Monday, August 13, 2018

काशी से कामाख्या - दोस्त, यही फना है


पढ़िए काशी से कामख्या की तीसरी और चौथी किस्त

उस रात हम सोये ही नहीं। पूरी रात आंखों में कट चुकी थी। पत्नी के सेल फोन का चार बजे का अलार्म रोजमर्रा की मानिंद बांग देने लगा था। चूंकि मिसेज बबिता भारद्वाज ने हमें ताकीद किया था कि वो हमें सिक्स फिफ्टीन तक लेने आ जाएंगी लिहाजा हमें जल्दी तैयार होना था। सो, हम एक दूसरे को आवाज देते हुए नहाने धोने की तैयार में लग गये। अनवरत बारिश के चलते गुवाहाटी का टेम्परेचर बाइस या तेइस पर उतर आया था। अचानक से पता चलने पर कि होटेल का सोलर गीजर काम नहीं कर रहा है, सब बेचैन हो उठे। समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ठंडे पानी से नहाया कैसे जाएगा। सबकी राय बनी कि जिसकी हिम्मत होगी वो नहायेगा वरना वजू से काम चलाया जाएगा। एक के बाद एक घुसता और नहा कर ही निकलता। आश्चर्य की हाथ धोते और ब्रश करते बेहद ठंडा लग रहे पानी की तासीर पीठ पर पडते वक्त बदल चुकी थी। जैसे शावर में किसी ने कोई दुआ पढ कर दम कर दिया हो। बहरहाल, साढे पांच या पौने छह बजे ही हम रेडी हो गये थे। अब हर लमहा बेचैनी बढती चली जा रही थी। मिसेज बबिता अपने बताये वक्त पर अपने हसबेंड के साथ आयीं और उन्होंने अपने मौसेरे भाई परितोष शर्मा को काॅल कर समझा दिया कि हमें जगद्जननी माता कामाख्या का विधिवत दर्शन पूजन करा दिया जाए। इसके बाद वो एक ओला कैब में हमें बैठा कर वापस लौट गयीं। और अब हम निकल पडे थे मां की जियारत के लिए। रवायत के मुताबिक हम सब निन्ने मुंह थे। मतलब हममें से किसी ने कुछ भी खाया पीया नहीं था। ये सब हमें उस सुनहरी जुल्फों वाले ने अपनी पहली तवज्जे में ही बता दिया था कि कम खाना और कम सोना राहे इश्क की पहली शर्त है। जियारत पर जाने का इरादा बांधने के साथ ही उसके तसव्वुर की बात भी उन्होंने हमें जैसे घुट्टी में पिला दी थी। सो हम सब चुपचाप चले जा रहे थे। टैक्सी ड्राइवर भी हमें देख अचंभे में था की अजीब मनहूस सूरत वाले हैं जो आपस में भी बात नहीं कर रहे हैं। रास्ते में मेन रोड आने तक तो हम बाहोश थे। गुवाहाटी की दुकानों पर लगे बोर्ड पढते हुए असम की इकाॅनमी को बूझने का प्रयास करते रहे लेकिन पता नहीं कब वो रात वाला शख्स फिर आकर जलवागर हो उठा। हिना की तेज खुशबू के चलते कुछ सूझ ही नहीं रहा था। तभी चलती टैक्सी में फिर हमें उसकी आवाज सुनायी देने लगी। कहने लगे, इश्क के लिए दर्द बहुत जरूरी है। दर्द के बगैर इश्क और इश्क के बगैर दर्द हासिल नहीं हो पाता। कहने लगे, यार अब
माता पार्वती को देखो। उन्हें अपने महबूब शिव से बेपनाह मोहब्बत थी। उन्हें नजरअंदाज किया जाना माता पार्वती को दर्द दे गया। उन्हे ये सब इस कदर नागवार गुजरा कि वो जलाल के उस मुकाम पर पहुंच गयीं कि खुद को उस अग्निकुंड में समाहित कर लिया जिसे उनके पिता राजा दक्ष ने तमाम शक्तियों को पाने के लिए प्रज्ज्वलित किया था। उनके इस जलाल ने भोलेनाथ कहे जाने वाले शिव के जमाल में भी ताप की अग्नि सुलगा दी। वो अपनी उस तीसरी आंख को खोल बैठे जो कयामत का सबब था। अब जरा माता पार्वती के दर्द को समझो कि बाप ने अपने अनुष्ठान में दुनिया जहान को न्यौता पर अपनी उस बेटी को ही नहीं बुलाया जो पराशक्ति की पर्याय है। राजा दक्ष की अज्ञानता को देखो कि वो बेशक शक्ति की आराध्य की पैदाइश के सबब थे पर वो अपनी बेटी की ताकत को पहचान ही नही सके। सुनहरे लम्बे बाल वाला वो शख्स लगातार बोले चले जा रहा था। उस पराशक्ति का मुकद्दर भी देखो कि पति के कंधे पर लदे उसके पार्थिव देह के प्रबल ताप को फरिश्ते भी बर्दाश्त नहीं कर सके। गैब को जब कुछ नहीं सूझा तो उसने उस शख्सियत से उसका सुदर्शन चक्र चलावाया जिस पर इस सृष्टि के पालन की जिम्मेदारी थी। अब जरा उस देवी के दर्द को महसूस करो जो इश्क की पर्याय थी। प्रेम की प्रतीक थी। इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की मां पार्वती थी। उसका पार्थिव देह अपने उस महबूब शिव के कंधे पर लदा था जिसके सिर्फ एक बार पलक झपका देने पर न जाने कितने कायनात बनते और मिट जाते हैं पर जरा उसकी तकलीफ को देखो कि उसके अंग प्रत्यंग कट कट कर जगह जगह गिरते जा रहे थे और तमाम फरिश्ते ये सारा तमाशा देख रहे थे ? उफ, कितना अफसोसनाक रहा होगा वो मंजर कि हमारी मां के देह का इक्यावन टुकडा कर दिया गया। दोस्त, यही फना है। अब फना के बाद बका को समझो। उस निष्प्राण शरीर के प्रबल ओज को देखो कि हर शेष अवशेष ने इक्यावन शक्ति पीठ का रूप धारण कर लिया। बका भी ऐसी कि कयामत के बाद भी इन शक्तिपीठों का वजूद इस ब्रह्मांड में कायम रहेगा। सुनो, मां कामाख्या इन शक्ति पीठों की सिरमौर हैंै। तुमने श्रीचक्र को देखा होगा। उसके शिखर की बिन्दु ही माता कामाख्या हैं। पहाडी रास्ते पर खाये एक हिचकोले से मेरी तन्द्रा टूट गयी। ड्राइवर ने बताया कि नील पर्वत की घाटी है। ये माता कामाख्या की दहलीज है। उसे क्या
पता कि हिना की खुशबू बिखेर रहा वो जलावागर मुझे रास्ते भर यही सारी दास्तां तो सुना रहा था। रास्ते में पहाडी चट्टानों पर लिखी इबारत मां के चमत्कार को महसूस करने का संदेश दे रहा थी। फील द मिरेकल, फील द गाॅडेस और भी न जाने क्या क्या। यह सब वाकई महसूस हो रहा था कि यहां कोई तो एक ताकत है जो अपनी तरफ लगातार खींच रही है। वो कह रही है कि हां, मैं ही हूं इस सृष्टि की जननी। इस नश्वर संसार में पैदा होने वाला हर शख्स मेरा ही अंश है। टैक्सी वाला हमें बस स्टैंड पर छोड कर जा चुका था। हम पंडित परितोष शर्मा
को काॅल कर उनसे बतियाते हुए माता के परिसर में दाखिल हो चुके थे। हम हैरान थे कि हम ठीक उन्ही सबसे मुखातिब थे जिन्हें हमने ख्वाब में देखा था। परितोष जी के अलावा तमाम लोग लाल रंग की पोशाक में थे। जाहिर है कि वो सब मां कामख्या दरबार के पंडे हैं। उनके चेहरे पर एक अलग तरह का तेज था। उसकी वजह वो नूर है जिसका वो हर रोज दीदार करते हैं। सब बेहद विनम्र और खामोश। अचानक से दिखने लगे वही कबूतर और बकरी के नन्हे बच्चे। सबके देह पर लगी लाल रंग की रोरी। जैसे वो रोरी नहीं इस दरबार का बिल्ला लगाये
घूम रहे हों। अरे हां, इनके बीच यहां कुछ बिल्ली और बिल्ले भी घूम रहे हैं। पर किसी को किसी की परवाह ही नहीं हैं। बिल्लियों का कबूतर के साथ यंू टहलना कुछ अजीब सा लगा। तभी मेरे रोंगटे खडे हो गये। रात उनकी कही बात याद आ गयी। यहां दिखने वाली हर सूरत को उसकी हकीकत मत समझना। कबूतर और बकरी की शक्ल के अलावा आसपास दिखने लगे तमाम चेहरों में भी अब मुझे डाकिनी शाकिनी नजर आने लगे। इस बीच परितोष शर्मा हमें मंदिर परिसर में स्थित एक कुंड में ले जाकर हमारा शुद्धिकरण करा रहे थे। जल प्रक्षालन के साथ शर्मा जी असमी टोन में अपना मंत्र पढ रहे थे और हम ओम अपवित्र पवित्रो वा सर्वा वस्थांग गतो पिवा की अपनी दोआ में लगे थे। उसके बाद वो हमें वीआईपी दर्शन की कतार में खडा कर पूजन सामग्री के इंतजाम में लग गये। एक दो फाटक पार कर थोडी ही देर में हम उस चौखट में दाखिल हो चुके थे जहां पहुंचने के साथ सब कुछ निस्तेज हो जाता है। पंडित परितोष शर्मा आगे आगे चल रहे थे और हम सब अपना वजूद खोये उनके पीछे कुछ ऐसे चल रहे थे जैसे वो हम नहीं हमारा देह पिंड चल रहा हो। हजारों साल पहले का बना वो मंदिर बेशक पत्थर का था पर यह बताते हुए मेरी रूह कांप रही है कि यहां के हर शिलाखंड में जान प्राण है। वो बकायदे मुस्कराती हैं। आने वाले हर शख्स का इस्तकबाल करती हैं। सबकी गुहार पुकार सुनती हैं। जिसकी जितनी समाई है उतनी उसे अता करने के लिए मां कामरूप कामाख्या से पैरवी भी करती हैं। इन प्राणवान दीवारों पर
विग्रह बन कर टंगे तमाम देव प्रतिमाओं का दीदार करते हुए अब हम गर्भगृह कामरूप कामाख्या का मुख्य विग्रह है। ऊपर रखी मूर्ति के नीचे मुख्य में दाखिल हो चुके हैं। हमारे पुरोहित शर्मा जी बता रहे हैं कि ये मां पिण्डुकी है। उन्होंने कुछ फूल हमारे हाथों में थमाये और पुष्पाजंलि पढना शुरु किया तो हमें सिंहरन होने लगी। ओम नमो भगवते... चामंुडे... नील पर्वत वासीनी... मां कामख्या... नमस्तुते... हमें वो सब याद आने लगा जिसे हमने ख्वाब में देखा था। फिर वही अंधेरी गुफा जैसी जगह में हाथ थाम कर उतरना... फिर वही संकल्प के साथ पुष्पाजंलि ओम नमो भगवते... चामंुडे... नील पर्वत वासीनी... योनी मुद्रा... मां कामख्या... नमस्तुते... इन सबके बीच हाथ में रखे फूल मां के देह अंश पर कब समर्पित हो गये पता ही नहीं चला लेकिन प्रस्थर अवशेष का स्पर्श मन मस्तिष्क में वीतराग का भाव भर गया। यहां भी वो कान में फुसफुसा रहा था। नहीं नहीं वो जैसे हुक्म दे रहा था। रख यहीं अपना सिर सजदे में। मांग अपने गुनाहों से माफी। अर्ज कर इस समस्त संसार के लिए रहम और करम। सबका भला, सबकी खैर की दुआ कर। यकीन कर की तू मां का नेक बंदा है। उसका प्यारा बच्चा है। शुक्राना अदा कर की उसने तुम्हे इस चौखट में दाखिल होने की इजाजत अता फरमायी। क्योंकि हर रोज हजारों की तादाद में आने वाले बंदों में से वो कुछ को ही दाखिले की रहम अता फरमाती हैं। वो हम सबकी मां ही नहीं हम सबकी रब हैं। उनसे अपने लिए श्रद्धा और भक्ति मांग। उन पर यकदा और यकीन मांग। उस यकीन पर कायम रहने की ताकत मांग। और मांग ले उस फकीरी को जिसके दम पर तू दुनिया जहान के लिए
ताजिंदगी, ताकयामत दुआगो रहे। वो लगातार बोले चला जा रहा था और सजदे में गिरा मैं सिर्फ आमीन, आमीन और आमीन कहे चला जा रहा था। मैं कब तक वहां इसी हाल में रहा पता ही नहीं चला। योनी मुद्रा कंुड के पवित्र जल प्रक्षालन से चैतन्यता तो आयी पर मेरा पूरा वजूद उस कुंड में डूब कर पूरी तरह से खत्म हो चुका था। बगल में माता महालक्ष्मी और महा सरस्वती की पिण्डुकी पर पुष्प अर्पित कर हम बगैर पीठ दिखाये बाहर निकल तो रहे थे पर हमारा बहुत कुछ वहीं छूट चुका था।
बाहर आने पर परितोष जी ने घूमा देवी, भैरवी, शीतला, तारा, काली, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी और बगुलामुखी देवी के मंदिरों को जाने का रास्ता बता दिया। हम हर एक मंदिर में मत्था टेकते हुए सिर्फ वही दुआ मांगते रहे
जिसके लिए हमें हुक्म मिला था। इन सारे मंदिरों के अपने तिलिस्म थे और थे अपने अलौकिक अनुभव। इन सबके बाद अब हम मां कामाख्या की प्रदक्षिणा कर रहे थे। मन कुछ अलग तरह के भाव से भरा हुआ था। हमने अगरबत्तियां सुलगायीं थीं पर हमारे हाथों में गमक किसी और की थी। साथ में कोई तो था जो अपनी लगातार मौजूदगी दर्ज करा रहा था। वो हमसे मंदिर के तवाफ के लिए कह रहा था। बार बार कही अपनी इस बात पर कायम था कि इस कायनात के प्रथम पुरूष और स्त्री भगवान शिव और माता पार्वती ही थे। उनके युग्म से ही इस संसार में मनुष्य मात्र का जन्म हुआ है। वो हमें राहे इश्क में इस आशिक और महबूब के जोडे की दी हुई कुर्बानियों की याद दिला रहा था। तभी वापस लौटते हुए मेरे कदम माता के दरबार की चौखट पर आकर जड हो गये। सजदे में गिरी देह के साथ जेहन एक बार फिर दूर कहीं गहरे तक डूब चुका था। वो मां से कुछ अर्ज कर
रहा था तो कुछ याचना कर रहा था। इसमें कुछ इसरार भी था तो कुछ इकरार भी था। उसका कहना था कि क्या कहेगा यह जहां आपके दर से खाली हम अगर जाएंगे ? अर्ज का ये सिलसिला चल ही रहा था कि आवाज आयी, उठो, मां अपने बच्चों को हताश कभी देख ही नहीं सकती। जाओ उसने तुम्हारी बात सुन ली है। हमारे उठे हुए कदम चल तो रहे थे पर हमारा बहुत कुछ वहीं धरा रह गया था।

हाजिरी का वो रहस्यमय इंतजाम और बगुलामुखी...

काशी से कामाख्या - 4

वो मंगल की रात थी। हम भुवनेश्वरी मंदिर से दर्शन के बाद हारमनी हाउस लौट आये थे। पता नहीं क्यों ऐसे लग रहा था जैसे कोई तो वहां हमारी बाट जोहता रहा और हम उससे बगैर मिले लौट आये थे। हमने कई बार गिनती की। दश महाविद्या की उन सारी देवियों का नाम स्मरण किया जिनके नाम और मंदिर का पता पंडित परितोष शर्मा जी ने हमें बताया था। उन्होंने हमसे कहा था कि माता बगुलामुखी का सिर्फ शिखर दर्शन कर लीजिएगा, क्योंकि मंगलवार होने के कारण वहां बहुत भीड होगी और एक सौ चवालिस सीढियां उतरना और फिर चढना मंदाकिनी दीदी के बस का नहीं है। हमने वही सब किया था। पता नहीं क्यों अब तक उलझन बनी हुई थी। देर रात तक हम मां कामाख्या मंदिर के तिलिस्म के बारे में ही बतियाते रह गये। इस बीच हम हारमनी हाउस को भी किसी जादू टोने की तरह ही देख रहे थे। ऐसे लग रहा था कि जैसे वहां रखी हर चीज किसी तंत्र
साधक की भैरवी हो। सीलिंग पर पतले धागे से टंगी सीरामिक की बहुरंगी ढेर सारी केटली। आलमारी में रखे बेशुमार खिलौने, किसी पुराने फोटोग्राफर की लकडी के स्टैंड पर रखी खूबसूरत फ्लैश लाइट और भी बहुत सारा, न जाने क्या क्या। शयन मुद्रा में लेटे हुए तथागत बुद्ध। उनका मुस्कराता चेहरा जैसे कह रहा हो कि मैं जानता हूं कि तुम मेरे रहस्यवाद को बूझने का प्रयास कर रहे हो। हारमनी हाउस की हर चीज में एक अट्रैक्शन था। ऐसे लग रहा था जैसे वो सब कोई शोडषी कन्याएं हों जिन्हें किसी ने उच्चाटन के मकसद से सम्मोहित कर रखा हो। सबकी बकायदा शक्लें दिख रही थीं। उस रात हमने पूरे हारमनी हाउस का भ्रमण किया। हर कमरे से लेकर हर मंजिल तक का निरीक्षण कर डाला। लोभान की तेज खुशबू की और हवा में तैरता धुआं। गलियारे में दीवार
पर टंगी बीज मंत्र के साथ हमारे कुलदेवता गणपति और मां गायत्री की तस्वीर देख हम अभिभूत थे। दूसरी तरफ कुछ बहुत पुरानी फिल्मों के पोस्टर थे जो बाकयदा फ्रेम में मढ कर यूं टंगे थे जैसे वो भी कोई देखने की चीज हो। हमारे कदम आगे बढ चुके थे लेकिन तभी अचानक ऐसे लगा जैसे किसी ने आवाज दी हो। हम हैरत में थे। पलट कर देखा तो वहां कोई नहीं था। अरे ये क्या ? हमने आगे बढ चुकीं दीदी और पत्नी को आवाज दी। बताया कि यहां अभी किसी ने मुझे आवाज दी हैै। इस बीच हम पोस्टर में बुरी तरह से खो चुके थे। पाकीजा
फिल्म के पोस्टर में राजकुमार के सीने से लगी महजबीन बानो मानो रो रही थीं। मेरे रोंगटे खडे हो गये थे। ऐसे लग रहा था जैसे वो सिसकियां ले रही हों। महजबीन को लोग मीना कुमारी के नाम से ज्यादा जानते हैं। वो अपने नाम की तरह वाकई बेहद खूबसूरत थीं। इश्क पाने के लिए महज बत्तीस की उम्र में फनाइयत से गुजरना उस आदाकारा की नियति बनी थी पर उन्होंने ऐसी बका पायी कि वो आज पोस्टर बनी यहां टंगी हुई हैं। हमें ये पोस्टर बेचैन कर गया। वो आवाज भी मुझे तंग किये हुए थी। कमरे में लौटने के बाद नेट के सर्च इंजन पर मैं अचानक महजबीन बानो उर्फ मीना कुमारी को तलाशने लगा। मेरी आंखों में उतर आया पानी मुझसे उस शख्सियत से मेरे रिश्ते का पता पूछ रहा था जिसे मैंने अपनी जिंदगी में कभी देखा ही नहीं। यह सब लिखते हुए मुझे सिंहरन हो रही है कि वो एक अगस्त की रात थी। ये वो मनहूस तारीख थी जिसमें महजबीन बानों दादर मुम्बई के एक छोटे से चाॅल में पैदा हुई थीं। मनहूस इसलिए कि महजबीन से मीना कुमारी बनने की दर्दनाक जिंदगी को उनके शैदाई ट्रेजडी क्वीन के नाम से पुकारते हैं। हम सो ही नहीं पाए। मोहतरम लोगों क्या इसे संयोग कह कर आगे बढ जाना चाहिए। नहीं साहब, ये कैसे कह सकते हैं आप ? नहीं, नहीं। बहरहाल, उस रात हम सबके बीच तय ये हुआ कि कल सुबह बाला जी के मंदिर जाएंगे। कामाख्या भी चलेंगे लेकिन दर्शन करने के लिए लाइन में लग कर न तो धक्के खाएंगे और न ही वीआईपी टिकट के लिए पैसे खर्च करेंगे। सुबह आराम से
सो कर उठेंगे फिर उसके बाद चलने का वक्त तय करेंगे। अगर मां कामाख्या ने हमें अंदर बुला लिया तो ठीक नहीं तो बाहर से हम उनका तवाफ यानि प्रदक्षिणा कर लेंगे। उस रात हम सबने सोना तो चाहा पर शायद नींद किसी को आयी ही नहीं। करवटें बदलते हुए सुबह कब हो गयी खबर ही नहीं लगी। गुवाहाटी के साथ एक मजेदार चीज है। यहां शाम जल्दी मतलब पांच बजे ढल जाती है लेकिन  सुबह साढे चार बजे सूर्य देवता अपने प्रकट होने की दस्तक दे चुके होते हैं। इस बीच ओला कैब हमें बालाजी के लिए लेकर चल पडा था। हम मंदिर के
दहलीज पर थे पर हमें यकीन ही नहीं हो रहा था कि हम गुवाहाटी में हैं। ऐसे लग रहा था जैसे हम तिरूमाला की पहाडी पर भगवान विष्णु के इस रूप को पुकार रहे हों। गणपति, पद्मावती, राजराजेश्वरी और फिर खुद आकर खडे थे भगवान बालाजी। वही कसौटी पत्थर का आदमकद विग्रह। जैसे अभी बस बोल देंगे। धोती, कमर में कसा खूबसूरत बंध, माथे पर वैष्णव तिलक। सब कुछ अद्भुत। तमिल बोलते पुजारी और प्रसाद में मिला अन्नम और लाडू। सब कुछ अवर्णनीय। कहीं पढा था कि भगवान बाला जी विष्णु के स्त्री रूप हैं। तो वो यहां मां का रूप धरे गुवाहाटी में क्यों बैठे हैं ? एक सवाल और भी था जो जेहन को मथे जा रहा था। कहीं वो गैब के कराये उस कृत्य की प्रायश्चित करने के लिए तो यहां नहीं आ गये जिसके तहत उन्होंने माता सती के पार्थिव देह पर सुदर्शन चलाया था ? इन सबके बीच हम कब फिर माता कामरूप दरबार की सीढियां चढने लगे पता ही नहीं चला। हमने कोई माला फूल नहीं लिया। बिल्कुल खाली हाथ। जैसे कोई मंगता आता है अपने मालिक के घर याचना के लिए। जेहन में सिर्फ एक ही बात थी और वो था खुद के गदाई होने का अहसास। सबका भला, सबकी खैर की दुआ। सर्व मंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते की प्रार्थना। आज हमने पंडित परितोष शर्मा जी को कोई काॅल नहीं किया। हमने तय किया कि आज हम कोई वकील नहीं रखेंगे। अपनी पैरवी खुद करेंगे। अपनी याचना सीधे मां से करेंगे। आज कुछ कम लोग थे। अब यहां मंदिर में अंदर घुसने का लालच मन में जागने लगा। दीदी को यह कह कर एक जगह बैठा दिया कि आप यहीं विराजो हम जाकर देखते हैं। किसी भी लाइन में कहीं कोई भीड नहीं थी। हम दनदानते हुए अंदर कब पहुंच गये पता ही नहीं चला। जब हम दाखिले के अंतिम फाटक पर पहुंचे तो हाथ हिलाती मंदाकिनी दीदी हमें दिख गयीं। मन बेजार सा हो उठा। पंडित पद्मपति शर्मा जी की भेजी तस्वीर और उनके माता कामाख्या के दर्शन करने की इच्छा का पूरा वाकया जैसे सामने आ गया। तभी जैसे वो अचानक से फिर आ खडा हो गया। वही सुनहरे लम्बे बाल वाला शख्स। कंधे पर काला रफ्फल और बैग टंगा हुआ था। झुका हुआ कंधा, जैसे हर लमहा वो किसी की अदब में झुका रहता हो। पान से रसदार हो गये लाल होंठ। जुल्फों को बार बार पीछे फेंकता दांया हाथ। और वही कातिल मुस्कान। उसने जैसे किसी को हमारे सामने धकेल दिया। हम अचानक से उस माला बेच रहे शख्स से गुजारिश
करने लगे, भैया वो हमारी बुजुर्ग बहन को जरा अंदर कतार में लगवा दो। हम चैनलगेट के अंदर थे और हमारे पीछे थे कम से कम पचास या साठ लोग। लम्बी कतार को देख पहले तो उसने इनकार में सिर हिलाया फिर हमने अचानक देखा कि वो इकरार में हामी भर रहा है। हम चिल्ला पडे। हमने दीदी को उसके साथ पीछे
से आने के लिए इशारा किया और वो हमारे साथ लाइन में लग चुकी थीं। अब हम मां के गर्भगृह में प्रविष्ट हो चुके थे। यह अलौकिक कृपा देख अब तक एक कैफियत तारी हो चुकी थी हम पर। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। बस लग रहा था जैसे हमारा पुनर्जन्म हो रहा हो। रक्तवर्णी जवाकुसुम और अढहुल से ढंकी मां की प्रतिमा आज स्पष्ट दर्शन दे रही थी। उसके नीचे की पिण्डुकी भी जैसे कह रही थी कि देखो मैं ही हूं यहां की मुख्य विग्रह। लाइन में लगते समय पत्नी की खरीदी हुई माला से हमने कुछ फूल आपस में बांट लिये थे। वो सब आज सीधे विग्रह पर समर्पित हो रहे थे। इसके पहले गर्भगृह में अंदर हमने एक कोना थाम कर देर तक मां से अपने मन की वो सब बातें कह डाली थी जिसे हम उन्हें या उस काली कमली वाले को कभी सुनाना चाहते थे। मन एकदम खाली हो गया था। अब हम अंधेरी गुफा में सीढियां उतर रहे थे। मां के शेष अवशेष पर गिरा पडा हमारा सिर एक बार फिर माफीनामे के लिए अरदास कर रहा था। दुनिया जहान के लिए रहम और करम की भीख मांग रहा था। मैं हैरान था कि उस वक्त कोई बहुत ज्यादा लोग अंदर थे ही नहीं पर जैसे कोई कोलाहल था वहां।
मंदिर में न रोशनी न कोई घंटा न घडियाल। पर उस लमहा वहां जल रहे दीये की टिमटिमाहट में इतनी रोशनी हो गयी थी जैसे खुद भगवान सूर्य वहां हाजिरी लगाने आ धमके हों। ओम का गंूजता स्वर जैसे नाद ब्रह्म की उपासना कर रहा हो। जैसे सिद्ध फकीरों कोे सुनायी देने वाला ब्रह्म मुहूर्त का अनहद नाद गंूजित हो उठा हो। मां के योनी कुंड के पवित्र जल का प्रक्षालन हमें जगा गया था। उस लमहा बेशक हम उल्टे पैर वापस चल रहे थे पर हमें हमारी राह एकदम सीधी दिखायी दे रही थी। बाहर निकलने के बाद हम बगुलामुखी के दरवाजे दस्तक देने के लिए सीढी उतर रहे थे। वहां एकदम निपट सन्नाटा तारी था। घने जंगल के बीच दो चार ही लोग
थे जो तंत्र की आराध्य के दर्शन की पिपासा लिये हमारी तरह बढे चले जा रहे थे। हम जब वहां पहुंचे तो एक हवन कंुड में अग्नि की ज्वाला धधक रही थीे। तंत्र साधना में लीन कोई साधक आंखे बंद किये हाथ जोडे बैठा था। पुरोहित यमजमान से आदेश के अंदाज में कह रहा था, आज मांग ले मां से। वो पूरी तरह से मुखातिब है। जा, आज तेरी सारी इच्छाएं पूरी कर दी उन्होंने। कहीं दूर से आती हक हक की आवाज हमें बता रही थी कि किसी की कोई साधना आज वाकई पूरी हो गयी थी। हम माता बगुलामुखी के चरणों में झुके हुए थे। उनसे आफत बलाओं से बचाने की विनम्र प्रार्थना करते हुए हमारी आंखों के कोर अनायास ही गीले हो रहे थे। ये माता का प्रबल प्रताप था कि हम एक सौ चवालिस सीढियों पर कब उतरे और कब चढ गये पता ही नहीं चला। वापसी में हम एक बार फिर उस चौखट पर सलामी दे रहे थे जिसने हमें अपनी कृपा का पात्र बनाया। दुबारा दर्शन देकर उस अनुग्रह से नवाजा जिसका मिलना विरल होता है। दहलीज पर सजदे में गिरा हम सबका सिर मां कामरूप कामाख्या के अलावा उस अवलम्ब का शुक्रगुजार था जिसने हमें ये अलौकिक जियारत अता फरमायी। तभी हिना की खुशबू गमकाता वो शख्स हमारे कान में फुसफुसा रहा था। सुनो, मां ने तुम्हारी पुकार सुनी है। वो तुम सबका भला करेगी। इस कायनात के हर शख्स का कल्याण करेगी। क्योंकि वो मां हैं। वो हम सबकी पैदाइश का सबब है। बेशक पुत्र कुपुत्र हो सकता है लेकिन यकीन मानो की माता कभी कुमाता नहीं होती... माता कभी कुमाता नहीं होती... माता कभी कुमाता नहीं होती...

गुरु हैं तो गुरु ही रहें राजनीति क्यों?


कहते हैं गुरु साक्षात परब्रह्मा.. इसी रूप में उनकी पूजा भी होती है। पर यही गुरु जब राजनीतिक बोल बोलने लग जाएं तो तमाम तरह की आशंकाएं मन में होने लगती है। खासकर तब जब देश में राजनीति आज दो परस्पर विचारधाराओं से ऊपर उठकर सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और व्यक्तिगत आरोपों-प्रत्यारोपों के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी है। जब चीन के आतंक से घबराकर तिब्बतियों ने भारत में शरण लिया तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने खुले दिल से तिब्बतियों को स्वीकार किया। पर आज उसी तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने जब नेहरू पर व्यक्तिगत हमला किया तब मंथन जरूरी हो जाता है कि आखिर गुरुओं के बिगड़े बोल के क्या मायने हैं। तिब्बती धर्मगुुरु दलाई लामा पिछले दिनों गोवा इंस्टीट्यूट आॅफ मैनेजमेंट के एक प्रोग्राम में थे। यहां उन्होंने मंच से कहा कि यदि जवाहर लाल नेहरू की जगह मोहम्मद अली जिन्ना प्रधानमंत्री होते तो देश का विभाजन नहीं होता। इंस्टीट्यूट की 25वीं वर्षगांठ पर आयोजित इस कार्यक्रम में दलाई लामा इतने पर ही चुप नहीं हुए। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी तो जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन नेहरू ने इसके लिए मना कर दिया। भारत पाकिस्तान एक हो जाता अगर जिन्ना प्रधानमंत्री बन जाते। मेरा मानना है कि सामंती व्यवस्था के बजाय प्रजातांत्रिक प्रणाली बहुत अच्छी होती है। सामंती व्यवस्था में कुछ लोगों के हाथों में निर्णय लेने की शक्ति होती है, जो बहुत खतरनाक होता है। पंडित नेहरू बहुत ज्ञानी थे, लेकिन उनसे गलती हो गई। उन्होंने कहा कि अब भारत की तरफ देखें। मुझे लगता है कि महात्मा गांधी जिन्ना को प्रधानमंत्री का पद देने के बेहद इच्छुक थे। लेकिन पंडित नेहरू ने इसे स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि स्वयं को प्रधानमंत्री के रूप में देखना पंडित नेहरू का आत्म केंद्रित रवैया था। ....यदि महात्मा गांधी की सोच को स्वीकारा गया होता तो भारत और पाकिस्तान एक होते। उन्होंने कहा, मैं पंडित नेहरू को बहुत अच्छी तरह जानता हूं, वह बेहद अनुभवी और बुद्धिमान व्यक्ति थे, लेकिन कभी-कभी गलतियां हो जाती हैं। जिंदगी में सबसे बड़े भय का सामना करने के सवाल पर आध्यात्मिक गुरू ने उस दिन को याद किया जब उन्हें उनके समर्थकों के साथ तिब्बत से निष्कासित कर दिया गया था।
दलाई लामा द्वारा इस तरह कही गई बातों के कई मायने हैं। पर सबसे बड़ी बहस इस पर है कि आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि एक धर्मगुरु को इस तरह की राजनीतिक बयानबाजी करने की जरूरत पड़ गई। यहां बता दें कि दलाई लामा ने अपने बयान के दूसरे दिन माफी भी मांग ली थी। पर उनके द्वारा कही गई बातों को पूरा देश सुन रहा है। पूरा विश्व जानता है कि भारत और चीन के बीच तनाव का एक बड़ा प्रमुख कारण दलाई लामा का भारत में शरण लेना है। चीन आज तक यह स्वीकार नहीं कर सका है कि उसके दुश्मनों को भारत ने शरण दे रखी है। क्या दलाई लामा इस बात को भूल गए कि जिस नेहरू की वो आलोचना कर रहे हैं उन्होंने तिब्बती शरणार्थियों के लिए चीन से दुश्मनी मोल ली थी। आज जिसके दम पर वो भारत में स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जी रहे हैं उसे ही राजनीति का मुहरा बनाकर वो क्या बताना चाहते हैं। क्या कारण है कि अचानक से जवाहर लाल नेहरू की नीतियों में उन्हें स्वार्थ की बू आने लगी है। क्या दलाई लामा इस बात को भूल चुके हैं कि भारत के विभिन्न राज्यों में रह रहे लाखों तिब्बती शरणार्थी खुली हवा में सांस इसीलिए ले पा रहे हैं क्योंकि भारत की सशक्त विदेश नीति की नींव उसी नेहरू के समय पड़ी थी।
आज भारत की राजनीति को एक अलग चश्मे से देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस युग को मोदी युग का नाम दे रखा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन किया है। चाहे पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंध बनाए जाने की दिशा में उनके द्वारा उठाए गए कई अप्रत्याशित कदम हों या फिर पाकिस्तान और म्यांमार में घुसकर दुश्मनों को खत्म करने की रणनीति हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कर दिया है कि वे जैसे को तैसा की नीति में विश्वास रखते हैं। इसी क्रम में जब चीनी सेना ने नार्थ ईस्ट में अपनी हलचल बढ़ाई तो भारतीय सेना ने उनका मुंहतोड़ जवाब दिया। जबकि उसी देश के सर्वोच्य पद पर आसीन व्यक्ति को अहमदाबाद के रिवर फ्रंट पर उन्होंने झूला भी झुलाया था। अगर तिब्बती धर्मगुरु इस बात से प्रभावित हैं कि वो हिंदु मुस्लिम का कार्ड खेलकर भारत सरकार को उपकृत कर देंगे, तो शायद यह उनकी सबसे बड़ी भूल होगी। इस वक्त भारत सरकार की नीतियां बिल्कुल स्पष्ट हैं।
राजनीति के अपने मायने हैं। इसकी अपनी अच्छाई और बुराई है। पर एक धर्मगुरु को लेकर पूरे भारत में एक मत है। गुरु को गुरु ही रहना चाहिए। उन्हें न तो राजनीति में आने की जरूरत है और न राजनीतिक बयानबाजी की। भारतीय लोकतंत्र का इतिहास रहा है कि जब-जब किसी धार्मिक गुरु ने राजनीतिक बयानबाजी की है उसे संकट का ही सामना करना पड़ा है। ऐसे में दलाई लामा सहित तमाम धार्मिक गुरुओं को जरूर मंथन करना चाहिए कि उनके द्वारा कही गई राजनीतिक बातों को कितना निगेटिव असर पड़ता है। हो सकता है कि दलाई लामा अपनी बातों के जरिए वर्तमान भारत सरकार को प्रभावित या खुश करना चाहते हों। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार सार्वजनिक मंचों से भारत की बबार्दी के लिए कांग्रेस की नीतियों को दोष दे चुके हैं। पर यहां गौर करने वाली बात है कि कभी भी प्रधानमंत्री मोदी ने पंडित नेहरू या किसी अन्य बड़े कांग्रेसी नेता पर व्यक्तिगत दोषारोपण नहीं किया है। धर्म गुुरु को यह समझना चाहिए कि यह सेंटिमेंट से जुड़ी बातें हैं। ऐसा कहकर वो अपना ही नुकसान करा रहे हैं। भारत सरकार से उन्हें न तो पहले खतरा था और न आज है। और न भविष्य में इस तरह का खतरा उत्पन्न होने की संभावना है। फिर बेवजह की राजनीतिक बयानबाजी कर वह देश के माहौल को प्रभावित करने का प्रयास क्यों कर रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला और मैकलोडगंज में हजारों तिब्बती शरणार्थी स्वतंत्रतापूर्वक रह रहे हैं। देश के किसी कोने में चले जाएं आपको तिब्बती शरणार्थी जरूर मिल जाएंगे। यह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और विदेश नीति का ही परिणाम है कि वे इतनी स्वतंत्रता से यहां वहां विचरण कर रहे है और स्थाई रूप से रहे हैं। भारत के सभी राज्यों की सरकारों ने इन्हें विशेष दर्जा दे रखा है। हर राज्य में इनके लिए विशेष व्यवस्था की गई है। कहीं तिब्बती कॉलोनी बसाकर, कहीं तिब्बती मार्केट बसाकर इन शरणार्थियों के लिए रोजी-रोजगार और छत की व्यवस्था की गई है। ऐसे में इनके धर्मगुरु द्वारा दिया गया बयान कहीं न कहीं इन्हें भी प्रभावित कर सकता है। इतना तो तय है कि दलाई लामा कभी भारतीय राजनीति का हिस्सा नहीं बनेंगे। फिर उनके द्वारा हिंदु और मुस्लिम राजनीति जैसी बयानबाजी कहीं से भी स्वीकार्य नहीं है। यह देश के अंदर एक अलग तरह के वैमनस्य फैलाने जैसा ही कृत है जिसकी जितनी भी आलोचना की जाए कम है।
फिलहाल दलाई लामा ने माफी मांग कर अपनी बातों को बैलेंस करने की कोशिश की है। पर उन्हें मंथन जरूर करना चाहिए कि जिस देश ने उन्हें बेहद प्यार और दुलार से रख रखा है उसमें वैमनस्य की बातों को वो क्यों तवज्जो दे रहे हैं।