Tuesday, September 6, 2016

‘कभी अपने चाहने वालों की मौत मांगी है’

Stuart binny's wife Mayanti a famous sports anchor
भारत में क्रिकेट धर्म की तरह है, अब इसे प्रमाणित करने की जरूरत नहीं है। पर हाल के दिनों में इस धर्म में काफी परिवर्तन आया है। सबसे बड़ा परिवर्तन क्रिकेटर्स के प्रति सोच है। इस सोच में सबसे बड़ी विडंबना क्रिकेटर्स की पर्सनल लाइफ और उनकी फैमली के प्रति है। एक क्रिकेटर्र की पत्नी ने तीन दिन पहले ही भारतीय दर्शकों से यह सवाल किया है कि क्या कभी आपने अपने चाहने वालों की मौत मांगी है? मंथन जरूरी है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो एक युवा क्रिकेटर की पत्नी को ऐसी बातें पब्लिक डोमिन में करनी पड़ी। 
दरअसल इस कहानी की शुरुआत हुई हाल ही में भारतीय क्रिकेट टीम के वेस्टइंडिज दौरे के दौरान। टीम में कई युवा चेहरे थे। इनमें से तो कई ऐसे थे जिन्होंने इस दौरे में ही इंडियन कैप पहना। जबकि कई ऐसे चेहरे थे जो कुछ सालों से टीम इंडिया के लिए खेल रहे हैं। ऐसा ही एक नाम है स्टूअर्ट बिन्नी का। बिन्नी ने भले ही इंडिया के लिए तमाम घरेलू सीरीज के अलावा रणजी ट्रॉफी और दलीप ट्रॉफी में बेहतर प्रदर्शन किया हो, लेकिन स्टूअर्ट की पहचान उनके खेल से ज्यादा उनके पिता की बदौलत ही है। अपने समय के जबर्दस्त क्रिकेटर रहे रोजर बिन्नी के बेटे होने का कभी उनको फायदा मिला तो कभी आलोचना का दौर भी चला। आलोचनाओं के बावजूद स्टूअर्ट ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। पर हाल का वेस्टइंडिज दौरा उनके कॅरियर का सबसे खराब दौरा साबित हुआ।
स्टूअर्ट का सबसे खराब दिन ट्-ट्वेंटी मैच के दौरान रहा है। इस मैच के एक ओवर में बिन्नी को पांच छक्के खाने पड़ें। इस ओवर में उन्होंने 32 रन क्या दिए सोशल मीडिया में मानो उनके खिलाफ अभियान ही शुरू हो गया। सबसे बुरा बर्ताव उनकी वाइफ के साथ हुआ। बिन्नी के छह गेंद उनकी वाइफ मयंती लेंगर के लिए भारी साबित हुए। ट्वीटर पर उनके लिए अशोभनीय बातों की बाढ़ आ गई। पर्सनल कमेंट किए जाने लगे। जब बात हद से आगे बढ़ गई तो मयंती को मोर्चा लेना पड़ा। उन्होंने खुद ट्वीटर पर अपनी भावनाओं को पोस्ट किया। 
Stuart binny's wife Mayanti a famous sports anchor
ट्रॉलर्स के नाम लिखे खत में मयंती ने लिखा,
‘मुझे पूरा भरोसा है कि आप में से किसी ने भी अपने चाहने वालों के लिए कभी भी मौत नहीं मांगी होगी या आपसे जुड़े ऐसे किसी व्यक्ति ने आपको डरावनी तस्वीरों वाला कोई धमकी भरा संदेश नहीं भेजा होगा। सुसाइड की ओर इशारा करते हुए मेरा मजाक उड़ाना शर्मनाक है। एक बार उन परिवारों के बारे में सोचिए, जो इस तरह की ट्रेजडी का सामना करते हैं और आपने उनकी इस असहनीय पीड़ा का मजाक बनाकर रख दिया है। मुझे उम्मीद हैं कि आपको प्यार मिलेगा और उत्तरदायित्व का अहसास होगा, क्योंकि तलाक की सलाह से ऐसा लग रहा है कि जैसे ये चीजें आपके पास हैं ही नहीं। मैं 18 साल की उम्र से नौकरी कर रही हूं। मुझे लालची महिला की संज्ञा देने में समय खराब करने की बजाय कोई नौकरी हासिल कीजिए और अपना व अपने परिवार का भला करने के दायित्व का निर्वहन कीजिए। मुझे लगता है कि हमारा मजाक उड़ाने से आपको अपने आप में अच्छा महसूस होता होगा, अन्यथा क्या यह सच में कोई मायने रखता है? 
आप सबको
शुभकामनाएं...
मयंती का यह खत अपने आप में बहुत कुछ बयां कर देता है। यह वो दर्द
है जब कोई सेलिब्रेटी क्रिकेटर अपने कॅरियर के खराब दौर से गुजर रहा होता
है। कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी ने जब भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम युग
का श्रीगणेश किया तब पूरा भारत उन्हें सिर आंखों पर बिठाए रखता था। पर जब
उनका खराब दौर आया तो उनके अपने शहर रांची में ही उनके घर की सुरक्षा
बढ़ानी पड़ गई थी। स्टार क्रिकेटर विराट कोहली को भी अपनी पर्सनल लाइफ के
लिए अपने फैंस के भद्दे कमेंट सहने पड़े। क्रिकेटर्स के घरों पर अंडा
फेंकना, उनके खिलाफ प्रदर्शन करना, उनकी निजी लाइफ पर कमेंट्री करना यह
आज के क्रिकेट दर्शकों का शगल बन चुका है। यह न केवल शर्मनाक है बल्कि एक
ऐसे दौर की तरफ इशारा कर रही है जब हमारे क्रिकेटर मैदान में जाते वक्त
सोचेंगे कि अगर आज उनसे कोई गलती हुई तो उनकी फैमिली सुरक्षित रहेगी या
नहीं।
खेल में हार या जीत होनी तय है। या तो आप जीतते हैं या हारते हैं।
यह सही है कि हार की पीड़ा को सहना मुश्किल होता है। पर क्या इसे किसी रूप
में जायज ठहराया जा सकता है कि हम किसी हार पर खिलाड़ियों के परिवार और
उनकी निजी जिंदगी को खतरे में डाल दें। क्या हम एक बेहतर दर्शक नहीं बन
सकते? क्या यह जरूरी है कि हम दर्शक के अलावा आलोचक, विरोधी,
प्रदर्शनकारी भी बन जाएं?
पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में जब उनकी टीम हारती है, खासकर भारत से
हारती है तो उनके खिलाड़ी इतने डरे सहमे रहते हैं कि कभी एक साथ अपने देश
नहीं लौटते हैं। मैच शुरू होने से पहले ही उनके हर एक खिलाड़ी के घर को
पुलिस घेरे में ले लिया जाता है। क्या भारतीय दर्शकों की भी ऐसी ही
मानसिकता बनती जा रही है। क्या हम भारतीय दर्शक भी चाहते हैं कि जिन
खिलाड़ियों ने हमारा मान सम्मान बढ़ाया है, जिन्होंने हमें कई बार
गौरवांवित होने का मौका दिया है उन्हें भय के वातावरण में जीना पड़े।
क्यों हम भारतीय क्रिकेट दर्शक खेल को खेल की भावना से देखने की परंपरा
को भूलते जा रहे हैं। भारतीय क्रिकेट के दर्शकों और फैंस को हाल के
ओलंपिक से भी सीख लेने की जरूरत है। कैसे हमने हार कर भी घर लौटे दीपा
कर्मकार और उत्तराखंड के धावक मनीष का स्वागत किया। यही खेल भावना हम
क्रिकेट में क्यों नहीं ला सकते। मंथन करने की जरूरत है।

किसी भी खिलाड़ी का हर दिन एक समान नहीं होता है। ऐसे में उन्हें भी
मेंटल सपोर्ट की जरूरत पड़ती है। यकीन मानिए यह मेंटन सपोर्ट जो दर्शकों
और उनके फैंस द्वारा दिया जा सकता है वह कोई और नहीं दे सकता है। आने
वाले समय में भारतीय क्रिकेट टीम में युवा क्रिकेटर्स की भरमार रहेगी,
ऐसे में हमें उनके साथ खड़ा रहना होगा। या नहीं कि हम उनके परिवार पर
भद्दे कमेंट करें। बिन्नी की वाइफ मयंती ने हमें मंथन करने का समय दिया
है। हमें सही अर्थों में दर्शक बनना ही होगा।
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