवाल उठना लाजिमी था कि केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने दिल्ली संभालने के लिए गद्दी सौंपी है, न कि मोदी को हराने की सुपारी लेने के लिए।
लोकसभा चुनाव के बाद थोड़ा संभलने के बाद एक बार फिर केजरीवाल ने मोदी मंत्र का जाप शुरू किया। इस बात निशाना बने दिल्ली के एलजी। केंद्र सरकार के खिलाफ सीधा युद्ध छेड़ दिया गया। ऐसा अहसास करवाने लगे कि केजरीवाल के पहले न कोई दिल्ली का मुख्यमंत्री बना है और न बनेगा। 2013 में राजनीतिक अवसरवादिता का सबसे बड़ा एग्जांपल सेट करते हुए केजरीवाल ने जिस तरह 49 दिनों की सरकार चलाई थी, उसमें वह भूल बैठे थे कि दस साल दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी। इस दौरान कभी एलजी से टकराहट नहीं हुई। बिना टकराहट दिल्ली का विकास ही हुआ। 

अवसरवादी राजनीति का ही परिणाम कहा जाएगा कि भ्रष्टचार के खिलाफ खड़ी हुई एक पार्टी आज खुद की भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोपों से जूझ रही है। सिर्फ दो सालों के अंदर दिल्ली में एंबुलेंस घोटाला, आॅटो परमिट घोटाला, टैंकर घोटाला, प्रीमियम बस सर्विस घोटाला और वीआईपी नंबर प्लेट घोटाला दुनिया के सामने है। सभी में भ्रष्चार के बड़े आरोप लगे हैं। अंगुली सीधे अरविंदर केजरीवाल की तरफ है। सभी में जांच जारी है, ऐसे में केजरीवाल के सबसे विश्वासपात्र रहे कपिल मिश्रा के आरोपोें ने बड़ा सवाल पैदा कर दिया है। केजरीवाल के करीबी कुमार विश्वास हों या कपिल मिश्रा सभी एक दूसरे को भाई-भाई बता रहे हैं। ऐसे में कुमार विश्वास का कुछ दिन पहले किया गया एक ट्वीट काफी प्रासंगिक बन जाता है। यह ट्वीट उन्होंने केजरीवाल से मनमुटाव की खबर बाहर आने के बाद किया था। विश्वास ने लिखा था...
‘‘अगर तू दोस्त है तो फिर ये खंजर क्यूं है हाथों में,
अगर दुश्मन है तो आखिर मेरा सर क्यूं नहीं जाता? ’’

Tuesday, April 25, 2017

लोकतंत्र के स्वाभिमान पर ‘मूत्रतंत्र’ से करारा प्रहार


उत्तर प्रदेश के चुनावी एजेंडे में किसानों की बात सबसे ऊपर थी। पंजाब में भी कमोबेश यही स्थिति थी। दोनों प्रदेश कृषि पर सर्वाधिक आश्रित हैं। दोनों ही प्रदेशों में किसानों की स्थिति दयनीय है। सर्वाधिक अन्न पैदा करने वाले इन दोनों राज्यों के किसानों की बातें हमेशा सुनी और समझी गई हैं। शायद यही कारण है कि चुनाव की तैयारी भी इन्हीं के इर्द गिर्द रची और बुनी जाती है। पर आज से ठीक 41 दिन पहले दिल्ली के लुटियन जोन से हजारों मील दूर से करीब 134 किसान जब यहां पहुंचते हैं तो लोग हैरान हो जाते हैं। पिछले 41 दिनों में इन किसानों ने अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए जिन-जिन तरीकों का सहारा लिया है, उसने मंथन करने पर मजबूर कर दिया है कि कब तक किसान चुनावी तवे की रोटी बने रहेंगे? क्या कभी इनका दर्द दिल्ली की लुटियन दरबार में सार्थक तरीके से सुनी जाएगी।
उत्तर प्रदेश के किसान थोड़े भाग्यशाली हैं, क्योंकि उन्हें मनचाही मुराद मिल गई। चुनाव के दौरान और उसके बाद वो जिस उम्मीद में जी रहे थे वह कमोबेश उन्हें हासिल हो गई। पंजाब के किसान अभी इंतजार में हैं कि कब उन्हें चुनाव के दौरान थमाई गई लॉलीपॉप खिलाई जाएगी। पर इसी बीच तमिलनाडु से दिल्ली पहुंचे 134 किसानों के दल ने 41 दिनों में कुछ ऐसा कर दिया है कि पूरे विश्व की नजर भारत की तरफ लग गई है। इन किसानों की तरह ही जब कुछ साल पहले मध्यप्रदेश के खंडवा इलाके के किसानों ने भी अपनी मांग मनवाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया था तब भी उनका यह विरोध प्रदर्शन विदेशी अखबारों में खूब उछला था। किसानों ने पानी के अंदर खड़े होकर लंबा संघर्ष किया। कुछ हद तक उनकी मांगों पर सरकार ने भी विचार किया। हालांकि यह बात अलग है कि आज फिर वहां के किसान उसी शर्मनाक स्थिति में पहुंच गए हैं। पर दिल्ली के जंतर मंतर पर ये किसान जिस तरह से अपनी मांगों को रख रहे हैं, उसने सभ्य समाज की चूलें हिला कर रख दी है। ज्यों-ज्यों इन किसानों के प्रदर्शन का दिन बढ़ता जा रहा है त्यों-त्यों इनके विरोध का तरीका भी सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा मार रहा है।
कभी सांप का मांस खाकर, कभी दिल्ली रेलवे स्टेशन से चूहे पकड़कर लाकर और उसे मूंह में थामकर, कभी पूरी तरह निवस्त्र होकर दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन करते दिख रहे इन किसानों को देखकर किसी को विश्वास भी नहीं हो रहा है कि क्या हमारे अन्नदाता इस बुरी स्थिति में पहुंच चुके हैं। इसी शनिवार को अपने प्रदर्शन के 39वें दिन जब इन किसानों ने अपना मूत्र एकत्र कर उसे पीकर अपना प्रदर्शन किया तो दिल्ली से लेकर तमिलनाडु की सरकार तक हिल गई। विदेशी मीडिया तक में भारतीय किसानों की इस दुखद और शर्मशार कर देने वाली हकीकत की चर्चा होने लगी। ये किसान अपने प्रदर्शन के दिन से ही तमिलनाडु से नरमंूड लेकर आए हैं और उसके साथ प्रदर्शन कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि ये नरमूंड उनके साथी किसानों के हैं। ये वे किसान थे जिन्होंने पिछले कुछ महीनों में कर्ज और तमाम अन्य समस्याओं के कारण अपनी जान दे दी।

अब सवाल उठता है कि ये 134 किसान अपने राज्य की ऐसी किन समस्याओं को लेकर दिल्ली आए हैं जहां उनकी बात किसी राजनेता, किसी मंत्री किसी सरकार के कान तक नहीं पहुंच रही है। क्या इनकी मांग इतनी गैर जरूरी है कि उस पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए? अगर इन किसानों की मांग इतनी ही गैर जरूरी है तो रविवार को ऐसी क्या स्थिति हो गई कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री माननीय ई पलानीसामी को जंतर मंतर पहुंचना पड़ गया। क्या सच में यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि किसानों ने अपना मूत्र पीकर एक ऐसा शर्मशार करने वाला संदेश दे दिया। या सच में किसानों की मांग में कुछ तो दम है। दरअसल दिल्ली के राजनीतिक गलियारे और मीडिया के चकाचौंध वाले कैमरे से काफी दूर होने के कारण आम लोगों को यह पता नहीं है कि तमिलनाडु पिछले 140 सालों में सबसे बड़े सूखे से जूझ रहा है। जयललिता के निधन के बाद खुद को बचाने में लगी सरकार के पास किसानों की बात सुनने का समय नहीं है। कभी पन्नीरसेल्वम, कभी शशीकला और कभी ई पलानीसामी के बीच फंसी राज्य सरकार खुद से इतनी परेशान है कि किसानों की आवाज उन तक पहुंच नहीं रही थी। वहां के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। दिल्ली पहुंचे किसानों ने तो यहां तक बताया है कि पिछले चंद महीनों में करीब 40 किसानों ने अपनी जान दे दी है। ऐसे में उनके पास दिल्ली पहुंचने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बच गया था। किसानों की सबसे प्रमुख मांग उनकी सुरक्षा को लेकर है। उनकी मांग है कि 60 से अधिक उम्र के किसानों को पेंशन की सुविधा दी जाए। किसानों की मदद के लिए सरकार सूखा राहत कोष का गठन करे। किसानों ने सरकारी बैंकों से जो लोन लिया है उसे माफ कर दिया जाए। साथ ही पानी की सुविधा के लिए विभिन्न नदियों को एक साथ जोड़ने की कोई बड़ी योजना बनाई जाए। 

किसानों की इन मांगों में एक भी मांग ऐसी नहीं है जिसे गैर जरूरी करार दिया जाए। बात सिर्फ इतनी सी है कि तमिलनाडु में फिलहाल कोई चुनाव नहीं है। नहीं तो तत्काल सभी राजनीतिक दल अपने मेनिफेस्टो में इन सभी मांगों को शामिल कर लेती। इसमें भी दो राय नहीं कि सभी मांगों को पूरा करने को लेकर जोर शोर से प्रचार करवाया जाता। पर विडंबना यह है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों की समस्याएं और उनकी मांगों को चुनावी लॉलीपॉप के रूप में देखा गया है। उत्तर प्रदेश और पंजाब इसके ताजा उदाहरण हैं। लंबे समय बाद यूपी में सत्ता में आई सरकार ने लोकसभा चुनाव को देखते हुए विधानसभा में किए चुनावी वादे पूरे कर लिए। किसानों के कर्ज माफ कर दिए गए। पंजाब अभी विचार विमर्श में ही लगा है। तमिलनाडु के किसानों ने मूत्र पीकर एक ऐसी समस्या पर मंथन करने की जरूरत पर बहस तेज कर दी है जिसे हम हमेशा इग्नोर करते हैं। यह अलार्मिंग कॉल है। मूत्रतंत्र ने लोकतंत्र के स्वाभिमान पर करारा प्रहार किया है।

Tuesday, April 18, 2017

दहेज प्रथा पर भी कुछ बोल दें मोदी जी


पूरा देश इस वक्त प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी को सुन रहा है। हालिया विधानसभा रिजल्ट के बाद एक बार फिर से नरेंद्र मोदी का कद बढ़ा है। अपने इसी कॉलम में एक बार मैंने चर्चा की थी कि कई बार मोदी जी की चुनावी रैलियों में उनके निगेटिव और निजी हमलों के कारण उनके सम्मान में कमी आने लगी है। पर जिस तरह उन्हें सुनने और एक झलक पाने की ललक लोगों में है उसने मेरी बातों को सिरे से खारिज कर दिया है कि उनके सम्मान में जरा भी कमी आई है। एक प्रधानमंत्री के तौर पर वो आज भी सबसे लोकप्रिय व्यक्ति हैं। अब जबकि पूरा देश उन्हें सुनने को तैयार है तो उनसे एक अनुरोध यह भी करना जरूरी है कि भारत की सबसे बड़ी कुप्रथा दहेज पर भी वो मंथन जरूर करें। एक बार इस कुप्रथा के खिलाफ भी आह्वान कर दें। उनकी हर बात भारत के लोग सुन रहे हैं, यह आह्वान भी जन आंदोलन में तब्दील हो सकता है।

बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने शराबबंदी के क्रांतिकारी कदम के बाद दहेज प्रथा पर करारा प्रहार किया है। वो शराबबंदी के जैसा कुछ नया नियम या कानून तो नहीं बना सके हैं, पर उन्होंने बिहार में दहेज प्रथा के खिलाफ नया अलख जगाने का प्रयास किया है। नितीश कुमार ने बिहार के लोगों से आह्वान किया है कि जिस घर में दहेज लिया या दिया जा रहा है वहां का मेहमान बनने से परहेज करें। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि हाल के वर्षों में जिस तरह दहेज ने बड़ी कुप्रथा के रूप में हमारे समाज को अपनी जकड़ में ले लिया है उसके खिलाफ नितीश का यह आह्वान महाअभियान बन सकता है। लंबे समय से दहेज के खिलाफ इसी तरह के महाअभियान की जरूरत महसूस की जा रही है। इस अभियान में न जात-पात का बंधन हो, न पार्टी पॉलिटिक्स की जगह हो।

यह कितनी बड़ी विडंबना है कि 21वीं सदी में रहते हुए हम आए दिन दहेज हत्या की खबरों से रूबरू होते हैं। तमाम कानूनों के बावजूद दहेज लोभियों के मन में इस तरह के कानूनों का रत्ती भर भी भय नहीं रह गया है। खुलेआम दहेज मांगा और दिया जा रहा है। अभी दो दिन पहले भी एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें सैकड़ों लोगों की भीड़ के सामने मंच से दहेज की रकम की गिनती हो रही थी। आंकड़ों पर गौर करें तो दिल दहल जाएगा। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर दो घंटे में दहेज प्रताड़ना के केस सामने आ रहे हैं। कई बार तो परिस्थितियां इस तरह बिगड़ जा रही हैं कि बेटियोंं को बहू के रूप में आना श्राप जैसा प्रतीत होने लगा है। कुछ तो हिम्मत हार जाती हैं और बहू के रूप में अपना जीवन ही बलिदान कर दे रही हैं।

भारत में समय-समय पर ऐसे लोगों ने जन्म लिया है जिन्होंने अपने बलबूते भारत में व्याप्त तमाम बुराईयों, कुप्रथाओं पर लगाम लगाई है। उन महापुरुषों का आह्वान ऐसा होता था लोग खूद ब खूद आगे आकर ऐसी बुराईयों के प्रति जागरूकता पैदा करते थे। आज प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ऐसे ही व्यक्तिव के रूप में भारत के लोगों के सामने हैं। सामाजिक बुराईयों के प्रति उनकी हर एक बात को जनता सुन रही है। स्वच्छ भारत मिशन का आज यह असर है कि घर के बच्चे अपने पैरेंट्स को गाड़ी से बाहर कूड़ा फेंकने पर टोक देते हैं। रोड किनारे धड़ल्ले से मूत्र त्यागने वाले लोग चार बार इधर उधर देखकर ऐसा रिस्क उठा रहे हैं। हर घर में करो योग रहो निरोग की बातें हो रही हैं। स्वदेशी अपनाने को लेकर लोग एक दूसरे को जागरूक कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के रूप में देश हित में किए जा रहे हर एक आह्वान पर लोग तालियां बजा रहे हैं। आपकी एक आह्वान पर करोड़ों लोग मोबाइल ऐप (भीम ऐप) तक डाउनलोड कर ले रहे हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि भारत की सबसे बड़ी कुप्रथा के खिलाफ भी बिगुल फूंका जाए।

यह सही है कि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिस पर राजनीतिक बहसबाजी शुरू हो जाती है। कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिससे पार्टी का नफा या नुकसान तौलने की जरूरत पड़ती है। पर इसमें कोई दो राय नहीं कि कुछ सामाजिक कुरीतियां ऐसी होती है जिस पर कोई भी आपको गलत नहीं ठहरा सकता है। दहेज विरोधी अभियान भी एक ऐसा मुद्दा है। अगर आज नितीश कुमार ने दहेज के खिलाफ बिहार के लोगों का आह्वान किया है तो क्या यह राष्टÑीय आह्वान नहीं बन सकता है? मोदी जी हो सकता है नितीश कुमार से आपकी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता हो। हो सकता है कि आपके पार्टी के लोग आपको नितीश कुमार के इस आह्वान से दूर होने की सलाह दें। पर आप मंथन जरूर करें। दहेज हत्या में जब बेटियां जला दी जाती हैं तो क्या आप खुद को माफ करने के काबिल समझ पाते हैं। नवरात्र पर नौ दिन का व्रत रखकर क्या आप यह संकल्प नहीं ले सकते कि जबतक लोग आपकी बातों को सुन रहे हैं आप दहेज के खिलाफ जोरदार आह्वान करते रहेंगे।

दहेज के मुद्दे पर पूरे देश के राजनेताओं, सरकारों और जन प्रतिनिधियों को राजनीति प्रतिद्वंदिता से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है। आज नितीश कुमार ने यह आह्वाान किया है। अगर इसी आह्वान को पूरे देश में आंदोलन का रूप दे दिया जाए तो हर साल हजारों की संख्या में दहेज की बली चढ़ने वाली बेटियों को सुरक्षित किया जा सकता है। दहेज के ही डर से हर साल लाखों बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है। आज भी हम उस सोच से मुक्ति नहीं पा सके हैं कि बेटी पैदा हुई तो उसकी शादी के समय खेत खलियान सब बेचना पड़ेगा। इस सोच को जड़ से खत्म करने के लिए व्यापक जन आंदोलन और जनजागरुकता की जरूरत है। आज नरेंद्र मोदी इस जन आंदोलन के सबसे बड़े प्रणेता के रूप में खुद को सामने ला सकते हैं।

Monday, April 10, 2017

लंगट सिंह कॉलेज और बापू की यादें

गांधी कूप 



यह बात उन दिनों की है जब मुजफ्फरपुर में मेरा और मृणाल भईया का एडमिशन लंगट सिंह कॉलेज कैंपस में मौजूद बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस स्कूल में हुआ था। पहले यह स्कूल लंगट सिंह कॉलेज की मुख्य बिल्ंिडग के ठीक सामने मौजूद एनसीसी वाली वर्षों पुरानी बिल्ंिडग में था। इसी के सामने गांधी पार्क था, जहां बापू की बड़ी प्रतिमा मौजूद थी। एक साल बाद ही स्कूल लंगट सिंह कॉलेज के आर्ट्स ब्लॉक के सामने मौजूद लंबे से कॉरिडोर नुमा ब्लॉक में शिफ्ट हो गया। पता चला कि यह ब्लॉक सीआरपीएफ के अस्थाई ठिकाने के लिए बनाया गया था। खैर इसी बिल्डिंग में हमारा स्कूल शिफ्ट हो गया। एक समय लंगट सिंह कॉलेज का कैंपस इतना बड़ा था कि बाद में इसमें बिहार यूनिवर्सिटी की स्थापना हो गई। इसी यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर की देख रेख में बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस स्कूल की स्थापना हुई थी। यूनिवर्सिटी के कई रिटायर्ड प्रोफेसर हमारे स्कूल के शिक्षक थे।
हमारे इसी स्कूल के ठीक सामने एक कुआं था। जब हम लोग छोटे थे तो स्कूल आते और जाते वक्त नियम से एकाथ पत्थर इस कुएं में फेंक दिया करते थे। एक दूसरे कीदेखा देखी कई बच्चे इस कुएं को अपनी प्राइवेट प्रॉपर्टी समझ चुके थे। कुएं में पत्थर फेंकना तो जैसे हमारा सबसे फेवरेट टास्क था। क्योंकि पत्थर भी एंगल बनाकर काफी दूर से फेंकना होता था। कुआं सूखा हुआ था। इसकी हालत इतनी खराब थी कि कोई यहां बैठना भी पसंद न करे। एक दिन हमारे स्कूल में एक छोटा सा प्रोग्राम था। स्कूल का प्रबंधन चुंकि बिहार यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर्स के जिम्मे था, इसलिए सेमिनार में यूनिवर्सिटी के कई सीनियर प्रोफेसर्स भी मौजूद थे। लंगट सिंह कॉलेज के तत्कालीन प्रींसिपल (नाम याद नहीं)भी आए थे। प्रोग्राम के दौरान ही उन्होंने इस कुएं की चर्चा की। उन्होंने बताया कि जब गांधी जी 10 अप्रैल 1917 को पहली बार बिहार आए थे, तो उनका पहला पड़ाव मुजफ्फरपुर का यह ऐतिहासिक लंगट सिंह कॉलेज ही बना था। उन्होंने इसी कुएं का पानी पीया था और यहीं स्रान भी किया था।
LS College, Arial View

मुझे आश्चर्य हो रहा था कि जो कुआं हमारी निशानेबाजी का प्रतिनिधित्व कर रहा है वह कभी बापू के आगमन का गवाह रहा है। प्रोग्राम के दौरान हम बच्चों को अपने आसपास की जगह को साफ रखने का पाठ पढ़ाया जा रहा था और कुआं की चर्चा इसी संदर्भ में हो रही थी। यकीन मानिए इस प्रोग्राम के बाद कुंआ के प्रति हमारा सम्मान बढ़ गया। हमने इसके बाद कभी इस कुएं में पत्थर नहीं फेंका। स्कूल आते जाते वक्त इस सूखे कुएं के पास जाते जरूर थे। कुआं सूखकर एक गड्ढे के रूप में मौजूद था। एक साढ़े चार से पांच फीट का छात्र आराम से इस कुंए में उतर कर बिना किसी सहारे के ऊपर आ सकता था। आठवीं क्लास के बाद कई सालों तक इस कुएं में उतरने का हमें भी सौभाग्य प्राप्त हुआ क्योंकि क्रिकेट का मैदान इस कुआं की बगल में ही था। और अमूमन हमारी गेंद इसमें गिर जाया करती थी।
स्कूल खत्म हुआ। रिजल्ट ठीक ठाक ही था तो लंगट सिंह कॉलेज में एडमिशन भी मिल गया। कुआं इसी तरह मौजूद रहा। आर्ट्स लेने के कारण कुआं का साथ मिलता रहा, कुआं ठीक आर्ट्स ब्लॉक के सामने ही था। ग्रेजूएशन में इतिहास विषय लिया। कॉलेज के दिनों में ही जब गांधी के चंपारण सत्याग्रह को पढ़ने का मौका मिला तो गांधी के मुजफ्फरपुर, लंगट सिंह कॉलेज और इस कुएं की ऐतिहासिकता को और भी नजदीक से पढ़ने का मौका मिला।
एक बार पढ़ाई के दौरान भोजनंदन सर ने कुएं की चर्चा करते हुए इसकी ऐतिहासिकता के बारे में बताया था। उन्होंने बताया कि जब 10 अप्रैल को 1917 में बापू मुजफ्फरपुर पहुंचे तो उन्होंने लंगट सिंह कॉलेज में ही रहने की बात कही। उस वक्त लंगट सिंह कॉलेज के प्रोफेसर आचार्य कृपलानी भी उनके साथ थे। आनन फानन में कॉलेज हॉस्टल में उनके रात गुजारने की व्यवस्था की गई। पर सरकारी संस्थान होने के कारण किसी तरह के विवाद से बचने के लिए गांधी जी से अगले ही दिन वहां से निकल जाने का निवेदन किया गया। दूसरे दिन सुबह की दिनचर्या के दौरान गांधी जी आर्ट्स ब्लॉक के सामने स्थित इसी कुएं पर पहुंचे। यहां के शीतल जल ने उनका मन मोह लिया। खुद बाल्टी से पानी खींचकर उन्होंने पानी पीया और स्रान किया।  इसके बाद गांधी जी चंपारण की ओर प्रस्थान कर गए।

कॉलेज के युवा दिनों में मन में कसक उठती थी कुआं की दुर्दशा को देखकर। ऐतिहासिक कुआं हमारे सामने धीरे-धीरे और भी खराब होता गया। कॉलेज की पढ़ाई भी खत्म हुई पर कुआं जस का तस पड़ा रहा। एक बार कॉलेज में मैंने अपने इतिहास ब्लॉक के दोस्तों से भी कुआं को लेकर चर्चा भी की, प्लान भी बना कि कॉलेज प्रिंसिपल के पास कूंआ के रखरखाव को लेकर चर्चा की जाएगी। हिस्ट्री डिपार्टमेंट के शिक्षकों से भी सहयोग लेने की बात भी हुई। पर उसी दौरान डिपार्टमेंट में पढ़ाई को लेकर हम छात्रों ने क्रांति कर दी फिर यह प्लानिंग धरी की धरी रह गई। कॉलेज खत्म हुआ। दोस्त दूर हो गए। कॉलेज दूर हो गया। कुआं दूर हो गया।
बहुत दिनों बाद जब साल 2005-06 में कॉलेज कैंपस में जाने का मौका मिला कुआं देखकर दिल को जबर्दस्त सुकून मिला। कुआं पूरी तरह से नए रंग रूप में था। मुझे नहीं पता इसके जिर्णोद्धार के लिए किसने सोचा।   किसने इसकी ऐतिहासिकता को समझा। किसने इसे सहेजने की प्लानिंग की। पर उस शख्स को कोटि कोटि नमन जरूर करना चाहूंगा। जिला प्रशासन ने भी इस कुएं को स्मारक के रूप में घोषित कर दिया है। इसके बाद इसे संगमरमरी पत्थरों से कवर करते हुए इसकी घेराबंदी कर दी गई है। अब इस कुएं का नाम गांधी कूप हो गया है।
आज जब पूरा मुजफ्फपुर गांधी के रंग में रंगा है। चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने पर हर तरफ गांधी की चर्चा हो रही है। लंगट सिंह कॉलेज किसी दुल्हन की तरह सजा हुआ है। ऐसे में गांधी कूप भी अपनी ऐतिहासिकता पर गौरवांवित है। मैं शहर से 12 सौ किलोमीटर दूर बैठा हूं। इस ऐतिहासिक आयोजन को मिस कर रहा हूं। पर अपने शहर की आनबान और शान लंगट सिंह कॉलेज की सुंदरता अखबारों के ई-पेपर पर देखकर आह्लादित हूं। भोजनंदन बाबू को बापू की भूमिका में देखकर आनंदित हूं। एक बार उन्होंने कहा था कभी मौका मिला तो गांधी को जीने की तमन्ना है। सर को आज वह मौका मिल गया। बिहार सरकार और नितीश कुमार बधाई के पात्र हैं जिन्होंने इतने बड़े आयोजन को सार्थक किया है। जब लंगट सिंह कॉलेज में इतना बड़ा अयोजन हो रहा है तो उम्मीद करता हूं इससे भी भव्य आयोजन चंपारण की धरती पर हो रहा होगा।

कुछ ऐतिहासिक बातें लंगट सिंह कॉलेज के बारे में


  • स्वतंत्रता सेनानी और प्रसिद्ध समाजसेवी लंगट सिंह की पहल पर और उनके द्वारा दान की गई सैकड़ों एकड़ जमीन पर तीन जुलाई 1899 में लंगट सिंह कॉलेज की स्थापना हुई।
  • भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद लंगट सिंह कॉलेज के शिक्षक और प्रिंसिपल रहे।
  • आचार्य जेबी कृपलानी और राष्टÑकवि रामधारी सिंह दिनकर जैसे दिग्गजों ने भी कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दी।
  • गांधी जी ने इसी कॉलेज प्रांगण में अपनी चंपारण यात्रा की पूरी रूपरेखा तैयार की।    
  • लंगट सिंह कॉलेज की मुख्य बिल्ंिडग जिसका उद्घाटन 26 जुलाई 1922 को हुआ था वह आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की तर्ज पर बना है। 


किसानों की कर्जदारी से सरोकार क्यों नहीं?


हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सवाल किया है कि किसानों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया है कि एक महीने के अंदर वह कोर्ट को बताए कि विभिन्न राज्य सरकारों ने इस दिशा में क्या प्लानिंग की है। देश के किसानों को सुप्रीम कोर्ट का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने एक ऐसे मुद्दे पर केंद्र को तलब किया है जिसकी जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। वैसे तो स्वयंसेवी संगठन सिटीजन्स रिसोर्स एंड इनीसिएटिव ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका गुजरात के किसानों को लेकर दायर की थी। पर कोर्ट ने मामले को बेहद संवेदशील माना और इसका दायरा बढ़ा दिया। साथ ही सभी राज्य सरकारों को मंथन करने पर विवश कर दिया है कि क्या वे सच में किसानों के हित के लिए कुछ कर रहे हैं। खासकर आत्महत्या की प्रवृति को रोकने के लिए।

मंथन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जिस किसान के इर्द गिर्द पूरे भारत की राजनीति का पहिया घुमता रहता है वही किसान जमीनी स्तर पर अपनी किसानी से ही पीड़ित है। थक हार कर वह आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाता है। किसानी एक ऐसा पेशा बन चुका है जहां हर कदम पर दर्द ही दर्द है। शायद यही कारण है कि पिछले 25 सालों में दो लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है। आत्महत्या के मामले में महाराष्टÑ, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, तेलंगाना, हरियाणा, छत्तीसगढ़ ने तो पिछले पांच सालों में रिकॉर्ड तोड़ दिया है। बावजूद इसके किसी राज्य से अब तक अच्छी खबर नहीं आई है कि किसानों को एकमुश्त राहत देने के लिए राज्य सरकारों ने क्या किया है।

हाल ही में सम्पन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी किसानों की दरिद्रता का मुद्दा सबसे ऊपर था। खासकर पंजाब और उत्तरप्रदेश में किसानों की बदहाली को दूर करने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों ने बड़े-बड़े बयान दिए। कुछ ऐसा ही बयान हरियाणा विधानसभा चुनाव के वक्त भी दिए गए थे। सबसे बड़ा बयान किसानों की कर्जमाफी को लेकर था। हरियाणा की बीजेपी सरकार तीन साल बाद भी किसानों की कर्जमाफी के लिए प्लानिंग ही कर रही है। पंजाब की कैप्टन सरकार केंद्र की ओर टकटकी लगाए बैठी है कि वहां से राहत राशि आए तो वह कर्ज माफी की योजना बना सके। हां इन सबसे इतर उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने बेहद सार्थक और मजबूत फैसला लेते हुए चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादे को पूरा किया है। उत्तरप्रदेश के लाखों किसानों की कर्जमाफी की घोषणा ने किसानों को जरूर राहत पहुंचाने का काम किया है। इस कर्जमाफी को साहसिक कदम इसलिए भी बताया जा रहा है क्योंकि रिजर्व बैंक कभी कर्जमाफी के पक्ष में नहीं था। रिजर्व बैंक का मानना था कि इससे लोन क्रेडिट पर असर पड़ेगा। आने वाले समय में किसान लोन लेंगे फिर माफी की उम्मीद लगाए बैठे रहेंगे।
योगी सरकार के इस साहसिक कदम के बाद देश में किसानों की ऋण माफी को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है। सितंबर 2016 में राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कृषि राज्यमंत्री ने बताया था कि भारत के किसानों पर इस वक्त 12 लाख 60 हजार करोड़ रुपए का कर्जा है। इनमें से 9 लाख 57 हजार करोड़ का कर्जा कॉमर्शियल बैंकों ने किसानों को दिया है। उस वक्त भी कृषि राज्यमंत्री ने स्पष्ट किया था कि सरकार कर्ज माफ करने पर कोई विचार नहीं कर रही है, क्योंकि रिजर्व बैंक की राय है कि इससे कर्ज वसूली पर निगेटिव असर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट का सरकार से सवाल ऐसे ही नहीं है। कोर्ट के सामने कई ऐसे उदाहरण हैं जब कॉरपोरेट घरानों के ऋण माफी के लिए सरकारें आगे रही है। बैंकों ने भी खूब दरियादिली दिखाई है।
यह बातें वाकई समझ से परे है कि विभिन्न राज्यों के आत्महत्या कर रहे किसानों का कर्ज माफ कर देने से अच्छी अर्थ व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी, जबकि बड़े कॉरपोरेट घरानों की कर्जमाफी से आर्थिक विकास को गति मिलेगी। यह अर्थव्यवस्था की कैसी टर्मनोलॉजी है? भारत का एक सामान्य नागरीक भले ही अर्थव्यवस्था के गूढ मंत्रों को नहीं समझ सकता है, पर इतनी समझ तो जरूर है कि कर्ज तो कर्ज ही होता है। चाहे वह कॉरपोरेट घराने का कर्ज हो या एक निरीह किसान का। आरबीआई के पूर्व गवर्नर से लेकर एसबीआई की अध्यक्ष अरुंधति भट्टाचार्य भी किसानों की कर्जमाफी के पक्ष में नहीं हैं। सभी की एक राय है कि फसल ऋण माफी के्रडिट अनुशासन को बिगाड़ देती है। किसान हर समय ऋण माफी की आस लगाए रखेंगे। इसी संदर्भ में मुख्य आर्थिक सलाहकार के एक बयान पर भी गौर करना चाहिए। एक सेमिनार के दौरान अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा कि ‘‘सरकार को बड़े कॉरपोरेट कर्जदारों को राहत देने की जरूरत है। आपको उन कर्जों को माफ करने में सझम होना चाहिए, क्योंकि पूंजीवाद इसी तरह से काम करता है। लोग गलतियां करते हैं, उन्हें कुछ हद तक माफ किया जाना चाहिए।’’
अब मंथन का वक्त है कि अगर पूंजीवाद का फॉर्मूला यही है तो क्या किसानों के लिए यह फॉर्मूला लागू नहीं हो सकता? कॉरपोरेट घराने तो गलती करते हैं, जबकि हमारे देश का किसान कभी खराब फसल, कभी मौसम के सितम, कभी जानवरों के आतंक और कभी फसलों के रोग के कारण बर्बाद होता है। यह कैसी व्यवस्था है कि किसानों की कर्जमाफी पर चर्चा होने लगती है और कॉरपोरेट घरानों का ऋण ‘चुपके’ से माफ कर दिया जाता है। केवी थॉमस की अध्यक्षता वाली लोक लेखा समिति की ताजा रिपोर्ट कहती है कि बैंकों की कुल 6.8 लाख करोड़ रुपए की गैर निष्पादित संपत्तियां (एनपीए) में से 70 फीसदी बड़े और रसूखदार कॉरपोरेट घरानों के पास है। जबकि मुश्किल से एक प्रतिशत भारत के किसानों के पास है। 2008 में भी जब किसानों का साठ हजार करोड़ रुपए का ऋण माफ किया गया था तब भी बहस शुरू हो गई थी। जबकि किसी ने इस बात पर चर्चा नहीं कि पिछले एक दशक में करीब दस लाख करोड़ रुपए का कॉरपोरेट घरानों का ऋण किस तरह बट्टे खाते में डालकर निपटा दिया गया। हाल ही में क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग ने अपनी रिपोर्ट दी है। इसमें उसने कहा है कि 2011 से 2016 के बीच बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा लिए गए करीब 7.4 लाख करोड़ रुपए के कर्ज में से चार लाख करोड़ रुपए के कर्ज को माफ किया जा सकता है।

पूंजीवादी व्यवस्था में बड़े घरानों की ऋण माफी के लिए कई तरह के उपाय किए जाते हैं। ऐसा ही एक उपाय है बैड बैंक। बड़ी कंपनियों के बुरे कर्जों की समस्या का समाधान करने के लिए बैड बैंक में समस्त बकाया ऋण ट्रांसफर कर दिए जाते हैं। साथ ही पब्लिक सेक्टर रिहैबिलिटेशन एजेंसी (पारा) के जरिए भी ऐसे ऋणों का निपटारा कर दिया जाता है। पर अफसोस इस बात का है कि आजादी के इतने सालों बाद भी किसानों की ऋण माफी के लिए ऐसी किसी व्यवस्था पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया। मंथन जरूर करना चाहिए कि किसानों की आत्महत्या को रोकने के लिए ऐसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं बननी चाहिए? कर्नाटक, महाराष्टÑ, तेलंगाना, गुजरात, पंजाब और हरियाणा के किसान हर साल आत्हत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा रहे हैं। सरकारें खामोश हैं। कर्ज तले दबे किसान आस लगाए सरकार की ओर देख रहे हैं। यह मंथन का सबसे उचित समय है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने किसानों की आत्महत्या पर गंभीर सवाल उठाया है। जवाब देने के लिए ही सही राज्य सरकारें कुछ तो करे।

Monday, February 13, 2017

क्यों प्रधानमंत्री मोदी खो रहे अपना सम्मान?

 
देश ने नरेंद्र मोदी को उनकी ईमानदार और दमदार छवि के कारण प्रधानमंत्री जैसे प्रतिष्ठित पद पर बैठाया था। विश्व के सर्वोत्तम लोकतंत्र के पहरेदार के रूप में उन्हें अप्रत्याशित विजय गाथा के साथ निर्वाचित किया गया था। लोकसभा चुनाव के दौरान हर तरफ मोदी-मोदी की ऐसी धूम मची कि अन्य दूसरे दल चारों खाने चित्त हो गए। पर ऐसा क्या हो रहा है और क्या हुआ है कि मोदी अपनी चमक खोते जा रहे हैं। खासकर किसी राज्य में विधानसभा चुनाव के वक्त क्यों अचानक उनके प्रति लोगों में सम्मान की भावना कम होती जा रही है। यह मंथन का समय है। एक बार फिर मोदी ने अपनी लोकप्रियता और सम्मान को ठेस पहुंचाई है।
यह कोई पहली बार नहीं हुआ है कि नरेंद्र मोदी के सम्मान में इतनी गिरावट आई है। अगर गिरावट मापने का कोई पैमाना होता तो यकिन मानिए इस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में पचास से साठ प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई होती। पर मैं यह बात सिर्फ उन लोगों की बातचीत के आधार पर लिखने की हिम्मत कर रहा हूं जो कुछ समय पहले सिर्फ मोदी-मोदी की रट लगाए रहते थे। मोदी के हर एक कदम पर फूलों की बारिश करने वाले ऐसे लोग अचानक मोदी के नाम चिढ़ने क्यों लगे हैं? ऐस क्यों है कि टीवी पर लाइव चलने वाले उनके भाषण को घंटों टकटकी लगाए देखने वाले अब टीवी पर भाईयों और बहनों की आवाज सुनते ही टीवी का रिमोट खोजने लगने लगे हैं। क्यों ऐसा होने लगा है कि मोदी को देश का भगवान मानने वाले लोग भी अब मोदी की न तारीफ करना और न सुनना पसंद करते हैं।
यह कोई अचानक नहीं हुआ है। जब प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने शपथ ग्रहण किया तो पूरे देश को आस थी कि वे प्रधानमंत्री के तौर अपनी एक अलग पहचान कायम करेंगे। कुछ अर्थों में उन्होंने ऐसा किया भी। विदेशों में जिस तरह उन्होंने भारत और भारतीयता की पहचान को ठोस अंदाज में विश्व के सामने रखा उसने उनके प्रति सम्मान कई गुणा बढ़ा दिया। कई बड़े अंतरराष्टÑीय प्लेटफॉर्म पर उन्होंने भारतीयों को गर्व करने का मौका दिया। कई ऐसे मौके भी आए जब देश ने एक सशक्त प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी को पाकर खुद पर गौरव महसूस किया। देश को ऐसा महसूस हुआ कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में लंबे वक्त के बाद एक सुदृढ़ और सशक्त भारत के लिए वोट किया है। पर अचानक ही कुछ ऐसा होने लगा जिससे देश को नरेंद्र मोदी में प्रधानमंत्री की छवि कम और बीजेपी पार्टी के प्रचारक की छवि अधिक दिखने लगी।

प्रधानमंत्री की छवि को सबसे पहला झटका लगा बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान। उस वक्त तक नरेंद्र मोदी बीजेपी और संघ की छाया से कोसों दूर निकल गए थे। पर बिहार चुनाव में स्टार प्रचारक के रूप में उनके पर्दापण ने सबकुछ मिट्टी पलिद कर दिया। पार्टी को ऐसा लगने लगा कि जिस बिहार ने लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम पर जाति, धर्म और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से ऊपर उठकर बीजेपी को वोट दिया, वही बिहार एक बार फिर से मोदीमय हो जाएगा। शायद ऐसा संभव भी हो जाता, अगर नरेंद्र मोदी एक प्रधानमंत्री के तौर पर रहते। पर उन्होंने प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए प्रचार रैलियों के दौरान सभी सीमाएं लांघ दीं। बिहार चुनाव के दौरान कांग्रेस, जदयू और राजद को थ्री इडियट्स की संज्ञा देकर उन्होंने अपने पैरों में ही कुलाहड़ी मार दी। इसके बाद वोट की भीख मांगते वक्त तो ऐसा लगने लगा जैसे वे प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद पर हैं ही नहीं। नीतिश कुमार से लेकर राहूल गांधी और लालू यादव पर व्यक्तिगत हमले कर उन्होंने अपनी सभी प्रतिष्ठा खो दी। देश ने इसका नतीजा जल्द ही देख लिया जब बिहार में बीजेपी बुरी तरह पराजित हुई। सत्ता और अपनी लोकप्रियता की खुमारी जब निकली तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
एक प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी जो कुछ भी कर रहे हैं उसे पूरा देश देख रहा है। उनके काम के प्रति समर्पण, देश के प्रति प्यार ने ही उन्हें इतना लोकप्रिय बनाया है। पूरे विश्व में भारत और भारतीयता की सशक्त पहचान बनाने में भी वो कोई कसर बाकि नहीं रख रहे हैं। नोटबंदी जैसे सशक्त फैसले लेकर भी उन्होंने दिखा दिया है कि वो वोट के लिए प्रधानमंत्री के पद पर नहीं बैठे हैं। ऐसे में अब उनके लिए मंथन का समय है कि वे क्यों बार बार ओछी और निम्न स्तर की बयानबाजी में उलझ जाते हैं। वे क्यों बार बार यह भूल जाते हैं कि देश उन्हें एक सशक्त प्रधानमंत्री के तौर पर ही देखना चाहता है। पंजाब विधानसभा चुनाव, फिर उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव के दौरान वे लगातार चुनावी रैलियां कर हैं। इन रैलियों में उनके द्वारा दिए जा रहे बयानों पर लोग हंस रहे हैं।
प्रधानमंत्री के तौर पर बिहार में की गई भयानक भूल को एक बार फिर नरेंद्र मोदी 2017 के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में दोहरा रहे हैं। वे इस बात को बार-बार भूल जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री के तौर पर किया जा रहा उनका काम अगर बेहतर और सशक्त होगा तो विभिन्न प्रदेशों के लोग भी उन्हें उसी तरह का प्यार देंगे। हां यह भी सच है कि जिस पार्टी की बदौलत वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं, उस पार्टी के प्रति भी उनका दायित्व है। संविधान में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि प्रधानमंत्री अपने पार्टी का   प्रचार प्रसार नहीं कर सकता है। हर एक प्रधानमंत्री ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान पार्टी के लिए प्रचार किया था। नरेंद्र मोदी भी उसी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। पर लोकतंत्र की मार्यादा और प्रधानमंत्री पद की गरिमा का ध्यान रखते हुए उन्हें कम से कम ऐसे शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए जिससे उनकी प्रतिष्ठा पर आंच न आए। अब संचार के ऐसे साधन मौजूद हैं कि उनकी हर एक बाद रिकॉर्ड होती है, बार-बार सुनवाई जाती है। क्षण भर में उनके मुंह से निकली बातें वायरल हो जाती हैं। ऐसे में नरेंद्र मोदी को किसी पर व्यक्तिगत हमले करने या असम्मानजनक भाषा का प्रयोग करने से जरूर बचना चाहिए। पूरा देश उन्हें एक सम्मानित प्रधानमंत्री के तौर पर चाहता है, न कि एक बाजारू और राजनीतिक भाषा बोलने वाले किसी पार्टी के प्रचारक के तौर पर। अब भी समय है। मंथन जरूर करें। आने वाले दिनों में उनकी कई रैलियों का दिन और समय तय है। इन रैलियों में वे प्रधानमंत्री बने रहें तो ठीक, वरना बिहार की जनता की तरह दूसरे राज्यों की जनता भी बहुत समझदार है।