Wednesday, June 17, 2015

आपदा बनी पत्रकारिता की पाठशाला

यह तस्वीर दैनिक जागरण के फोटो जर्नलिस्ट राजू ने ली थी। आपदा के कहर के बाद पहाड़ की चुनौती की यह जीवंत तस्वीर थी।
किसी भी पत्रकार के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जो उसके लिए पाठशाला बन जाती है। 2013 की उत्तराखंड त्रासदी कुछ ऐसी ही पाठशाला साबित हुई। ऊपरवाला न करे इस तरह की पाठशाला में दोबारा जाने का किसी को मौका मिले। पर इस एक पाठशाला ने उत्तराखंड के तमाम पत्रकारों की जिंदगी बदल कर रख दी। खबरों को देखने, समझने और उसे प्रजेंट करने का हर तरह से एक नया नजरिया मिला। बड़े से बड़े प्रिंट के पत्रकार हों या टीवी जर्नलिस्ट, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहां से की जाए और खत्म कहां की जाए। भयानक आपदा से बचकर आए हर एक शख्स के साथ दस-दस कहानियां थीं। पहाड़ों का दर्द भी था और सरकार की नाकामियां भी थीं। उत्तराखंड के पत्रकारों और फोटो पत्रकारों को दिल से नमन, जो उन्होंने उस वक्त रिपोटिंग की वह पत्रकारिता के लिए मिसाल बनी। हालांकि इन्हीं रिपोर्टिंग में कुछ ऐसी खबरों ने भी जगह बना ली, जिसने पत्रकारिता को गहराई तक शर्मिंदा किया। आज केदारनाथ त्रासदी की दूसरी किस्त में कुछ ऐसे ही साहसिक रिपोर्टिंग और शर्मशार करने वाली रिपोर्टिंग की चर्चा।

18 जून की शाम के बाद से राजधानी देहरादून के तमाम न्यूज रुम में त्रासदी के अलावा दूसरी खबरों की चर्चा ही नहीं बची थी। हर तरफ से छन-छन कर आ रही सूचनाओं का समंदर था, जिसमें से खबर निकालना चुनौती से कम नहीं था। तमाम अखबारों के रिपोर्ट्स की टीम भी 19 जून की सुबह पहाड़ों की ओर रवाना हो चुकी थी। इन रिपोर्ट्स के साथ तमाम तरह की समस्याएं थीं। पहाड़ों में पहुंचने के सभी रास्ते बंद थे। फोन और बिजली के लाइन ठप थे। अपनी गाड़ियों से रवाना हुए कुछ रिपोर्ट्स बीच रास्ते में फंस चुके थे। देहरादून के जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से भारतीय सेना का रेस्क्यू आॅपरेशन शुरू हो चुका था। सहस्त्रधारा हैलीपैड पर प्राइवेट एविएशन के हेलिकॉप्टर रेस्क्यू कर रहे थे। जुगाड़ और पैरवी करके जैसे-तैसे कुछ पत्रकार हेलिकॉप्टर से फाटा और गौचर तक पहुंचने में कामयाब भी हो गए थे। पर वहां से आगे जाने का न तो रास्ता था और न साहस। सबकुछ तबाह को चुका था। सबसे अधिक चुनौती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने थी। उनके पास फुटेज के नाम पर ऋषिकेश में गंगा का रौद्र रूप था। और इसी रौद्र रूप में बह चुके स्वर्गाश्रम के भगवान शिव की प्रतिमा की मोबाइल फुटेज। वहीं से लाइव रिपोर्टिंग शुरू थी।

दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे बड़े अखबारों के स्ट्रींगर्स पहाड़ों में मौजूद थे। पर उनके पास भी खबरों को पहुंचाने का संसाधन सीमित हो चुका था। फिर भी उन्होंने जो किया उसने पत्रकारिता के लिए एक मिसाल कायम की। अमर उजाला ने आपदा की कवरेज के लिए पहाड़ों के पत्रकारों को कई महीने बाद देहरादून में सम्मानित भी किया। नोएडा से देहरादून पहुंचे अमर उजाला के वरिष्ठ संपादक उदय कुमार ने जी भर कर स्ट्रींगर्स की तरीफ की। कई को नगद  देकर सम्मानित भी किया गया। अपने पत्रकारिता जीवन में स्ट्रींगर्स के प्रति इतना सम्मान मैंने पहली बार देखा था। अघोषित तौर पर स्ट्रींगर्स को पत्रकारिता में सबसे नीचले पायदान पर रखा जाता है। पर उत्तराखंड की आपदा में इन्हीं नीचले पायदान पर रहे लोगों ने बता दिया कि पत्रकारिता में कभी कोई नीचला पायदान नहीं होता है। सभी पायदान समान ही होते हैं। कोई ऊपर से शुरू होता है कोई नीचे से।

मुझे अच्छी तरह याद है अमर उजाला के अगस्त्यमुनि सेंटर के संवाददाता की कहानी। उसका नाम था दिनेश जमलोकी। आपदा ने उसका घर, खेत सबकुछ तबाह कर दिया था। जैसे-तैसे वह अपने परिवार को बचा सका था। किसी का घर तबाह हो जाए, खाने को मोहताज हों, बेघर हों इससे बड़ी दुख की घड़ी क्या हो सकती है। पर सलाम पत्रकारिता के उस जज्बे को। दिनेश ने पहले अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। फिर लगातार पंद्रह दिन तक बिना थके, बिना रुके रिपोर्टिंग की। ऐसी-ऐसी जीवंत रिपोर्ट भेजी जिसे अमर उजाला ने प्रमुखता से प्रकाशित किया।

करीब तीन दिन बाद जब बारिश थमी और पहाड़ के कुछ रास्ते खुले तब जाकर मीडिया की टीम धीरे-धीरे पहाड़ों तक पहुंचने में कामयाब रही। जैसे-जैसे मीडिया पहाड़ों में ऊपर की ओर जा रही थी, वैसे-वैसे खबरों के तेवर बदलते जा रहे थे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल सबसे ज्यादा खराब था। ओवी वैन लेकर टीवी पर अक्सर दिखने वाले बड़े चेहरों का बस एक ही मकसद हो गया था कि सबसे पहले केदारनाथ कौन पहुंचता है। चुंकि इन तीन-चार दिनों के बीच अखबारों के माध्यम से यह स्थापित हो चुका था कि आस्था के सबसे बड़े केंद्र केदारनाथ में ही सर्वाधिक नुकसान हुआ है। हर चैनल में बाद में यही ब्रेकिंग खबर चली, हम सबसे पहले पहुंचे केदारनाथ मंदिर। हमारे चैनल पर देखिए केदारनाथ की पहली तस्वीर। हमारे रिपोर्ट्स ने जान की बाजी  लगा दी यहां तक पहुंचने में। कुछ ऐसे ही स्लग के साथ ब्रेकिंग न्यूज में आपदा पीड़ितों की कहानी दब गई। हालांकि इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सक्रियता नहीं दिखाई होती तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी की जीवंत सच्चाई पूरी दुनिया नहीं देख सकती।

पर इस सच्चाई से भी जी नहीं चुराया जा सकता कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का  भौड़ापन और नंगापन भी साक्षात दिखा। एक बड़े चैनल के बड़े पत्रकार ने तो वह कर दिया जो लंबे समय तक याद रखा जाएगा। बांग्लादेश के पहाड़ों में हुए बस एक्सीडेंट की फूटेज को लाइव कवरेज में कंवर्ट करके लाइव रिपोर्ट दिखा दी। पांच-छह घंटे तक चली इस रिपोर्ट के बाद जब चैनल को अहसास हुआ तो तुरंत रिपोर्ट हटा दी गई। यह वीडियो 18 जून से ही सोशल मीडिया में चल रही थी। इसी को लाइव करके चला दिया गया था। बस खाई में गिर रही थी और चैनल का रिपोर्टर लाइव रिपोर्ट कर रहा था। टीवी पत्रकारिता के पतन की यह हद थी।

ठीक इसी तरह खुद को नेशनल अखबार कहने वाले अखबार ने केदारनाथ में लूट की खबरों का प्रमुखता से छापा। बताया कि वहां नेपाली युवक  शवों के साथ किस तरह गंदा खेल रहे हैं। महिलाओं की लाश से गहने चुराए जा रहे हैं। अंगुलियों में पहनी अंगुठी उतारने के लिए चाकू से अंगुली काट दी जा रही है। हद तो यह हो गई कि एक महिला के शव के अंगुली को काटती एक तस्वीर भी प्रकाशित कर दी गई। बाद में उत्तराखंड सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और अखबार को माफी मांगनी पड़ी।

इस तरह के सैकड़ों उदाहण थे आपदा के दौरान जब पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती आपके सामने थी। एक तरफ जहां ऐसे शर्मशार करने वाले उदाहरण सामने थे, वहीं दूसरी तरफ देहरादून के फोटो पत्रकारों की जीवंत तस्वीरें भी थीं। दैनिक जागरण के फोटो जर्नलिस्ट राजू पुशोला की एक ऐसी ही तस्वीर ने पहाड़ की चुनौतियों को साक्षात दिखा दिया था। आपदा के दौरान पहाड़ों से आने वाली एक-एक तस्वीर अपने आप में कई सौ शब्दों की कहानी बयां करने के लिए काफी थी। मीडिया फुटेज में भी शब्दों का स्थान ना मात्र का ही था। इन तस्वीरों और फुटेज को देखकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

आपके लिए मेरे पर्सनल आर्काइव से कुछ तस्वीरें। साभार : दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के फोटो जर्नलिस्ट चाचा उर्फ राजेश बड़थ्वाल, राजू पुशोला और अरुण सिंह। 


अपनों को खोने का दर्द क्या होता है, अरुण सिंह की इस एक तस्वीर ने बयां कर दी थी।

केदारनाथ में त्रासदी का क्या हाल था, यह चाचा द्वारा खींची गई इस तस्वीर में नजर आ रही है। ध्यान से देखने पर आप पाएंगे कि चार धाम सीजन में हजारों की भीड़ वाले इस मंदिर में सिर्फ एक काला कुत्ता विचर रहा है।

कई क्षेत्रों में कस्बों के बीच में नदियों का मुख्य प्रवाह आ गया था।

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