Sunday, August 14, 2016

मोदी जी! इसे कहते हैं आ ‘गाय’ मुझे मार


आ बैल मुझे मार कहावत तो आपने कई बार सुनी होगी। पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गो-रक्षा के नाम पर ठेकेदारी करने वालों को स्पष्ट संदेश क्या दिया, कहावत थोड़ी बदल गई। यूपी, पंजाब सहित कई बड़े राज्यों के चुनाव के प्री-क्वार्टर फाइनल की तैयारियों के बीच प्रधानमंत्री के बयान ने कहावत को पलट दिया है। जिस तरह से गो-रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे संगठनों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उसमें यह कहने में जरा भी गुरेज नहीं कि अब बैल की जगह गाय ने ले ली है और लोग कहने लगे हैं आ ‘गाय’ मुझे मार।
आज स्वतंत्रता दिवस की हम 70 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस स्वतंत्रता दिवस को भारत पर्व के रूप में सेलिब्रेट करने का आह्वान किया था। पर जबसे भारत पर्व मानने के लिए मोदी जुटे, एक से बढ़कर एक बड़ा बयान दिए जा रहे हैं। लंबे समय से तमाम बड़े मुद्दों पर मौन साधे मोदी ने अचानक फ्रंट फुट पर आकर ताबततोड़ बैटिंग क्या शुरू की हर तरफ हो हल्ला मच गया। दलितों पर बड़ा बयान, कश्मीर पर खुलकर बयान फिर गो-रक्षकों को स्पष्ट चेतावनी ने जहां एक तरफ मोदी विरोधियों को शांत कर दिया है, वहीं मोदी के अपने उनसे खासे नाराज हो गए हैं। विपक्ष के पास पिछले कुछ महीनों से एक ही मुद्दा था कि मोदी न तो कश्मीर पर कुछ बोल रहे हैं, न तो दलितों पर और न गो-रक्षा के नाम पर मची मारकाट पर। पर अचानक से मोदी ने पलटवार तो किया, लेकिन खुद मुसीबत को न्योता दे दिया है।
नरेंद्र मोदी के नाम का दिनरात गुनगान करने वाले विश्व हिंदु परिषद, बजरंग दल सहित तमाम हिंदु संगठनों के नेता अचानक से मोदी से नफरत करने लगे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे संगठनों के बयानों ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि मोदी ने अपने चौके छक्कों से विरोधियों को तो शांत कर दिया है, पर बॉल बाउंड्री पर बैठे अपनों को जो लगा है उसका दर्द लंबे समय तक सुनाई देने वाला है। विश्व हिंदु परिषद के फायर ब्रांड नेता और अंतरराष्टÑीय कार्याध्यक्ष डा. प्रवीण तोगड़िया ने तो बकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर मीडिया के सामने अपनी भड़ास निकाली। तोगड़िया ने कहा कि ‘पीएम के भाषण बाद देश के करोड़ों हिंदू रो रहे हैं।’ तोगड़िया ने खुलेआम मोदी के भाषण की धज्जियां उड़ाते हुए स्पष्ट संदेश दे दिया है कि गो-रक्षा के नाम पर भले ही प्रधानमंत्री का बयान राजनीति से प्रेरित है, लेकिन आम जनमानस उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।
हालांकि जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पद पर बैठे किसी भी शख्स की बातों के हमेशा से ही दो मतलब होते हैं। एक बात का तात्पर्य तात्कालिक परिस्थितियों से होता है और दूसरी दूरागामी सोच से परिलक्षित होती है। एक तरफ देश को देखना होता है दूसरी तरफ अपने दल और उसके हितों की रक्षा करना भी उनका कर्तव्य होता है। शायद यही कारण है कि विहिप और उसके सहभागी संगठनों को प्रधानमंत्री की बात नागवार गुजरी है। प्रधानमंत्री की मुख से बात निकली है तो दूर तलक भी जाएगी। यही कारण है कि सभी बातों को यूपी, पंजाब सहित कई अन्य राज्यों के चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
भले ही प्रधानमंत्री की बातों के कई मतलब निकाले जाएं, पर आजादी के इतने सालों बाद भी इस सत्य से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता है कि गो-रक्षा के नाम पर हमेशा से राजनीति ही होती है। प्रधानमंत्री ने सीधे-सीधे गो-रक्षकों को असमाजिक करार दे दिया, लेकिन उस पर कुछ नहीं बोले की जिन राज्यों में गो-हत्या पूरी तरह प्रतिबंधित है उन राज्यों में आज भी गो-हत्या कैसे हो रही है। प्रधानमंत्री ने इस पर भी कुछ नहीं बोला कि जब हरियाणा, जम्मू कश्मीर, झारखंड, राजस्थान जैसे राज्यों में गो-हत्या पर दस साल तक जुर्माना है तो क्यों वहां फिर भी गो-हत्या धड़ल्ले से हो रही है। मोदी ने सीधे आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि अस्सी प्रतिशत गो-रक्षक फर्जी हैं, पर ये आंकड़े कोई बताएगा कि गो-हत्या के मामले में आजादी से लेकर अबतक कितने लोगों को सजा हुई है। प्रधानमंत्री को इस बात पर भी अपनी स्पष्ट राय रखनी चाहिए कि जब भारत में गाय एक है तो गो-रक्षा के लिए सभी राज्यों में अलग-अलग कानून क्यों है? क्यों किसी राज्य में गो-हत्या कानून वैध है तो कहीं अवैध? क्यों नहीं गो-रक्षा के नाम पर राजनीति को रोकने के लिए एक सामन व्यवस्था का गठन किया जाए।

इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले दो सालों में गो-मांस और गो-हत्या के नाम पर भारत ने बहुत कुछ झेला है। इस बात से भी कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि धर्म के कुछ ठेकेदारों ने गो-रक्षा के नाम पर अपनी दुकान खोल रखी है। बेवजह लोगों को परेशान भी किया जा रहा है। पर क्या इससे भी इनकार किया जा सकता है कि हर क्षेत्र में कुछ गलत लोग बसते हैं। कई ऐसे राज्य हैं जहां गो-रक्षा दलों की पहचान कर उन्हें पहचानपत्र तक जारी किया जाता है। ऐसा क्यों नहीं हो सकता है कि सभी राज्यों में ऐसी व्यवस्था की जाए, ताकि भविष्य में होने वाली घटनाओं को रोका जा सके। प्रधानमंत्री की अपील के तत्काल बाद गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एडवाइजरी जारी कर दिया है।  बेहतर तो यह भी होता कि गो-रक्षकों को पकड़ने की जगह गो-हत्या पर होने वाली राजनीति को खत्म करने का प्रयास किया जाता। मंथन का वक्त है कि हम गो-हत्या को राजनीति के चाकू से कबतक टूकड़े-टूकड़े करेंगे।

Monday, August 1, 2016

मीडिया परेशान है, मीडिया क्या करे?


अजीब प्रश्न है न कि मीडिया भी परेशान है। वह खुद नहीं समझ पा रहा है कि क्या करे? क्या लिखे? क्या दिखाए? क्या बोले? किस पर बहस करे? किस मुद्दे को उठाए? दलित के आगे दलित लिखे या ऐसे ही जाने दे? तमाम ऐसे प्रश्न हैं जिनसे मीडिया आजकल जूझ रहा है। मीडिया के सामने यह प्रश्न पहले मौजूं नहीं था। पर हाल के दिनों में खासकर 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद आम लोगों में मीडिया को देखने, सुनने, समझने, पढ़ने की क्षमता में जबर्दस्त परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन कोई साधारण परिवर्तन नहीं है। इस पर गहराई से मंथन की जरूरत है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया को चौथा महत्वपूर्ण स्तंभ कोई ऐसे नहीं मान लिया गया है। इसके पीछे लंबा और संघर्षपूर्ण समय गुजारा गया है। जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का युग नहीं आया था तब जो समाचारपत्रों में पढ़ लिया उसे ही अंतिम सत्य मान लिया जाता था। लोगों के विश्वास और पत्रकारिता की विश्वसनियता ने ही इसे चौथे स्तंभ के रूप में ख्याति दिलाई थी। पर अब यह बातें कथा कहानियों में अच्छी लग रही है। आज मीडिया को सीधी चुनौती मिल रही है। चुनौती दे रहा है आधुनिक तंत्र, जो सोशल मीडिया के नाम से हमारे बीच मौजूद है। सोशल मीडिया ने मीडिया को एक ऐसे दोराहे पर ला खड़ा किया है जहां विश्वास, विश्वसनियता के बाद अब विवशता ने अपना स्थान बना लिया है।
पूरा भारत मुख्यत: दो विचारधाराओं में बंट गया है। एक विचारधारा वह है जो मोदी के सपोर्ट में है। दूसरी विचारधारा वाले मोदी के विरोधी हैं। एक ब्रिटीश अखबार ने हाल में लिखा कि यह मोदी युग है, जिसमें दो विचारधाराओं के बीच लड़ाई है। यह काफी हद तक सच भी है। पर इन सबसे ऊपर मीडिया पर खतरे बढ़ गए हैं। अगर आप मोदी सरकार के काम काज या प्रधानमंत्री मोदी के बेहतर विजन पर कुछ लिखते हैं, प्रोग्राम बनाते हैं या बहस करते हैं तो आपके ऊपर बीजेपी के प्रवक्ता होने का ठप्पा लग जाता है। आपको भक्त की संज्ञा दे दी जाती है। अगर आपने मोदी सरकार के कामकाज पर सवालिया निशान लगा दिया तो आपके अखबार या चैनल को कांग्रेस पोषित बता दिया जाएगा। अगर आप पत्रकारिता के जाने पहचाने चेहरे हैं तो सोशल मीडिया पर आपकी वो आरती उतारी जाएगी कि आप खुद को पहचान नहीं पाएंगे। भूल से भी अगर आपने केजरीवाल के ट्वीट को री-ट्वीट कर दिया तो फिर तो पूछिए मत।

यह मीडिया और मीडियाकर्मियों दोनों के लिए संक्रमण का काल है। यह संक्रमण कैसे और कब प्रवेश कर गया है पता नहीं। पर धीरे-धीरे यह संक्रमण मीडिया की विश्वसनियता को निश्चित तौर पर कम कर रहा है। सोशल मीडिया की ताकत ने बड़े ही शातिराना अंदाज में इस विश्वसनियता के ऊपर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आपकी हर एक खबर, हर एक प्रोग्राम, हर एक बहस, हर एक आर्टिकल पर सोशल मीडिया नजरें गड़ा कर बैठा है। आपने कुछ गलत किया नहीं कि सोशल मीडिया आपकी क्लास लेनी शुरू कर देगा। यह सब बड़े ही प्लान तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। सभी पार्टियों, संगठनों ने अपने यहां साइबर सेना बना रखी है। इस साइबर सेना के सिपाही बेहद पढ़े लिखे, टेक्नो फ्रेंडी युवा हैं। इस साइबर सेना का बस एक ही काम है मीडिया की निगरानी। कब किस मुद्दे को और किस बात को ट्रेंड करवाना है यह इन्हें बखूबी आता है। इन्हें सिर्फ इंतजार रहता है अपने सेनापतियों के दिशा-निर्देशों का। यह साइबर सेना ट्रेंड सेट करती है। इसके बाद आम लोग इसे सत्य मानकर सोशल मीडिया की उलझनों भरी दुनिया में कूद पड़ते हैं।
भारतीय संविधान के बाद साइबर एक्ट ने भी सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों को फ्रीडम आॅफ एक्सप्रेशन के नाम से ऐसी स्वतंत्रता दे दी है जिसने सबकुछ उल्टा पुल्टा कर दिया है। यह अच्छी बात है कि सोशल मीडिया ने आम लोगों को काफी ताकतवर बना दिया है। पर सबसे अधिक खतरा मीडिया पर है। अपनी जर्नलिस्टिक एथिक्स के कारण जिन बातों को मीडिया प्रकाशित नहीं कर सकती या दिखा नहीं सकती है वह सोशल मीडिया पर इस कदर गदर मचाती है कि मीडिया की विश्वनियता धरी की धरी रह जाती है। आज सोशल मीडिया पर हर एक व्यक्ति पत्रकार बन चुका है। फोटोजर्नलिस्ट बन चुका है। ऐसे में मंथन जरूरी हो जाता है कि मीडिया की साख को कैसे सुरक्षित रखा जाए।

मीडिया के लिए सबसे अहम बात यह है कि इसमें आलोचना की स्वतंत्रता है। किसी दूसरे प्रोफेशन में आप इसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं। सिर्फ मीडिया एक ऐसा प्रोफेशन बचा है जहां मीडियाकर्मी खुद एक दूसरे की कमियों पर बात करते हैं। खुलकर चर्चा और लड़ाई करते हैं। चाहे चैनलों के राष्टÑभक्त होने की बात हो या फिर मीडियाकर्मियों के मोदी भक्त होने की बात हो, हर तरफ बहस की स्वतंत्रता है। हालांकि आम पाठक और दर्शकों को इससे कोई मतलब नहीं होता है, फिर भी यह आलोचना खुले आम होती है। टीवी के परदे पर होती है सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर होती है। सोशल मीडिया की दिन ब दिन मजबूत होती ताकत के बीच यह यक्ष प्रश्न मीडिया के सामने आ चुका है कि वह अपनी ताकत, अपनी विश्वसनियता, अपने तेवर को कैसे संरक्षित करे। संक्रमण के इस दौर में वह कौन सी युक्ति अपनाई जाए कि दर्शकों और पाठकों का विश्वास भी कायम रहे और सरकार की ‘बुरी नजरों’ से बचा जा सके। मंथन करने के बाद अगर आपके पास भी कोई युक्ति हो तो मीडिया से जरूर साझा करे। नहीं तो सोशल मीडिया तो है ही।


Saturday, July 30, 2016

हरक सिंह रावत पर रेप का केस.... वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गई

...आइए आपको बताऊं सेक्स स्कैंडल में फंसे उत्तराखंड के कद्दावर नेता हरक सिंह रावत से जुड़ी क्या है वह भूली दास्तां.. जब मैं देहरादून में था। वह सेक्स और राजनीति का कॉकटेल था...
New Published 11 April 2013

कहते हैं राजनीति में मुर्दों को भी जिंदा रखा जाता है। वक्त पड़ने पर उन्हें कब्र से बाहर लाया जाता है और फिर उस पर गेम प्लान होता है। उत्तराखंड की राजनीति में सेक्स का तड़का भी ऐसा ही गड़ा मुर्दा है। हरीश रावत को सत्ता से बेदखल करने की साजिश रचने वाले हरक सिंह रावत अब ऐसे ही एक गड़े मुर्दे की गिरफ्त में आ चुके हैं। उनके ऊपर दिल्ली के सफदरगंज इनक्लेव थाने में एक महिला ने रेप का मामला दर्ज करवाया है।
आप पूछेंगे इसमें नई कौन सी बात है। राजनेताओं पर तो मामले दर्ज होते ही रहते हैं वह भी उत्तराखंड में तो सेक्स के कॉकटेल पर राजनीति बहुत पुरानी है। तो जनाब बता दूं। यह मामला उतना भी सीधा नहीं है। पता नहीं उत्तराखंड की मीडिया इसे कैसे लेगी। पर बता दूं कि इस सेक्स स्कैंडल से जुडेÞ बेहद अहम कड़ियों का खुलासा हमने तीन साल पहले ही कर दिया था।
उस वक्त मैं दैनिक जागरण के आईनेक्स्ट अखबार का संपादकीय प्रभारी था। क्राइम रिपोर्टर थे मयंक राय। मयंक इन दिनों ई-टीवी उत्तराखंड में हैं। मयंक के पास किसी सूत्र के जरिए यह जानकारी आई थी कि कांग्रेस के एक बड़े नेता पर एक महिला ने रेप का आरोप लगाया है। फिर हमलोगों ने इस मामले पर बेहद गहराई से पड़ताल की थी। बेहद संगीन मामला होने के कारण एक-एक पहलू पर जांच करने के बाद हमने यह खबर प्रकाशित की थी। इतनी सावधानी इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि मामला उत्तराखंड के सबसे कद्दावर नेता हरक सिंह रावत के बारे में थी। यह वही हरक सिंह रावत थे जो 2004 में जेनी कांड में फंसे थे। जेनी ने भी हरक सिंह रावत पर रेप का आरोप लगाया था। खैर हमने इस मामले के एक-एक पहलू की जांच की और खबर प्रकाशित की।
हमने बताया कि कैसे उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर सेक्स स्कैंडल ने दस्तक दे दी है। हमने यहां तक खुलासा किया था कि इस मामले को दबाने के लिए उस युवती को दिल्ली के सफदरगंज इनक्लेव में करीब डेढ करोड़ का फ्लैट खरीद कर दिया गया है। तीन से चार किस्तों में हमने इसे पूरे प्रकरण से जुड़े एक-एक पहलू को खोला था। हालांकि स्वीकार करता हूं कि उस वक्त कांग्रेस नेता का नाम और उस युवती के नाम का खुलासा करने में हमारे सामने पत्रकारिता के एथिक्स आड़े आ गए थे। नेता जी का नाम का खुलासा एक शर्त पर किया जा सकता था, अगर उस  लड़की ने नेता जी के नाम से एफआईर दर्ज कराई होती। पर अफसोस ऐसा नहीं हो सका। पर समझने वाले समझ गए थे कि मामला किस कद्दावर नेता से जुड़ा है। उस वक्त उत्तराखंड की राजनीति में जबर्दस्त तूफान आया था। लेकिन जिस तरह तूफान आता है और थम जाता है। ठीक उसी तरह यह तूफान भी थम गया।
News Published 12 April 2013

थम इसलिए गया था कि मामले को बेहद शातिराना तरीके से मैनेज कर लिया गया था। युवती को भी मैनेज कर लिया गया था। थम इसलिए भी गया था क्योंकि युवती ने अपने साथ हुए ‘सो कॉल्ड रेप’ का मामला दर्ज नहीं करवाया था। छानबीन की जाए तो पता चल जाएगा कि उस वक्त उसी युवती ने सफदरगंज इनक्लेव थाने में जाकर फरियाद की थी। अब यह कहने में जरा भी हिचक नहीं है कि वह फरियाद कहीं न कहीं हरक सिंह रावत को ब्लैकमेल करने के लिए की गई थी।
अब करीब तीन साल बाद उसी सफदरगंज इन्क्लेव में एक युवती द्वारा हरक सिंह रावत पर रेप का केस दर्ज करवाया गया है। आज सुबह जैसे ही मेरे मोबाइल पर दिल्ली से इस मामले को लेकर कॉल आई मैं हैरान रह गया। फोन करने वाले ने मुझे इसलिए फोन किया था, क्योंकि वह उस वक्त का गवाह है जब इसी युवती ने मामले को लेकर मुझे और मयंक को कोर्ट में घसीटने की धमकी दे डाली थी। कांग्रेस के उस वक्त के कुछ बड़े लोगों ने भी हमें शांत रहने की नसीहत दे डाली थी। अब सबकुछ साफ है।
News Published 5 May 2013

मुझे पता नहीं हरक सिंह रावत इस मामले से कैसे बचकर निकलेंगे। हालांकि उनका इस तरह के मामलों में पुराना अनुभव रहा है। वे बेदाग होकर निकल जाएंगे। पर हरीश रावत को सत्ता से उतारने के प्रयास के बाद उनका इस तरह बचकर निकलना इतना आसान भी नहीं होगा। अभी आगे क्या होगा कह नहीं सकता, लेकिन अनुभव के आधार पर कहूं तो हरक को घेरने के लिए यह बेहद शातिर चाल चलने वाला हरक का ही करीबी है। जल्द ही सामने आ भी जाएगा।
फिलहाल युवती ने सफदरगंज इन्क्लेव थाने में बताया है कि वह आसाम की रहने वाली है और हरक सिंह रावत ने उससे दो साल पहले सफदरगंज इनक्लेव के ही फ्लैट में रेप किया है। पर आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि यह महिला कोई और नहीं पंजाब की वही सिंगर है जिसकी चर्चा हमेशा उत्तराखंड में होती है। देहरादून के सहस्रधारा में इसका अपना फ्लैट भी है।
इंतजार करिए अभी और भी खुलासे होंगे। पर इस वक्त मुझे बेहद फक्र है कि हमने जो खबर प्रकाशित की थी उसकी बुनियाद सच के दम पर रखी गई थी। मयंक राय को भी बधाई देना चाहूंगा कि जब तक उसने मेरे साथ काम किया खोजी पत्रकारिता का रोज नया इतिहास ही लिखता गया। उम्मीद करता हूं वह जहां भी है इसी तरह अपनी खोजी पत्रकारिता के जरिए अपनी पहचान कायम रखेगा।

Thursday, July 28, 2016

कश्मीर की घाटियां....यहां आतंकी आंदोलनकारी कहे जाते हैं

 कश्मीर की घाटियों के रहस्य और रोमांच- दूसरा भाग
  
कश्मीर की घाटियों में कारगिल से होते हुए द्रास और फिर सोनमर्ग पहुंचे मनमीत की बातें। मनमीत ने बताया कैसे यहां पाकिस्तान प्रयोजित आतंकियों को आंदोलनकारी बताने पर उसे घुटन होने लगी और हां यह भी जान जाइए कश्मीर की घाटियों में भी पुलिस का चरित्र वैसा ही है। 

करगिल से गुजरते वक्त

करगिल में सुबह काफी सर्दी थी। चारों तरफ पहाड़ियों में कोहरा लगा था। पाकिस्तानी चेकपोस्ट वाली पहाड़ी में भी। मैं जल्दी ही करगिल छोड़ कर शाम तक सोनमर्ग पहुंचना चाहता था। जो वहां से 201 किलोमीटर दूरी पर था। केवल गर्म काबा पीने के बाद मैंने करगिल पीछे छोड़ दिया और साथ ही छोड़ दी चौड़ी और अच्छी सड़क। इसके बाद की सड़क कहीं कहीं बेहद संकरी और अत्याधिक खराब है। नीचे बह रही सुरू नदी कई बार डरा भी देती है। 
करगिल से कुछ ही आगे निकलने के बाद मुझे सेब के बगीचे दिखने शुरू हो गए। ज्यादातर बगीचे सड़क से लगते हुए ही हैं। सड़क किनारे एक सेब का बगीचा कुछ असामान्य सा लगा तो मैंने जीप रोक ली। ध्यान से देखा तो बगीचे के बीचों बीच कंकरीट की छत से ढका एक गड्डा था। जिसके दो तरफ से छोटी सी खिड़की थी और खिड़की के बाहर नली नुमा चीज निकली हुई थी। गौर से देखने पर मैं समझ गया और आगे बढ़ने में भलाई समझी। वो एक बंकर था और वो नली एलएमजी की नाल थी। नाल गांव की तरफ थी। 

अब मंजर बदलने लगा था। हर तरफ फौज, एलएमजी, बंकर और पेड़ पर छुपे बैठै स्नाइफर। यहां तैनात फौजी काले कपड़े से पूरा मुंह छुपाते हैं। यहां तक की कमिशन आॅफिसर भी। कोई अपनी पहचान गांव वालों को नहीं बताता। एक अनजाना डर फौजियों में भी दिखता है और गांववासियो में भी। तीन घंटे बाद कक्सार पहुंचा। कक्सार में जीप बाजार में खड़ी कर सोचा थोड़ा गांव घूम आता हूं। बाजार से थोड़ा ऊपर एक पगडंडी नुमा रास्ता जा रहा था। मुझे किसी ने बताया कि वहां इंटर कॉलेज है, जिसमें आज ब्लॉक स्तरीय फुटबॉल मैच चल रहा है। मुझे लगा वहां कुछ लोग मिल जाएंगे बातें करने के लिए। लिहाजा, मैंने पगडंडी पकड़ ली। मुश्किल से सात सौ मीटर चलने पर मैं ग्राउंड की बाउंड्री के बाहर खड़ा था। वहां दो टीमों के बीच मुकाबला पूरे हाई वोल्टेज में था। मैं ग्राउंड के अंदर घुस गया और एक ओर घास में बैठ कर वहां का जायजा लेने लगा। मैंने ग्राउंड के चारों ओर नजर दौड़ाई तो मुझे फिर से कई असामान्य चीजें दिखीं। मसलन, चारों तरफ बख्तर बंद वाहन और उसके अंदर बैठै स्नाइफर। हर तरह काला कपड़ा मुंह से ढके फौजी और बेपरवाह खेलते खिलाड़ी। वहां मैंने एक बुजुर्ग से बातचीत शुरू की। नाम अब याद नहीं उनका। उन्होंने मुझे बताया कि फौज तो रहती है, लेकिन आज कुछ ज्यादा इसलिए भी है क्योंकि मीडिया ने आर्र्मी के हवाले से ही खबर दी है कि इन पहाड़ियों में आतंकवादियों (उसने आंदोलनकारी कहा) का मूवमेंट देखा गया है। 

मुझे वहां अजीब सी घुटन होने लगी और मैं नीचे चला आया। सुंदर और बर्फ से लकदक पहाड़ियों के बीच मुझे पहली बार घुटन हो रही थी। नीचे ड्राइवर जीप में बैठकर चाय पी रहा था। मैं बगल वाली सीट पर बैठ गया और जीप चलने लगी। उसके बाद कुछ ही देर बाद में करगिल वॉर मेमारियल के बाहर था। करगिल वॉर मेमोरियल तोलोलिंग की पहाड़ी के नीचे स्थित है और यहां पर युद्व के दौरान के सभी हथियार रखे हुए हैं। यहां पर कैप्टन थापा भी मिले, जिनका परिवार दून के गढ़ीकैंट में रहता था। यहां से सामने दिखता है टाइगर हिल। भारत की शान। जिसे पाकिस्तानी कब्जे से छुड़ाने में भारत के कई जवानों को शहादत देनी पड़ी। वॉर मेमोरियल में एक घंटा गुजारने के बाद बीस किलोमीटर आगे ही द्रास सेक्टर पहुंचा। रास्ते में हर तरफ बख्तर बंद वाहन और ग्रेनेड और एके 47 से लैस फौजी दिखने अब आम बात हो गई थी। फौजियों की एकके 47 पर चिपकी उंगलियां बता रही थी कि कितना टेंशन में वो यहां इन सुंदर वादियों के बीच रहते हैं। दोपहर ढाई बजे दाचीगाम पहुंचा। ये गांव कुछ अपने गांव की तरह लगा। छोटी छोटी दुकानें और ढालूनुमा घरों की छतें। खूबसूरत लोग। महिलाएं भी निश्चित तौर पर खूबसुरत होंगी, लेकिन वो बुर्के में थी। साफ सुधरे कपड़े। सेब के बगीचे उनकी उन्नति का रास्ता कई दशक पहले खोल चुके थे। सेब की रेड डिलीसियस और गोल्डन डिलीसियस प्रजाति सबसे मीठी यहीं पाई जाती है। गांव में एक घर सजा हुआ था। पास जाकर देखा तो वहां शादी समारोह हो रहा था। फिर जो दिखा, वो फिर से बेचैन कर गया। 

विवाह वाले घर की छत में स्नाइफर काला कपड़ा मुंह से ढका छुपा हुआ था। जिस चबुतरे में विवाह की रश्में हो रही थी, उसके बगल में बख्तर बंद वाहन खड़ा था। जिसके अंदर से एलएमजी की नली बाहर लोगों की जश्न मनाती भीड़ में तनी हुई थी। उफ..... क्या लोग हैं, मेरा ड्राइवर बुदबुदाया। शाम पांच बजे जोजिला दर्रा को पार करते हुए मेरे और ड्राइवर के बीच कोई बात नहीं हुई। सड़क पर जमी बर्फ से कई बार जीप का टायर फिसल जाता और नीचे सैकड़ों फीट खाई दिखती। जब दर्रा पार हो गया तो दोनों ने एक लंबी सांस बाहर छोड़ी और एक दूसरे की तरफ देखते हुए बस मुस्करा दिए। हम सात बजे सोनमर्ग पहुंचे।

 इस दौरान लगभग आठ चेकपोस्ट हमने पार की। हर चेकपोस्ट में फौजी वाहन की चेकिंग करते हैं और पुलिस के जवान वाहन के कागज।   फौजी अपना काम करके किनारे हो जाते है, लेकिन पुलिस का जवान आपको आगे जाने से रोक देगा। वो बतायेगा कि आगे रोड खराब है और जम्मू कश्मीर में तीन बजे के बाद बाहर से आने वाले वाहनों को आगे जाने नहीं दिया जाता। काफी मानमनोव्वल के बाद आप उसे दो सौ रुपये दिजीये और आगे बढ़ जाइये। आर्र्मी का जवान पुलिस की तरफ से मुंह मोड़ लेगा। मानो एक मौन स्वीकृति दे रहा हो। हर चेकपोस्ट में रुपये भेंट चढ़ाने के दौरान यही सोचता की पुलिस का चरित्र पूरे भारत में एक सा है। हम खामंखा यूपी या उत्तराखंड पुलिस को लानते देते हैं।
जारी--