Thursday, December 29, 2016

पोलॉर्ड तुम्हें नहीं पता तुमने क्या कर दिया


Mukesh alias Pollard in red cap
with his coach RaviShankar
क्रिकेट की दुनिया के कई रोमांच का आप कभी न कभी गवाह जरूर बने होंगे। पर आज जिस रोमांच के बारे में आपको बता रहा हूं, उसे पढ़ने के बाद आपको भी अहसास होगा कि
‘जो तूफानों में पलते जा रहे हैं
वहीं दुनिया बदलते जा रहे हैं’
रोमांच की यह कहानी है बिहार के मुजफ्फपुर की। लंगट सिंह कॉलेज के मैदान में इंटर कॉलेज क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान की कहानी है यह। इसी 27 दिसंबर को मैदान में फाइनल में पहुंचने के लिए आरडीएस कॉलेज मुजफ्फरपुर और एमएस कॉलेज मोतिहारी के बीच जंग छिड़ी थी। पहले बल्लेबाजी करते हुए एमएस कॉलेज ने आरडीएएस को 110 रन का टारगेट दिया। आसान से लक्ष्य का पीछा करते हुए आरडीएस कॉलेज की पारी मध्यक्रम में लड़खड़ा गई। पर मैदान में आरडीएस कॉलेज की तरफ से मौजूद मुकेश से सभी को उम्मीदें थीं। उम्मीद इसलिए थी क्योंकि मुकेश को लोग उसके असली नाम से कम और पोलॉर्ड के नाम से ज्यादा जानते हैं। जी हां वही जुनूनी क्रिकेटर कैरोन पोलॉर्ड। वेस्डइंडीज का वही पोलॉर्ड, जो कभी अपनी जादूई गेंदबाजी से कहर बरपाता है तो कभी अपनी तूफानी बैटिंग से बॉलर्स को रुला देता है। मुकेश भी कुछ ऐसा ही है।
आॅलराउंडर मुकेश के ऊपर सारा दबाव था। पर अचानक मैच के 21वें ओवर में एक दनदनाते हुए बाउंसर ने उसे पिच पर गिरा दिया। सिर पर बॉल लगने के कारण हम एक उभरते क्रिकेटर फिलिप ह्यूज के सदमे को झेल चुके हैं। इसलिए बताने की जरूरत नहीं कि जब एक सामान्य 70 -80 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से आती हुई बॉल सीधे आपकी कनपटी में लगती है तो क्या दशा होती है।
बॉल पोलॉर्ड के कनपटी के किनारे लगी थी। कनपटी पर लगी चोट ने उसे अचेत कर दिया। उसे आनन फानन में मैदान से बाहर लाया गया। फर्स्ट एड दिया गया। स्थिति थोड़ी सामान्य होने के बाद मैच दोबारा शुरू हुआ। पर आरडीएस कॉलेज का पोलॉर्ड मैदान में नहीं जा सका। मैदान के बाहर अपनी टीम के बीच लेटा पोलॉर्ड इस अवस्था में नहीं था कि वह दोबारा बैटिंग के लिए जा सके। अब स्थिति पलट चुकी थी। एक समय ऐसा आ गया जब आरडीएस कॉलेज की टीम हारने की कगार पर पहुंच गई।
टीम के सात विकेट गिर चुके थे। आठवां विकेट भी गिर गया। अब पूरी तरह मैच आरडीएस कॉलेज के हाथ से निकल गया था। पर आठवां विकेट गिरने के बाद पोलॉर्ड ने अपने साथियों को पैड पहनाने को कहा। आरडीएस कॉलेज के कोच सह फीजिकल डायरेक्टर रविशंकर के लाख मना करने के बावजूद पोलॉर्ड मैदान में उतरने की जिद पर अड़ गया। अंत में रविशंकर ने उसे इजाजत दे दी। साथियों ने जोरदार तालियों के साथ उसे मैदान में भेजा। पिच पर जाते ही पोलॉर्ड ने पहले तो एक-दो रन लेना शुरू किया। हर एक दो रन दौड़ने के बाद वह बैठ जाता था। कनपटी पर लगी चोट और असहनीय दर्द एवं थकावट के बावजूद वह खेल रहा था। हर रन के बाद हाथों को भींजते हुए शायद वह अपने अंदर की ऊर्जा को जागृत कर रहा था। फिर दोनों हाथों को कसकर जकड़ते हुए बैट थामता था। पर उसके मन में तो कुछ और ही चल रहा था। वह इंतजार कर रहा था उस बॉलर का जिसकी बॉल ने उसे अचेत कर दिया। यह उस जीवटता की जिंदा मिसाल है जिसे हम और आप सिर्फ फिल्मी परदे पर ही देखते हैं। आमीर खान की सर्वकालिक फिल्मों में से एक ‘लगान’ के क्लाइमेक्स में भी आपने यह सीन देखी होगी। पर वहां सबकुछ स्क्रिीप्टेड था। वह रील लाइफ थी, यहां रीयल लाइफ का ‘भूवन’ मैदान में था। रीयल लाइफ के इस भूवन ने मैच का रुख पलट दिया था। अंतिम ओवर में तक टीम को जीत की कगार पर ले आया। अंतिम छह गेंद पर टीम को पांच रनों की दरकार थी।
Cricket Team R.D.S College. 

आखिर वह बॉलर भी पोलॉर्ड के सामने आ गया। बॉलर था फैजल गनी। विजी ट्रॉफी के स्टार बॉलर रहे फैजल की तेज गेंद ने पोलॉर्ड को अंदर से हिला दिया था। पर जिस कांफिडेंस से पोलॉर्ड ने खुद को स्ट्राइक एंड पर रखा था वह देखने लायक था। तेज रफ्तार से आ रहे फैजल की पहली गेंद पर पोलॉर्ड ने दनदनाते हुए ऐसा पंच मारा कि बॉल बाउंड्री के बाहर चली गई। मैदान के बाहर दर्शक जोश से चिल्ला रहे थे और मैदान में खामोशी पसरी थी। अब जीत एक रन दूर थी। अगली ही गेंद पर पोलॉर्ड ने दोगूनी रफ्तार से बॉल को बाउंड्री पार पहुंचा दिया।
इस बाउंड्री के जरिए पोलॉर्ड ने वह कर दिखाया जिसकी जितनी मिसाल दी जाए कम है। यह उस जीवटता का चौका था जो हमारे अंदर विश्वास जगाती है। यह उस जीवटता का चौका था जिसके जरिए हम अपने भय पर काबू पाते हैं। और यह उस जीवटता का चौका था जिसे आज का युवा भूलने लगा है।
चोट के बावजूद 29 रनों की नाबाद पारी खेलकर पोलॉर्ड ने आरडीएस के सिर जीत का सेहरा बांध दिया। मैच का विनिंग स्कोर करते हुए पोलॉर्ड वहीं पिच पर लेट गया। शायद पोलॉर्ड को भी नहीं पता नहीं था आज उसने क्या कर दिया है।
मेरे लिए तो यह इतना सुखद पल है जिसे सुनकर मैं मुजफ्फरपुर से बारह सौ किलोमीटर दूर बैठ कर भी रोमांचित हो रहा हूं। आज सुबह मित्र रविशंकर से लंबी बातचीत हुई। उसी ने पोलॉर्ड की पूरी कहानी सुनाई। मुझे लगा मुजफ्फरपुर के इस पोलॉर्ड के जीवटता की कहानी आप सभी को भी सुनाई जाए। इसीलिए लिख डाली। मुजफ्फरपुर शहर में इन   दिनों इस रीजन का सबसे बड़ा क्रिकेट लीग हो रहा है। एमपीएल के आयोजकों के पास अगर मेरा यह मैसेज पहुंचे तो मैं निवेदन करना चाहूंगा कि पोलॉर्ड को सार्वजनिक मंच से सम्मानित करके उसकी हौसलाआफजाई करें।
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि मुजफ्फरपुर जैसे बड़े शहर जहां कई बड़े अखबारों की प्रींटिंग यूनिट है वहां कैसे पोलॉर्ड की कहानी लोगों तक नहीं पहुंची। एक अखबार ने जरूर पोलॉर्ड के उस दिन की आजीवन न भूलने वाली पारी को थोड़ी जगह दी। पर दावे के साथ कह सकता हूं यह पारी पोलॉर्ड को ताउम्र हौसला और प्रेरणा देगी। पोलॉर्ड की इस पारी को जिसने भी वहां देखा होगा उन्हें भी यह पारी लंबे समय तक प्रेरणा देगी। उम्मीद करता हूं मुजफ्फरपुर का यह पोलॉर्ड जिसे आप तस्वीर में लाल कैप पहने देख रहे हैं आने वाले समय में अपनी इसी जीवटता के दम पर टीम इंडिया का कैप पहने।  रवि ने बताया कि पोलॉर्ड की कनपटी पर चोट के कारण गहरा दाग बन गया है। यह दाग खत्म हो या न हो पर दुआ करनी चाहिए कि पोलॉर्ड अपना यह हौसला कभी न खोए।
कभी मुजफ्फरपुर जाऊंगा तो इस पोलॉर्ड से जरूर मिलूंगा, क्योंकि पता नहीं क्यों मुझे इस पोलॉर्ड में अपना बचपन नजर आ रहा है। अपने क्रिकेट जीवन की कहानी फिर कभी।

Monday, December 26, 2016

राजनीति से बहुत ऊपर है शिवाजी का कद

 
भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई करीब तीन हजार छह सौ करोड़ रुपए की लागत के एक ऐसे प्रोजेक्ट का गवाह बनने जा रही है जो आने वाले समय में महाराष्टÑ की राजनीति का आधार बन सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों मुंबई में अरब सागर के बीच छत्रपति शिवाजी महाराज के स्मारक की नींव रख दी है। सागर के उफान मारते पानी के बीच बनने वाला यह स्मारक आने वाले दिनों में महाराष्टÑ की राजनीति में क्या उफान लाएगा यह तो आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल इस स्मारक के विरोध में भी स्वर उठने लगे हैं। पर यह वक्त बीजेपी सहित तमाम दूसरी राजनीतिक पार्टियों और महाराष्टÑ से जुड़े संगठनों के लिए मंथन का वक्त है कि क्या शिवाजी का कद इतना छोटा है कि उन्हें राजनीति में झोंक दिया जाना चाहिए? पूरे विश्व के कोने-कोने में हमें तमाम ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जहां हम वहां की सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ वहां के युगपुरुषों की प्रतिमाएं मौजूद हैं।
भारत के भी कई राज्यों में हमें वहां के युगपुरुषों की प्रतिमाएं और स्मारक मिल जाएंगे। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं होते हैं। इन स्मारकों और प्रतिमाओं के सामने फोटो खिंचवाकर हम उन्हें अपने एलबम में सजाना शान की बात समझते हैं। ऐसे में अगर भारतीय अस्मिता की आन-बान और शान के प्रतीक माने जाने वाले शिवाजी का स्मारक बनाया जा रहा है तो विरोध के स्वर क्यों? दुनिया के सबसे ऊंचे स्मारक के रूप में इसे पहचाना जाएगा। क्या यह सुखद नहीं कि पूरे विश्व में अभी स्टेच्यू आॅफ लिबर्टी की जो पहचान है वह भारतीय अस्मिता के प्रतीक की तरफ शिफ्ट हो जाएगी।
अरब सागर में 32 एकड़ की चट्टान पर बनने वाले इस मराठा शासक की 192 मीटर ऊंची प्रतिमा दुनिया के किसी भी पर्यटक के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगी। एक बार में यहां दस हजार पर्यटक आ सकते हैं। इनमें वो दर्शक भी शामिल होंगे, जिन्होंने शिवाजी को न कभी पढ़ा होगा और न उनके बारे में जानते होंगे। पर एक बार यहां आने के बाद उन्हें भी शिवाजी महाराज के प्रति जानने की इच्छा जरूर होगी। क्या यह कम नहीं है कि इसी बहाने में हम भारतीय इतिहास के उस युगपुरुष को याद कर सकेंगे, जिन्होंने हिंदुस्तान का सिर कभी झुकने नहीं दिया।
भारतीय इतिहास में छात्रपति शिवाजी के शासन, उनके संघर्ष, उनके द्वारा किए कार्यों को बेहद सम्मानजनक स्थान मिला हुआ है। कई विदेशी सेनाओं ने तो शिवाजी के युद्ध नीति पर बकायदा अध्ययन कर रखा है। वियतनाम के सैन्य इतिहास में शिवाजी को भगवान की तरह पूजा जाता रहा है। एक बार वहां के सेनाध्यक्ष ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि अमेरिका के साथ इतना लंबा संघर्ष सिर्फ और सिर्फ छत्रपति शिवाजी की युद्ध तकनीक के आधार पर ही संभव हो सका था। शिवाजी महाराज ने छद्म युद्ध की जो तकनीक इजात की थी वह आज भी अतुलनिय है। भारतीय सैन्य इतिहास में तो शिवाजी को भारतीय नौसेना का पितामह कहा जाता है।
ब्रिटिश इतिहास में दर्ज है कि शिवाजी की सेना में 85 फ्रिगेड यानि लड़ाई के लिए छोटे जहाज और करीब तीन बड़े जहाज मौजूद थे। जिस शिवाजी के नाम से दुश्मनों की रूह कांप जाती थी अगर उस शिवाजी महाराज को भारतीय आन-बान के प्रतीक के रूप में इतना ऊंचा दर्जा दिया जा रहा है तो आपत्ति क्यों? दरअसल शिवाजी के स्मारक और स्टेच्यू के विरोध के पीछे कई तर्कपूर्ण कारण भी मौजूद हैं। केंद्र सरकार और महाराष्टÑ सरकार को इन तर्कपूर्ण कारणों पर भी ध्यान देना चाहिए। पूरे महाराष्टÑ सहित कई क्षेत्रों में शिवाजी के ऐतिहासिक किले मौजूद हैं, जो बेहद खराब स्थिति में हैं। यही नहीं शिवाजी से जुड़ी कई यादें भी देखरेख के आभाव में विलुप्त हो चुकीहैं, या विलुप्त होने की कगार पर है। कभी भी किसी केंद्र सरकार ने और न ही राज्य सरकार ने इन किलों, स्मारकों और यादों को सहेजने का जज्बा दिखाया और न सम्मान दिया।
भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीयत पर शक भी इसीलिए किया जा रहा है क्योंकि जितनी भी सरकारें आईं हैं उन्होंने शिवाजी को राजनीति के चश्मे में ही देखने की कोशिश की है। हर चुनाव में छत्रपति शिवाजी को राजनीति के अखाड़े में उतार दिया जाता है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से नरेंद्र मोदी द्वारा किए जा रहे शिलान्यास पर भी राजनीति हो रही है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिस शिवाजी के स्मारक का शिलान्यास महाराष्टÑ की देवेंद्र फर्नांडिस की सरकार और प्रधानमंत्री मोदी ने धूमधाम से किया है, उस स्मारक की परिकल्पना कभी कांग्रेस ने की थी। वर्ष 2004 में कांग्रेस और एनसीपी की सरकार ने इस स्मारक की घोषणा की थी। लंबे समय से स्मारक की यह फाइल दफ्तरों में धूल फांकती रही। हर बार चुनावी मौसम में यह फाइल मुद्दों के रूप में वोटर्स के सामने आई। चुनावी मौसम बीत जाने के बाद फिर से शिवाजी इतिहास के पन्नों में ही दफन होते रहे। अब लंबे समय बाद इतिहास का पन्ना शिलान्यास तक पहुंचा है। बताया जा रहा है कि चंद महीनों में महाराष्टÑ में महापालिकाओं के चुनाव व्यापक स्तर पर होने जा रहे हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो सिर्फ 41.8 प्रतिशत वोट बीजेपी को मिले थे। ऐसे में यह बात भी उठ रही है कि कहीं एक बार फिर से शिवाजी के   विशालकाय स्मारक की परिकल्पना सिर्फ परिकल्पना ही बनकर न रह जाए। नोटबंदी के बाद वैसे भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा है। तीन महीने बाद बजट का मौसम भी शुरू हो जाएगा। ऐसे में करीब तीन हजार छह सौ करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट के लिए बजट कहां से आएगा।
शिवाजी स्मारक के शिलान्यास से पहले मुंबई में कई जगहों पर शिवसेना और बीजेपी का पोस्टर वार भी पूरे देश ने देखा है। बीजेपी के पोस्टर में न तो बाबा साहब और न ही उद्धव ठाकरे को जगह मिली। वहीं शिवसेना ने इस स्मारक को बाबा साहब का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया है। ऐसे में शक की कोई गुंजाइश नहीं बचती कि यह प्रोजेक्ट सिरे चढ़ भी सकेगा की नहीं। वैसे भी अभी महाराष्टÑ में बाबा साहब अंबेडकर स्मारक की राजनीति शुरू नहीं हुई है। बीजेपी सरकार पर दबाव रहेगा कि जितना भव्य शिवाजी मेमोरियल होगा उतना ही भव्य डॉ अंबेडकर स्मारक भी होना चाहिए। पर मंथन जरूर करना चाहिए कि इन सभी राजनीतिक दबावों, राजनीतिक स्वार्थ और वाद-विवाद से ऊपर हमारे युग पुरुषों की पहचान कायम होनी चाहिए की नहीं। इन युगपुरुषों का कद राजनीति से कई गुना ऊपर स्थापित है।

Friday, December 23, 2016

तैमूर के बहाने : एक है हिटलर

Hitler 

ऐसा नहीं है कि भारतीय इतिहास के सबसे कु्र शासकों में से एक तैमूर लंग के बाद भारत में किसी बच्चे का नाम तैमूर नहीं रखा गया हो। कल ही दिल्ली से राजीव भाई ने बताया कि बिहार में उनके गांव आरा में एक तैमूर है जो कच्छा बनियान बेचता है। अगर भारत के विभिन्न राज्यों खासकर मुस्लिम बहुल वाले राज्यों की वोटर लिस्ट चेक की जाए तो सैकड़ों तैमूर मिल जाएंगे। पर करिना-सैफ ने अपने बेटे का नाम तैमूर क्या रख लिया है हर तरफ बवाल मचा है। इन्हीं सबके बीच व्हॉट्स ऐप पर मैसेज आया कि ..नाम में क्या रखा है निर्भया कांड के दरिंदे के नाम के साथ राम जुड़ा है।
सही बात है नाम में क्या रखा है। अब भला किसी का नाम हिटलर रख देने से कोई हिटलर थोड़े ही हो जाता है। तैमूर के बहाने मुझे हिटलर की याद आ गई। याद आई तो फेसबुक पर उसकी चर्चा कर दी। लीजिए हाजीर है ‘एक है हिटलर’... यह उस ‘विद्रोही’ हिटलर की कहानी है जिसका जन्म पश्चिम चंपारण की उस धरती पर हुआ, जहां से गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। अद्भूत है गांधी और हिटलर का संयोग।

जब मैंने कच्छा ठीक से पहनना शुरू किया था उसी वक्त हिटलर से मुलाकात हुई थी। कहने का मतलब है वह ‘अंडरवियर फ्रेंड लिस्ट’ में है। मेरे ख्याल से वह 1983-84 का साल था, जब हम लोग मुजफ्फरपुर के मझौलिया रोड स्थित वर्मा कैंपस में शिफ्ट हुए थे। हमारे घर से ठीक बगल वाला घर संस्कृत के टीचर ‘माट साहब’ का था। ‘माट साहब’ मास्टर साहब का अपभ्रंश था। हम लोग उन्हें चाचा जी कहते है। गारंटी के साथ कह सकता हूं कि चाचा जी का ओरिजनल नाम (अचलेश्चर त्रिपाठी) चुनिंदा लोग ही जानते थे। पूरे शहर में वे ‘संस्कृत वाले माट साहब’ के नाम से ही जाने जाते थे। पूरे मुजफ्फरपुर में उनके जैसा संस्कृत पढ़ाने वाला कोई शिक्षक नहीं था। यही कारण था कि हर साल हजारों की संख्या में उनके यहां संस्कृत पढ़ने के लिए स्टूडेंट्स पहुंचते थे।
हम लोग जब उस घर में शिफ्ट हुए थे, तब पहली बार हिटलर नाम सुना था। हम छोटे बच्चे थे, इसलिए इतिहास वाले हिटलर के बारे में पता नहीं था। हां पापा मेरे हिस्ट्री के प्रोफेसर थे तो उन्हें इस बात से जरूर आश्चर्य हुआ था कि इतना छोटा बच्चा हिटलर कैसे हो सकता है। खैर वक्त के साथ-साथ हम थोड़े बड़े हुए। जब स्कूल पहुंचे तो इतिहास वाले हिटलर से सामना हुआ। इतिहास में हिटलर को पढ़ने के बाद जिज्ञासा हुई कि आखिर हमारे बचपन के मित्र का नाम हिटलर कैसे रखा गया।
यह तो वह हिटलर था, जो हमारे साथ गली क्रिकेट खेलते बड़ा हो रहा। यह तो वह हिटलर है जिसे हम जब चाहें तब गले में हाथ डालकर पटक दें। यह तो वह हिटलर है जो क्रिकेट में आउट होते ही अपनी बैट का दम दिखाते घर चल दे। क्योंकि मोहल्ले का एकलौता बैट उसी के पास था। इसी के दम पर वह दो बार आउट होता था। मुथैय्या मुरलीधरन की तरह थ्रो के एक्शन में स्पीन बॉल फेंककर यह हिटलर खुद को अनिल कुंबले से कम नहीं समझता था। यह तो वह हिटलर है जिसे पिताजी की तेज आवाज से सूसू आ जाए। वह हिटलर तानाशाह था, जिसके नाम से दुनियां कांपती थी और यह हिटलर ....
एक किस्सा सुनाता हूं। मुझे अच्छी तरह याद है हमलोग उस वक्त सातवीं क्लास में पढ़ते थे। हिटलर के घर में ही हम कैरम खेल रहे थे। कैरम खेलने में हम इतने मशगुल थे कि हमें पता ही नहीं चल सका था कि चाचा जी स्कूल से घर आ गए हैं और ड्राइंग रूम में विराजमान हैं। चाची ने हिटलर को खाने के लिए बोला और हिटलर का जवाब आया ‘अरे यार’ खा लेंगे। हिटलर का इतना बोलना था कि घर में भूचाल आ गया। चाचा जी अचानक से प्रकट हुए। आव देखा न ताव हिटलर को दोनों हाथों से दबोच कर कैरम पर पटक मारा। बोले तय कर लो कि यह तुम्हारी मां है या यार। कसम खाकर बोलता हूं, आज भी जब किसी को यार बोलता हूं चाचा जी का वह गुस्सा याद आ जाता है। और दावे से कह सकता हूं कि हिटलर भी जब यह यार शब्द बोलता होगा उसे पिता जी की पटखनी याद आती होगी। 
तो यह हिटलर किताबों और इतिहास वाले हिटलर से बिल्कुल जुदा था। फिर भी यह जिज्ञासा बनी रही कि आखिर किसी बच्चे का नाम हिटलर कैसे हो सकता है। चाचा जी से पूछने की तो हमारी हिम्मत थी नहीं। दिन बीतते गए हम लोग हाईस्कूल पहुंच गए। तब शायद पहली बार हमें हिटलर का असली नाम पता चल सका रुद्रेश्वर त्रिपाठी। कहां शिव जी का साक्षात नाम और कहां हिटलर। फिर हिटलर के चाचा जी जो उनके साथ ही रहते थे (अब इस दुनिया में नहीं रहे) उन्होंने इस नाम का खुलासा किया। उन्होंने बताया था कि जब हिटलर छोटा था (हम लोगों से मिलने से पहले की बात) तब बात-बात में गुस्सा हो जाता था। हर बात में रूठना तो जैसे उसकी आदत बन गई थी। एक दिन बातों ही बातों में उन्होंने उसे हिटलर नाम दे दिया। फिर यह नाम रुद्रेश्वर के साथ ऐसा जुड़ा कि आज तक उसके असली नाम से लोग उसे कम और हिटलर के नाम से ज्यादा जानते हैं।

संयोगवश कॉलेज में मैंने इतिहास सब्जेक्ट ले लिया। हिटलर नाम में दिलचस्पी भी बढ़ी। इसी दौरान हिटलर की आत्मकथा मीनकैम्फ भी पढ़ने का मौका मिला। यह आत्मकथा खुद हिटलर ने लिखी थी, मीनकैम्फ का मतलब था ‘मेरा संघर्ष’। इस आत्मकथा को   पढ़ने का बाद जब मेरी मां हिटलर की मां को आवाज देती थीं और कहती थीं कि ...हिटलर की मम्मी सुनती हैं..सच कहता हूं बड़ा मजा आता था। फिर तो हर एक शब्द पर गौर करने लगा।
हिटलर की मम्मी, हिटलर के पापा, हिटलर के भैया, हिटलर के चाचा, हिटलर के दादा, हिटलर की दादी, हिटलर की चाची कहने का मतलब है मुझे हिटलर के पूरे खानदान से मिलने का मौका मिला। कई बार हिटलर के पुस्तैनी घर भी गया। हिटलर मेरी दीदी बॉबी दीदी को ही अपनी बहन मानता था। जब राखी के लिए वह हिटलर को राखी बांधती थी तो हमलोग कहते थे, तुम विश्व इतिहास के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर को राखी बांध रही हो। न जाने ऐसी ही कितनी अनगिनत यादें हिटलर और उसके नाम से जुड़ी हैं।
पर अभी भी सवाल मौजूं है कि आखिर क्या नाम का प्रभाव किसी के स्वभाव पर पड़ता है?
इन सबके बीच हिटलर के दादा जी की चर्चा जरूरी है। महात्मा गांधी के परम भक्त हिटलर के दादा सही में सभी के दादा थे। वक्त के ऐसे पाबंद कि मुर्गा बांग देना भूल जाए, लेकिन दादाजी का सुबह चार बजे उठना जरूरी था। नियम कायदे के जबर्दस्त पक्के। खान पान के उतने ही शौकिन। पान उनकी जान थी। एक शब्द में कहा जाए तो कंप्लीट दादा जी थे। हिटलर की अपने पिताजी के नाम से भले ही सूसू निकल जाए पर हिटलर की उनके दादा जी से जबर्दस्त पटती थी। दूसरी तरफ हिटलर के पिताजी सहित पूरा खानदान दादा जी के नाम से थर थर कांपता था। चाची की स्थिति तो यह थी कि अगर दादा जी ड्राइंग रूम में बैठे हों तो वह उस रूम से भी नहीं गुजरती थीं। वो तो उनके ससुर जी थे, पर मेरी मां भी हिटलर के दादा जी के रौब से कांपती थीं। दादा जी का यह रुतबा कहें या खौफ, ताउम्र उनके सामने किसी ने ऊंची आवाज में बात करने की हिम्मत नहीं दिखाई। पूरे घर के असली तानाशाह वही थे। घर को बांध कर कैसे रखा जा सकता है यह उन्हें पता था। मजाल नहीं था कि उनकी मर्जी के बिना घर का पत्ता भी हिल सके। कई बार दबी जुबान में दादाजी की तानाशाही चर्चा की विषय भी बनी थी।
हिटलर तो एक प्रतीक बन गया। जिद्दीपने का। लड़ाई का। बात बात में गुस्सा होने का। मजाक-मजाक में रखा गया हिटलर नाम रुद्रेश्वर की जिंदगी के साथ जुड़ गया। कॉलेज और यूनिवर्सिटी में भी रुद्रेश्वर अपने असली नाम से कभी नहीं जाना गया। यह नाम उसपर इतना हावी हुआ कि बाद में किसी ने नोटिस भी नहीं लिया कि आखिर पश्चिमी चंपारण के एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ गोरा चिट्टा बालक हिटलर कैसे बन गया। आज भी सभी उसे हिटलर ही पुकारते हैं। मुझे पता नहीं हिटलर की बेगम प्रियंवदा उसे क्या बुलाती है। पर सोच कर गुदगुदी हो रही है कि जब हिटलर गुस्सा करता होगा तो उसे भी हंसी जरूर आती होगी कि किस ‘हिटलर’ से पाला पड़ गया। बड़ा होकर हिटलर का बेटा भी उसके नाम पर क्या रिएक्ट करेगा, यह देखना और सूनना मजेदार होगा। पर यह सब बचपने की बात है। हिटलर आज एक सफल बैंकर है। अपने शहर मुजफ्फरपुर में ही सरकारी बैंक में ऊंचे पद पर है। उसका एक बेहद सुंदर परिवार है। नाम में कुछ रखा नहीं होता, कर्म प्रधान होता है।
सैफ और करीना से प्यार करने वाला मैं एक फैन बेहद प्यार से रखा गया तैैमूर नाम दिल से स्वीकारता हूं। ऊपर वाले से दुआ है कि तैमूर अपने मां और पिता जी की तरह सफल बने। अंत में उस तैमूर का शुक्रिया जिसके बहाने आपको हिटलर की कहानी सुनने को मिली।

Monday, November 21, 2016

प्लीज! आप कॉमन मैन का दिखावा मत करिए


नोटबंदी के इस शोर में एक बार फिर से कॉमन मैन सबसे ऊपर है। वह ऊपर इसलिए भी है क्योंकि नोटबंदी का तात्कालिक असर उसके ऊपर ही है। किसी भी बड़े फैसले का कुछ तात्कालिक परिणाम सामने आता है, कुछ दूरगामी परिणाम सामने आता है। भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना भी यही है कि दूरगामी परिणाम की जगह तात्कालिक परिणामों पर ही अधिक फोकस शुरू हो जाता है। नोटबंदी के इस शोर में भी यही हो रहा है। एक बार फिर से राजनीतिक दलों और ड्रामेबाज नेताओं का कॉमन मैन के प्रति इतना अथाह प्यार दिख रहा है जैसे चुनाव के समय होता है। पर कॉमन मैन को सब पता है। शायद यही कारण है जहां पूरे देश में नोट बंदी को लेकर मारामारी है, बैंकों में छोटी-मोटी बहसबाजी को छोड़ दिया जाए तो कॉमन मैन लंबी-लंबी लाइनों में लगकर भी खुश है।
कॉमन मैन खुश इसलिए भी है क्योंकि उसे लाइन में लगने की आदत जन्मजात मिली हुई है। याद करिए आज से 15 से बीस साल पहले की लाइनें। जब हम रसोई गैस की लाइन में कई-कई घंटे खड़े होते थे। रात दो बजे से लाइन में लगने के बाद भी दोपहर तक गैस नहीं मिल पाती थी। याद करिए राशन की दुकानों पर केरोसिन और चीनी के लिए लगने वाली लाइन को। रेलवे रिजर्वेशन के टिकट काउंटर की भी लाइन आपको याद ही होगी। सिनेमा के टिकट के लिए हम लाइन में खड़े होते थे। किस-किस लाइन की याद दिलाऊं। क्या उस लाइन में कभी आपको कोई वीआईपी नजर आया था। क्या उस लाइन में कभी आपको कोई आईएएस और आईपीएस अधिकारी नजर आता था। याद करिए क्या आपको वहां किसी राजनीतिक दल का कोई बड़ा नेता नजर आता था। नहीं न। फिर मंथन करिए आज नोटबंदी के बाद जब कॉमन मैन लाइन में फिर से है तो नेताओं और बयानबाजों को खुजली क्यों हो रही है। कॉमन मैन तो बचपन से लाइन में लगने का आदी हो चुका है। नोट भी लाइन में लगकर ठीक करा लेगा। फिर असली दिक्कत किसे और क्यों है?

दरअसल, जब भी कोई बड़ा परिवर्तन होता है, उसके पीछे तमाम बड़े कारण ही होते हैं। विमुद्रीकरण कुछ ऐसा ही परिवर्तन होता है। नरेंद्र मोदी सरकार ने चाहे इसका फैसला कितने महीने पहले क्यों न लिया हो, लेकिन इसकी जरूरत देश लंबे समय से महसूस कर रहा था। नकली नोटों से लेकर, कालाबाजारियों तक ने जिस तरह पूरे आर्थिक तंत्र पर अपना कब्जा कर लिया था उसने कई विसंगतियों को जन्म दे दिया था। एक बड़ा झटका इन्हें लगाया जाना जरूरी था। फिलहाल, सरकार के इस निर्णय को लेकर विपक्षी पार्टियों के पास एक भी सार्थक तर्क नहीं है कि क्यों यह फैसला गलत है। गलत सिर्फ इस बात के लिए ठहराया जा रहा है कि क्योंकि कॉमन मैन को दिक्कत हो रही है। हर जगह आम आदमी के लिए खास लोग बयानबाजी कर रहे हैं। जिस नेता को देखो कॉमन मैन की बात कर रहा है। इससे पहले रसोई गैस की लाइन में लगकर क्यों नहीं गैस बुक कराई आपने। कभी राशन की दुकान की लाइन में लगकर क्यों नहीं देखा कि कैसा महसूस होता है। कभी बड़े सरकारी हॉस्पिटल में लाइन लगाकर क्यों नहीं देखा कि वहां क्या हाल होता है कॉमन मैन का।
भारतीय इतिहास में दो बड़े सम्राट हुए जिन्होंने पब्लिक के समर्थन से बहुत कुछ हासिल किया और बहुत कुछ खो दिया। इनका नाम था सम्राट अकबर और सम्राट मोहम्मद बिन तुगलक। दोनों ही राजाओं ने भारत में इकोनॉमिक रिफॉर्म के लिए बेहद सार्थक प्रयास किया। दोनों ही राजाओं को पता था कि वो जिस आर्थिक सुधार के लिए कदम उठा रहे हैं वो उनके खिलाफ भी जा सकता है। पर बावजूद इसके दोनों ही राजाओं ने राष्टÑहित में बड़े फैसले लिए। तुगलक क्यों फेल हो गया और अकबर क्यों सफल हो गया, इस पर भी तमाम रिसर्च हो चुके हैं। पर मोदी सरकार के इतने बड़े फैसले के बाद ही उन्हें तत्काल तुगलक की तरह फेल कह देना कहीं से तार्किक नहीं है। कहा जा रहा है कि इस नोटबंदी का असर चुनाव में बीजेपी को होगा। क्या नरेंद्र मोदी और उनकी टीम को इस बात अहसास नहीं था कि आम लोग परेशान होंगे। इससे उनकी पार्टी को नुकसान होगा। मैं तो बधाई देना चाहूंगा सरकार के इस फैसले को। तमाम नुकसान की संभावनाओं के बावजूद देश हित में इतना बड़ा फैसला लिया।
वैसे यह भी बता देना जरूरी है कि कॉमन मैन इतना भी मूर्ख नहीं है कि वह अच्छे और बुरे में फर्क करना न जानता हो। बैंकों की लाइन में लगे लोग चुपचाप फॉर्म भरकर अपनी छोटी रकम के बदले नई करंसी ले रहे हैं। उन्हें दो घंटे लाइन में लगना पड़े या पांच घंटे। उन्हें इस बात का जरूर अफसोस है कि उनका समय बर्बाद हो रहा है। पर जैसे ही देश हित की बात आती है वो मुस्कुराता हुआ कह रहा है हम तो तत्काल रूप से परेशान हैं, पर उनका क्या जो बहुत दूर तक परेशान हैं। हां, ये लाइन में लगने वाले लोग भी दूरगामी परिणाम का बेचैनी से इंतजार करेंगे। इन्हें मुद्रास्फीति, सेंसेक्स, दलाल स्ट्रीट, डॉलर के प्राइस बढ़ने-घटने से कोई फर्कनहीं पड़ता है। इन्हें तो इस बात से फर्क पड़ता है कि महंगाई घटी की नहीं। कॉमन मैन की मुश्किलें अलग तरह की होती हैं। इन्हें उससे मतलब होता है। अगर सही में नरेंद्र मोदी की सरकार के फैसले से इन कॉमन मैन को कुछ राहत मिलेगी तो यकीनन इसमें सरकार की मंशा की जीत होगी। 

इतनी जल्दी इतने बड़े फैसले के नफा और नुकसान पर बहस करना बेमानी है। मीडियाकर्मियों को भी इतने बड़े फैसले को राजनीति की चाशनी में रखकर नहीं परोसना चाहिए। दूरगामी असर तत्काल नजर नहीं आते हैं। हो सकता है यह दूरगामी परिणाम नरेंद्र मोदी सरकार के लिए घातक भी सिद्ध हों, पर यह राजनीतिक प्रतिबद्धता ही है कि इस सरकार ने एक ऐसा सर्जिकल स्ट्राइक किया है जिसने नक्सलियों से लेकर अलगाववादियों तक की कमर तोड़ दी है। टेरर फंडिंग फिलहाल पूरी तरह थम गई है, पर सरकार को सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि चोर-पुलिस के खेल में चोर दो कदम आगे की सोचते हैं।
कुछ लोग सरकार की तैयारियों पर भी जबर्दस्त प्रहार कर रहे हैं। सरकार की प्लानिंग और इसके इंप्लीमेंटेशन पर भी सवालिया निशान लगा रहे हैं। पर क्या यह भी बताने की जरूरत है कि घर में एक साधारण शादी-ब्याह का कार्यक्रम भी होता है तो तमाम तैयारियों के बाद भी कितनी परेशानियां सामने आती हैं। ऐसे में यह तो पूरे देश की आर्थिक विसंगतियों पर सर्जिकल स्ट्राइक है। ऐसे में राजनीतिक दलों के ड्रामेबाजों और बयानबाजों की फौज को मंथन जरूर करना चाहिए कि घरवापसी, पुरस्कार वापसी के बाद अब नोटवापसी का ड्रामा देखकर लोग हंस ही रहे हैं। कॉमन मैन पहले भी लाइन में लगता रहा है और आज भी लाइन में लगकर हंस रहा है। इसलिए प्लीज आप खास आदमी की तरह रहें कॉमन मैन बनने की कोशिश न करें।

Monday, October 3, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगने वालों पाकिस्तान से कुछ सीखो

भारतीय जांबाजों ने पाकिस्तान को उसी की भाषा में समझाकर एक बेहतर संदेश दिया है। लंबे समय से इसी की प्रतीक्षा की जा रही थी। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में विशेष तौर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित कर और फिर अचानक पाकिस्तान में उनके घर जाकर साफ कर दिया था कि भारत पाकिस्तान से दोस्ती चाहता है। दुश्मनी से कोई बातचीत संभव नहीं है। बावजूद इसके बार-बार पाकिस्तानी सेना भारत के सब्र की परीक्षा ले रही थी। सीजफायर का उल्लंघन, गुरदासपुर में आतंकी घटना, पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमला और फिर उड़ी में 19 भारतीय सैनिकों की शहादत ने आखिरकार भारत को कड़ी कार्रवाई करने पर विवश कर ही दिया।
उड़ी हमले के बाद जिस तरह भारत सरकार अपने देश के लोगों के अलावा अंतराष्टÑीय दबाव झेल रही थी उसने स्पष्ट कर दिया था कि आने वाले दिनों में बहुत कुछ होगा। भारत सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हर एक विषय पर सोची समझी रणनीति पर काम किया। पहले संयुक्त राष्टÑ में पाकिस्तान को उसकी ही बात पर घेरा। फिर सिंधु जल समझौता और मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापस करने की झिड़की दी। साथ ही साथ पीओके में घुसकर एक साथ कई आतंकी शिविरों को नष्ट भी किया। पाकिस्तान को भी इस बात का अंदेशा था, इसीलिए वह बार-बार परमाणु हमले की धमकी दे रहा था। पर भारत सरकार ने इस सर्जिकल स्ट्राइक से स्पष्ट कर दिया है कि अब छेड़ोगे तो छोडेंÞगे नहीं।
इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम बात यह रही कि भारत सरकार ने खुद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सर्जिकल स्ट्राइक करने की बात स्वीकार की। यह अपने आप में बहुत बड़ी डिप्लोमेटिक जीत है। जहां एक तरफ पाकिस्तान को भी फोन पर इस सर्जिकल स्ट्राइक की सूचना दी गई, वहीं अमेरिका, रूस सहित कई अन्य देशों को भी पूरे अभियान के बारे में बताया गया। सभी को जानकारी दी गई कि कैसे भारतीय जांबाजों ने पीओके में आतंकियों का सफाई अभियान चलाया है। पाकिस्तान की हालत सबसे बुरी है। वह न तो यह स्वीकार कर पा रहा है कि भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक कर कितने आतंकियों को मारा और न ही यह स्वीकार कर पा रहा है कि पीओके में सही में आतंकी प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं।
पाकिस्तान इस वक्त सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दे पर हर तरफ से घिरा हुआ है। पूरी दुनिया में उसकी फजीहत हो रही है। पर भारत के चंद तथाकथित बड़े बुद्धिजीवी भारत सरकार पर ही प्रश्चचिह्न लगाने पर तुले हैं। मीडिया के भी कुछ सो-कॉल्ड बड़े पत्रकार और हमेशा मोदी नीति के खिलाफ आग उगलने वाले चंद लोग भी भारत से इस सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगने में जुटे हैं। ये वैसे ही लोग हैं जो अपने होने का सबूत भी अपने परिजनों से मांगने में गुरेज नहीं करेंगे। ऐसे लोग ही भारत सरकार को नीचा दिखाकर खुद को लोकतांत्रिक देश का सबसे बड़ा पैरोकार मानने लगे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक-एक बात जिन्हें बुरी लगती है, ऐसे राजनीतिक लोगों ने भी इस सर्जिकल स्ट्राइक की बड़ाई की है। उन्होंने भी उड़ी का साहसिक बदला लेने के लिए भारतीय जांबाजों की जांबाजी को सराहा है। पर कुछ तथाकथित लोग अब भी भारत सरकार को कठघरे में खड़ा करने की छद्म मुहिम चलाने में जुटे हैं। यह ऐसा वक्त है जब पूरे भारत को एकजुट रहने की जरूरत है, वहीं ऐसे लोगों से सावधान रहने की भी जरूरत है। लोकतंत्र में फ्रीडम और एक्सप्रेशन के नाम पर कुछ भी ऊलजुलूल बोलने वालों के बहकावे में आए बिना हमें भारत सरकार को सपोर्ट करने की जरूरत है। राजनीतिक तौर पर चाहे सोनिया गांधी हों राहुल गांधी या फिर अरविंद केजरीवाल। सभी ने एक स्वर में भारत सरकार के इस सख्त कदम की प्रशंसा की है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत सरकार अपनी इस मुहिम को आगे भी जारी रखेगी। अंतरराष्टÑीय बॉर्डर पर जिस तरह का माहौल है उसमें युद्ध की संभावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता है। ऐसे में हर एक भारतीय को सावधान और सजग रहने की जरूरत है। पाकिस्तान की भाषा में सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत भारत सरकार से मांगने वालों के लिए यह करारा तमाचा होगा जब पाकिस्तान खुद यह बताए कि उसके कितने आतंकी लॉन्चिंग पैड धवस्त हुए हैं और कितने आतंकी मारे गए हैं। हालात ये हैं कि जहां भारतीय जांबाजों ने कार्रवाई की है वहां पाकिस्तानी सेना रात के समय जाकर आतंकियों के शवों की शिनाख्त में जुटी है। पाकिस्तानी मीडिया दबे स्वर में यह खबरें प्रकाशित कर रही है। जबकि वहां की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस प्रोपेगेंडा में जुटी है कि कैसे भारतीय सेना को इस दौरान नुकसान पहुंचाया गया है। वहां के एक राष्टÑीय चैनल ने पिछले दिनों एक डॉक्टर्ड वीडियो चलाकर यहां तक दिखा दिया कि कैसे पाकिस्तानी सेना ने उनकी सीमा में घुस आए भारतीय सैनिकों को सबक सिखाया।

तो हे भारत के तथाकथित बुद्धिजिवियों! थोड़ा सा मंथन जरूर करो। पाकिस्तान से तुम्हें सीख लेने की जरूरत है कि वहां की मीडिया इन हालातों में सरकार के साथ कैसे खड़ी है। अब भविष्य में भारत सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगने से पहले एक बार जरूर पाकिस्तान भी होकर आ जाओ ताकि तुम्हें पता चल सके कि   राष्टÑप्रेम क्या होता है और संकट के समय अपने सरकार के साथ किस तरह खड़ा रहा जाता है। भारतीय सेना को तो जो करना था उसने कर दिया। पूरा भारत चाहता है कि सेना बिना बताए भी ऐसा ही करती रहे। फिलहाल, नरेंद्र मोदी और उनकी टीम को राजनीतिक स्तर और सैन्य स्तर पर इतनी बड़ी जीत के लिए बधाई।

Friday, September 30, 2016

धोनी तुम दिल में बसे थे..अब दिमाग में हो


स्टेडियम में सचिन के बाद अगर किसी का इतना नाम अब तक गूंजा है तो वह धोनी ही है। बस यही एक गूंज है जो आपको धोनी के इतने करीब लेकर जाती है। धोनी द अनटोल्ड स्टोरी में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे धोनी के चाहने वाले न जानते हों। पर जब आप उसे परदे पर जीवंत रूप में देखते हैं तो यकीन मानिए हमारे और आपके दिल में बसने वाला धोनी दिमाग में बस जाएगा।
महेंद्र सिंह धोनी भारतीय इतिहास का सबसे अनप्रेडिक्टबल कप्तान क्यों बना, यह उसके जन्म के समय ही पता चल जाता है। वानखेड़े स्टेडियम स फिल्म की कहानी शुरू होती है। इसके चंद मिनट बाद फ्लैश बैक में जैसे ही धोनी का जन्म दिखाया जाता है उसी वक्त यह अहसास हो जाता है कि जिस धोनी के जन्म के समय जब डॉक्टर ही कंफ्यूज हो जाता है उस धोनी को विरोधी कैसे पढ़ सकते थे। तभी तो धोनी टी-20 वर्ल्ड कप में जोगिंदर सिंह जैसे युवा बॉलर से फाइनल ओवर करवता है और 2011 वर्ल्ड कप फाइनल में अपनी बल्लेबाजी का क्रम अचानक से ऊपर करके हम विश्व विजेता बनाता है। इसी अनप्रेडिक्टबल कप्तानी की बदौलत धोनी ने भारतीय क्रिकेट की इतनी ऊर्जा दी है जिसे सदियों तक भुलाया नहीं जा सकता है।

क्यों देखने जाएं यह फिल्म?
वैसे तो धोनी का नाम ही इतना बड़ा है कि फिल्म देखने का वह पर्याप्त कारण है। फिर भी आपको दो कारण से यह फिल्म जरूर देखना चाहिए। पहला कारण.. सुशांत सिंह राजपूत ने धोनी के कैरेक्टर को जो जीवंतता प्रदान की है वह सदियों में कभी दोबारा देखने को नहीं मिलेगी और दूसरा माही को एमएस धोनी बनते देखने की इच्छा। एक छोटे से शहर का माही, पंप आॅपरेटर को बेटा माही, फुटबॉल में अपना कॅरियर बनाने की चाहत रखने वाला माही कैसे एमएस बनता है इसे बेहद खूबसूरत अंदाज में फिल्मी परदे पर दिखाया गया है।
धोनी को चाहने वालों को उम्र की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है, लेकिन खासकर युवाओं को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए। धोनी जैसे शख्स की कहानी को तीन घंटे पांच मिनट के फ्रेम में बांधना किसी चुनौती से कम नहीं। इसीलिए धोनी की चुनौती और उसके संघर्ष को थोड़ा लंबा किया गया है। खासकर उस भाग को जिसमें धोनी सबकुछ हासिल करने के बावजूद कैसे टीम इंडिया की जर्सी और ट्रेन के टिकट कलेक्टर की वर्दी के बीच झूलता रहता है। यह एक युवा की मनोदशा को दर्शाता है जिसमें कई बार हम अपना सबकुछ गंवा देते हैं। पर धोनी को देखने के बाद आपको अहसास होगा कि जिंदगी हमें किसी खास मकसद के लिए मिली है, सिर्फ जरूरत हमें अपनी क्षमता को पहचानने की है।
क्यों न जाएं फिल्म देखने
जो लोग इसे एक क्रिकेट की पृष्ठभुमि वाली फिल्म मानकर देखने जाएंगे उन्हें निराशा हाथ लगेगी, क्योंकि इसमें वैसा कुछ भी नहीं है। न ही यह स्पोर्ट्स ओरिएंटेड फिल्म है। सिर्फ धोनी के खेल को देखना चाहते हैं तो यू-ट्यूब पर हजारों क्लीपिंग मौजूद है। जो लोग धोनी के जीवन के और भी अंदरुनी राज, टीम ड्रेसिंग रूम की अनटोल्ड स्टोरी, कई सीनियर क्रिकेटर्स से उनके विवाद की गॉसिप जानना चाहते हैं उन्हें भी इस फिल्म में कुछ नहीं मिलेगा। फिल्म सिर्फ धोनी के 2011 वर्ल्ड कप विनर बनने तक की कहानी बयां करती है। धोनी से जुड़ी कई कंट्रोवर्सी से भी फिल्म का कुछ खास लेना देना नहीं।

निर्देशन और एक्टिंग
धोनी के कैरेक्टर को इस तरह जीवंत करने के लिए सुशांत सिंह राजपूत के नौ महीने की मेहनत सार्थक है। फिल्म की पहली झलक देखते ही आपको अहसास हो जाएगा कि सुशांत के अलावा यह रोल कोई और नहीं कर सकता है। धोनी के पिता पान सिंह धोनी को अगर आपने कभी देखा है तो आपको अनुपम खेर को पान सिंह के रूप में देखना काफी अच्छा लगेगा। इसके अलावा भूमिका चावला, किआरा अडवाणी, दिशा पटानी, हैरी टंगड़ी, श्रेयस तलपड़े, राजेश शर्मा, ब्रिजेन्द्र काला, कुमुद मिश्रा ने भी फिल्म के साथ न्याय किया है। निर्देशक नीरज पांडे वाकई बधाई के पात्र हैं जिन्होंने हमारे रीयल हीरो को 72एमएम के परदे पर सदा के लिए अमर बना दिया है। युवा संगीतकार अमान मलिक, रोचक कोहली और गीतकार मनोज मुंतशिर ने फिल्म को वह सबकुछ दिया है जो एक दर्शक के रूप में हमें चाहिए।

धोनी का वेलेंटाइन डे 
कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी का वेलेंटाइन डे से कुछ खास रिश्ता रहा है। शायद यह वह अनटोल्ड स्टोरी है जिसे दर्शक देखकर जरूर रोमांचित होंगे। फिल्म आपको कई जगह रुलाती है और हंसाती भी है। धोनी के अपने दोस्तों के साथ मस्ती का अंदाज भी पहली बार दर्शकों के सामने आएगा। फिल्म में धोनी के रियल मैच और फिल्मी परदे के मैच को बेहतरीन और टेक्निनिकल अंदाज से मिक्स और एडिट किया गया है। और फिल्म का अंत भी हेलिकॉप्टर शॉट और धोनी की सदाबहार मुस्कान से करना भी जरूर आपको धोनी..धोनी..धोनी कहने पर मजबूर कर देगा।

Thursday, September 29, 2016

छू ले तुझको है किसमें दम, भारत माता तेरी कसम


प्रधानमंत्री ने उड़ी हमले के चंद दिनों बाद केरल में रैली की थी। इस दौरान जो उन्होंने जो हुंकार भरी थी उस पर भी मोदी भक्तों को कोसने वालों ने सवालिया निशान लगा दिया था। 56 र्इंच की दुहाई देकर ताना मारने वालों के लिए भारतीय जांबाजों का सैन्य पराक्रम इस बात का प्रमाण है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो दुश्मनों को उनके घर में घुस कर मारने में हमारी भारतीय सेना कभी पीछे नहीं हटेगी। सियाचिन की घाटियों में दीपावली मनाने वाले भारतीय प्रधानमंत्री ने केरल को अपनी बात रखने के लिए क्यों चुना, इस पर मोदी भक्तों के दुश्मनों ने टिप्पणी की। टिप्पणी कोई भी कर सकता है, वह स्वतंत्र है।
पर ऐसे वक्त पर जब पूरा देश एक होने की बात दोहरा रहा हो, जब जनभावनाएं एकजूट होने का आह्वान कर रही हो, हर एक भारतीय उड़ी के उन 18 शहीदों के बलिदान को याद करके अपनी भुजाएं फड़फड़ा रहा हो, ऐसे में देश के प्रधानमंत्री को संबल और हौसला देने की बजाए कुछ तथाकथित बड़े पत्रकार और तथाकथित आलोचक अपनी राग भैरवी गाने में जुट जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने उड़ी हमले के बाद अपने पहले सार्वजनिक मंच से पाकिस्तान को जो संदेश दिया था वह अपने आप में बहुत कुछ बयां कर रहा था। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी यूएन में दहाड़ते हुए पाकिस्तान को उसकी करनी का फल भुगतने को तैयार रहने को कहा था। भरतीय सेना ने जो हुंकार भरी थी उसके भी अपने मायने थे। भारतीय सेना की तरफ से स्पष्ट कर दिया गया था कि 18 शहीदों के बलिदान का बदला तो जरूर लिया जाएगा, लेकिन समय और दिन वह खुद तय करेंगे। इतने के बावजूद भी ताना मारने वालों की जमात खुद को सो कॉल्ड बुद्धिजिवि कहलाने में बिजी थे।
आज जब भारतीय सेना सीना ठोकर कह रही है कि पाकिस्तान में घुसकर हमने आतंकी कैंपों को तबाह कर दिया है। ऐसे में हर एक भारतीय को इंडियन आर्मी के जांबाजों पर गर्व महसूस हो रहा है। वह इतना गौरव महसूस कर रहा है कि हर तरफ भारतीय सेना की जय जयकार हो रही है। सबकुछ अच्छा-अच्छा हो रहा है, लेकिन इसके बाद क्या?
इसके बाद क्या..यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर हम सभी को सोचना है। रक्षा विशेषज्ञ कह रहे हैं अभी टेंशन और बढ़ेगी। ऐसे में सबसे अहम है हमारी एकजूटता। मोदी सरकार ने देर शाम ही आॅल पार्टी मीटिंग बुलाकर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि हमें एकजुट होना होगा। ऐसे में मीडिया के अलावा आम लोगों को भी एकजुट रहने की जरूरत है।
किसी सरकार की आलोचना जायज है। इससे उसे और बेहतर करने की प्रेरणा मिलती है। पर एक समय ऐसा होता है जब हमें सभी दुर्भावनाओं से ऊपर उठना होता है। सभी आलोचनाओं को पीछे छोड़ना होता है। यह वही समय है। हमें यह स्वीकारने में जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए कि मोदी हमारे प्रधानमंत्री हैं। वह अगर वह करारा जवाब देने की बात कह रहे हैं तो स्वीकार करना चाहिए। यह नहीं कि उन्हें अपना 56 र्इंच का सीना दिखाने की चुनौती देनी चाहिए। मोदी भक्त..मोदी भक्त कहकर राष्टÑप्रेम को भी कटघरे में खड़ा करने वालों से भी हमें सावधान रहने की जरूरत है।

तो हे मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर न स्वीकार करने वालों, तो हे भक्तों को गाली देने वालों अब भी समय है एकजूटता दिखाओ। पड़ोसी आंखे तरेरे बैठा है। अब भी एकजूट नहीं रहोगे तो आने वाली पीढ़ी तुमसे यही सवाल करेगी कि मोदी की खामी निकालने में समय जायज करने वालों कम से कम आज के वक्त तो एकजूट होकर अपनी सरकार के साथ खड़े रहो।
अंत में उन जांबाजों के नाम यह चंद पंक्तियां जिन्होंने भारत मां पर बुरी नजर रखने वालों को उनके घर में घुसकर मारा..
भारत माता तेरी रक्षक रहेंगे हम
दीवारें बनेंगे हम मां
तलवारें हम बनेंगे मां
छू ले तुझको है किसमें दम
भारत माता तेरी कसम
वंदे मातरम, वंदे मातरम

Sunday, September 18, 2016

17 जवानों की शहादत, युद्ध नहीं तो क्या?


श्रीनगर से करीब सौ किलोमीटर दूर उरी सेक्टर में आर्मी कैंप में अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ है। इस आतंकी हमले में 17 जवानों की शहादत से पूरा देश गमगीन है। रात के घने अंधेरे में हुए इस हमले ने दिन के उजाले की तरह साफ कर दिया है कि पड़ोसी मुल्क की मंशा क्या है। मंथन का वक्त है कि क्या हम अब भी इसे युद्ध मानने से इनकार कर दें?
युद्ध की सर्वमान्य परिभाषा न तो कभी पहले तय की जा सकी है और न अब। इस साइबर युग में युद्ध अब किताबी ज्ञान से काफी आगे बढ़ चुका है। कश्मीर में आतंकी बुरहान वानी के इनकाउंटर के बाद जिस तरह घाटी सुलग रही है, उसने स्पष्ट संकेत दे दिए थे कि पाकिस्तान अपनी छद्म युद्ध को किसी भी स्तर पर लेकर जा सकता है। खुफिया इनपुट भी लगातार इस ओर इशारा कर रहे थे कि आने वाले दिनों में घाटी को और भी अशांत करने के लिए आर्मी को ही निशाना बनाया जाएगा। अब उरी सेक्टर की आतंकी घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान की क्या चाहता है। रविवार की सुबह जब पूरा देश नींद के आगोश में था तो उसी वक्त उरी सेना मुख्यालय में भारतीय जांबाज आतंकियों से लोहा ले रहे थे। आतंकियों ने जवानों पर बम से हमला किया, जिससे वहां टेंट में आग लग गई। ज्यादातर जवान इस अप्रत्याशित हमले में आग लगने से हताहत हुए। करीब 17 जवान शहीद हुए और 19 जवान गंभीर रूप से घायल हैं। यह आतंकी हमला ऐसे समय में हुआ है जब दोनों देशों के बीच तल्खी का माहौल है। आतंकी बुरहान की मौत के बाद जिस तरह पाकिस्तान ने अपना रिएक्शन दिया था उसने भी साफ कर दिया था कि पाक किस तरह भारत को अस्थिर करने की साजिश रच रहा है। काला दिवस मनाकर उसने दोनों देशों की तल्खी को और बढ़ाने का ही काम किया था।
अब सवाल यह उठता है कि इतना सबकुछ हो जाने के बाद भारत का रूख क्या होगा? क्या भारत अब खुले तौर पर यह स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए कि पाकिस्तान ने सही अर्थों में भारत के साथ युद्ध घोषित कर रखा है। राजनीतिक पंडित क्या कहेंगे और किस रणनीति को अपनाने की बात कहेंगे इससे भारतीय जनमानस को कोई परवाह नहीं है। एक आम भारतीय तो बस यही चाह रहा है कि भारत इस युद्ध का जबाव देगा या नहीं? हालांकि इस आतंकी हमले के तत्काल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ शब्दों में यह जरूर कहा है कि हमले के दोषियों को किसी की कीमत पर बख्सा नहीं जाएगा। रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी ऐसे ही तेवर दिखाए हैं। पर क्या यह तेवर सिर्फ बयानों तक ही सीमित रहेंगे या फिर जमीनी स्तर पर भी भारत अपने तेवर दिखाएगा।

यहां सबसे अहम यह है कि उरी में हमले के चंद घंटे पहले ही पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने एक पाकिस्तान टीवी चैनल पर इंटरव्यू के दौरान साफ शब्दों में कहा है कि भारत के खिलाफ अगर जरूरी हुआ तो परमाणू हमले से भी परहेज नहीं होगा। ऐसे में भारतीय रणनीतिकारों को अब भी कुछ सोचने समझना बांकी रह गया है कि पाकिस्तान किस तरह भारत पर प्रेशर गेम बिल्डप कर रहा है।  पाकिस्तान लगातार धमकी देता है और भारतीय रणनीतिकार इसे सिर्फ हवाई बात कहकर शांति बहाल की उम्मीद करते हैं। पीओके को लेकर भारत के पास इतने इनपुट हैं जिससे इसे युद्ध मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
पीओके में कितने ऐसे टेरर कैंप हैं जो कि एलओसी से लगे हैं और कितने लॉन्चिंग पैड हैं जहां से आतंकी घुसपैठ करके जम्मू-कश्मीर में दाखिल होते हैं। यह सारे इनपुट गृहमंत्रालय से लेकर रक्षामंत्रालय तक को हैं। आतंकियों के पास हथियारों के जखीरे से लेकर पाक सेना द्वारा पहुंचाई जा रही मदद की जानकारी भी है। बावजूद इसके भारत किस इंतजार में बैठा है यह समझ से परे है। कारगील युद्ध के पहले शहीद मेजर सौरभ कालिया के परिजन आज भी भारत सरकार से पूछ रहे हैं कि उनके शहीद बेटे के बलिदान का बदला भारत कब लेगा। इसका जबाव आज तक नहीं मिल सका है। ऐसे में आज उरी में शहीद हुए 17 जवानों के परिजनों को भारत सरकार कब जबाव देगी। उन जवानों के परिजनों के अलावा आज पूरा देश भारत सरकार से पूछ रहा है कि कब तक हम पीओके में मौजूद लॉन्चिंग पैड पर सिर्फ निगाह टिकाए बैठे रहेंगे। अब यह मंथन का समय नहीं है। कार्रवाई का समय है।

वर्ष 2014 में भी उरी सेक्टर में ठीक इसी तरह का आतंकी हमला हुआ था। उस हमले में सात जवान शहीद हुए थे। उस वक्त भी रक्षा विशेषज्ञों ने स्पष्ट कहा था कि अब सीधी कार्रवाई करनी चाहिए। यह कार्रवाई दो स्तर पर होनी चाहिए। पहले स्तर पर आतंकियों के सेफ हाउस को टारगेट करना चाहिए। ये सेफ हाउसे जम्मू-कश्मीर के अंदर ही मौजूद हैं। इन सेफ हाउस पर कार्रवाई में अब नहीं देखना चाहिए कि सेफ हाउस के ऊपर किसका हाथ है। सीधी कार्रवाई करनी चाहिए, बिना किसी राजनीतिक भय के। दूसरे स्तर पर कार्रवाई  सर्जिकल स्ट्राइक के साथ होना चाहिए।  पीओके में मौजूद लॉन्चिंग पैड के अलावा वहां मौजूद आतंकी कैंप को सीधा निशाना बनाए जाने की जरूरत है। जब पाकिस्तान ने भारत के साथ खुले तौर पर युद्ध की घोषणा कर ही रखी है तो डरना किस बात का। 17 जवानों की शहादत लगातार यह सवाल पूछेगी कि क्या अब भी युद्ध को स्वीकार करने में कोई और बड़ी शहादत का इंतजार रहेगा?


Friday, September 16, 2016

तो क्या खत्म होगा नीतीश-लालू गठबंधन?

 
बिहार के अब तक के सबसे सफल मुख्यमंत्रियों की श्रेणी में शुमार नीतीश कुमार की स्थिति उस सांप ओर छछुंदर की तरह हो गई है, जिसे न तो निगलते बन रहा है और न उगलते। मोहम्मद शहाबुद्दीन के जेल से बाहर आते वक्त भले ही नीतीश कुमार बिहार से बाहर थे, लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज ने साफ कर दिया है कि वह परेशान हैं। यह वही शहाबुद्दीन है जिसे जेल के अंदर डालने की हिम्मत नीतीश कुमार ने अपने पहले शासन काल में 2005 में दिखाई थी और आज यह वही शहाबुद्दीन है जो पूरी शान-ओ-शौकत के साथ नीतीश राज में जेल से बाहर आया है। जेल से बाहर आते ही पहला बयान नीतीश के खिलाफ देते हुए शहाबुद्दीन ने स्पष्ट कर दिया है कि नीतीश बाबू का खेल खत्म है। अब नीतीश कुमार को मंथन करना है कि वह लालू के साथ बने रहेंगे या बिहार की जनता के साथ।
बिहार की यह विडंबना ही रही है कि जब-जब अपराधों पर लगाम लगाने के लिए नीतीश ने कमर कसी है, उनके साथियों ने ही उनके कदम रोक दिए हैं। एक सरकारी आंकड़े में बताया गया था कि अपने पहले शासन काल में नीतीश ने करीब 55 हजार अपराधियों से बिहार को मुक्त कराया था। यह 2005 का वह दौर था जब बिहार की जनता ने लालू के जंगल राज से मुक्ति पाने के लिए नीतीश को भारी जनसमर्थन दिया था। नीतीश ने भी सत्ता की बागडोर संभालते ही बिहार को अपराधमुक्त बनाने का जो संकल्प लिया था, उसे काफी हद तक पूरा भी किया। पुलिस को इतनी शक्ति दे दी गई थी कि या तो अपराधी बिहार छोड़कर भाग गए, या एनकाउंटर में मार दिए गए। बाहुबलियों को एक-एक कर जेल में डाला गया। इन्हीं बाहुबलियों में मोहम्मद शहाबुद्दीन भी एक था। यह वही शहाबुद्दीन था जिसने लालू राज में एसपी को सरेआम थप्पड़ मार दिया था, पर नीतीश ने इसे जेल की सलाखों के पीछे डालकर बिहार की जनता में साफ संदेश दिया कि बिहार अपराधमुक्त होकर रहेगा।

अब करीब 11 साल बाद नीतीश कुमार बिहार की जनता से किस तरह आंख मिला रहे हैं, यह कैमरे पर साफ दिख रहा है। नीतीश की उल्टी गिनती तो उसी दिन शुरू हो गई थी जब उन्होंने लालू यादव के साथ गठबंधन किया था। जेल से बाहर आते ही शहाबुद्दीन ने साफ कहा कि नीतीश परिस्थितिवश मुख्यमंत्री हैं। शहाबुद्दीन के इस कथन के मायने भी साफ हैं, क्योंकि जिस गठबंधन की सरकार में लालू यादव की पार्टी को सबसे अधिक सीट है उस गठबंधन में नीतीश कैसे सीएम बने रह सकते हैं। लालू के साथ गठबंधन के बाद यह भी स्पष्ट हो चुका था कि अब जल्द ही शहाबुद्दीन जेल से बाहर होंगे। सीवान की जेल में जिस तरह शहाबुद्दीन का खुला दरबार लग रहा था और लालू की पार्टी आरजेडी के विधायकों का वहां आना-जाना था, उसने जता दिया था कि आने वाला समय अब किसका होगा। इसी बीच पत्रकार राजदेव हत्याकांड में सीधे तौर पर शहाबुद्दीन का नाम आना सब कुछ बयां कर गया। शहाबुद्दीन का सबसे करीबी लड्डन मियां पत्रकार हत्याकांड में जेल के अंदर है। हद तो यह है कि नीतीश सरकार की पुलिस इस मामले में शहाबुद्दीन से पूछताछ तक नहीं कर सकी।
अब, जबकि शहाबुद्दीन के तौर पर लालू का सबसे बड़ा हथियार जेल की सलाखों से बाहर आ चुका है नीतीश कुमार जरूर मंथन कर रहे होंगे कि वे अपना भविष्य किस तरह तय करें। नीतीश के पास सिर्फ दो विकल्प बच रहे हैं, या तो नीतीश कुमार डमी मुख्यमंत्री की तरह ही काम करते रहें, क्योंकि कुर्सी से उन्हें मोह हो गया है। या दूसरा विकल्प यह है कि बिहार सरकार पर से लालू यादव की परछार्इं से खुद को मुक्त कर लें, क्योंकि जब तक लालू यादव की परछार्इं बिहार सरकार पर रहेगी नीतीश कुमार मुंह छिपाते ही रहेंगे और शहाबुद्दीन जैसे अपराधियों से आंख तक नहीं मिला सकेंगे। नीतीश को जरूर मंथन करना होगा कि कहीं वह दिन न आ जाए कि एक ही मंच पर नीतीश कुमार को शहाबुद्दीन का स्वागत करना पड़ जाए, क्योंकि तमाम विवादों के बावजूद आज भी शहाबुद्दीन लालू यादव की पार्टी राजद के राष्टÑीय कार्यकारिणी का सदस्य है। उस दिन नीतीश क्या करेंगे?

शहाबुद्दीन के जेल से बाहर आने के कारणों पर चर्चा के दौरान अदालत के निर्णय पर तनिक भी टिप्पणी बेकार है। पर बीजेपी नेता सुशील मोदी का कहना सौ प्रतिशत सच माना जा सकता है। मोदी ने नीतीश सरकार पर आरोप लगाया है कि जिस मर्डर केस में शहाबुद्दीन जेल के अंदर था अगर उस केस की ठीक से पैरवी की जाती तो कोई भी अदालत शहाबुद्दीन को जमानत नहीं दे सकती थी। बिहार की जनता भी नीतीश कुमार से जरूर सवाल पूछेगी कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी को लागू करने के लिए जिस नीतीश सरकार ने दिल्ली से लाखों रुपए खर्च कर वकीलों की फौज खड़ी की थी, उसी नीतीश सरकार ने किन मजबूरियों के चलते शहाबुद्दीन को वॉकओवर दे दिया। 11 साल पहले जिस नीतीश सरकार में शहाबुद्दीन को जेल हुआ था, उसी सरकार में वह बाहर आया है। ऐसे में बिहार की जनता को भी यह मंथन जरूर करना होगा कि चुनाव के समय क्यों उनकी बुद्धि कुंद हो गई थी। क्या सच में बिहार की जनता भी यही चाहती थी कि जंगलराज ही उन्हें मंजूर था और आज भी है? 

Sunday, September 11, 2016

दीपक तुमने जो किया उसने पत्रकारिता को रोशन कर दिया

‘आज समाज’ के पत्रकार हैं दीपक। युवा और मेहनती। कई बार काम में लापरवाही के कारण मुझसे डांट भी सुनते हैं। हालांकि डांट खाने के बाद उनका उत्साह और बढ़ जाता है। दीपक ने कभी अपने काम का बखान नहीं किया और न ही वह कभी करेगा। पर कल शनिवार की रात उसने जो काम किया उसने हम पत्रकारों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। उसने उन लोगों के चेहरे पर करारा तमाचा मारा है जो लोग हम पत्रकारों को संवेदनहीन कहने से नहीं चूकते हैं।
अभी हाल ही में जब मांझी को अपनी पत्नी का शव कंधे पर ले जाते हुए मीडिया में दिखाया गया, तब भी पत्रकारों को कटघरे में खड़ा कर दिया गया। सवाल पूछे गए। मीडिया ने उनकी मदद क्यों नहीं की। सिर्फ तस्वीरें क्यूं बनाते रहे। अब इन्हें कौन समझाए कि अगर मीडिया ने इन तस्वीरों को नहीं खींचा होता तो पूरी दुनिया कभी नहीं समझ सकती कि वहां क्या हुआ। जिसने भी उन तस्वीरों को खींचा उसने पहले अपना पत्रकारिता धर्म निभाया और फिर मानवता धर्म भी।

खैर ऐसे सैकड़ों उदाहरण आपको मिल जाएंगे। पर मैं बात कर रहा था दीपक की। शनिवार की रात दीपक आॅफिस से काम समाप्त कर करीब 11.30 बजे घर जा रहा था। अंबाला आॅफिस से एक किलोमीटर आगे बढ़ते ही चंडीगढ़ एक्सप्रेस हाईवे पर पीर बाबा की मजार के पास पुल के नीचे उसे कुछ लोगों की भीड़ दिखी। उत्सुक्तावश उसने भी अपनी बाइक रोकी और लोगों से पूछा। वहां बलदेवनगर चौकी के कुछ पुलिसकर्मी भी खड़े थे और पुल से नीचे टॉर्च मार रहे थे। जोहड़ (स्थानीय भाषा में तलाब) पूरी तरह जलकुंभी से भरा हुआ था और किसी गाड़ी की पिछली लाइट नजर आ रही थी। पता चला कि अभी दस मिनट पहले एक गाड़ी इस जोहड़ में समा गई है। किसी को नहीं पता कि उस गाड़ी में कितने लोग हैं? जिंदा भी हैं या नहीं। दीपक ने पुलिसवालों से कहा कि पानी में उतरकर देखते हैं, पर पुलिसवालों का जवाब था क्रेन आ रही है, फिर देखेंगे। दीपक ने कहा कि तब तक तो अगर कोई जिंदा भी होगा वह मर जाएगा। दीपक से रहा नहीं गया। उसने आव देखा न ताव जोहड़ में छलांग लगा दी। पल भर में ही वह जोहर में समाई गाड़ी की छत पर था। घने अंधेरे में कुछ भी नजर नहीं आ रहा था कि गाड़ी के अंदर कितने लोग हैं। इसी बीच एक स्थानीय युवक ने भी हिम्मत दिखाई। दीपक के हौसले को देखते हुए वह भी एक र्इंट लेकर गाड़ी तक पहुंच गया। दीपक और उस युवक ने कड़ी मेहनत के बाद गाड़ी का शीशा तोड़ा और ड्राइविंग सीट पर बेहोश पड़े युवक को किसी तरह बाहर खींच कर ले आए। युवक पूरी तरह बेहोश था। उसे तत्काल पास ही के प्राइवेट हॉस्पिटल में ले जाया गया। डॉक्टर्स के तमाम प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका।
इस बीच मुझे भी हादसे की सूचना मिल गई थी। दीपक ने सभी जानकारी तो दी, लेकिन यह नहीं बताया कि कैसे उसने पत्रकारिता के कर्तव्य के साथ मानवता की एक बेहतरीन मिशाल पेश की। पुलिसकर्मी तमाशबीन बनकर देखते रहे। बाद में दीपक ने बताया कि जब उसे बाहर निकाला तो युवक के शरीर पर चोट के कोई गंभीर निशान नहीं थे। हो सकता है वह युवक पानी के अंदर बेहोश हो गया हो, या फिर उसे गाड़ी से निकलने का कोई रास्ता ही नहीं मिला हो जिसके कारण पानी में उसका दम घुंट गया। अगर समय रहते कोई पुलिसवाला हिम्मत करके तत्काल पानी में उतर गया होता तो हो सकता है युवक की जान बच जाती।
खैर दीपक ने जो हिम्मत दिखाई उसने पत्रकारिता के धर्म को और भी पूजनीय बना दिया। यह एक बेहतरनी उदाहरण है कि एक पत्रकार कितना सजग और मददगार हो सकता है।

एक निवेदन
अब किसी हादसे की तस्वीर खींचते वक्त या हादसे में घायल लोगों से बातचीत करते वक्त कोई मीडियाकर्मी नजर आए तो उसका मजाक मत बनाइएगा। वह पत्रकार अपनी पेशागत मजबूरियों के कारण ऐसा करता है न की आपकी कॉमेडी के लिए। जब जरूरत पड़ती है वह हादसे के शिकार लोगों की खबर करता है और जरूरत पड़ने पर दीपक की तरह घने अंधेरे में अपनी जान की परवाह किए बगैर एक अनजान व्यक्ति के लिए जोहड़ में कूदने का जज्बा भी रखता है।
दीपक इस जिंदादिली और हौसले को सलाम। तुमने हमारा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।

Tuesday, September 6, 2016

‘कभी अपने चाहने वालों की मौत मांगी है’

Stuart binny's wife Mayanti a famous sports anchor
भारत में क्रिकेट धर्म की तरह है, अब इसे प्रमाणित करने की जरूरत नहीं है। पर हाल के दिनों में इस धर्म में काफी परिवर्तन आया है। सबसे बड़ा परिवर्तन क्रिकेटर्स के प्रति सोच है। इस सोच में सबसे बड़ी विडंबना क्रिकेटर्स की पर्सनल लाइफ और उनकी फैमली के प्रति है। एक क्रिकेटर्र की पत्नी ने तीन दिन पहले ही भारतीय दर्शकों से यह सवाल किया है कि क्या कभी आपने अपने चाहने वालों की मौत मांगी है? मंथन जरूरी है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो एक युवा क्रिकेटर की पत्नी को ऐसी बातें पब्लिक डोमिन में करनी पड़ी। 
दरअसल इस कहानी की शुरुआत हुई हाल ही में भारतीय क्रिकेट टीम के वेस्टइंडिज दौरे के दौरान। टीम में कई युवा चेहरे थे। इनमें से तो कई ऐसे थे जिन्होंने इस दौरे में ही इंडियन कैप पहना। जबकि कई ऐसे चेहरे थे जो कुछ सालों से टीम इंडिया के लिए खेल रहे हैं। ऐसा ही एक नाम है स्टूअर्ट बिन्नी का। बिन्नी ने भले ही इंडिया के लिए तमाम घरेलू सीरीज के अलावा रणजी ट्रॉफी और दलीप ट्रॉफी में बेहतर प्रदर्शन किया हो, लेकिन स्टूअर्ट की पहचान उनके खेल से ज्यादा उनके पिता की बदौलत ही है। अपने समय के जबर्दस्त क्रिकेटर रहे रोजर बिन्नी के बेटे होने का कभी उनको फायदा मिला तो कभी आलोचना का दौर भी चला। आलोचनाओं के बावजूद स्टूअर्ट ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। पर हाल का वेस्टइंडिज दौरा उनके कॅरियर का सबसे खराब दौरा साबित हुआ।
स्टूअर्ट का सबसे खराब दिन ट्-ट्वेंटी मैच के दौरान रहा है। इस मैच के एक ओवर में बिन्नी को पांच छक्के खाने पड़ें। इस ओवर में उन्होंने 32 रन क्या दिए सोशल मीडिया में मानो उनके खिलाफ अभियान ही शुरू हो गया। सबसे बुरा बर्ताव उनकी वाइफ के साथ हुआ। बिन्नी के छह गेंद उनकी वाइफ मयंती लेंगर के लिए भारी साबित हुए। ट्वीटर पर उनके लिए अशोभनीय बातों की बाढ़ आ गई। पर्सनल कमेंट किए जाने लगे। जब बात हद से आगे बढ़ गई तो मयंती को मोर्चा लेना पड़ा। उन्होंने खुद ट्वीटर पर अपनी भावनाओं को पोस्ट किया। 
Stuart binny's wife Mayanti a famous sports anchor
ट्रॉलर्स के नाम लिखे खत में मयंती ने लिखा,
‘मुझे पूरा भरोसा है कि आप में से किसी ने भी अपने चाहने वालों के लिए कभी भी मौत नहीं मांगी होगी या आपसे जुड़े ऐसे किसी व्यक्ति ने आपको डरावनी तस्वीरों वाला कोई धमकी भरा संदेश नहीं भेजा होगा। सुसाइड की ओर इशारा करते हुए मेरा मजाक उड़ाना शर्मनाक है। एक बार उन परिवारों के बारे में सोचिए, जो इस तरह की ट्रेजडी का सामना करते हैं और आपने उनकी इस असहनीय पीड़ा का मजाक बनाकर रख दिया है। मुझे उम्मीद हैं कि आपको प्यार मिलेगा और उत्तरदायित्व का अहसास होगा, क्योंकि तलाक की सलाह से ऐसा लग रहा है कि जैसे ये चीजें आपके पास हैं ही नहीं। मैं 18 साल की उम्र से नौकरी कर रही हूं। मुझे लालची महिला की संज्ञा देने में समय खराब करने की बजाय कोई नौकरी हासिल कीजिए और अपना व अपने परिवार का भला करने के दायित्व का निर्वहन कीजिए। मुझे लगता है कि हमारा मजाक उड़ाने से आपको अपने आप में अच्छा महसूस होता होगा, अन्यथा क्या यह सच में कोई मायने रखता है? 
आप सबको
शुभकामनाएं...
मयंती का यह खत अपने आप में बहुत कुछ बयां कर देता है। यह वो दर्द
है जब कोई सेलिब्रेटी क्रिकेटर अपने कॅरियर के खराब दौर से गुजर रहा होता
है। कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी ने जब भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम युग
का श्रीगणेश किया तब पूरा भारत उन्हें सिर आंखों पर बिठाए रखता था। पर जब
उनका खराब दौर आया तो उनके अपने शहर रांची में ही उनके घर की सुरक्षा
बढ़ानी पड़ गई थी। स्टार क्रिकेटर विराट कोहली को भी अपनी पर्सनल लाइफ के
लिए अपने फैंस के भद्दे कमेंट सहने पड़े। क्रिकेटर्स के घरों पर अंडा
फेंकना, उनके खिलाफ प्रदर्शन करना, उनकी निजी लाइफ पर कमेंट्री करना यह
आज के क्रिकेट दर्शकों का शगल बन चुका है। यह न केवल शर्मनाक है बल्कि एक
ऐसे दौर की तरफ इशारा कर रही है जब हमारे क्रिकेटर मैदान में जाते वक्त
सोचेंगे कि अगर आज उनसे कोई गलती हुई तो उनकी फैमिली सुरक्षित रहेगी या
नहीं।
खेल में हार या जीत होनी तय है। या तो आप जीतते हैं या हारते हैं।
यह सही है कि हार की पीड़ा को सहना मुश्किल होता है। पर क्या इसे किसी रूप
में जायज ठहराया जा सकता है कि हम किसी हार पर खिलाड़ियों के परिवार और
उनकी निजी जिंदगी को खतरे में डाल दें। क्या हम एक बेहतर दर्शक नहीं बन
सकते? क्या यह जरूरी है कि हम दर्शक के अलावा आलोचक, विरोधी,
प्रदर्शनकारी भी बन जाएं?
पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में जब उनकी टीम हारती है, खासकर भारत से
हारती है तो उनके खिलाड़ी इतने डरे सहमे रहते हैं कि कभी एक साथ अपने देश
नहीं लौटते हैं। मैच शुरू होने से पहले ही उनके हर एक खिलाड़ी के घर को
पुलिस घेरे में ले लिया जाता है। क्या भारतीय दर्शकों की भी ऐसी ही
मानसिकता बनती जा रही है। क्या हम भारतीय दर्शक भी चाहते हैं कि जिन
खिलाड़ियों ने हमारा मान सम्मान बढ़ाया है, जिन्होंने हमें कई बार
गौरवांवित होने का मौका दिया है उन्हें भय के वातावरण में जीना पड़े।
क्यों हम भारतीय क्रिकेट दर्शक खेल को खेल की भावना से देखने की परंपरा
को भूलते जा रहे हैं। भारतीय क्रिकेट के दर्शकों और फैंस को हाल के
ओलंपिक से भी सीख लेने की जरूरत है। कैसे हमने हार कर भी घर लौटे दीपा
कर्मकार और उत्तराखंड के धावक मनीष का स्वागत किया। यही खेल भावना हम
क्रिकेट में क्यों नहीं ला सकते। मंथन करने की जरूरत है।

किसी भी खिलाड़ी का हर दिन एक समान नहीं होता है। ऐसे में उन्हें भी
मेंटल सपोर्ट की जरूरत पड़ती है। यकीन मानिए यह मेंटन सपोर्ट जो दर्शकों
और उनके फैंस द्वारा दिया जा सकता है वह कोई और नहीं दे सकता है। आने
वाले समय में भारतीय क्रिकेट टीम में युवा क्रिकेटर्स की भरमार रहेगी,
ऐसे में हमें उनके साथ खड़ा रहना होगा। या नहीं कि हम उनके परिवार पर
भद्दे कमेंट करें। बिन्नी की वाइफ मयंती ने हमें मंथन करने का समय दिया
है। हमें सही अर्थों में दर्शक बनना ही होगा।

Tuesday, August 30, 2016

‘सरकार’ प्रवचन से शासन नहीं चलता है

अभूतपूर्व जीत के साथ हरियाणा में शासन की बागडोर संभालने वाली भारतीय
जनता पार्टी की सरकार अपने अभिनव प्रयोगों के लिए चर्चित हो रही है। ताजा चर्चा बटोरी है विधानसभा में प्रवचन के साथ। यह प्रवचन कितना जरूरी और कितना गैर जरूरी था इसकी चर्चा तो लंबे वक्त तक चलती रहेगी। पर ज्वलंत मुद्दा यह है कि लोकतंत्र में प्रदेश का शासन प्रवचनों से नहीं चलता है।
जिस विधानसभा में बैठे जनता के नुमाइंदों को जनता ने इसीलिए चुन कर भेजा
है कि वे उनकी बातों को प्रमुखता से उठाएंगे, उसी विधानसभा का बेहद कीमती
वक्त प्रवचन सुन कर जाया किया गया, इसे जनता कैसे स्वीकार कर सकती है। इस
पर मंथन जरूरी है।
सवाल उठना लाजिमी है कि हरियाणा की मनोहर सरकार के पास आखिर ऐसी क्या
मजबूरी या ऐसी क्या प्लानिंग है कि उन्होंने प्रवचन सुनने के लिए विधानसभा जैसा स्थल चुना। वह सदन जिसे जनता का सबसे बड़ा दरबार कहा जाता है वहां साधु-संतों के प्रवचनों का क्या उद्देश्य है? वोट देने वाली जनता अपने नुमाइंदों को इसलिए सदन तक भेजती है ताकि उनके नुमाइंदे जनता के हितों की बात कर सकें। पर अचानक ऐसा क्या हो गया कि सदन का कीमती समय प्रवचनों में जाने दिया गया। आस्था, धर्म, विश्वास यह हर किसी का निजी मामला होता है। इसे सार्वजनिक तौर पर किसी पर थोपा नहीं जा सकता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी राज्य का सदन पूरे राज्य के लोगों का केंद्र होता है। ऐसे में लोकतंत्र के इस केंद्र में किसी संत के प्रवचन का प्रचलन क्या जायज है? यह सवाल मनोहर सरकार से लगातार पूछा जाएगा। यह भी पूछा जा रहा है कि क्या अब यहां गुरुबाणी और जुम्मे की नमाज भी अता की जाएगी? या फिर गुड फ्राइडे और क्रिसमस के अवसर पर यहां विशेष प्रार्थना सभा के आयोजन के लिए भी हम तैयार रहें। क्या यह लोकतांत्रिक स्वच्छंता का नतीजा है कि हम इस ऐतिहासिक घटना के साक्षी बन सकें? क्या ऐसे किसी आयोजन के साक्षी हम भविष्य में भी बनते रहेंगे? 
जैन मुनि तरुण सागर के हरियाणा विधानसभा में कड़वे प्रवचन के बाद सोशल मीडिया पर कड़वे बोल ने ट्रेंड करना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया के जरिए जब हरियाणा सरकार की खिंचाई शुरू हुई तो सरकार के नुमाइंदों ने सफाई देना शुरू कर दिया। सरकार के नुमाइंदों ने कहना शुरू किया कि तन और मन की पवित्रता के लिए यह जरूरी है। कभी-कभी ऐसे आयोजन होने चाहिए। पर इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है कि हरियाणा के मंत्री और विधायक जितना काम कर रहे हैं क्या उससे उनके शरीर पर दबाव बढ़ गया है। ऐसे में क्या आने वाले सत्र में योग गुरु रामदेव भी सदन में योग का पाठ पढ़ाते नजर आएंगे, ताकि जनता के सेवक फील्ड में उत्साह और नई ऊर्जा के साथ काम कर सकें। 

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं देखने को मिला होगा कि सदन में ऐसे किसी धार्मिक आयोजन के लिए वक्त निकाला गया हो। जैन मुनि के कड़वे प्रवचन प्रतिदिन टेलीविजन पर प्रसारित होते हैं। हर महीने कहीं न कहीं इनका कार्यक्रम आयोजित होता है। लाखों लोग इनके प्रवचन सुनने जाते हैं। मंत्रियों से लेकर विधायक और बड़े-बड़े नेता जैन मुनि के प्रवचन सुनने उनके कार्यक्रमों में जाते हैं। ऐसे में यह क्या इतना जरूरी था कि इसका आयोजन सदन के भीतर कराया जाए? प्रदेश इस वक्त घोर असुरक्षा के भय में जी रहा है। सरकारी आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि हरियाणा में अपराध की स्थिति किस कदर लगातार बढ़ रही है। बेरोजगारी की स्थिति, आरक्षण की आग, भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितताओं का आरोप ये कुछ ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जिससे हरियाणा का आमजन रू-ब-रू हो रहा है। ऐसे में जब विधानसभा का सत्र आयोजित होता है तो जनता इस इंतजार में रहती है कि उनके राहत से जुड़ी कुछ बातों पर बहस होगी। पिछला सत्र
उठापटक, आरोप-प्रत्यारोप, निष्काषण और बेवजह की बहसबाजी में बीत गया। ऐसे
में मानसून सत्र से बहुत उम्मीदें हैं। पर सत्र की शुरुआत जिस तरह से हुई
है उसने पूरे भारत की नजर हरियाणा की तरफ खींच लिया है। सोशल मीडिया के
अलावा मुख्य धारा की विदेशी मीडिया में इस बात की चर्चा है कि सदन में
प्रवचन हो रहे हैं।हरियाणा विधानसभा में अपने करीब चालीस मिनट के प्रवचन के दौरान जैन मुनि ने बेटी बचाओ से लेकर तमाम ऐसे मुद्दों पर अपनी बात कही जिसकी जितनी
तारीफ की जाए कम है। पर सरकार के नुमाइंदों को कौन समझाए कि सिर्फ
प्रवचनों से बेटी नहीं बचाई जा सकती। इसी सरकार के सरकारी आंकड़े गवाही दे
रहे हैं कि एक तरफ जहां इस प्रदेश में कन्या भू्रण हत्या के मामले लगातार
बढ़ रहे हैं, वहीं उसी अनुपात में बलात्कार के मामले भी बढ़ रहे हैं। इस
वर्ष 31 जुलाई तक प्रदेश में 637 बलात्कार के मुकदमे दर्ज हुए हैं। जो
पिछले वर्ष से 3.24 प्रतिशत अधिक है। जिस दिन सदन में धार्मिक प्रवचन हो
रहे थे उसी रात प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण जिले गुड़गांव के एक कस्बे में
अपराधियों ने परिवार के लोगों के सामने दो बहनों के साथ गैंग रेप किया।
इतना ही नहीं बहनों के मामा-मामी को मौत के घाट उतार दिया। जाट आंदोलन के
समय पूरा प्रदेश करीब दस दिनों तक किस कदर बंधक बन गया था इसे पूरे
विश्व ने देखा था।

संवैधानिक व्यवस्था में किसी लोकतांत्रिक सरकार का काम जनता के हितों की रक्षा करना होता है। उनके कल्याण के लिए योजनाओं की प्लानिंग और उसके
क्रियान्वयन के लिए तत्पर रहना होता है। इन सबके लिए सदन ही एक मात्र ऐसा
स्थान है जहां से पूरे प्रदेश के विकास की रूपरेखा खींची जा सकती है। पर
हरियाणा सरकार ने अपना कीमती चालीस मिनट प्रवचन में बिता दिया। सरकार के
पास तमाम ऐसे बड़े तर्क हो सकते हैं जिससे वह इस आयोजन को जायज ठहरा सकती
है। हो सकता है उसे कई प्लेटफॉर्म पर स्वीकार भी कर लिया जाए। पर मंथन
जरूर करना चाहिए कि जिस प्रदेश में तमाम ज्वलंत मुद्दों पर जनता सरकार के
जवाब और सकारात्मक कदम का इंतजार कर रही है उस प्रदेश की विधानसभा में
प्रवचन क्या इतना जरूरी है?

Monday, August 22, 2016

एक नेशनल प्लेयर का मर जाना और जश्न



क्या इसे महज एक संयोग मान लिया जाए कि एक तरफ पूरा देश साक्षी, सिंधु और
दीपा जैसी प्लेयर्स के स्वागत में पलकें बिछाए बैठा है। वहीं, दूसरी तरफ
पंजाब में एक नेशनल प्लेयर को अपनी जान देनी पड़ गई। वह भी चंद रुपयों की
खातिर। सरकार द्वारा मिलने वाली सुविधाओं के खातिर। अपने हक के खातिर।
नहीं यह संयोग नहीं हो सकता। यह भारत की पूरी सरकारी व्यवस्था पर एक
जोरदार तमाचा मारा है उस प्लेयर ने, जो भारत का भविष्य थी। तमाचा एक सही
मौके पर, ताकि लोग भारतीय खिलाड़ियों के हालातों से ठीक से परिचित हो
सकें। सिर्फ इस बात पर प्रलाप करने वालों के लिए भी यह तमाचा है जो हर
समय यह बोलते हैं कि करोड़ों हिंदुस्तानियों में से सिर्फ एक-दो पदक? जी,
यही हकीकत है कि क्यों हम अंतरराष्टÑीय स्तर पर चंद पदकों पर सीमित रहते
हैं।
पूरा देश जहां सिंधु और साक्षी की जीत के जश्न में शरीक था, वहीं पंजाब
के सबसे बड़े शहर पटियाला में एक नेशनल प्लेयर अपनी जिंदगी को खत्म करने
की तैयारी कर चुकी थी। हैंडबॉल की इस नेशनल प्लेयर का नाम था पूजा।
सेकेंड ईयर की यह होनहार प्लेयर इसलिए परेशान थी कि उसे अपने भविष्य की
चिंता थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित सुसाइड नोट में उसने कई
गंभीर सवालों को जन्म दिया है। बताया है कि कैसे उसे अपनी गरीबी के बीच
पढ़ाई करनी पड़ रही है और कैसे हमारे सिस्टम ने उसे मदद देने से इनकार कर
दिया है। ऐसे में उसके पास सिर्फ एक विकल्प है कि वह इस दुनिया को अलविदा
कह दे। उसने प्रधानमंत्री को लिखे खत में कहा है कि आप यह व्यवस्था जरूर
कर दें कि मेरी जैसी गरीब लड़की धन के अभाव में ऐसा कदम न उठा ले।
पूजा अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसने जिस वक्त आत्महत्या जैसा कदम
उठाया है वह मंथन का समय है। भारतीय परिवेश में जब एक प्लेयर अपने करियर के प्रति आशंकित हो, महज हॉस्टल का एक रूम लेने के लिए परेशान हो, ऐसे देश में हम खिलाड़ियों से कितने मेडल की उम्मीद कर सकते हैं। जहां हर एक खिलाड़ी को अपने भविष्य की चिंता सता रही हो, जहां खिलाड़ी इस बात से
परेशान हो कि उसकी डाइट की व्यवस्था बिना पैसे के कहां से होगी, वहां हम
अंतरराष्टÑीय स्तर पर मेडल्स की झड़ी लगा देने की बात कैसे कर सकते हैं।
वह तो भारत मां की मिट्टी में इतना हौसला और दम है कि यहां के प्लेयर
अपने बलबूते बहुत कुछ हासिल कर ले रहे हैं।
जो प्लेयर हमें गौरवांवित होने का मौका दे रहे हैं, जरा उनका बैकग्राउंड खंगालने की भी जरूरत है। बैकग्राउंड इसलिए ताकि हम देख सकें कि
जिमनास्टिक जैसे खेल में जब एक भारतीय खिलाड़ी पूरे विश्व का ध्यान खींचती है तो किन परिस्थितियों में उसने यह मुकाम हासिल किया है। ट्रैक एंड फील्ड के फाइनल में जब कोई प्लेयर अपना स्थान बनाती है तो हमें देखना जरूरी है कि उसने दौड़ने के लिए कितनी भागमभाग की है। सलाम है इन हौसलों
को।
जिस देश में सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत एक खिलाड़ी पर साल भर में सिर्फ
18 से 20 हजार रुपए खर्च करने की व्यवस्था हो वहां हम खिलाड़ियों से कितनी
उम्मीद कर सकते हैं। यह भी सच है कि तमाम सरकारी विभागों में स्पोर्ट्स
कोटे से नौकरी का प्रावधान होना भी स्पोर्ट्स के प्रति लगाव का बड़ा कारण
है। ऐसे में मंथन करना जरूरी हो जाता है कि क्यों एक खिलाड़ी पर अपने
भविष्य की इतनी चिंता का दायित्व होता है। क्यों एक समय बाद हमारे खिलाड़ी
खेल छोड़कर हाथों में अपना स्पोर्ट्स सर्टिफिकेट लिए सरकारी दफ्तरों के
चक्कर लगाते रहते हैं ताकि उन्हें कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल सके। रेलवे की
सरकारी नौकरी में सैकड़ों ऐसे खिलाड़ी मिल जाएंगे जिन्होंने अपने समय में
नेशनल या इंटरनेशनल लेवल पर अपना जलवा दिखाया होगा। पर महज चंद रुपयों की
खातिर फोर्थ ग्रेड की नौकरी करने को मजबूर हैं। कई जगह वो कूड़ा उठाने और रेलवे कोच की सफाई करते हुए भी मिल जाएंगे। हम चीन, जापान और अमेरिका से अपने देश के खिलाड़ियों की तुलना करते हैं।
पर यह भूल जाते हैं कि उन देशों में नेशनल लेवल के खिलाड़ियों का क्या
रुतबा होता है। उन्हें इस बात की चिंता नहीं होती है कि उनका परिवार कैसे
चलेगा। उन्हें इस बात की चिंता नहीं होती है कि खेल के साथ-साथ उन्हें
नौकरी के लिए एकेडमिक डिग्री भी लेनी है। उन्हें सिर्फ यह सिखाया जाता है
कि बस खेलो। खेलते रहो। यह मंथन का वक्त है कि एक तरफ पटियाला की पूजा
है, वहीं दूसरी तरफ सिंधु और साक्षी हैं। पूजा महज 3720 रुपए महीने का
जुगाड़ कर पाने में सक्षम नहीं हो सकी। वहीं, मेडल जीतने वाली सिंधु और
साक्षी पल भर में करोड़पतियों में शुमार हो गर्इं।

यह कैसी व्यवस्था है। मेडल लाने के लिए अपने दम पर जाओ, जब मेडल जीत लोगी तब हम तुम्हें मालामाल कर देंगे। तुम्हें हीरे और सोने में तौल देंगे।
अपने दम पर सुविधाएं जुटाओ, डाइट की व्यवस्था करो, जब जीत कर आओगे तब
तुम्हें सबकुछ देंगे। क्या इस व्यवस्था पर कोई मंथन करेगा, ताकि पूजा जैसी होनहार प्लेयर को सुसाइड न करना पड़ा। क्या कोई ऐसा सिस्टम डेवलप हो सकेगा जिसमें हमारे खिलाड़ी भी सिर्फ अपनी पेट के खातिर न खेलें। वह मेडल
हासिल करने के लिए खेलें। सिर्फ खेलें और   खेलते रहें। आइए साक्षी और
सिंधु का हम स्वागत करें क्योंकि उन्होंने हमें गौरवांवित होने को मौका
दिया है। पर जश्न के इस माहौल में पूजा को नहीं भूलें, क्योंकि हैंडबॉल
की नेशनल प्लेयर पूजा ही हमारी सच्चाई है। हमारे सिस्टम की सच्चाई है।

Sunday, August 14, 2016

मोदी जी! इसे कहते हैं आ ‘गाय’ मुझे मार


आ बैल मुझे मार कहावत तो आपने कई बार सुनी होगी। पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गो-रक्षा के नाम पर ठेकेदारी करने वालों को स्पष्ट संदेश क्या दिया, कहावत थोड़ी बदल गई। यूपी, पंजाब सहित कई बड़े राज्यों के चुनाव के प्री-क्वार्टर फाइनल की तैयारियों के बीच प्रधानमंत्री के बयान ने कहावत को पलट दिया है। जिस तरह से गो-रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे संगठनों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उसमें यह कहने में जरा भी गुरेज नहीं कि अब बैल की जगह गाय ने ले ली है और लोग कहने लगे हैं आ ‘गाय’ मुझे मार।
आज स्वतंत्रता दिवस की हम 70 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस स्वतंत्रता दिवस को भारत पर्व के रूप में सेलिब्रेट करने का आह्वान किया था। पर जबसे भारत पर्व मानने के लिए मोदी जुटे, एक से बढ़कर एक बड़ा बयान दिए जा रहे हैं। लंबे समय से तमाम बड़े मुद्दों पर मौन साधे मोदी ने अचानक फ्रंट फुट पर आकर ताबततोड़ बैटिंग क्या शुरू की हर तरफ हो हल्ला मच गया। दलितों पर बड़ा बयान, कश्मीर पर खुलकर बयान फिर गो-रक्षकों को स्पष्ट चेतावनी ने जहां एक तरफ मोदी विरोधियों को शांत कर दिया है, वहीं मोदी के अपने उनसे खासे नाराज हो गए हैं। विपक्ष के पास पिछले कुछ महीनों से एक ही मुद्दा था कि मोदी न तो कश्मीर पर कुछ बोल रहे हैं, न तो दलितों पर और न गो-रक्षा के नाम पर मची मारकाट पर। पर अचानक से मोदी ने पलटवार तो किया, लेकिन खुद मुसीबत को न्योता दे दिया है।
नरेंद्र मोदी के नाम का दिनरात गुनगान करने वाले विश्व हिंदु परिषद, बजरंग दल सहित तमाम हिंदु संगठनों के नेता अचानक से मोदी से नफरत करने लगे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे संगठनों के बयानों ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि मोदी ने अपने चौके छक्कों से विरोधियों को तो शांत कर दिया है, पर बॉल बाउंड्री पर बैठे अपनों को जो लगा है उसका दर्द लंबे समय तक सुनाई देने वाला है। विश्व हिंदु परिषद के फायर ब्रांड नेता और अंतरराष्टÑीय कार्याध्यक्ष डा. प्रवीण तोगड़िया ने तो बकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर मीडिया के सामने अपनी भड़ास निकाली। तोगड़िया ने कहा कि ‘पीएम के भाषण बाद देश के करोड़ों हिंदू रो रहे हैं।’ तोगड़िया ने खुलेआम मोदी के भाषण की धज्जियां उड़ाते हुए स्पष्ट संदेश दे दिया है कि गो-रक्षा के नाम पर भले ही प्रधानमंत्री का बयान राजनीति से प्रेरित है, लेकिन आम जनमानस उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।
हालांकि जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पद पर बैठे किसी भी शख्स की बातों के हमेशा से ही दो मतलब होते हैं। एक बात का तात्पर्य तात्कालिक परिस्थितियों से होता है और दूसरी दूरागामी सोच से परिलक्षित होती है। एक तरफ देश को देखना होता है दूसरी तरफ अपने दल और उसके हितों की रक्षा करना भी उनका कर्तव्य होता है। शायद यही कारण है कि विहिप और उसके सहभागी संगठनों को प्रधानमंत्री की बात नागवार गुजरी है। प्रधानमंत्री की मुख से बात निकली है तो दूर तलक भी जाएगी। यही कारण है कि सभी बातों को यूपी, पंजाब सहित कई अन्य राज्यों के चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
भले ही प्रधानमंत्री की बातों के कई मतलब निकाले जाएं, पर आजादी के इतने सालों बाद भी इस सत्य से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता है कि गो-रक्षा के नाम पर हमेशा से राजनीति ही होती है। प्रधानमंत्री ने सीधे-सीधे गो-रक्षकों को असमाजिक करार दे दिया, लेकिन उस पर कुछ नहीं बोले की जिन राज्यों में गो-हत्या पूरी तरह प्रतिबंधित है उन राज्यों में आज भी गो-हत्या कैसे हो रही है। प्रधानमंत्री ने इस पर भी कुछ नहीं बोला कि जब हरियाणा, जम्मू कश्मीर, झारखंड, राजस्थान जैसे राज्यों में गो-हत्या पर दस साल तक जुर्माना है तो क्यों वहां फिर भी गो-हत्या धड़ल्ले से हो रही है। मोदी ने सीधे आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि अस्सी प्रतिशत गो-रक्षक फर्जी हैं, पर ये आंकड़े कोई बताएगा कि गो-हत्या के मामले में आजादी से लेकर अबतक कितने लोगों को सजा हुई है। प्रधानमंत्री को इस बात पर भी अपनी स्पष्ट राय रखनी चाहिए कि जब भारत में गाय एक है तो गो-रक्षा के लिए सभी राज्यों में अलग-अलग कानून क्यों है? क्यों किसी राज्य में गो-हत्या कानून वैध है तो कहीं अवैध? क्यों नहीं गो-रक्षा के नाम पर राजनीति को रोकने के लिए एक सामन व्यवस्था का गठन किया जाए।

इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले दो सालों में गो-मांस और गो-हत्या के नाम पर भारत ने बहुत कुछ झेला है। इस बात से भी कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि धर्म के कुछ ठेकेदारों ने गो-रक्षा के नाम पर अपनी दुकान खोल रखी है। बेवजह लोगों को परेशान भी किया जा रहा है। पर क्या इससे भी इनकार किया जा सकता है कि हर क्षेत्र में कुछ गलत लोग बसते हैं। कई ऐसे राज्य हैं जहां गो-रक्षा दलों की पहचान कर उन्हें पहचानपत्र तक जारी किया जाता है। ऐसा क्यों नहीं हो सकता है कि सभी राज्यों में ऐसी व्यवस्था की जाए, ताकि भविष्य में होने वाली घटनाओं को रोका जा सके। प्रधानमंत्री की अपील के तत्काल बाद गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एडवाइजरी जारी कर दिया है।  बेहतर तो यह भी होता कि गो-रक्षकों को पकड़ने की जगह गो-हत्या पर होने वाली राजनीति को खत्म करने का प्रयास किया जाता। मंथन का वक्त है कि हम गो-हत्या को राजनीति के चाकू से कबतक टूकड़े-टूकड़े करेंगे।

Monday, August 1, 2016

मीडिया परेशान है, मीडिया क्या करे?


अजीब प्रश्न है न कि मीडिया भी परेशान है। वह खुद नहीं समझ पा रहा है कि क्या करे? क्या लिखे? क्या दिखाए? क्या बोले? किस पर बहस करे? किस मुद्दे को उठाए? दलित के आगे दलित लिखे या ऐसे ही जाने दे? तमाम ऐसे प्रश्न हैं जिनसे मीडिया आजकल जूझ रहा है। मीडिया के सामने यह प्रश्न पहले मौजूं नहीं था। पर हाल के दिनों में खासकर 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद आम लोगों में मीडिया को देखने, सुनने, समझने, पढ़ने की क्षमता में जबर्दस्त परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन कोई साधारण परिवर्तन नहीं है। इस पर गहराई से मंथन की जरूरत है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया को चौथा महत्वपूर्ण स्तंभ कोई ऐसे नहीं मान लिया गया है। इसके पीछे लंबा और संघर्षपूर्ण समय गुजारा गया है। जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का युग नहीं आया था तब जो समाचारपत्रों में पढ़ लिया उसे ही अंतिम सत्य मान लिया जाता था। लोगों के विश्वास और पत्रकारिता की विश्वसनियता ने ही इसे चौथे स्तंभ के रूप में ख्याति दिलाई थी। पर अब यह बातें कथा कहानियों में अच्छी लग रही है। आज मीडिया को सीधी चुनौती मिल रही है। चुनौती दे रहा है आधुनिक तंत्र, जो सोशल मीडिया के नाम से हमारे बीच मौजूद है। सोशल मीडिया ने मीडिया को एक ऐसे दोराहे पर ला खड़ा किया है जहां विश्वास, विश्वसनियता के बाद अब विवशता ने अपना स्थान बना लिया है।
पूरा भारत मुख्यत: दो विचारधाराओं में बंट गया है। एक विचारधारा वह है जो मोदी के सपोर्ट में है। दूसरी विचारधारा वाले मोदी के विरोधी हैं। एक ब्रिटीश अखबार ने हाल में लिखा कि यह मोदी युग है, जिसमें दो विचारधाराओं के बीच लड़ाई है। यह काफी हद तक सच भी है। पर इन सबसे ऊपर मीडिया पर खतरे बढ़ गए हैं। अगर आप मोदी सरकार के काम काज या प्रधानमंत्री मोदी के बेहतर विजन पर कुछ लिखते हैं, प्रोग्राम बनाते हैं या बहस करते हैं तो आपके ऊपर बीजेपी के प्रवक्ता होने का ठप्पा लग जाता है। आपको भक्त की संज्ञा दे दी जाती है। अगर आपने मोदी सरकार के कामकाज पर सवालिया निशान लगा दिया तो आपके अखबार या चैनल को कांग्रेस पोषित बता दिया जाएगा। अगर आप पत्रकारिता के जाने पहचाने चेहरे हैं तो सोशल मीडिया पर आपकी वो आरती उतारी जाएगी कि आप खुद को पहचान नहीं पाएंगे। भूल से भी अगर आपने केजरीवाल के ट्वीट को री-ट्वीट कर दिया तो फिर तो पूछिए मत।

यह मीडिया और मीडियाकर्मियों दोनों के लिए संक्रमण का काल है। यह संक्रमण कैसे और कब प्रवेश कर गया है पता नहीं। पर धीरे-धीरे यह संक्रमण मीडिया की विश्वसनियता को निश्चित तौर पर कम कर रहा है। सोशल मीडिया की ताकत ने बड़े ही शातिराना अंदाज में इस विश्वसनियता के ऊपर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आपकी हर एक खबर, हर एक प्रोग्राम, हर एक बहस, हर एक आर्टिकल पर सोशल मीडिया नजरें गड़ा कर बैठा है। आपने कुछ गलत किया नहीं कि सोशल मीडिया आपकी क्लास लेनी शुरू कर देगा। यह सब बड़े ही प्लान तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। सभी पार्टियों, संगठनों ने अपने यहां साइबर सेना बना रखी है। इस साइबर सेना के सिपाही बेहद पढ़े लिखे, टेक्नो फ्रेंडी युवा हैं। इस साइबर सेना का बस एक ही काम है मीडिया की निगरानी। कब किस मुद्दे को और किस बात को ट्रेंड करवाना है यह इन्हें बखूबी आता है। इन्हें सिर्फ इंतजार रहता है अपने सेनापतियों के दिशा-निर्देशों का। यह साइबर सेना ट्रेंड सेट करती है। इसके बाद आम लोग इसे सत्य मानकर सोशल मीडिया की उलझनों भरी दुनिया में कूद पड़ते हैं।
भारतीय संविधान के बाद साइबर एक्ट ने भी सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों को फ्रीडम आॅफ एक्सप्रेशन के नाम से ऐसी स्वतंत्रता दे दी है जिसने सबकुछ उल्टा पुल्टा कर दिया है। यह अच्छी बात है कि सोशल मीडिया ने आम लोगों को काफी ताकतवर बना दिया है। पर सबसे अधिक खतरा मीडिया पर है। अपनी जर्नलिस्टिक एथिक्स के कारण जिन बातों को मीडिया प्रकाशित नहीं कर सकती या दिखा नहीं सकती है वह सोशल मीडिया पर इस कदर गदर मचाती है कि मीडिया की विश्वनियता धरी की धरी रह जाती है। आज सोशल मीडिया पर हर एक व्यक्ति पत्रकार बन चुका है। फोटोजर्नलिस्ट बन चुका है। ऐसे में मंथन जरूरी हो जाता है कि मीडिया की साख को कैसे सुरक्षित रखा जाए।

मीडिया के लिए सबसे अहम बात यह है कि इसमें आलोचना की स्वतंत्रता है। किसी दूसरे प्रोफेशन में आप इसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं। सिर्फ मीडिया एक ऐसा प्रोफेशन बचा है जहां मीडियाकर्मी खुद एक दूसरे की कमियों पर बात करते हैं। खुलकर चर्चा और लड़ाई करते हैं। चाहे चैनलों के राष्टÑभक्त होने की बात हो या फिर मीडियाकर्मियों के मोदी भक्त होने की बात हो, हर तरफ बहस की स्वतंत्रता है। हालांकि आम पाठक और दर्शकों को इससे कोई मतलब नहीं होता है, फिर भी यह आलोचना खुले आम होती है। टीवी के परदे पर होती है सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर होती है। सोशल मीडिया की दिन ब दिन मजबूत होती ताकत के बीच यह यक्ष प्रश्न मीडिया के सामने आ चुका है कि वह अपनी ताकत, अपनी विश्वसनियता, अपने तेवर को कैसे संरक्षित करे। संक्रमण के इस दौर में वह कौन सी युक्ति अपनाई जाए कि दर्शकों और पाठकों का विश्वास भी कायम रहे और सरकार की ‘बुरी नजरों’ से बचा जा सके। मंथन करने के बाद अगर आपके पास भी कोई युक्ति हो तो मीडिया से जरूर साझा करे। नहीं तो सोशल मीडिया तो है ही।