Thursday, June 18, 2015

उत्तराखंड त्रासदी : अब बचाने से बड़ी थी जलाने की चुनौती

 शवों का सामूहिक दाह संस्कार से पूर्व पुलिसकर्मियों ने अंतिम सलामी दी।
चाहने वालों ने कोशिश तो बहुत की लेकिन
खो गया मैं तो ढूंढ न पाया मुझको!
सख्त हैरत में पड़ी थी मौत, ये जुमला सुनकर
आ, अदा करना है सांसों का किराया मुझको !!


केदारघाटी में पड़े जहां-तहां पड़े हजारों शव शायद अपने सांसों का किराया इसलिए मांग रहे थे क्योंकि उन्हें मुक्ति चाहिए थी। सबसे बड़ा सवाल यही तो था आपदा के बाद, आखिर उन्हें मुक्ति कौन देगा। इसका जिम्मा दिया गया उत्तराखंड पुलिस और एनडीआरफ की टीम को। बेहद खराब मौसम, रास्तों का अता पता नहीं, कनेक्टिविटी की प्रॉब्लम, भोजन की दिक्कत, इन सबके बीच उत्तराखंड पुलिस को काम करना था।

अब तक की पत्रकारिता में मैंने जब भी पुलिस का चेहरा देखा था तो बड़ा की कुरुप चेहरा ही देखा था। कभी शवों को लात से टटोलती पुलिस की तस्वीरों को देखा था, कभी मृतकों के परिवारों से असभ्य भाषा में बात करते देखा था। यह पहली बार था जब मैं ही क्या पूरे भारत को पुलिस का एक ऐसा मानवीय चेहरा नजर आया, जिसने लोगों की सोच को बदल कर रख दिया। क्या डीआईजी, क्या एसपी और क्या कांस्टेबल। सभी का एक ही मकसद बन गया था मृतकों का अंतिम संस्कार।

उत्तराखंड पुलिस की गुलदार टीम के 19 जांबाजों को भी इस काम में लगाया गया था। इस टीम में पहाड़ों में काम करने का अनुभव करने वाले विशेष प्रशिक्षण प्राप्त जवान थे। इनका काम था ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों में शवों की खोज करना और उन्हें एक जगह जमा करना। फिर इसकी सूचना दूसरी टीम को देना। उत्तराखंड पुलिस की दूसरी टीम शवों का एक साथ दाहसंस्कार करती थी। इस काम में सबसे बड़ी चुनौती थी मौसम मनमानी। जबर्दस्त ठंड और बारिश ने भी जवानों के हौसले को कम नहीं होने दिया। मुश्किल यह भी थी कि पहाड़ों में मौजूद लकड़ियां बारिश से पूरी तरह भींग चुकी थी। इससे अंतिम क्रिया नहीं की जा सकती थी। केदारनाथ मंदिर परिसर में भी हजारों शव इधर-उधर बिखरे पड़े थे। सड़ गल रहे इन शवों से उठ रहे दुर्गंध ने आवारा हिंसक पशुओं को भी आमंत्रित कर दिया था। चुनौती यह थी कि अगर इन शवों का जल्दी दाहसंस्कार न किया गया तो महामारी फैल जाएगी।इस चुनौती में एक बार फिर सहारा बनी इंडियन एयर फोर्स। एयर फोर्स के बड़े हेलिकॉप्टर से शवों के सामूहिक दाह संस्कार के लिए लकड़ियां भेजे जाने का निर्णय हुआ। गौचर स्थित एयर बेस पर किसी तरह सूखी लकड़ियां पहुंचाई जाती थी फिर वहां से इन लकड़ियों को हेलिकॉप्टर में डाल कर केदारघाटी पहुंचाने का काम शुरू हुआ।

डीआईजी संजय गुंज्याल को इस टीम को लीड करने की जिम्मेदारी मिली थी। इस जांबाज पुलिस अधिकारी ने अपने सहयोगियों के साथ कई दिनों तक केदारघाटी में खतरनाक विपरीत परिस्थितियों के बीच कैंप किया। खुद शवों को उठाकर चिता सजाई। सामूहिक चिताओं को राजकीय सम्मान देते हुए अपने साथियों के साथ उन्हें अंतिम सलामी दी। फिर उनका संस्कार किया। कई दिनों तक यही प्रक्रिया चलती रही। पहले शवों को खोजा जाता था, फिर उन्हें एकत्र किया जाता था और अंतिम विदाई दी जाती थी।

डीआईजी संजय गुंज्याल, डीआईजी जीएस मातोर्लिया, डीआईजी अमित सिन्हा,  एसएसपी निलेश आनंद भरण, एसपी प्रदीप कुमार राय, एसपी मणिकांत मिश्रा, एसपी नवनीत भुल्लर, एसपी स्वतंत्र सिंह ये कुछ ऐसे नाम थे जो अपनी टीम के साथ आपदा के समय हीरो की तरह उभरे। न नाम की चाहत, न टीवी पर चेहरा चमकाने की ख्वाहिश, न अखबार के पन्नों में जगह की तमन्ना और न कोई अवार्ड की हसरत। बेहद खतरनाक परिस्थितियों ने इन्होंने अपने कर्तव्य को अंजाम दिया। तत्कालीन डीजीपी सत्यव्रत बंसल ने भी अपनी लीडरशिप क्वालिटी की बेहतरीन मिसाल कायम की। हर वक्त अपनी टीम के संपर्क में रहे और समय-समय पर गाइड करते रहे। अपने नाम और अपने काम को हमेशा मीडिया से दूर रखा।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र और इतिहास के साथ-साथ संस्कृत में शिक्षा प्राप्त एडिशनल एसपी मणिकांत मिश्रा ने तो केदारघाटी में मिले शवों के अंतिम संस्कार से पहले मंत्रों का जाप करने जैसा कार्य भी किया। दाह संस्कार के दौरान किए जाने वाले मंत्रों का उच्चारण कर मणिकांत मिश्रा ने अपने सहयोगियों के दिलों में अनोखी जगह बना ली। मणिकांत मिश्रा के इस कार्य के बारे में उनके ही एक सहयोगी ने बाद में देहरादून में बताया था। हालांकि उत्तराखंड पुलिस की इस तरह के कार्यों की चर्चा कभी मीडिया ही हेडलाइन नहीं बन सकी। और न ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए यह टीआरपी थी। पर उत्तराखंड पुलिस के इस तरह के सैकड़ों प्रयास आज भी गुमनाम हैं।

एक और चुनौती थी शवों के अंतिम संस्कार के पहले उनका डीएनए सैंपल लेना। क्योंकि अगर इन्हें नहीं लिया जाता तो उनकी पहचान करना असंभव था। देहरादून से एक टीम इसी काम के लिए केदारघाटी में कैंप कर रही थी। क्योंकि अपने से बिछड़ चुके लोगों को कम से कम यह तो संतोष दिलाया जा सके कि उनके अपने सच में उनसे बहुत दूर जा चुके हैं और पूरे रीति रिवाज से उनका अंतिम संस्कार भी किया जा चुका है।

इसी बीच कुछ दिनों बाद जब हालात सामान्य हुए और दोबारा केदारनाथ मंदिर में पूजा अर्चना शुरू करवाई गई तो उत्तराखंड सरकार ने इसे पूरे तामझाम के साथ मीडिया में प्रचारित करने का प्रयास किया। राजधानी देहरादून से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टीम को हेलिकॉप्टर में लाद-लाद कर केदारमंदिर तक पहुंचाया गया। पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कैमरों ने मंदिर में पूजा अर्चना की जगह उन तस्वीरों को   दिखाना शुरू किया, जिसे देखकर पूरे भारत में रोष की लहर दौड़ गई। मीडिया के कैमरों ने दिखाया कि अब भी जगह-जगह शव पड़े हैं। यह आरोप प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो चुका था कि उत्तराखंड पुलिस सही तरीके से शवों का दाह संस्कार नहीं कर रही है। पर सच्चाई जानने का किसी ने प्रयास नहीं किया था।

सच्चाई यह थी कि कई शव हजारों टन पत्थरों के नीचे दबे थे। बोल्डर्स इतने बड़े-बड़े थे कि उन्हें मानवीय हाथों से हटाना असंभव था। शव इस कदर दबे थे कि उन्हें किसी तरह निकाला नहीं जा सकता था। इसके लिए जेसीबी मशीनों की जरूरत थी। इन भारी मशीनों को हेलिकॉप्टर से इतनी तंग घाटी में उतारना संभव नहीं था। जिसके कारण उत्तराखंड पुलिस लाचार थी। टीवी पर शवों की खबर चलते ही उत्तराखंड सरकार के हाथ पांव फूल गए। जिस नियत से उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स को पूरे ताम झाम के साथ घाटी में उतारा था वह दांव उल्टा पड़ चुका था। हालांकि इसका असर यह हुआ कि दोबारा से पुलिस टीम को घाटी की ओर रवाना कर दिया गया। यह बात उत्तराखंड सरकार भी जानती थी और उत्तराखंड पुलिस भी कि इस तरह बिना संसाधन के घाटी में जाना समय की बर्बादी है। पर पूरे देश की भावनाएं जुड़ी थी, उत्तराखंड पुलिस एक बार फिर घाटी में थी।

आज भी घाटी में कंकालों का मिलना जारी है। लंबे समय तक यह जारी भी रहेगा, क्योंकि जिंदगी की चाहत में लोग ऐसी ऊंचाइयों तक पहुंच गए थे जहां सामान्य परिस्थितियों में कोई जाने की सोच भी नहीं सकता है।

शवों के दाह संस्कार के लिए  गौचर स्थित एयरफोर्स बेस पर हेलिकॉप्टर में लकङियां लादी जाती थी।

खराब मौसम के बीच इन सूखी लकङियों को केदारघाटी में पहुंचाना अपने आप में बड़ी चुनौती थी।

बेहद सख्त माने जाने वाले डीआईजी संजय गुंज्याल का यह मानवीय रूप किसी ने नहीं देखा था।

  अपने कामों से एडिशन एसपी मणिकांत मिश्रा (बीच में) ने अपने सहयोगियों के दिल में एक खास जगह बनाई।

जहां-तहां बिखड़े पड़े शवों का हाल यह था कि उन्हें बहुत दूर ले जाया भी नहीं जा सकता था। ऐसे में इन शवों का उस स्थान पर ही दाह संस्कार कर दिया गया।



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