Monday, August 14, 2017

शर्म है कि किसी को शर्म आती नहीं

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में पिछले 72 घंटे में 65 मासूमों की मौत हो जाती है। आरोपों प्रत्यारोपों का दौर चलता है। पर किसी को शर्म नहीं आ रही है। शर्म के लिए कई बातें हैं, पर इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है कि एक तरफ हम अपनी आजादी के 71वें साल में प्रवेश कर रहे हैं और दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के स्वास्थ मंत्री बेशर्मी से यह बयान दे रहे हैं कि अगस्त के महीने में बच्चे मरते ही हैं। आजादी के इस मौके पर हम उन मासूम बच्चों की याद में जश्न मनाने से परहेज करें और मंथन करें कि क्यों हम आज भी उसी दौर में जीने को विवश हैं जिस दौर में मेडिकल सुविधाओं में अभाव में हमारे पूर्वज तमाम तरह के रोगों को अपनी नियति मान कर जीते थे। जो बयान उत्तर प्रदेश के स्वास्थ मंत्री ने दिया वही बातें हमारे नाना दादा कहा करते थे। बारिश का मौसम है, जाड़े का मौसम है अब मौत आने वाली है। 
हर किसी को मौत तो आनी ही है। आएगी ही। यही एक साशस्वत है। परम सत्य है कि सभी को एक न एक दिन यहां से जाना है। जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है। पर विडंबना इस बात की है कि एक शर्म है जो किसी को नहीं आ रही है। शर्म उन्हें भी नहीं आ रही है जिन्होंने उत्तर प्रदेश में इतने दिनों तक राज किया। चाहे वह अखिलेश यादव की सरकार हो या मायावती की। उन्होंने सरकार की तरफ से प्रदेश में स्वास्थ सुविधाओं का कितना ख्याल रखा। अगर यह बात सत्य है कि आॅक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी को पिछले कई वर्षों से बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो उस वक्त सरकार किसकी थी?
शर्म तो कांग्रेस के उन महान नेताओं को भी नहीं आ रही है जो बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में पिछले कई सालों से इंसेफेलाइटिस से मौत की आगोश में समा रहे हजारों मासूमों के परिजनों के आंसू पोछने आज तक नहीं गए। वे गोरखपुर में बच्चों की मौत की खबर फैलते ही लाव लश्कर के साथ हॉस्पिटल पहुंच गए। गोरखपुर इसलिए पहुंच गए क्योंकि वह उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह जिला है। राजनीति लाभ पूरा मिलेगा, शायद यही लालच रही होगी। मुजफ्फरपुर इसलिए नहीं पहुंच पाए क्योंकि वहां मासूमों की लाशों पर राजनीति नहीं हो सकती थी।
शर्म उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को भी नहीं आ रही है। बेशर्मी की सारी हदों को पार करते हुए प्रदेश के स्वास्थ मंत्री अगस्त माह में होने वाले बच्चों की मौतों का आंकड़ा बता रहे हैं। वह यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि यह मौतें सामान्य हैं। कोई नई बात नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी अपने सिपहसलारों के भरोसे बयान देने मैदान में उतरे। पर शर्म उन्हें भी नहीं आई। जिस योगी आदित्यनाथ के डर से गोरखपुर में गलत काम करने वाले थर-थर कांपते थे। आज उसी योगी आदित्यनाथ की जुबान बंद है। वोट की राजनीति में कोई बखेड़ा न हो जाए, इसलिए वे भी नपातुला बोल गए। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए मौत किस तरह हुई इस पर फोकस बनाए रखा। उन्हें भी शर्म नहीं आई कि जिस योगी में लोग दबंग मुख्यमंत्री की छवि देखते हैं। जिस योगी पर उन्हें भरोसा है कि वो अपनी कड़क प्रशासनिक क्षमता से सबकुछ ‘टाइट’ कर देगा, आज वही योगी घुटनों पर बैठा है।
यह कैसे संभव है कि जिस मेडिकल कॉलेज को लेकर स्थानीय मीडिया लगातार आगाह करता आ रहा हो, उस मेडिकल कॉलेज की स्थिति उसी गृह जिले के मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंची हो। यह भी कैसे संभव है कि उसी मेडिकल कॉलेज में कुछ दिन पहले पहुंचे मुख्यमंत्री को आने वाले संभावित खतरों के प्रति आगाह नहीं किया गया हो। अगर सही में योगी आदित्यनाथ को किसी ने आगाह नहीं किया तो इससे बड़ी शर्म की बात नहीं हो सकती। अगर सही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बच्चों की मौत पर शर्म है तो नाप दें ऊपर से नीचे तक के तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों को जिन्होंने ऐसा होने दिया। दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा का डायलॉगमारने वाले मुख्यमंत्री को अपनी दबंगता का परिचय देने का इससे मुफीद समय नहीं हो सकता।
शर्म मीडिया को भी आनी चाहिए जो इस संवेदनशील मुद्दे में भी हिंदू और मुस्लिम एंगल खोज लेती है। चुंकि प्रदेश के मुखिया की छवि कट्टर हिंदूवादी नेता के रूप में है, इसीलिए वहां के एक मुस्लिम डॉक्टर को बिना तथ्यों के जांच पड़ताल के हीरो बना देती है। अब जब यह तथ्य सामने आ चुका है कि डॉक्टर कफील अहमद भी इस पूरे प्रकरण का एक प्रमुख दोषी है तो मीडिया के जांबाज रिपोर्टर क्या अपनी गलती पर शर्म करेंगे? यह मीडिया के लिए भी मंथन का समय है कि वह तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करे और लोगों को दिग्भ्रमित होने से बचाए। शायद इसीलिए शनिवार को गोरखपुर पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मीडिया से अपील की और कहा कि आप हवा-हवाई रिपोर्टिंग न करें।
किस-किस की शर्म की बातें करें। कल हम अपनी स्वतंत्रता के 71वें साल में प्रवेश करने जा रहे हैं। हर एक क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ने वाले हमारे देश में अगर आज भी सैकड़ों मासूस बेहतर स्वास्थ सुविधाओं के आभाव में अकाल मौत मर रहे हैं इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है। हो सकता है गोरखपुर में मरने वाले बच्चों के परिजनों को वहां की सरकार करोड़ों रुपए मुआवजे के तौर पर बांट दे। हो सकता है दिल्ली की केंद्र सरकार भी अपनी तरफ से करोड़ों रुपए का फंड राहत के तौर पर भेज दे। पर क्या हम इस बात के लिए खुद को तैयार कर सकेंगे कि स्वतंत्रता के इस जश्न के मौके पर उन मासूमों के परिजनों के खून के आंसू कैसे रोके जाएं।
हम सभी को मंथन करना है। सिर्फ फेसबुक और व्हॉट्एप पर मासूमों की याद में डीपी बदलने से किसी को शर्म नहीं आने वाली। शर्म अगर आएगी तो वह अपनी अंतरात्मा को झकझोरने से। आजादी की शाम से पहले यह खबर पूरी दुनिया में पहुंच चुकी है कि कैसे हमारे मासूम आज भी सिस्टम की फेल्योरनेस से तिल-तिल कर मरने को बेबस हैं। आजादी का यह मौका जायज न होने दें। कुछ शर्म करें। शर्म करेंगे तभी कुछ हल निकलेगा। यही उन मासूमों के प्रति श्रद्धांजलि होगी।
जय हिंद

Monday, July 24, 2017

सिर्फ गृहणी नहीं, ‘वित्त मंत्री’ हैं घरेलू महिलाएंं

भारतीय न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी बातों में एक सबसे बड़ी कमी यह है कि कई महत्वपूर्ण फैसले बिना किसी शोर शराबे के भीड़ में गुम हो जाती हैं। जबकि ऐसे फैसले नजीर के तौर पर पेश किए जाने की जरूरत होती है। चर्चा भी इसलिए जरूरी होती है क्योंकि इससे बड़े बदलाव की कहानी शुरू की जा सकती है। एक ऐसा ही फैसला कुछ दिन पहले मद्रास हाईकोर्ट ने दिया है। कोर्ट ने घरेलू महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा है कि एक घरेलू महिला को भी वेतन प्राप्ति का पूरा अधिकार है। वह घर की वित्त मंत्री होती है। उसे भी वेतन दिया जाए। इतना ही नहीं कोर्ट ने न केवल अपना फैसला सुनाया, बल्कि एक घरेलू महिला को उसके 24 घंटे के काम की पारिश्रमिक भी तय की। यह पारिश्रमिक तीन हजार रुपए तय की गई है। इस फैसले की पूरी चर्चा आज आपसे करूंगा, ताकि आप भी मंथन करें और एक घरेलू महिला के पूरे जीवन चक्र को सम्मान दें।
इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है पुड्डूचेरी शहर से। वहां 2009 में मालती नाम की महिला की मौत बिजली के खुले तार की वजह से हो जाती है। पुड्डूचेरी बिजली बोर्ड को महिला के पति को मुआवजे के तौर पर पांच लाख मुआवजा देना था। बोर्ड ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। गुहार लगाई कि चुंकि महिला एक घरेलू महिला थी, जिसके कारण उसकी कोई आय भी नहीं थे, ऐसे में मुआवजे की रकम बहुत ज्यादा है इसे कम की जाए। भारतीय न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी मामले में फैसला देने के लिए एक घरेलू महिला के कार्यों का मुल्यांकन किया जाना था।
मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति केके शशिधरन और न्यायमूर्ति एम मुरलीधरन की एक डिवीजन बेंच ने पूरे मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान तमाम तर्क पेश किए गए, लेकिन अंतिम फैसला घरेलू महिलाओं के पक्ष में आया। कोर्ट ने महिलाओं के अप्रत्यक्ष कार्यों और देखभाल का मूल्यांकन किया और उसे स्वीकृत किया। कोर्ट ने माना कि मालती एक डेडिकेटेड वाइफ थी। अपने दो बच्चों के प्रति भी वह समर्पित थी। वह घर की वित्त मंत्री थी। वह एक शेफ थी। वह घर की चार्टेड अकाउंटेंट थी। अपने घर की इनकम और खर्चे को नियंत्रित करती थी। एक पति ने अपनी घरेलू कंपनी का सबसे वफादार कर्मचारी खो दिया। दो बच्चों ने अपनी मां का प्यार खो दिया। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि वह सिर्फ एक घरेलू महिला थी। इसीलिए उस महिला को एक कामकाजी महिला के रूप में देखा जाए और उसे हर मुआवजे का अधिकार है।
मद्रास हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए न केवल मालती को न्याय दिलाया, बल्कि गृहणियों के लिए एक ऐसा आधार तैयार कर दिया है जो आने वाले समय में काफी सकारात्मक बदलाव की तरफ ले जाएगा। भारतीय पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं अपने अस्तित्व के लिए हमेशा से ही संघर्ष करती आई हैं। आज भारतीय महिलाएं अपने सर्वश्रेष्ठ समय में जी रही हैं, जहां उन्हें हर वो अधिकार प्राप्त है जिसके लिए वो लंबे वक्त से संघर्ष कर रही थीं। समाज के हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी पहचान कायम की है। बॉर्डर की रक्षा करने के साथ-साथ वो हवाई जहाज उड़ा रही हैं।
मल्टीनेशनल कंपनियों के सर्वोच्य पदों पर बैठकर भी उन्होंने अपनी प्रतिभाएं दिखाई हैं। पर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आज इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए बहसें हो रही हैं। बड़े-बड़े सेमिनार आयोजित किए जा रहे हैं। जब भी महिला सशक्तिकरण की बातें होती हैं तो यह जरूर महसूस होता है कि क्या सच में आज भी सशक्तिकरण पर चर्चा जरूरी है। महिला सशक्तिकरण पर काम करने वाली एक एक एनजीओ ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें इस बात का जिक्र किया गया कि आज की आधुनिक महिलाएं महिला सशक्तिकरण पर चर्चा को बेकार मानती हैं। उनका मानना है कि उन्हें सभी अधिकार मिले हैं। वे इस दम पर आगे बढ़ रही हैं। बेहतर मुकाम हासिल कर रही हैं। हां यह जरूर है कि भारतीय घरेलू महिलाओं की स्थिति आज भी चिंतनीय जरूर है।
भारतीय घरेलू महिलाएं आज भी खुद को उपेक्षित महसूस करती हैं। समाज की मुख्यधारा से वे खुद को अलग समझती हैं। कई मौकों पर ऐसा देखने को मिला है कि घरेलू महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पर मद्रास हाईकोर्ट ने देर से ही सही एक ऐसी सार्थक बहस को जन्म दिया है जिसमें घरेलू महिलाओं को भी उनके कार्यों की बदौलत एक बेहतर स्थिति में देखने का मौका मिला है। एक घरेलू महिला के दिन की शुरुआत सुबह पांच बजे से शुरू होकर देर रात तक रहता है। उन्हें कोई वीकली आॅफ नहीं मिलता। हर दिन उनकी ड्यूटी होती है। पूरे देश में छुट्टी हो पर एक घरेलू महिला अपने परिवार, बच्चों के लिए ड्यूटी पर रहती है। ऐसे अनगिनत काम हैं जिनका कभी मूल्यांकन नहीं किया गया। 

मद्रास हाईकोर्ट ने घरेलू महिलाओं के अनगिनत काम को भी ‘काम’ यानी रोजगार की श्रेणी में माना है। यह घरेलू महिलाओं के लिए प्रति एक बेहतर दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है। कोर्ट ने मंथन करने के लिए हमें प्रेरित किया है कि हम अपनी घरेलू मां, पत्नी, बहन के कार्यों का सम्मान करें। फिलहाल कोर्ट ने एक घरेलू महिला के कार्यों का मुल्यांकन करते हुए मालती के केस में उसका वेतन तीन हजार रुपए मासिक तय किया। भले ही यह रकम काफी कम है, पर कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए बहुत कुछ कह दिया है। कोर्ट ने एक घरेलू महिला के अवैतनिक और गैर मान्यताप्राप्त कार्य को श्रम की श्रेणी में ला दिया है। एक घरेलू महिला को भी कामकाजी महिला की तरह सम्मान दिलाने का प्रयास किया है।