Friday, June 26, 2015

शर्म उनको मगर आती नहीं


एक बार फिर उत्तराखंड के पहाड़ों पर विपदा आन पड़ी है। सरकारी तंत्र के होनहारों ने हजारों तीर्थ यात्रियों को संकट में ला खड़ा किया है। बार-बार  की चेतावनी के बाद भी उत्तराखंड सरकार चेत नहीं रही है। बिना किसी ठोस बंदोबस्त के चार धाम और हेमकुंड साहिब की यात्रा को जारी करने को रजामंदी दे रही है। नतीजा सामने है। हजारों यात्रियों की जान संकट में है। पूरे देश की नजर उत्तराखंड पर टिक गई है। इतना सब होने के बावजूद उत्तराखंड सरकार के कारिंदे ऐसे हैं जिन्हें शर्म नहीं आ रही है।
दरअसल उत्तरखंड में बार-बार आ रही आपदा को समझने के लिए हमें इसके भौगोलिक विस्तार को गहराई से समझने की जरूरत है। जून 2013 में आ चुकी आपदा ने हमें चेता दिया था कि अगर पहाड़ों के साथ ज्यादा छेड़छाड़ की गई तो प्रकृति हमेशाअपना रौद्र रूप दिखाएगी। ऐसा भी नहीं है कि इससे पहले पहाड़ों में आपदा नहीं आई है, पर हाल के वर्षों में आ रही आपदाओं ने अपना नया रूप दिखाया है। नदियों ने अपना बहाव बदल दिया है। चाहे वह सोनप्रयाग हो या अगस्त्यमुनी या फिर रुद्रप्रयाग हो या चमोली, हर जगह नदियों ने अपना वर्षों पुराना रास्ता अख्तियार कर लिया है। कहा भी जाता है नदियां अपना मूल रास्ता कभी नहीं भूलती हैं। जिस तरह पहाड़ों में सभी नियमों की अनदेखी कर बेतहाशा निर्माण कार्य हो रहे हैं उसने पहले ही संकेत दे दिए थे कि आने वाला समय पहाड़ों के लिए भारी पड़ने वाला है। विकास के नाम पर नदियों के रास्ते तक अतिक्रमण का शिकार हुए। 2013 की आपदा में अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी ने जब अपना विकराल रूप दिखाया उसने सबकुछ उलट पुलट कर रख दिया। हाल यहां तक खराब हुए कि कई-कई किलोमीटर तक राष्टÑीय राजमार्ग नदियों के मुख्य बहाव की जद में आ गए।
उत्तराखंड को पुनर्जिवित करने के लिए हजारों करोड़ रुपए के मदद आए। पर विधानसभा के पटल पर रखी गई कैग रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किस तरह इन पैसों का दुरुपयोग हुआ। किस तरह हजारों करोड़ रुपयों को पानी में बहा देने के लिए छोड़ दिया गया। उत्तराखंड को पुनर्जिवित करने के लिए सबसे बड़ी जरूरत थी कि इसका बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जाए। जमीनी शुरुआत करने की जरूरत थी। पहाड़ को पहाड़ के नजरिए से देखते हुए पुनर्निमाण करने की प्लानिंग करनी थी। पर हुआ इसका उल्टा। सरकार का मुख्य उद्देश्य बन गया जैसे-तैसे चार धाम यात्रा शुरू करवा दी जाए। पुनर्निर्माण की जगह पूरा फोकस यात्रा शुरू करने पर कर दिया गया। 2014 में भी इसी तरह यात्रा शुरू हुई। उस साल भी सरकारी तैयारियों की पोल खुल गई। पर इससे भी सरकार ने कुछ सीख नहीं ली।
परिवर्तन बस इतना हुआ कि उत्तराखंड से पिता-पूत्र का शासन समाप्त हुआ। विजय बहुगुणा और उनके पुत्र साकेत बहुगुणा की राजशाही खत्म हुई और उसकी जगह हरीश रावत को कमान सौंपी गई। पहाड़ के लोगों के बीच उम्मीद की किरण जगी। चुंकि हरीश रावत को ठेठ पहाड़ी माना जाता है, इसीलिए उम्मीद थी कि वे पहाड़ के दर्द को समझेंगे। पर अफसोस ऐसा हो नहीं सका। वे भी उसी चाकरी से घिरे रहे जिन्होंने बहुगुणा के समय पहाड़ का शोषण किया और राहत और पुनर्निर्माण के नाम पर हजारों करोड़ रुपए डकार गए।
वक्त ने एक बार फिर पलट कर उत्तराखंड सरकार की तरफ देखा है। सत्ता परिवर्तन के ठीक एक साल बाद फिर पहाड़ कराह रहा है। पहाड़ को पुनर्जिवित करने के नाम पर हर जगह अस्थाई पुल बना दिए गए। जैसे-जैसे सड़क निर्माण कर दिए गए। सड़क भी चार धाम मुख्य यात्रा मार्ग के ही बनाए गए। जब पता था कि नदियां जब उभान पर आएंगी ये अस्थाई पुल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगे। बावजूद इसके न तो इनकी क्वालिटी पर ध्यान दिया गया और न ही स्थायित्व का ख्याल रखा गया। नतीजा यह हुआ कि हल्की बारिश में ही उत्तराखंड की हालत खराब हो गई। राष्टÑीय राजमार्गों की हालत भी खराब हो चुकी है। जगह-जगह हुई लैंड स्लाइडिंग ने यात्रियों के रास्ते रोक रखे हैं।
इसमें दो राय नहीं कि चारों धाम सहित हेमकुंड साहिब भारतीय सनातन धर्म के आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। हर साल लाखों यात्री यहां की यात्रा करना चाहते हैं। इन यात्राओं से सरकार को भी हजारों करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। पर मंथन का वक्त है कि क्या हम सिर्फ धार्मिक यात्राओं की दृष्टि से ही उत्तराखंड को देखें। या फिर इसे देखने का नजरिया बदलने की जरूरत है। उत्तराखंड को वास्तव में एक ऐसे ठोस तरीके से सजाने संवारने की जरूरत है जो लंबे समय तक कायम रह सके। क्या हुआ कि अगर एक दो साल यात्रा नहीं होगी तो। इससे कोई खास फर्क तो नहीं पड़ा जाएगा। 2013 की घटना के बाद से तो वैसे भी पूरा देश भयभीत है। फिर क्या जरूरत है करोड़ों रुपए विज्ञापन पर खर्च कर पूरे देश से यात्रियों को वहां बुलाने की।
न आपके पास प्लानिंग है, न आपके पास व्यवस्था है और न ही आपके पास ठोस निर्माण का व्यवस्थित ढांचा है। ऐसे में सभी यात्राओं को कुछ साल के लिए बंद कर ठोस निर्माण पर ध्यान दें तब जाकर ही हम अगले पचास साठ साल के लिए निश्ंिचत हो सकते हैं, नहीं तो हर साल ऐसे ही विपदा आएगी और हमारी जान संकट में रहेगी। पहाड़ के लोग तो हर वक्त त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही हैं, उत्तराखंड सरकार दूसरे राज्यों के लोगों को   भी क्यों सता रही है इसका जवाब कोई नहीं दे रहा है। कुछ तो शर्म करो उत्तराखंड सरकार। अब भी मंथन का वक्त है। अभी मंथन नहीं किया तो वक्त अपना हिसाब तो जरूर लेगा ही। तैयार रहना।


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