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Monday, October 2, 2017

इस प्लांड मर्डर को रोकने की पहल करें

आज दो अक्टूबर है। पूरा राष्ट्र आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन मना रहा है। हर तरफ जश्न का माहौल है, पर राष्ट्रीय राजधानी के बेहद नजदीक के तीन घरों में मातम है। यह मातम है उन घरों के तीन सदस्यों के प्लांड मर्डर के कारण। गांधी जयंती के इस मौके पर आप भी कह रहे होंगे कि मैं यह क्या हत्या की बात लेकर बैठक गया। पर आज के दिन से बेहतर कोई मौका नहीं हो सकता है कि मैं इस प्लांड मर्डर की चर्चा करूं। यह वह प्लांड मर्डर है जिसके विरुद्ध महात्मा गांधी ने लंबा संघर्ष किया था। वे इस तरह के प्लांड मर्डर के न केवल विरोधी थे, बल्कि यह भी कहा करते थे कि यह मानव जाति का सबसे घिनौना रूप है। आज अगर गांधी जिंदा होेते तो वो हैरान रह जाते कि इतनी तरक्की करने के बावजूद औसतन प्रतिदिन करीब तीन से चार लोग तमाम तरह की सीरवरेज की सफाई के दौरान दम घूंटने से मर जा रहे हैं। 
सीवरेज में सफाई के दौरान मरने वालों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। सफाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) के आंकड़े बताते हैं कि प्रतिवर्ष दो से ढ़ाई हजार लोग इससे प्रभावित होते हैं। अधिकतर की मौत हो जाती है। ऐसा तब है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक अमानवीय कृत बताते हुए इसे पूरी तरह बैन कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सीवरेज के अंदर जाकर सफाई करने पर न केवल पूरी तरह से रोक लगा दी थी, बल्कि इस कार्य के दौरान मारे गए लोगों के परिजनों को दस लाख रुपए का मुआवजा भी घोषित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीवरेज में उतरने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि वहां आक्सीजन न के बराबर होगा। वहां अत्यंत घातक हाईड्रोजन सल्फाइड, मेथेन, कार्बनडाइआॅक्साइड और कार्बन मोनोआॅक्साइड की मौजूदगी किसी की जान लेने के लिए काफी है। फिर ऐसे में कोई भी एजेंसी किसी सफाईकर्मी को बिना सुरक्षा उपकरणों के कैसे वहां भेज सकती है। इससे होने वाली मौत को मर्डर की श्रेणी में माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अगर विभिन्न राज्य सरकारों की नाकामी के कारण लोग मारे जा रहे हैं तो इसे मर्डर नहीं प्लांड मर्डर कहा जाना ही बेहतर है।
अभी 48 घंटे पहले ही राष्ट्रीय  राजधानी से चंद किलोमीटर दूर गुुरुग्राम में सीवर की सफाई के दौरान तीन मजदूरों की दर्दनाक मौत ने मंथन करने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हम कब तक इस प्लांड मर्डर को देखने के लिए मजबूर रहेंगे। भारतीय संसद ने भी मैन्युअल स्कैवन्जर्स रीहैबिलिटेशन एक्ट के जरिए इस प्रथा को रोकने का भरपूर प्रयास किया है। 2013 में यह एक्ट पास हुआ, लेकिन आज तक किर्सी भी राज्य सरकार ने इस एक्ट को सीरियसली नहीं लिया है। हाल यहां तक खराब हैं कि हर साल सबसे अधिक मौत राष्ट्रीय  राजधानी दिल्ली और उसके आसपास ही होते हैं। इससे भी बूरा यह है कि विभिन्न राज्य सरकारों ने इस एक्ट को लेकर कभी गंभीरता नहीं दिखाई। परिणामस्वरूप सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों का आंकड़ा दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है।
भारत में 1993 से ही सीवरेज की मैन्यूअल सफाई पर रोक है। बाद में 2013 में इस संबंध में एक्ट भी पारित कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट तौर पर सभी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को कहा कि वर्ष 1993 के बाद जितनी भी मौतें सीवरेज में मैन्यूअल सफाई के दौरान हुई उन सभी के परिजनों को दस-दस लाख मुआवजा दिया जाए। सफाई के दौरान होने वाली मौतों को साफ तौर पर मर्डर माना गया। मंथन का वक्त है कि इतने सारे कदम उठाए जाने के बावजूद आखिर ये प्लांड मर्डर क्यों नहीं रोके जा रहे हैं। इसके लिए हम किसे जिम्मेदार ठहराएं। राज्य सरकार या उसकी एजेंसियां इसके लिए जिम्मेदार हैं या फिर सीधे तौर पर केंद्र सरकार। कटघरे में सभी हैं क्योंकि यह एक राष्ट्रीय  समस्या के तौर पर मौजूद है और इसका हल भी राष्ट्रीय स्तर पर ही निकालने की जरूरत है।

याद करिए। आज से 30-40 साल पहले का वक्त। जब सिर पर मैला ढोते हम किसी व्यक्ति को देखते तो कैसा महसूस होता था। यह एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होती थी। आज अगर कोई दिख जाए तो हमारा रिएक्शन कैसा होगा जरा इसकी कल्पना करें। महात्मा गांधी ने ताउम्र ऐसी प्रथाओं को दूर करने का आह्वान किया। वे बेहतर मानवीय जीवन के हिमायती थे। अपने तमाम संदेशों में उन्होंने ऐसी प्रथाओं को जड़ से खत्म करने का आह्वान किया। आज स्थिति में सौ फीसदी तो नहीं, लेकिन 98 फीसदी जरूर सुधार है। आज सिर पर मैला ढोने की प्रथा लगभग समाप्त हो चुकी है। पर दूसरी तरफ सीवरेज में जाकर सफाई करने की मजबूरी ने हमें मंथन करने पर मजबूर कर दिया है।
भारत विकास के एक बेहतर मुकाम पर है। सीवरेज सफाई के लिए देशी और विदेशी तकनीक का बेहतर इस्तेमाल भी हो रहा है। फिर क्यों हम प्लांड मर्डर होने दे रहे हैं। क्या राज्य सरकारें और उनकी नोडल एजेंसियां इसके लिए जिम्मेदारी तय नहीं कर सकती हैं। क्यों नहीं मैन्युअल सफाई को पूरी तरह खत्म करने की दिशा में हम सार्थक प्रयास करें। आज दो अक्टूबर है। आज के दिन विभिन्न राज्य सरकार और केंद्र सरकार दो कदम आगे बढ़े। हर जगह विभिन्न नोडल एजेंसियों और उनके ठेकेदारों द्वारा सीवरेज सफाई का काम करवाया जाता है। उनकी जिम्मेदारी तय करते हुए आदेश पारित किए जाएं कि बहुत मजबूरी होने पर ही किसी कर्मचारी को सीवरेज में उतारा जाए। बिना सुरक्षा उपकरण, गैस मास्क के कोई भी कर्मचारी सीवरेज में नहीं उतारा जाए। किसी भी तरह की दुर्घटना के लिए संबंधित सफाई एजेंसी ही जिम्मेदार होगी। अगर सीवरेज में सफाई के दौरान किसी की मौत होती है तो संबंधित एजेंसी को ही एक हफ्ते के अंदर परिजनों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित दस लाख रुपए का मुआवजा देना होगा।
इसमें दो राय नहीं है कि सीवरेज एक ऐसा जाल है जिसे ठीक करने में हम सौ फीसदी मशीनों पर निर्भर नहीं रह सकते हैं। मजबूरी है कि हम मैन्यूअली काम करवाएं। पर क्या इससे भी इनकार किया जा सकता है कि प्रत्येक राज्य सरकार मैन्यूअली वर्क करवाने के लिए एक अलग विंग स्थापित करे। इसके अंदर मजदूरों को बेहतर ट्रेनिंग दे। सुरक्षा उपकरणों का एक बेहतर संसाधन उपलब्ध करवाएं। क्यों नहीं स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और अर्बन डेवलपमेंट में ही हम सीवरेज ट्रीटमेंट के आधुनिकीकरण को भी जोड़ दें। इसके लिए किसी अतिरिक्त बजट की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। तमाम ऐसे उपाय हैं जिसे स्थापित कर हम इस प्लांड मर्डर को रोक सकते हैं।
पूरी दुनिया में सीवरेज सफाई को लेकर बड़ा अभियान चल रहा है। ग्लोबल रूप में इसे कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है इसे समझने के लिए यह काफी है कि भारत में सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े बेजवाड़ा विल्सन को मैगसेसे जैसा प्रतिष्ठित अवॉर्ड तक मिल चुका है। 

आज गांधी जयंती से बड़ा मौका कोई दूसरा नहीं हो सकता कि हम संकल्प लें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर पूरे देश में गांधी जयंती पर सफाई अभियान के लिए बड़ी पहल की गई है। पूरे देश की जनता भारत सरकार के साथ है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को सीवरेज सफाई के दौरान होने वाली अमानवीय कृत को रोकने की दिशा में भी सार्थक आह्वान करने की जरूरत है। पूरा देश उनकी बात सुन रहा है। ऐसे में वे कुछ ऐसा करें कि राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी समझें और इस प्लांड मर्डर को रोकें।
चलते चलते
कुछ दिन पहले एक खबर आई थी कि केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने सफाई कर्मचारियों की मौत को गंभीरता से लिया है। अब मैन्युअल स्कैवन्जर्स रीहैबिलिटेशन ऐक्ट, 2013 में बदलाव पर मंथन किया जा रहा है। इस ऐक्ट में संसोधन करते हुए एजेंसियों और ठेकेदारों को जिम्मेदार बनाया जाएगा। बहुत सी कमियों को दूर करते हुए ऐक्ट को और भी सशक्त बनाया जाएगा। अगर सच में ऐसा है तो बदलाव का यही समय है।