Friday, June 19, 2015

तो मत करिए योग, कोई जबर्दस्ती तो नहीं

हर तरफ योग की चर्चा है। ऐसा लग रहा है विश्व योग दिवस के रूप में हम एक ऐसे युग में प्रवेश करने जा रहे हैं जहां सभी स्वस्थ होंगे। हेल्दी होंगे, फिट होंगे, तंदरुस्त होंगे, जो भी आप कह लें, वे सब होंगे। पर इन सबके होने के बीच विरोध के स्वर इस तरह उठ रहे हैं जैसे कोई आपसे जबर्दस्ती कर रहा हो। क्या सच में कोई जबर्दस्ती किसी से कोई काम करवा सकता है। यह जानते हुए भी कि यह चीज आपकी भलाई के लिए है, फिर भी हम कहां मानते हैं।

हर महीने भारत में हजारों लोग रोड एक्सीडेंट में सिर्फ इसलिए मर जाते हैं क्योंकि उन्होंने हेल्मेट नहीं पहनी होती है। कुछ ऐसा ही आंकड़ा फोर व्हीलर वालों के साथ है। सीट बेल्ट न बांधने के कारण रोड एक्सीडेंट के दौरान मरने वालों की संख्या अधिक होती है। ओवर स्पीड गाड़ी न चलाएं, रेड लाइट क्रॉस न करें न जाने कितने नियम कायदे बने हैं। ये सभी हमारी सुरक्षा के लिए ही बने हैं। पर जरा मंथन करिए। हममें से कितने लोग हैं जो इसे हमारी सुरक्षा मान कर पहनते हैं या पालन करते हैं। यह हम सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि हमारे अंदर पुलिस का थोड़ा बहुत डर रहता है। पुलिस के चालान से बचने के लिए हम हेल्मेट पहनते हैं, सीट बेल्ट बांधते हैं।

हम यह जानते हैं कि हेल्मेट न पहनने का क्या-क्या नुकसान हो सकता है। कैसे कोई कीड़ा अचानक से हमारे चेहरे से टकराकर हमें घायल कर सकता है। कैसे हवा के झोंकों के साथ कोई नुकिली चीज हमारे चेहरे और आंख से टकराकर हमें अंधा बना सकती है। कैसे सूर्य की तेज रोशनी में हमारा सिर गर्म होकर तपने लगता है। पर हमें इससे ज्यादा फिक्र इस बात की होती है कि हमारे रेशमी बाल न खराब हो जाएं। अगर पुलिस के चालान का डर न हो तो शायद ही कोई हेल्मेट पहने। हेल्मेट बनाने और बेचने वाले चाय और पान की दुकान खोलने को मजबूर हो जाएं।  चालान का डर न हो तो सीट बेल्ट बांधना तक नहीं आएगा किसी को। रेडलाइट का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। हर चीज हमारी सुरक्षा और हमारी सुविधा के लिए ही है। पर फिर भी हमें इसे मानने के लिए कड़े नियमों की जरूरत है। हम मानते नहीं हैं, हमें मनाना पड़ता है। वह भी जबर्दस्ती। डंडे की जोर पर।

ऐसे में अगर किसी ने योग करने की बात कह दी तो क्या बुरा किया। कोई आपको आपके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का प्रयास कर रहा है। बता रहा है कि हजारों रुपए जिम में फेंकने के बजाय अगर थोड़ा वक्त योग के लिए निकाल लिया जाए तो हम कितने स्वस्थ रह सकते हैं। पर हमें इसमें भी राजनीति नजर आने लगती है। भाई जब आप अपने सिर और अपने जान की सुरक्षा के लिए भी नियमों में बंधे हैं तो फिर यह कैसी दलील की आपसे योग जबर्दस्ती करने को कहा जा रहा है। एक वक्त था जब भारत को योगियों और जोगियों का देश कहा जाता था। पर अब इसी योग ने वैश्विक पहचान कायम कर ली है। भारत के हजारों बाबाओं का रोजगार इसीलिए दिन दुनी राज चौगुनी प्रगति कर रहा है क्योंकि उनके विदेशी भक्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पश्चिमी सभ्यता में योग को जिंदगी का सबसे अहम अंग मान लिया गया है।

मेडिशन एस्क्वॉयर में प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी जब भाषण दे रहे थे तो निर्जला व्रत पर थे। नवरात्र चल रहा था। तमाम जगहों पर नरेंद्र मोदी गए पर अन्न और जल ग्रहण नहीं किया। विदेशी अखबारों ने नरेंद्र मोदी के इस तप पर विशेष आर्टिकल लिखा। बताया कि कैसे एक प्रधानमंत्री योग के दम पर इतनी शक्ति प्राप्त कर लेता है कि दस दिन बिना रुके, बिना थके अपना काम करता है। यह योग और विकास के बीच की कड़ी नहीं तो क्या है।
हरिद्वार और ऋषिकेश में आपको हर दिन हजारों विदेशी पर्यटक मिल जाएंगे। अगर उनसे बात करने का मौका मिले और उनसे आप पूछें कि भारत क्यों आए हैं, तो दस में से आठ के जवाब यही मिलेंगे कि ध्यान और योग सीखने। जिस पश्चिमी सभ्यता ने योग को इस तरह आत्मसात करने की दिशा में कदम उठाया है वहीं हम योग पर टिप्पणी करके इसे नीचा दिखाने का प्रयास करते नजर आते हैं।  योग को भी धर्म के बंधन में बांध कर कुछ तथाकथित सेक्यूलर लोगों ने एक ऐसा उदाहरण पेश किया है जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है।

आप पर योग करने के लिए नियमों की बंदिशें तो नहीं लगाई जा रही है। सूर्य नमस्कार करने के लिए जेल में डालने की तो धमकी तो नहीं दी रही है। सुबह सैर पर निकलने के लिए आपको घर से तो नहीं निकाला जा रहा है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर घबराने की क्या जरूरत है। आप मत जाइए योग करने, कोई जबर्दस्ती तो नहीं है। हेल्मेट नहीं लगाइए आपकी मर्जी। सीट बेल्ट मत बांधिए आपकी च्वाइस। योग मत करिए आपका मन। पर एक बार मंथन जरूर करिए, क्या हमारी जिंदगी और इससे जुड़ी सुरक्षा सिर्फ नियमों में बांध कर ही होनी चाहिए।
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