Friday, September 16, 2016

तो क्या खत्म होगा नीतीश-लालू गठबंधन?

 
बिहार के अब तक के सबसे सफल मुख्यमंत्रियों की श्रेणी में शुमार नीतीश कुमार की स्थिति उस सांप ओर छछुंदर की तरह हो गई है, जिसे न तो निगलते बन रहा है और न उगलते। मोहम्मद शहाबुद्दीन के जेल से बाहर आते वक्त भले ही नीतीश कुमार बिहार से बाहर थे, लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज ने साफ कर दिया है कि वह परेशान हैं। यह वही शहाबुद्दीन है जिसे जेल के अंदर डालने की हिम्मत नीतीश कुमार ने अपने पहले शासन काल में 2005 में दिखाई थी और आज यह वही शहाबुद्दीन है जो पूरी शान-ओ-शौकत के साथ नीतीश राज में जेल से बाहर आया है। जेल से बाहर आते ही पहला बयान नीतीश के खिलाफ देते हुए शहाबुद्दीन ने स्पष्ट कर दिया है कि नीतीश बाबू का खेल खत्म है। अब नीतीश कुमार को मंथन करना है कि वह लालू के साथ बने रहेंगे या बिहार की जनता के साथ।
बिहार की यह विडंबना ही रही है कि जब-जब अपराधों पर लगाम लगाने के लिए नीतीश ने कमर कसी है, उनके साथियों ने ही उनके कदम रोक दिए हैं। एक सरकारी आंकड़े में बताया गया था कि अपने पहले शासन काल में नीतीश ने करीब 55 हजार अपराधियों से बिहार को मुक्त कराया था। यह 2005 का वह दौर था जब बिहार की जनता ने लालू के जंगल राज से मुक्ति पाने के लिए नीतीश को भारी जनसमर्थन दिया था। नीतीश ने भी सत्ता की बागडोर संभालते ही बिहार को अपराधमुक्त बनाने का जो संकल्प लिया था, उसे काफी हद तक पूरा भी किया। पुलिस को इतनी शक्ति दे दी गई थी कि या तो अपराधी बिहार छोड़कर भाग गए, या एनकाउंटर में मार दिए गए। बाहुबलियों को एक-एक कर जेल में डाला गया। इन्हीं बाहुबलियों में मोहम्मद शहाबुद्दीन भी एक था। यह वही शहाबुद्दीन था जिसने लालू राज में एसपी को सरेआम थप्पड़ मार दिया था, पर नीतीश ने इसे जेल की सलाखों के पीछे डालकर बिहार की जनता में साफ संदेश दिया कि बिहार अपराधमुक्त होकर रहेगा।

अब करीब 11 साल बाद नीतीश कुमार बिहार की जनता से किस तरह आंख मिला रहे हैं, यह कैमरे पर साफ दिख रहा है। नीतीश की उल्टी गिनती तो उसी दिन शुरू हो गई थी जब उन्होंने लालू यादव के साथ गठबंधन किया था। जेल से बाहर आते ही शहाबुद्दीन ने साफ कहा कि नीतीश परिस्थितिवश मुख्यमंत्री हैं। शहाबुद्दीन के इस कथन के मायने भी साफ हैं, क्योंकि जिस गठबंधन की सरकार में लालू यादव की पार्टी को सबसे अधिक सीट है उस गठबंधन में नीतीश कैसे सीएम बने रह सकते हैं। लालू के साथ गठबंधन के बाद यह भी स्पष्ट हो चुका था कि अब जल्द ही शहाबुद्दीन जेल से बाहर होंगे। सीवान की जेल में जिस तरह शहाबुद्दीन का खुला दरबार लग रहा था और लालू की पार्टी आरजेडी के विधायकों का वहां आना-जाना था, उसने जता दिया था कि आने वाला समय अब किसका होगा। इसी बीच पत्रकार राजदेव हत्याकांड में सीधे तौर पर शहाबुद्दीन का नाम आना सब कुछ बयां कर गया। शहाबुद्दीन का सबसे करीबी लड्डन मियां पत्रकार हत्याकांड में जेल के अंदर है। हद तो यह है कि नीतीश सरकार की पुलिस इस मामले में शहाबुद्दीन से पूछताछ तक नहीं कर सकी।
अब, जबकि शहाबुद्दीन के तौर पर लालू का सबसे बड़ा हथियार जेल की सलाखों से बाहर आ चुका है नीतीश कुमार जरूर मंथन कर रहे होंगे कि वे अपना भविष्य किस तरह तय करें। नीतीश के पास सिर्फ दो विकल्प बच रहे हैं, या तो नीतीश कुमार डमी मुख्यमंत्री की तरह ही काम करते रहें, क्योंकि कुर्सी से उन्हें मोह हो गया है। या दूसरा विकल्प यह है कि बिहार सरकार पर से लालू यादव की परछार्इं से खुद को मुक्त कर लें, क्योंकि जब तक लालू यादव की परछार्इं बिहार सरकार पर रहेगी नीतीश कुमार मुंह छिपाते ही रहेंगे और शहाबुद्दीन जैसे अपराधियों से आंख तक नहीं मिला सकेंगे। नीतीश को जरूर मंथन करना होगा कि कहीं वह दिन न आ जाए कि एक ही मंच पर नीतीश कुमार को शहाबुद्दीन का स्वागत करना पड़ जाए, क्योंकि तमाम विवादों के बावजूद आज भी शहाबुद्दीन लालू यादव की पार्टी राजद के राष्टÑीय कार्यकारिणी का सदस्य है। उस दिन नीतीश क्या करेंगे?

शहाबुद्दीन के जेल से बाहर आने के कारणों पर चर्चा के दौरान अदालत के निर्णय पर तनिक भी टिप्पणी बेकार है। पर बीजेपी नेता सुशील मोदी का कहना सौ प्रतिशत सच माना जा सकता है। मोदी ने नीतीश सरकार पर आरोप लगाया है कि जिस मर्डर केस में शहाबुद्दीन जेल के अंदर था अगर उस केस की ठीक से पैरवी की जाती तो कोई भी अदालत शहाबुद्दीन को जमानत नहीं दे सकती थी। बिहार की जनता भी नीतीश कुमार से जरूर सवाल पूछेगी कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी को लागू करने के लिए जिस नीतीश सरकार ने दिल्ली से लाखों रुपए खर्च कर वकीलों की फौज खड़ी की थी, उसी नीतीश सरकार ने किन मजबूरियों के चलते शहाबुद्दीन को वॉकओवर दे दिया। 11 साल पहले जिस नीतीश सरकार में शहाबुद्दीन को जेल हुआ था, उसी सरकार में वह बाहर आया है। ऐसे में बिहार की जनता को भी यह मंथन जरूर करना होगा कि चुनाव के समय क्यों उनकी बुद्धि कुंद हो गई थी। क्या सच में बिहार की जनता भी यही चाहती थी कि जंगलराज ही उन्हें मंजूर था और आज भी है? 
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