Thursday, July 28, 2016

कश्मीर की घाटियां....यहां आतंकी आंदोलनकारी कहे जाते हैं

 कश्मीर की घाटियों के रहस्य और रोमांच- दूसरा भाग
  
कश्मीर की घाटियों में कारगिल से होते हुए द्रास और फिर सोनमर्ग पहुंचे मनमीत की बातें। मनमीत ने बताया कैसे यहां पाकिस्तान प्रयोजित आतंकियों को आंदोलनकारी बताने पर उसे घुटन होने लगी और हां यह भी जान जाइए कश्मीर की घाटियों में भी पुलिस का चरित्र वैसा ही है। 

करगिल से गुजरते वक्त

करगिल में सुबह काफी सर्दी थी। चारों तरफ पहाड़ियों में कोहरा लगा था। पाकिस्तानी चेकपोस्ट वाली पहाड़ी में भी। मैं जल्दी ही करगिल छोड़ कर शाम तक सोनमर्ग पहुंचना चाहता था। जो वहां से 201 किलोमीटर दूरी पर था। केवल गर्म काबा पीने के बाद मैंने करगिल पीछे छोड़ दिया और साथ ही छोड़ दी चौड़ी और अच्छी सड़क। इसके बाद की सड़क कहीं कहीं बेहद संकरी और अत्याधिक खराब है। नीचे बह रही सुरू नदी कई बार डरा भी देती है। 
करगिल से कुछ ही आगे निकलने के बाद मुझे सेब के बगीचे दिखने शुरू हो गए। ज्यादातर बगीचे सड़क से लगते हुए ही हैं। सड़क किनारे एक सेब का बगीचा कुछ असामान्य सा लगा तो मैंने जीप रोक ली। ध्यान से देखा तो बगीचे के बीचों बीच कंकरीट की छत से ढका एक गड्डा था। जिसके दो तरफ से छोटी सी खिड़की थी और खिड़की के बाहर नली नुमा चीज निकली हुई थी। गौर से देखने पर मैं समझ गया और आगे बढ़ने में भलाई समझी। वो एक बंकर था और वो नली एलएमजी की नाल थी। नाल गांव की तरफ थी। 

अब मंजर बदलने लगा था। हर तरफ फौज, एलएमजी, बंकर और पेड़ पर छुपे बैठै स्नाइफर। यहां तैनात फौजी काले कपड़े से पूरा मुंह छुपाते हैं। यहां तक की कमिशन आॅफिसर भी। कोई अपनी पहचान गांव वालों को नहीं बताता। एक अनजाना डर फौजियों में भी दिखता है और गांववासियो में भी। तीन घंटे बाद कक्सार पहुंचा। कक्सार में जीप बाजार में खड़ी कर सोचा थोड़ा गांव घूम आता हूं। बाजार से थोड़ा ऊपर एक पगडंडी नुमा रास्ता जा रहा था। मुझे किसी ने बताया कि वहां इंटर कॉलेज है, जिसमें आज ब्लॉक स्तरीय फुटबॉल मैच चल रहा है। मुझे लगा वहां कुछ लोग मिल जाएंगे बातें करने के लिए। लिहाजा, मैंने पगडंडी पकड़ ली। मुश्किल से सात सौ मीटर चलने पर मैं ग्राउंड की बाउंड्री के बाहर खड़ा था। वहां दो टीमों के बीच मुकाबला पूरे हाई वोल्टेज में था। मैं ग्राउंड के अंदर घुस गया और एक ओर घास में बैठ कर वहां का जायजा लेने लगा। मैंने ग्राउंड के चारों ओर नजर दौड़ाई तो मुझे फिर से कई असामान्य चीजें दिखीं। मसलन, चारों तरफ बख्तर बंद वाहन और उसके अंदर बैठै स्नाइफर। हर तरह काला कपड़ा मुंह से ढके फौजी और बेपरवाह खेलते खिलाड़ी। वहां मैंने एक बुजुर्ग से बातचीत शुरू की। नाम अब याद नहीं उनका। उन्होंने मुझे बताया कि फौज तो रहती है, लेकिन आज कुछ ज्यादा इसलिए भी है क्योंकि मीडिया ने आर्र्मी के हवाले से ही खबर दी है कि इन पहाड़ियों में आतंकवादियों (उसने आंदोलनकारी कहा) का मूवमेंट देखा गया है। 

मुझे वहां अजीब सी घुटन होने लगी और मैं नीचे चला आया। सुंदर और बर्फ से लकदक पहाड़ियों के बीच मुझे पहली बार घुटन हो रही थी। नीचे ड्राइवर जीप में बैठकर चाय पी रहा था। मैं बगल वाली सीट पर बैठ गया और जीप चलने लगी। उसके बाद कुछ ही देर बाद में करगिल वॉर मेमारियल के बाहर था। करगिल वॉर मेमोरियल तोलोलिंग की पहाड़ी के नीचे स्थित है और यहां पर युद्व के दौरान के सभी हथियार रखे हुए हैं। यहां पर कैप्टन थापा भी मिले, जिनका परिवार दून के गढ़ीकैंट में रहता था। यहां से सामने दिखता है टाइगर हिल। भारत की शान। जिसे पाकिस्तानी कब्जे से छुड़ाने में भारत के कई जवानों को शहादत देनी पड़ी। वॉर मेमोरियल में एक घंटा गुजारने के बाद बीस किलोमीटर आगे ही द्रास सेक्टर पहुंचा। रास्ते में हर तरफ बख्तर बंद वाहन और ग्रेनेड और एके 47 से लैस फौजी दिखने अब आम बात हो गई थी। फौजियों की एकके 47 पर चिपकी उंगलियां बता रही थी कि कितना टेंशन में वो यहां इन सुंदर वादियों के बीच रहते हैं। दोपहर ढाई बजे दाचीगाम पहुंचा। ये गांव कुछ अपने गांव की तरह लगा। छोटी छोटी दुकानें और ढालूनुमा घरों की छतें। खूबसूरत लोग। महिलाएं भी निश्चित तौर पर खूबसुरत होंगी, लेकिन वो बुर्के में थी। साफ सुधरे कपड़े। सेब के बगीचे उनकी उन्नति का रास्ता कई दशक पहले खोल चुके थे। सेब की रेड डिलीसियस और गोल्डन डिलीसियस प्रजाति सबसे मीठी यहीं पाई जाती है। गांव में एक घर सजा हुआ था। पास जाकर देखा तो वहां शादी समारोह हो रहा था। फिर जो दिखा, वो फिर से बेचैन कर गया। 

विवाह वाले घर की छत में स्नाइफर काला कपड़ा मुंह से ढका छुपा हुआ था। जिस चबुतरे में विवाह की रश्में हो रही थी, उसके बगल में बख्तर बंद वाहन खड़ा था। जिसके अंदर से एलएमजी की नली बाहर लोगों की जश्न मनाती भीड़ में तनी हुई थी। उफ..... क्या लोग हैं, मेरा ड्राइवर बुदबुदाया। शाम पांच बजे जोजिला दर्रा को पार करते हुए मेरे और ड्राइवर के बीच कोई बात नहीं हुई। सड़क पर जमी बर्फ से कई बार जीप का टायर फिसल जाता और नीचे सैकड़ों फीट खाई दिखती। जब दर्रा पार हो गया तो दोनों ने एक लंबी सांस बाहर छोड़ी और एक दूसरे की तरफ देखते हुए बस मुस्करा दिए। हम सात बजे सोनमर्ग पहुंचे।

 इस दौरान लगभग आठ चेकपोस्ट हमने पार की। हर चेकपोस्ट में फौजी वाहन की चेकिंग करते हैं और पुलिस के जवान वाहन के कागज।   फौजी अपना काम करके किनारे हो जाते है, लेकिन पुलिस का जवान आपको आगे जाने से रोक देगा। वो बतायेगा कि आगे रोड खराब है और जम्मू कश्मीर में तीन बजे के बाद बाहर से आने वाले वाहनों को आगे जाने नहीं दिया जाता। काफी मानमनोव्वल के बाद आप उसे दो सौ रुपये दिजीये और आगे बढ़ जाइये। आर्र्मी का जवान पुलिस की तरफ से मुंह मोड़ लेगा। मानो एक मौन स्वीकृति दे रहा हो। हर चेकपोस्ट में रुपये भेंट चढ़ाने के दौरान यही सोचता की पुलिस का चरित्र पूरे भारत में एक सा है। हम खामंखा यूपी या उत्तराखंड पुलिस को लानते देते हैं।
जारी--


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