Monday, November 21, 2016

प्लीज! आप कॉमन मैन का दिखावा मत करिए


नोटबंदी के इस शोर में एक बार फिर से कॉमन मैन सबसे ऊपर है। वह ऊपर इसलिए भी है क्योंकि नोटबंदी का तात्कालिक असर उसके ऊपर ही है। किसी भी बड़े फैसले का कुछ तात्कालिक परिणाम सामने आता है, कुछ दूरगामी परिणाम सामने आता है। भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना भी यही है कि दूरगामी परिणाम की जगह तात्कालिक परिणामों पर ही अधिक फोकस शुरू हो जाता है। नोटबंदी के इस शोर में भी यही हो रहा है। एक बार फिर से राजनीतिक दलों और ड्रामेबाज नेताओं का कॉमन मैन के प्रति इतना अथाह प्यार दिख रहा है जैसे चुनाव के समय होता है। पर कॉमन मैन को सब पता है। शायद यही कारण है जहां पूरे देश में नोट बंदी को लेकर मारामारी है, बैंकों में छोटी-मोटी बहसबाजी को छोड़ दिया जाए तो कॉमन मैन लंबी-लंबी लाइनों में लगकर भी खुश है।
कॉमन मैन खुश इसलिए भी है क्योंकि उसे लाइन में लगने की आदत जन्मजात मिली हुई है। याद करिए आज से 15 से बीस साल पहले की लाइनें। जब हम रसोई गैस की लाइन में कई-कई घंटे खड़े होते थे। रात दो बजे से लाइन में लगने के बाद भी दोपहर तक गैस नहीं मिल पाती थी। याद करिए राशन की दुकानों पर केरोसिन और चीनी के लिए लगने वाली लाइन को। रेलवे रिजर्वेशन के टिकट काउंटर की भी लाइन आपको याद ही होगी। सिनेमा के टिकट के लिए हम लाइन में खड़े होते थे। किस-किस लाइन की याद दिलाऊं। क्या उस लाइन में कभी आपको कोई वीआईपी नजर आया था। क्या उस लाइन में कभी आपको कोई आईएएस और आईपीएस अधिकारी नजर आता था। याद करिए क्या आपको वहां किसी राजनीतिक दल का कोई बड़ा नेता नजर आता था। नहीं न। फिर मंथन करिए आज नोटबंदी के बाद जब कॉमन मैन लाइन में फिर से है तो नेताओं और बयानबाजों को खुजली क्यों हो रही है। कॉमन मैन तो बचपन से लाइन में लगने का आदी हो चुका है। नोट भी लाइन में लगकर ठीक करा लेगा। फिर असली दिक्कत किसे और क्यों है?

दरअसल, जब भी कोई बड़ा परिवर्तन होता है, उसके पीछे तमाम बड़े कारण ही होते हैं। विमुद्रीकरण कुछ ऐसा ही परिवर्तन होता है। नरेंद्र मोदी सरकार ने चाहे इसका फैसला कितने महीने पहले क्यों न लिया हो, लेकिन इसकी जरूरत देश लंबे समय से महसूस कर रहा था। नकली नोटों से लेकर, कालाबाजारियों तक ने जिस तरह पूरे आर्थिक तंत्र पर अपना कब्जा कर लिया था उसने कई विसंगतियों को जन्म दे दिया था। एक बड़ा झटका इन्हें लगाया जाना जरूरी था। फिलहाल, सरकार के इस निर्णय को लेकर विपक्षी पार्टियों के पास एक भी सार्थक तर्क नहीं है कि क्यों यह फैसला गलत है। गलत सिर्फ इस बात के लिए ठहराया जा रहा है कि क्योंकि कॉमन मैन को दिक्कत हो रही है। हर जगह आम आदमी के लिए खास लोग बयानबाजी कर रहे हैं। जिस नेता को देखो कॉमन मैन की बात कर रहा है। इससे पहले रसोई गैस की लाइन में लगकर क्यों नहीं गैस बुक कराई आपने। कभी राशन की दुकान की लाइन में लगकर क्यों नहीं देखा कि कैसा महसूस होता है। कभी बड़े सरकारी हॉस्पिटल में लाइन लगाकर क्यों नहीं देखा कि वहां क्या हाल होता है कॉमन मैन का।
भारतीय इतिहास में दो बड़े सम्राट हुए जिन्होंने पब्लिक के समर्थन से बहुत कुछ हासिल किया और बहुत कुछ खो दिया। इनका नाम था सम्राट अकबर और सम्राट मोहम्मद बिन तुगलक। दोनों ही राजाओं ने भारत में इकोनॉमिक रिफॉर्म के लिए बेहद सार्थक प्रयास किया। दोनों ही राजाओं को पता था कि वो जिस आर्थिक सुधार के लिए कदम उठा रहे हैं वो उनके खिलाफ भी जा सकता है। पर बावजूद इसके दोनों ही राजाओं ने राष्टÑहित में बड़े फैसले लिए। तुगलक क्यों फेल हो गया और अकबर क्यों सफल हो गया, इस पर भी तमाम रिसर्च हो चुके हैं। पर मोदी सरकार के इतने बड़े फैसले के बाद ही उन्हें तत्काल तुगलक की तरह फेल कह देना कहीं से तार्किक नहीं है। कहा जा रहा है कि इस नोटबंदी का असर चुनाव में बीजेपी को होगा। क्या नरेंद्र मोदी और उनकी टीम को इस बात अहसास नहीं था कि आम लोग परेशान होंगे। इससे उनकी पार्टी को नुकसान होगा। मैं तो बधाई देना चाहूंगा सरकार के इस फैसले को। तमाम नुकसान की संभावनाओं के बावजूद देश हित में इतना बड़ा फैसला लिया।
वैसे यह भी बता देना जरूरी है कि कॉमन मैन इतना भी मूर्ख नहीं है कि वह अच्छे और बुरे में फर्क करना न जानता हो। बैंकों की लाइन में लगे लोग चुपचाप फॉर्म भरकर अपनी छोटी रकम के बदले नई करंसी ले रहे हैं। उन्हें दो घंटे लाइन में लगना पड़े या पांच घंटे। उन्हें इस बात का जरूर अफसोस है कि उनका समय बर्बाद हो रहा है। पर जैसे ही देश हित की बात आती है वो मुस्कुराता हुआ कह रहा है हम तो तत्काल रूप से परेशान हैं, पर उनका क्या जो बहुत दूर तक परेशान हैं। हां, ये लाइन में लगने वाले लोग भी दूरगामी परिणाम का बेचैनी से इंतजार करेंगे। इन्हें मुद्रास्फीति, सेंसेक्स, दलाल स्ट्रीट, डॉलर के प्राइस बढ़ने-घटने से कोई फर्कनहीं पड़ता है। इन्हें तो इस बात से फर्क पड़ता है कि महंगाई घटी की नहीं। कॉमन मैन की मुश्किलें अलग तरह की होती हैं। इन्हें उससे मतलब होता है। अगर सही में नरेंद्र मोदी की सरकार के फैसले से इन कॉमन मैन को कुछ राहत मिलेगी तो यकीनन इसमें सरकार की मंशा की जीत होगी। 

इतनी जल्दी इतने बड़े फैसले के नफा और नुकसान पर बहस करना बेमानी है। मीडियाकर्मियों को भी इतने बड़े फैसले को राजनीति की चाशनी में रखकर नहीं परोसना चाहिए। दूरगामी असर तत्काल नजर नहीं आते हैं। हो सकता है यह दूरगामी परिणाम नरेंद्र मोदी सरकार के लिए घातक भी सिद्ध हों, पर यह राजनीतिक प्रतिबद्धता ही है कि इस सरकार ने एक ऐसा सर्जिकल स्ट्राइक किया है जिसने नक्सलियों से लेकर अलगाववादियों तक की कमर तोड़ दी है। टेरर फंडिंग फिलहाल पूरी तरह थम गई है, पर सरकार को सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि चोर-पुलिस के खेल में चोर दो कदम आगे की सोचते हैं।
कुछ लोग सरकार की तैयारियों पर भी जबर्दस्त प्रहार कर रहे हैं। सरकार की प्लानिंग और इसके इंप्लीमेंटेशन पर भी सवालिया निशान लगा रहे हैं। पर क्या यह भी बताने की जरूरत है कि घर में एक साधारण शादी-ब्याह का कार्यक्रम भी होता है तो तमाम तैयारियों के बाद भी कितनी परेशानियां सामने आती हैं। ऐसे में यह तो पूरे देश की आर्थिक विसंगतियों पर सर्जिकल स्ट्राइक है। ऐसे में राजनीतिक दलों के ड्रामेबाजों और बयानबाजों की फौज को मंथन जरूर करना चाहिए कि घरवापसी, पुरस्कार वापसी के बाद अब नोटवापसी का ड्रामा देखकर लोग हंस ही रहे हैं। कॉमन मैन पहले भी लाइन में लगता रहा है और आज भी लाइन में लगकर हंस रहा है। इसलिए प्लीज आप खास आदमी की तरह रहें कॉमन मैन बनने की कोशिश न करें।
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