Monday, June 8, 2015

मुनि जी आपका नि:वस्त्र होना

आज शाम आॅफिस की कैंटिन बंद थी। अपने न्यूज एडिटर सुमित शर्मा के साथ आॅफिस के सामने नेशनल हाईवे के उस पार चाय की दुकान तक गया था। बगल में ही अंबाला-चंडीगढ़ रीजन का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित स्कूल है। अचानक वहां के मेन गेट पर हलचल होती है। चंद पलों में ही नि:वस्त्र चले आ रहे जैन मूनि नजर आते हैं। अगल-बगल चंद भक्तों की फौज के साथ पैदल चले आ रहे मुनि जी स्कूल में प्रवेश कर जाते हैं। नहीं पता स्कूल में मुनि जी के आने का क्या उद्देश्य होगा? नहीं पता कि स्कूल में वे प्रवचन देने आए हैं या फिर किसी अन्य काम से? पर इन सबके बीच कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे यह सबकुछ लिखने पर मजबूर किया। हो सकता है मेरा कुछ लिखना कुछ धर्मांध लोगों को अखरे। पर ‘कड़वे’ बोल तो जैन धर्म के सबसे बड़े मुनि जी भी बोलते हैं। वह भी टीवी पर। इसीलिए मुझे लगता है कि कड़वा बोलना अनुचित नहीं है।
              मैं बता रहा था स्कूल के सामने का दृश्य। मुनि जी के स्कूल में प्रवेश से ठीक पहले उनके सामने से दो महिलाएं भी गुजर रहीं थीं। अचानक वे दोनों सामने से नग्न चले आ रहे मुनि महाराज को देखकर वापस मुड़ गर्इं। यह शर्म और हया का ही परदा था कि जिस धर्म में आप जैसे जैन मुनियों को नि:वस्त्र देखने की आजादी है, वहीं दूसरे धर्मों में इस तरह के मामलों पर सार्वजनिक बातचीत करना भी असंस्कारी होने का प्रतीक माना जाता है। दोनों महिलाओं ने थोड़ी देर वापस चलने के बाद फिर अपनी राह जरूर पकड़ ली, पर यह सवाल भी छोड़ गई कि ऐसा क्यों है?
सामान्य धर्म का ज्ञाता भी इस बात को समझता है कि जब आपने मोक्ष प्राप्त कर लिया तो जीवन में सुख-दुख, रिश्ते-नाते, भोग-विलास, अपने-पराए की दीवारों के मायने खत्म हो जाते हैं। धर्म-गं्रथों में इस पर विस्तार से चर्चा की गई है। कुछ ऐसा ही जैन मुनियों के साथ है। माना जाता है कि आपने मोक्ष की राह पकड़ ली है। जिसके कारण दिगंबर बन चुके हैं, अर्थात दिक़ यानि दिशाएं ही आपका अंबर यानि वस्त्र हैं। शायद बहुत लोगों को पता न हो कि कितने कठिन तप और कठोर नियमों में आप बंधे होते हैं। पर छोटा सा सवाल जैन मुनियों से लाजमी है कि जब आपने मोक्ष की राह पकड़ ली है तो सार्वजनिक जीवन में इस तरह आपका विचरना कहां तक उचित है। हिंदु धर्म में ही नागा साधुओं की अपनी अलग दुनिया है। उन्हें तो कभी इस तरह सार्वजनिक जीवन में विचरते नहीं देखा जाता है। जिन्हें नागा साधु बनना होता है, या जो उनके कर्मकांडों से प्रभावित होते हैं वे उनके अखाड़ों में जाकर दीक्षा लेते हैं। वहीं रहते हैं, वहीं जीते हैं। कुंभ स्रान जैसे धार्मिक मौकों पर ही उनके सार्वजनिक दर्शन सुलभ होते हैं।
इतिहास का छात्र रहा हूं इसीलिए जैन धर्म के ऐहितासिक साक्ष्यों को पढ़ा और जाना है। पढ़ाई के दौरान ही मैंने जाना था कि जैन धर्म के 24 तीर्थकंर हुए। जिन्होंने जैन धर्म को प्रचारित और प्रसारित करने का काम किया। ऋषभदेव जी महाराज जिन्हें आदिनाथ भी कहा गया, से शुरू होकर भगवान महावीर तक जैन धर्म कैसे पहुंचा इसकी विस्तृत व्याख्या भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। इहितास बताता है कि जैन धर्म में ऋषभदेव, अजितनाथ, संभवनाथ, अभिनंदन, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चंद्रप्रभ, सुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयांस- नाथ, वासुपूज्य स्वामी, विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत स्वामी, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के रूप में 24 तीर्थंकर हुए। महावीर स्वामी के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर कई प्रमाण हैं। महावीर स्वामी के बाद कालांतर में जैन धर्म दो संप्रदायों में विभक्त हो गया। एक स्वेतांबर कहलाए, दूसरे दिगंबर कहलाए। स्वेतांबर संप्रदाय को मामने वाले मुनि स्वेत अंबर यानि सफेद वस्त्र धारण करते हैं, जबकि दिगंबर संप्रदाय के मुनि नग्न रहते हैं। दिशाएं ही उनका वस्त्र होती हैं।
हर धर्म और संप्रदाय की अपनी सीमाएं हैं। अपनी मान्यताएं हैं। अपनी प्रथा है और उन प्रथाओं को पालन करने के अपने नियम हैं। कम से कम भारत में किसी को इसकी इजाजत नहीं है कि वे किसी दूसरे धर्म या संप्रदाय के खिलाफ कोई टीका टिप्पणी कर दे। मुझे याद आ रही है कुछ साल पहले आगरा की वह घटना। जैन धर्म के दिगंबर संप्रदाय के एक बड़े मुनि महाराज जी का आगरा प्रवास था। शहर में प्रवेश के लिए उन्हें एक संप्रदाय विशेष बाहुल्य क्षेत्र से ले जाया गया था। चुंकि सामान्य अवस्था में किसी व्यक्ति को नग्न देखना कौतूहल का विषय हो जाता है। कुछ ऐसा ही वहां भी हुआ। संप्रदाय विशेष के लोगों ने मुनि महाराज की नग्न अवस्था पर टिका टिप्पणी कर दी। चंद दिनों बाद ही आगरा का माहौल ऐसा खराब हुआ कि एक हफ्ते तक वहां कर्फ्यू लगा रहा। सांप्रदायिक हिंसा में कई घर जल गए। लोग एक दूसरे के दुश्मन बन गए। पूरा शहर अशांत हो गया था।
यह सिर्फ टिका टिप्पणी का मसला भर नहीं है। यह सार्वजनिक जीवन का प्रश्न भी है। यह सच है कि जैन मुनियों को धार्मिक स्वतंत्रता मिली है कि वे नग्न अवस्था में सार्वजनिक जीवन में कहीं भी जा आ सकते हैं। पर यही काम जब कोई साधारण मनुष्य कर दे और किसी ने शिकायत कर दी तो उसके खिलाफ सार्वजनिक स्थल पर अश्लीलता फैलाने का मामला तक दर्ज हो सकता है। आईपीसी की धारा 294 में आपको जेल भेजा   जा सकता है। अगर किसी महिला के सामने आपने अश्लील हरकत की तो धारा 354 में आपके खिलाफ मुकदमा दर्ज होगा। यहां तक कि 81 पुलिस एक्ट में भी इसका प्रावधान है।
बात सिर्फ इतनी सी है कि जब आपने दीक्षा लेकर मोक्ष  प्राप्ती की राह पकड़ ली, तो फिर सार्वजनिक जीवन में आपके आने का क्या तात्पर्य है। क्यों आप स्कूलों और कॉलेजों में जाते हैं। हर धर्म की मान्यताएं अनंत हैं, पर यह भी स्वीकार करना होगा कि सिर्फ जैन धर्म को मानने वाले ही शहर में मौजूद नहीं हैं। उन्हें आपका इस तरह नग्न अवस्था में विचरण करना अखर सकता है। हो सकता है दिगंबर धर्म की मान्यताओं को मानने वाली महिलाओं को आपका नग्न होकर उनके सामने आना नहीं अखरे पर यह भी सच है कि दूसरे धर्म की महिलाओं के लिए यह काफी बड़ा परदा होता है। क्या सिर्फ धार्मिक मान्यताएं मानकर दूसरे संप्रदाय या धर्म को मानने वालों का चुप रहना मजबूरी है?
मोक्ष की तमाम परिभाषाएं हो सकती हैं, पर एक साधारण मनुष्य के तौर पर तो मैं तो सिर्फ यही मानता हूं कि जिसने सांसारिक मोह माया से मुक्ति पा ली उसने मोक्ष पा लिया। जब सांसारिक जीवन से आपने मुक्ति राह पकड़ ली है तो सार्वजनिक जीवन से भी आपको दूर हो जाना चाहिए। धर्म में तो वह शक्ति है कि हर किसी को अपनी ओर खींचती है। जिन्हें आपके पास आना है वे खुद आपके पास चलकर आएंगे। आपको उनको पास जाने की जरूरत नहीं है।आपका तप, आपकी कड़ी साधना, दैनिक जीवन में आपकी अनुशासनात्मक दिनचर्या अनुकरणीय है। इसका प्रभाव ही काफी है कि लोग आपके पास खींचे चले आएंगे। पर यूं आपका नि:वस्त्र विचरण करना कई बार सोचने पर मजबूर कर देता है।
और अंत में
(अगर मेरी बातों से किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती तो मैं उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं)

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