Saturday, July 11, 2015

दो कदम तुम भी चलो, दो कदम हम भी चलें


भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध के बाद ऐसा कोई दिन नहीं बीता जब बॉर्डर पर तनाव न हुआ हो। कई बार इस तनाव को कम करने का प्रयास किया गया, लेकिन हर बाद मुद्दों पर टकराव होते रहे। सबसे बड़ा मुद्दा कश्मीर को लेकर रहा है। सन 1972 में फिल्म आई एक हसीना दो दीवाने। फिल्म का एक गाना बड़ा ही मशहूर हुआ, बोल थे...दो कदम तुम भी चलो, दो कदम हम भी चलें, मंजिलें फिर प्यार के, आएंगे चलते-चलते। इस गाने के भाव को हम आज भी भारत-पाक के संबंधों को लेकर समझ सकते हैं। पर अफसोस इस बात पर है कि कदम उठते तो हैं चलने के लिए पर राजनीति की बेड़ियों में जकड़ जाते हैं। एक हसीना यानि कश्मीर के मुद्दे पर बयानों की ऐसी तलवारबाजी का प्रदर्शन होता है कि सभी कदम बेकार हो जाते हैं। फिल्म में भी गाने के बोल बदल जाते हैं और हीरो को गाना पड़ता है..दो कदम तुम न चले, दो कदम हम न चले, आरजू के दिए बुझ गए जलते-जलते।
रूस के उफा शहर में एक बार फिर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच महत्वपूर्ण बातचीत हुई है। लंबे समय से ऐसी बातचीत की उम्मीद की जा रही थी। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान नवाज शरीफ की दिल्ली में मौजूदगी ने साफ संकेत दे दिए थे कि कदम बढ़ा कर दिल मिलाने पर समहमति बनेगी। पर पाकिस्तान लौटते ही पाक रेंजर्स ने सीजफायर का उल्लंघन कर एक दूसरा ही संकेत दे दिया था। इसके बाद कई ऐसे मौके आए जब दोनों प्रधानमंत्री एक दूसरे के सामने आए, पर ये सभी मुलाकातें बेहद औपचारिकता भर रहीं। रूस में सम्मेलन के दौरान यह पहला मौका है जब दोनों प्रधानमंत्रियों ने आमने-सामने बैठकर कई मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की। इस बातचीत के बाद दोनों देशों ने ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी कर काफी स्पष्ट शब्दों में दोनों देशों की बातों को सामने रखा।
सबसे महत्वपूर्ण यह रहा है कि दोनों देशों के प्रधानमंत्री ने अपने तय समय सीमा से काफी अधिक देर तक बातचीत की। यह बातचीत करीब एक घंटे तक चली। यह समय सीमा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों के बीच अक्सर ऐसा होता आया है कि बातचीत समय सीमा से पहले ही खत्म हो जाती है। तनाव इतने अधिक भारी पड़ जाते हैं कि बातचीत की औपचारिकता ही महसूस होती रही है। इससे पहले इसी साल दोनों देशों के सचिव स्तर की वार्ता भी इसी तनाव के कारण रद हो चुकी है। ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी करते हुए बताया गया है कि आतंकवाद के सभी स्वरूपों पर दोनों देशों ने कड़ी निंदा की है। पर लखवी के मुद्दे पर क्या बातचीत हुई है इस पर दोनों देशों ने कुछ भी बयान जारी नहीं किया है।
यहीं आकर बातचीत दोराहे पर चली जाती है कि एक तरफ पाकिस्तान हर बार आतंकवाद के मुद्दे पर कड़ाई से कार्रवाई की बात करता है, वहीं भारत में अमन के दुश्मनों को न केवल पनाह देता है, बल्कि उन्हें अपने यहां खुली छूट देता है। इससे पहले जब एक जून को भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान को ललकारते हुए कहा था कि जबतक लखवी के मामले पर पाकिस्तान ठोस निर्णय नहीं लेता है, भारत किसी तरह की बातचीत नहीं करेगा। अब जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ इतनी बड़ी बैठक हो चुकी है तो इस मामले पर कुछ भी बयान सामने नहीं आ रहे हैं। इसी बात पर प्रधानमंत्री मोदी प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और अपने सहयोगी शिवसेना के निशाने पर भी आ चुके हैं। इसे एक और यू-टर्न बताकर प्रधानमंत्री की खिंचाई की जा रही है।
मंथन जरूरी है कि हम कदम कहां तक बढ़ाएं और कहां अपने कदम को विराम दें। इससे संदेश गलत जाता है कि पहले हम अपने कदम रोक दें, फिर आहिस्ता से बढ़ा दें। जब आपने उस राह पर न जाने की पहले ही सोच ली है जो राह आतंक को बढ़ावा देता है तो फिर उस पर बातचीत का क्या फायदा। अगर आपमें क्षमता है तो इसका मुंहतोड़ जवाब दें। जमीनी हकीकत को स्वीकारते हुए अपनी व्यवस्थाओं को मजबूत करें। अच्छा तब होता जब सामने वाला आपकी बातों को गंभीरता से लेता। जब-जब बातचीत का दौर शुरू होता है पाक रेंजर्स सीजफायर का उल्लंघन कर अपनी मंशा जता देते हैं।
अब देखना यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ का दो कदम आगे बढ़ना पाकिस्तान के सिपहसालारों को रास आता है या नहीं। या फिर एक बार भारत और पाक की सीमाएं मोर्टार के गोले से थर्राएंगी। अगले साल नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान जाने का न्योता स्वीकार करके दिलेरी का परिचय दिया है। इस दिलेरी पर पूरे विश्व की नजर अभी से टिक गई है, क्योंकि दो कदम तुम भी चलो, दो कदम हम भी चलें की नीति के बाद चीन ने जो कुछ किया है उसे भी पूरी दुनिया ने करीब से देखा है।   

 चलते-चलते
पाकिस्तान में अभी से ही भारतीय प्रधानमंत्री को लेकर तमाम तरह की विरोधाभासी खबरों का आना सिलसिला शुरू हो चुका है। इन प्रायोजित खबरों में भारतीय प्रधानमंत्री को कमजोर और झुक जाने वाला इंसान बताया जा रहा है। एक टीवी कार्यक्रम में तो इस तरह से प्रधानमंंत्री का मजाक उड़ाया गया है जिसे अगर एक आम भारतीय भी देख ले तो उसका खून खौल उठे। पर सवाल अभी भी वही है कि वे कौन लोग हैं जो भारत-पाक के रिश्तों को मजबूत होता   नहीं देखना चाहते। आप भी मंथन करिए।

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