Monday, January 18, 2016

बिहार में जंगलराज: जो कल था वह आज भी है


बिहार में विधानसभा चुनाव समाप्त होने के बाद भी सबसे बड़ी बहस वहां मौजूद जंगलराज को लेकर है। हर तरफ यही चर्चा है कि बिहार में जंगलराज-2 है। इसे प्रचारित करने के पीछे पर्याप्त कारण भी हैं। नीतीश और लालू के गठजोड़ के बाद सत्ता में आई सरकार अभी सत्ता संतुलन से जूझ ही रही है कि बैक-टू-बैक कई बड़ी वारदातों ने बिहार की छवि को भरपूर नुकसान पहुंचाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। पहले इंजीनियर्स की हत्या फिर दो दिन पहले पटना में ज्वैलर की सरेआम गोली मारकर हत्या ने बिहार को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। 
नीतीश कुमार को अपने से अलग होने की बात अब तक बीजेपी पचा नहीं पा रही है, इसीलिए जंगलराज को प्रचारित करने में सबसे आगे बीजेपी ही है। पर आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जो जंगलराज 2001 के दौर में लालू यादव की पार्टी के राज में था उसमें 2005 से 2015 के बीच भी कोई परिवर्तन नहीं आया था। यह अलग बात है कि नीतीश के पिछले दस साल के राज के दौरान मीडिया की मेहरबानी कहें या नीतीश का अपना जलवा, इस तरह राष्टÑीय स्तर पर बिहार में अपराध की चर्चा बेहद सामान्य रही। जबकि, हकीकत यही है कि बिहार में अपराध का ग्राफ ज्यों का त्यों बना रहा। लालू यादव के सत्ता के केंद्र में आते ही राष्टÑीय मीडिया का ध्यान बिहार के तथाकथित जंगलराज की तरफ कुछ ज्यादा ही है। शायद यही कारण है कि इन दिनों बिहार में जंगलराज सुर्खियों में है।
चलिए आपको बिहार में तथाकथित जंगलराज के कुछ स्याह पहलू से रू-ब-रू करा दूं, ताकि आपको समझने में दिक्कत न हो कि बिहार में जंगलराज कैसे, कब और कहां था। तथ्यात्मक आंकड़ों की बात करें तो बिहार में वर्ष 2001 से 2005 तक रजिस्टर्ड अपराधों की संख्या 5 लाख 15 हजार 289 रही। यह वह दौर था जब लालू यादव का शासन अपने चरम पर था। बावजूद इसके कि लालू यादव जेल यात्रा कर चुके थे, सत्ता उनकी पत्नी के हाथों में थी। चुनाव आते ही बीजेपी और जदयू की पूरी कैपेनिंग जंगलराज को खत्म करने पर फोकस हो गई। नतीजा भी बेहतर आया और नीतीश को सत्ता की कमान मिली। पर 2006 से 2010 तक बिहार में रजिस्टर्ड अपराधों की संख्या 6 लाख 30 हजार 682 हो गई। तर्क दिया गया कि नीतीश सरकार ने अपराधियों पर लगाम लगाया जिसके कारण रजिस्टर्ड अपराधों की संख्या बढ़ गई। पर इस तथ्य का जवाब कोई नहीं देना चाहता है कि क्यों यही संख्या 2011 से 2015 तक 8 लाख 67 हजार 944 का आंकड़ा छू गई?
जंगलराज में किडनैपिंग को सबसे बड़ा धंधा बनाकर पेश किया गया। कई फिल्मों में भी बिहार की यही छवि दिखाई गई। किडनैपिंग संगठित अपराध का ट्रेड मार्क बन गया। पर तथ्य यह है कि जिस किडनैपिंग की संख्या 2001 से 2005 के बीच 10 हजार 385 रही, वही संख्या 2006 से 2010 के बीच बढ़कर 13 हजार 872 पर पहुंच गई। हद तो यह है कि 2011 से 2015 के बीच किडनैपिंग की संख्या 27 हजार 534 पहुंच गई। महिलाओं की सुरक्षा का दम भरने वाली नीतीश सरकार के कार्यकाल में सबसे अधिक बलात्कार के मामले सामने आए। तथाकथित जंगलराज 2001 से 2005 के बीच बिहार में रेप के 4461 मामले दर्ज हुए, वहीं 2006 से 2010 के बीच यह संख्या बढ़कर 4970 हो गई। 2011 से 2015 के बीच रेप की संख्या बढ़कर 5093 तक पहुंच गई। बिहार में चंद दिनों की सरकार के भीतर बैक-टू-बैक मर्डर ने जिस तरह पूरे देश के चिंतनशील लोगों को झकझोर रखा है उस मर्डर की हकीकत भी कुछ जुदा नहीं है। जहां लालू यादव की पार्टी के राजकाज में पांच साल के भीतर 18 हजार 189 हत्याएं हुर्इं वहीं नीतीश कुमार के दस साल के शासन काल में 32 हजार 288 हत्याएं हुर्इं। 
बीजेपी को इस बात की चिंता है कि अगर बिहार में उनकी सत्ता नहीं आई है तो वहां जंगलराज पसर गया है। पर इस सवाल का जवाब कौन देगा कि जब नीतीश के साथ गठजोड़ में थे तब जो अपराध का आंकड़ा लगातार बढ़ता गया उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? क्या उन दिनों तथाकथित जंगलराज उन्हें नजर नहीं आ रहा था, जो इन दिनों वे महसूस कर रहे हैं। यह सही है कि लालू यादव एक ऐसे सिंबल के रूप में राजनीति में हैं जिसे अपराधियों के संरक्षण के लिए मशहूर कर दिया गया। पर, नीतीश कुमार के शासन काल में बढ़ते अपराधों पर गंभीरता से मंथन करने की जरूरत है। सिर्फ लालू यादव के बिहार में गठबंधन के कारण जंगलराज आ जाने को मुर्खतापूर्ण करार देना चाहिए। नीतीश कुमार के पास मौका है कि वह जिस तरह अपने तथ्यात्मक वक्तव्यों से विरोधियों को कड़ा जवाब देते हैं, उसी तथ्यात्मक आंकड़ों पर गौर कर अपने इस शासनकाल में कम से कम अपराधों पर लगाम लगाने के लिए गंभीर प्रयास करेंगे। अगर वे बिहार में लगातार बढ़ते क्राइम ग्राफ पर लगाम लगाने में कामयाब नहीं हो सकेंगे तो पूरा बिहार उनसे इस वक्त भी सवाल कर रहा है और पांच साल बाद भी सवाल करेगा। फर्क बस इतना होगा कि इस वक्त नीतीश कुमार जवाब देने की स्थिति में हैं, उस वक्त उनको जवाब देने का कोई मौका ही नहीं देगा और यही जंगलराज का शोर उन्हें ले डूबेगा। फिलहाल जंगलराज का शोर करने वालों को थोड़ा शांत होने की जरूरत है, क्योंकि आंकड़ों की तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोला करती हैं। और यह तस्वीरें यही बयां   कर रही हैं कि जो तथाकथित जंगलराज कल था, वही पिछले दस साल में भी रही और अगर स्थितियां नहीं सुधरीं तो कल भी रहेगी। भले ही मुख्यधारा की मीडिया नीतीश के मोहपाश में बंधी रहे, पर अब सोशल मीडिया का जमाना है इसलिए बिहार की हर छोटी-बड़ी घटनाओं से पूरा देश रू-ब-रू हो रहा है। देख रहा है, समझ रहा है। 

(यहां दिए गए आंकड़े बिहार सरकार के आधिकारिक आंकड़े हैं।)

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