Saturday, June 20, 2015

थैंक्स पापा, इस बेहतर जिंदगी के लिए

पुत्र का खत, पिता के नाम 


 पापा आपको तो पता भी नहीं होगा कि आज के दिन (21 जून ) जब आपकी मैरिज एनिवर्सरी होती है, इसी दिन फादर्स डे भी होता है। आज तक हमने कभी फादर्स डे सेलिब्रेट नहीं किया। जब हम छोटे बच्चे थे उस वक्त इस तरह के स्पेशल डे का प्रचलन नहीं होता था। हमने भी नहीं जाना कि फादर्स डे क्या होता है। हम कितने खुशनसीब थे कि अपने पापा के लिए एक खास दिन नहीं निकालना पड़ता था। हमारे लिए तो हर दिन फादर्स डे ही होता था। हर दिन हम आपके साथ सेलिब्रेट करते थे।

बचपन में आपके सिर से पके हुए बाल उखाड़कर कटोरी में जमा करना। फिर एक पैसे के हिसाब से उसे काउंट करना। उस हिसाब के अनुसार आपसे मेहनताना लेकर आईसक्रीम वाले और पेड़े वाले बाबा का इंतजार करना। कभी-कभी चनाचुर गरम वाले की भी बारी आती थी। हमारे लिए तो वही खुशी फादर्स डे सेलिब्रेशन की तरह थी। हमारे लिए तो आप वर्ल्ड के बेस्ट पापा लगते थे जब शाम में सब्जी लाने के साथ-साथ आप गरमा गरम समोसे भी ले आते थे। खुशी इतनी होती थी कि शब्दों में बयां करना मुश्किल होता था।

हम कैसे भूल सकते हैं, मां द्वारा की जाने वाली सुताई। आपको ड्राइंग रूम में बंद करके मां मुझे और भईया को अंदर वाले कमरे में ले जाकर पीटती थी। आपको इसलिए इस सुताई कांड से बाहर रखा जाता था कि आप उल्टे मां पर ही भड़क जाते थे। हमारी सुताई कांड के बाद मां का आपसे झगड़ना कि आप तो कुछ बोलते ही नहीं हैं। आपके नहीं बोलने का ही नतीजा है कि दोनों भाई बिगड़ रहे हैं। पर आपका अपनी किताबों और फाइल से नजर न उठाना। चुपचाप पढ़ते रहना। यह सब हमारे जख्मों पर मरहम की तरह लगता था।

आपका संघर्ष भी हमने देखा है। हम मुजफ्फरपुर में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे और आप हमसे दूर अपने हथुआ स्थित कॉलेज में दूसरी जिंदगी जी रहे थे। सप्ताह में तीन दिन वहां और चार दिन हमारे साथ। यह सिलसिला करीब 22 सालों तक चला। आपके क्लास का रूटीन हमें भी याद हो गया था। कब आप जाएंगे, किस दिन आएंगे, हम मैथ के पहाड़ों की तरह रट चुके थे। जब हम छोटे थे, हमारे पास कोई साधन नहीं था तब हम भयानक ठंड और बरसात में भी आपको सुबह छह बजे की ट्रेन पकड़ने के लिए जाते देखते थे। मां सुबह-सुबह आपके लिए नाश्ता और दोपहर का खाना भी पैक कर देती थी। कई बार हम मां से पूछते भी थे कि दोपहर के बाद रात का खाना कौन देगा? मां मुस्कुरा देती थी और कहती थी पापा खुद बना लेंगे।
तीन दिन के क्लास के बाद आप जब लौटते थे तो घर आने की जल्दी में आप सीवान से शाम की ट्रेन पकड़ते थे, कई बार ट्रेन लेट होने के कारण आप देर रात घर पहुंचते थे। रात दस के बाद रिक्शा वाले आने से मना कर देते थे, तो आप पैदल ही घर तक सात किलोमीटर दूरी तय करते थे। हम कैसे भूल सकते हैं आपका वो संघर्ष।

वैसे तो यूनिवर्सिटी में 180 दिन का एकेडमिक सेशन होता था, उस पर से हड़ताल हमारे लिए किसी सौगात से कम नहीं होती थी, क्यों उन दिनों आप घर पर ही होते थे। आपका साइकिल चलाना भी हमें कई बार काफी अखरता था। जब दूसरे प्रोफेसर्स को हम स्कूटर, मोटरसाइकिल और कार पर देखते थे तो जलन होती थी। आप भी तो प्रोफेसर हैं फिर आपके पास क्यों नहीं। पर हमें पता था कि आपने कभी वो काम नहीं किया जो दूसरे प्रोफेसर्स करते थे। कोई ट्यूशन नहीं, कोई कोचिंग नहीं। आपका कॉलेज और हमारे साथ बिताए गए आपके पलों से अनमोल आपके लिए कुछ दूसरा नहीं था। आपकी ईमानदारी और काम के प्रति लगन ने हमें बहुत कुछ सीखाया। इसी के बदौलत हम आज अपने दम पर स्थापित हैं।

 मुझे अच्छी तरह याद है जब हमारे घर में पहला स्कूटर आया था। मंटू मामा के दोस्त सूरज मामा इंडियन ओवरसिज बैंक के मैनेजर बनकर मुजफ्फरपुर आए थे। जब आप उनके बैंक अपनी साइकिल से जाते थे तो वो आप पर नाराज होते थे। कहते थे, क्या जीजा जी आप स्कूटर तो ले ही सकते हैं। पर आप हंस कर टाल देते थे। पर दो-तीन महीने बाद उन्होंने जबर्दस्ती लोन देकर आपको स्कूटर खरीदवा दिया था। आपने भी इस लालच से खरीद लिया था कि दीदी की शादी में दहेज दे देंगे।
आपने तो सिर्फ दो दिन ही चलाने की कोशिश की। फिर न तो आपने सीखने की चाहत दिखाई और न ही हमने फोर्स किया। क्योंकि हम आजादी से स्कूटर उड़ा सकते थे। आपने भी कभी हमें नहीं टोका। आप अपनी साइकिल पर ही मस्त रहे। हां इतना जरूर था कि आपकी डेली रुटीन बन गई थी कि अपनी साइकिल के साथ स्कूटर को चमकाना। आपको इस बात की चिंता रहती थी कि स्कूटर पुरानी न हो जाए, नहीं तो दहेज में कौन लेगा।
स्कूटर आने के बाद आपको सुबह-सुबह स्टेशन छोड़ने के लिए हमारा सुबह जागने का सिलसिला शुरू हो गया था। पर कई बार आप ठंड को देखते हुए मना भी कर देते थे। पैदल ही निकलने के लिए तैयार हो जाते थे। पर स्कूटर आने के बाद मैंने और भईया ने कभी आपको पैदल नहीं जाने दिया। भईया तो कई बार आपको रात में स्टेशन से लेने भी पहुंच जाता था। मुझे रात में जाने की इजाजत नहीं होती थी। पर आपने कभी न छोड़ने की बात कही और न स्टेशन से लेकर आने का आॅर्डर दिया। आपका ही दिया संस्कार है कि हम सभी में आज भी वो प्यार और सम्मान कायम है। हम एक दूसरे से इतनी दूर होकर भी एक अनमोल डोर में बंधे हैं।

हमारी पढ़ाई-लिखाई और हमारे बेहतर भविष्य के लिए आपने जो त्याग किया उसकी कोई कीमत नहीं चुकाई जा सकती है। मुझे आज तक याद नहीं जब आपने कभी मेरे ऊपर हाथ उठाया हो या दीदी को कभी डांटा हो। हां भईया के ऊपर आपका गुस्सा आज भी याद है। जब भईया आपके मना करने के बावजूद उस दिन क्रिकेट खेलने चला गया था। वहां उसके नाक पर चोट आई थी। प्रमोद चाचा ने उसे डॉक्टर से दिखलाया और घर ले आए। चोट के कारण भईया को दर्द काफी हो रहा था और उसे सुला दिया गया था। चुंकि शाम का वक्त था और मच्छर काफी थे इसीलिए दीदी ने मच्छरदानी लगा दी थी। मां को तो जितना कुछ कहना था   उन्होंने कह दिया था पर हम सभी आपके आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। हमें नहीं पता था कि दवाई लाने जा रहे प्रमोद चाचा ने आपको पूरे प्रकरण की जानकारी पहले ही दे दी है। आप घर में घुसते ही भईया पर चिल्लाए और उसके रूम में जाकर मच्छरदानी के ऊपर से चप्पलों की बरसात कर दी। आपको भी पता था कि मच्छरदानी के ऊपर से चोट नहीं लगने वाली, लेकिन मां के शब्दवाण से बचने के लिए आपने अपना रौद्र रूप दिखाया। फिर शांत हो गए। मैं और दीदी एक दूसरे को देखकर मन ही मन मुस्करा रहे थे और भईया तो ऐसे बन रहा था कि उसे जैसे कुछ पता ही नहीं अभी-अभी क्या हुआ। पापा आपके गुस्से में भी आपका प्यार हमें संबल देता है।

आपने अपनी जिंदगी में जितना संघर्ष किया उसका अंश मात्र भी हम कर लें तो बहुत होगा। आज भी आपसे बात किए हमें कई-कई दिन हो जाते हैं। मां से ही बात होती है। पर हमें पता है मां आपको सबकुछ बताती है और हम भी आपके बारे में मां से ही पूछ लेते हैं। ऐसा क्यों है यह आज तक समझ नहीं पाया। पर यह भी सच ही है कि बेटी पापा से और बेटे मां से ज्यादा करीब होते हैं।

पाप आज आपके और मां के लिए जब मैंने सेकेंड एसी का टिकट कटवाया तो मां बिगड़ने लगी। कहने लगी क्या जरूरत थी सेकेंड एसी की, थर्ड एसी से ही चले जाते। क्यों बेकार में ज्यादा पैसे खर्च कर दिए। कहने को तो मैं मां को बहुत कुछ कहता पर इतना ही कह पाया कि बहुत संघर्ष किए हैं तुमने और पापा ने अपनी जिंदगी में। अब जब सबकुछ से निश्ंिचत हो गई हो तो क्या हो गया अगर तुमने सेकेंड एसी में सफर कर लिया। मां का जवाब भी सुन लीजिए उन्होंने क्या कहा, हमारा क्या हम तो तुम लोगों के लिए ही जी रहे हैं। मां ने यह कह तो दिया पर मुझे आपका और मां का मेरे, भैया और दीदी के लिए किया गया त्याग, तप और संघर्ष ऐसा है, जिसका ऋण कभी नहीं चुकाया जा सकता। लव यू पापा। आपका और मां का साया जबतक हमारे साथ है हमारे साथ कभी बुरा नहीं हो सकता। आज हम जो कुछ भी हैं आपके द्वारा दिए गए संस्कार, प्यार और विश्वास की बदौलत हैं। थैंक्स आपने हमें इतनी बेहतर जिंदगी दी।

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