Saturday, May 2, 2020

मानो या न मानो : श्रमिकों का यह हाल कोरोना का सबसे खतरनाक काल है


शुक्रवार  जब सुबह लिंगमपल्ली से झारखंड के लिए पहली ट्रेन रवाना हुई तो सहसा किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। फिर धीरे-धीरे सोशल मीडिया के जरिए ट्रेन की वीडियो सामने आने और आधिकारिक बयान आने के बाद स्पष्ट हो गया कि यह सच है। मजदूर दिवस पर मजदूरों के लिए इससे बड़ी खुशी की कोई बात नहीं हो सकती थी। पर एक सवाल मेरे मन में कौंध रहा था, आखिर ऐसी क्या बात हुई कि लिंगलमपल्ली के मजदूरों पर सरकार अचानक इतनी मेहरबान हो गई। मेहरबान भी ऐसे कि कानो कान किसी को खबर ही नहीं लगी और ट्रेन अपने गंतव्य को 1233 मजदूरों को लेकर निकल भी गई।

दिनभर खबर के पीछे लगा रहा। सफलता हाथ लगी शाम पांच बजे। लिंगमपल्ली मंे इस गोपनीय ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचाने में जिस अधिकारी ने भूमिका निभाई उससे बात हो सकी। बहुत सारी बातें उन्होंने बताई। मजदूरों के रोने से लेकर उनके अभिनंदन तक की कहानी बयां की। बहुत देर बाद जब पूछा कि आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां बनीं कि अचानक से सरकार मेहरबान हो गई थी। तो उन्होंने हिचकिचाते हुए सच्चाई बयां की। बताया कि अगर इन मजदूरों को यहां से नहीं भेजा जाता तो कुछ भी बड़ा हो सकता था। दरअसल जिस प्रोजेक्ट में ये मजदूर लगे थे वहां काम पिछले 35 दिनों से बंद था। शुरुआत में तो जैसे तैसे इन मजदूरों ने काम चला लिया। पर जब पैसे खत्म हो गए तो हिंसा कर बैठे। कंपनी कार्यालय में जबर्दस्त तोड़ फोड़ हुई। पुलिस पर हमला हुआ। गाड़ियां तोड़ दी गईं। तीन पुलिसकर्मी अभी हॉस्पिटल में हैं। यह घटना बुधवार को हुई थी। स्थिति इतनी तनावपूर्ण थी कि कभी भी कुछ हो सकता था।

ऐसे में आप आसानी से समझ सकते थे कि कहानी क्या हुई होगी। अगर तेलांगना सरकार इन मजदूरों पर मुकदमा दर्ज कराती तो स्थिति और विकट होती। रोकने का कोई कारण था नहीं, कंपनी वाले पहले ही हाथ खड़े कर चुके थे। ऐसे में एक मात्र विकल्प था इन्हें वापस इनके राज्य भेज दिया जाए। हुआ भी ऐसा ही। मजदूर खुश, वो अपने घर पहुंच गए। स्थानीय प्रशासन भी खुश, चलो बला टली। झारखंड सरकार खुश कि हर जगह उनकी तारीफ हो रही है क्योंकि पूरा देश देखता रह गया और उन्होंने मजदूरों की घर वापसी करवा ली।

अब इस कहानी को थोड़ा आगे लेकर जाएं। शुक्रवार को कई और श्रमिक स्पेशल ट्रेन चल चुकी। खबर जंगल में आग की तरह फैली और आज सुबह से हरियाणा, सूरत, चेन्नई, गुजरात, कश्मीर में मजदूरों के प्रदर्शन शुरू हो गए। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक में फंसे प्रवासी मजदूर बेचैन हैं। महसूस करिए उनकी बेचैनी को। वो दूसरे प्रदेश में खुद को अनाथ महसूस कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि यहां रहेंगे तो मर जाएंगे। आखिर उनकी स्थिति ऐसी क्यों हो गई है। कोई रेल की पटरी के सहारे पैदल ही अपने गांव की ओर निकला है। कोई रेहड़ी और साइकिल से अपने परिवार को लेकर चल पड़ा है।

जरा महसूस करिए मजदूरों के अंदर मौजूद उस भय को। क्या हमारी राज्य सरकारों के पास इतना भी सामर्थ्य नहीं कि वो इन्हें दिलासा दे सके कि उनका हम ख्याल रखेंगे। आप मत जाएं। यहीं रूकें। क्या हमारी सरकारें इतनी नाकाम हैं कि दो वक्त की रोटी न खिला सके। पर अफसोस सभी की कलई खुल गई है।

सबसे निष्ठुर तो इंडस्ट्री के वो लोग निकले जिन्होंने इन मजदूरों को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया। जिन मजदूरों के दम पर सालों से करोड़ों रुपए कमाए उन्हें एक महीने में पराया कर दिया। यह भी नहीं सोचा कि जब लॉकडाउन खत्म हो जाएगा तो इन्हीं मजदूरों के भरोसे उनकी इंडस्ट्री पटरी पर लौटेगी।
जरा सोचिए जिन पटरियों पर पैदल चल कर मजदूर अपनी जिंदगी को वापस पाने के लिए गांव को निकले हैं क्या वो उन पटरियों की तकलीफदेह यात्रा भूल सकेंगे। क्या वो भूल सकेंगे कि उनके मालिकों ने उनके साथ क्या नीचता दिखाई। यकीन मानिए जितने मजदूरों ने घर वापसी की है उन्होंने दृढ़ निश्चय कर लिया होगा कि चाहे जो हो जाए वापस नहीं लौटेंगे। आने वाले दिनों में अर्थ जगत के हालात को समझिए। कुछ भी इतनी जल्दी पटरी पर नहीं लौटेगा।
अब इसके एक और पहलू को समझिए कि इन मजदूरों को वापस भेजकर कितना बड़ा खतरा उठाया गया है। यूपी की बस्ती से खबर आई है कि महाराष्ट्र से वापस लौटे कई लोग कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। बिहार के सुदूर गांव तक में कोरोना पॉजिटिव मिलने लगे हैं। आने वाले समय में खतरा और कितना बड़ा होता जाएगा कहा नहीं जा सकता है।
पहले रटते रहे कि जो जहां हैं वहीं रहिए। अब ऐसी क्या मजबूरी हो गई कि ट्रेन पर ट्रेन चलाई जा रही है? क्या राज्य सरकारों ने अपनी नाकामी मान ली है कि हम महीने दो महीने लाख दो लाख मजदूरों की देखभाल नहीं कर सकते। या फिर इन सरकारों में यह भय समा गया है कि कभी भी बगावत हो सकती है। जैसा कि हो भी रहा है।

कारण चाहे जो भी हो। पर कोरोना काल में मजदूरों का यह हाल इतिहास के पन्नों में दर्ज हो रहा है। आने वाला कल इन सरकारों से जरूर सवाल करेगा कि जिन श्रमिकों के बल पर तुम अपने यहां विकास का रास्ता खोज रहे थे उन्हें किन रास्तों से दोबारा अपने यहां बुलाओगे। और बुलाओगे तो भी क्या वो मजदूर वापस लौटेंगे, ताकि तुम फिर उन्हें थोड़ा संकट आते बेगाना कर दो। भूखा मरने के लिए छोड़ दो।
अब भी समय है रोकिए मजदूरों को। उन्हें विश्वास दिलाइए सरकार उनके साथ है। उनके खाने की पर्याप्त व्यवस्था करिए। आपदा राहत में हर साल करोड़ों रुपए का जो प्रावधान होता है उसे खर्च करिए। दिल बड़ा करिए। दूसरे प्रदेशों के मजदूरों के भरोसे अपने प्रदेश के विकास की गाड़ी चलाते वक्त जो दिल था उसे खोलिए। नहीं खोलिएगा तो बहुत देर हो जाएगी।

Thursday, November 21, 2019

हां तो.. लानत है ऐसे सेकुलरिज्म पर



बीएचयू पर जवाब ढूंढते मेरे कुछ सामान्य सवाल, आप भी मदद कीजिए

पहला सवाल : सेकुलर होने का मतलब क्या है? क्या सेकुलर होने का मतलब सिर्फ यह है कि दूसरे के धर्म या धार्मिक क्रिया कलापों को बेहुदा या अवैज्ञानिक करार दे दो...! क्या सेकुलर होने का मतलब यह है कि दूसरे के धर्म, धार्मिक क्रिया कलाप, कर्मकांड की हंसी उड़ाओ...! धार्मिक मान्यताओं को न मानो और इसकी खिचड़ी बना डालो।
अरे साहब, सेकुलरिज्म हमें यह नहीं सिखाता कि दूसरे के धर्म या संप्रदाय का अपमान करो। सेकुलरिज्म समझाता है कि दूसरे के धर्म का भी सम्मान करो।


दूसरा सवाल : बीएचयू में आखिर मुस्लिम प्रोफेसर पर नियुक्ति पर हंगामा क्यों?
क्या यह पहली बार हुआ है कि बीएचयू यानी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में किसी मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति हुई है?
इसका जवाब है, नहीं।
बीचएयू की स्थापना काल में ही कई मुस्लिम संप्रदाय के लोगों ने पंडित मदन मोहन मालविय जी का साथ दिया था। वहां से आज तक हजारों मुस्लिम छात्र पढ़कर निकले हैं, जिन्होंने पूरे विश्व में न केवल बीएचयू बल्कि पूरे भारत का मान बढ़ाया है। इसी बीएचयू में सैकड़ों मुस्लिम शिक्षकों ने लंबे समय तक बच्चों को पढ़ाया है।


तीसरा सवाल : फिर आज क्यों वहां एक मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति पर बवाल मचा है?
दरअसल, यह बवाल सिर्फ बीएचयू में नियुक्ति को लेकर नहीं है। सिर्फ एक मुस्लिम प्रोफेसर के संस्कृत पढ़ाने पर नहीं है। यह बवाल एक मुस्लिम प्रोफेसर के उस संकाय में पढ़ाने को लेकर है जहां आज तक के इतिहास में सिर्फ जनेऊधारी हिंदुओं का प्रवेश हुआ है।
इसे आप सबरीमाला मंदिर प्रकरण से जोड़ कर देख सकते हैं। क्यों वहां चंद महिलाएं जबर्दस्ती घुसने की कोशिश कर रही हैं। क्यों हिंदू धर्म उन महिलाओं को वहां जाने की इजाजत नहीं देता। साथ ही इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी पढ़े जाने की जरूरत है।
इसे ऐसे भी समझें कि मुस्लिम महिलाओं का मस्जिद या ईदगाह में जाना वर्जित है। पर क्या सेकुलरिज्म या जेंडर बायसनेस का झंडा बुलंद कर उन्हें वहां जाने की इजाजत दी जा सकती है?


दरअसल, बीएचयू के संस्कृत विभाग के अंतर्गत आने वाले संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में हिंदू धर्म, कर्मकांड, धार्मिक अनुष्ठान सहित हिंदू धर्म के वैज्ञानिक आधार पर शिक्षा-दीक्षा होती है। यहां से निकलने वाले छात्र पूरे विश्व में हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ बड़े-बड़े मंदिर में पुजारी के तौर पर मान्यता पाते हैं।
जो लोग प्रोफेसर फिरोज खान का समर्थन कर रहे हैं, वो अपनी जगह बिल्कुल सही हैं। संस्कृत एक भाषा है, जिसे हर कोई सीख सकता है, पढ़ सकता है। इसका शिक्षक बन सकता है। इन लोगों को समझने की जरूरत है संस्कृत भाषा है, यह धर्म नहीं है।

चौथा सवाल : फिर फिरोज खान को लेकर विरोध क्यों?
इसे आप इस प्रकार समझिए। जरा कल्पना कीजिए कि कोई हिंदू ब्राह्मण जिसे अरबी, फारसी और उर्दू का जबर्दस्त ज्ञान हो वह मदरसे में किसी मुस्लिम छात्र को मौलवी या इमाम बनने की शिक्षा दे सकता है।
या फिर कोई गुरुमुखी का ज्ञाता मुस्लिम व्यक्ति गुरुद्वारे में जाकर ग्रंथी बनने की शिक्षा दे सकता है। नहीं न!
फिर इसे कोई कैसे स्वीकार कर ले कि एक मुस्लिम प्रोफेसर जो संस्कृत का ज्ञाता है और वह बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में नियुक्त हो और वहां के बच्चों को हिंदू धर्म, मूर्ति पूजा सहित कर्मकांड, पुरोहिताई आदि की शिक्षा दे।

दरअसल, धर्म एक भाव है और धार्मिक शिक्षा अंतरभाव से उत्पन्न एक वेग। जिसे जिस धर्म में आस्था है वह उस धर्म की शिक्षा अंतरभाव से दे सकता है। किताबी ज्ञान लेकर ऐसी शिक्षा-दीक्षा नहीं दी जा सकती। बात विषय ज्ञान की नहीं बल्कि श्रद्धा, विश्वास और आस्था की है।

दिक्कत क्या है कि इन दिनों सेकुलरिज्म की व्याख्या करने वालों ने हमें धर्म, संप्रदाय में इस कदर बांट दिया है कि हम एक दूसरे के धर्म को सम्मान देने की जगह उसका अपमान करने में जुट गए हैं। सबरीमाला मंदिर प्रकरण हो या बीएचयू दोनों जगह ऐसा ही हो रहा है। धर्म और धार्मिक मान्यताओं पर प्रहार कर लोग खुद को बहुत बड़ा सेकुूलर घोषित करने में लगे हैं। खासकर जितना हिंदू धर्म और हिंदू धर्म की मान्यताओं का आप मजाक उड़ाएं आप उतने बड़े सेकुलरवादी कहलाएंगे। लानत है ऐसे सेकुलरिज्म पर।
हमें समझना होगा कि सेकुलर होने का मलतब यह नहीं कि आप दूसरे के धर्मों का मजाक बनाएं, उनकी मान्यताओं पर चोट करें। बल्कि सेकुलर का सही अर्थ यह है कि आप दूसरे के धर्म और मजहब का सम्मान करें।


और अंत में ....
मेरे मामा जी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पासआउट हैं। यहां लंबे समय तक उन्होंने पढ़ाया भी। मध्यकालीन भारत उनका सब्जेक्ट था। जब इसमें एमफील कर रहे थे तो उन्हें अनुभव हुआ कि बिना उर्दू फारसी जाने मध्यकालीन भारत को ठीक से समझना कठिन है। उन्होंने बड़ी शिद्दत के साथ इसे सीखा, पढ़ा। जब जेएनयू से पीएचडी कर रहे थे तो रिसर्च वर्क में उन्हें इसी उर्दू फारसी के ज्ञान की बदौलत काफी मदद मिली। कुरान का एक-एक कलमा उन्हें रटा हुआ है। किसी उर्दू के शिक्षक से अच्छा उनका उर्दू-फारसी का ज्ञान है। क्या आप स्वीकार कर लेंगे कि वो किसी मदरसे में इमाम बनने की, कुरान की, या मौलवी बनने की शिक्षा-दीक्षा देने के लिए उपयुक्त हैं।
सिर्फ सेकुलर-सेकुलर मत रटिए। बल्कि सेकुलर बनने का प्रयास करिए। दूसरे के धर्म और मजहब का सम्मान करिए। सेकुलरिज्म की आड़ में बेवजह किसी दूसरे धर्म का मजाक मत बनाइए। धार्मिक आस्था और मान्यताओं को दरकिनार मत करिए। कुछ चीजें परदे में रहती हैं तो अच्छा लगता है। इस परदे को मत हटाइए।

Saturday, November 9, 2019

मुझे खबर नहीं मंदिर जले हैं या मस्जिद... मेरी निगाह के आगे तो सब धुंआ है मियां ...


मुझे खबर नहीं मंदिर जले हैं या मस्जिद.
मेरी निगाह के आगे तो सब धुंआ है मियां ...
शायर  डॉ. राहत इंदौरी ने जब इन पंक्तियों को लिखा होगा तो उनके मनएद में क्या चल रहा होगा यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन आज जब रामजन्म भूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और इसके बाद जिस तरह हिंदुस्तानियों ने संयम और सद्भाव का परिचय दिया, उसने एक नई इबारत जरूर लिख दी है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देकर न्याय की गरिमा बढ़ाई है, वहीं दूसरी तरफ भारत के लोगों ने आपसी प्रेम दिखाकर लोकतंत्र का मान बढ़ा दिया है। पूरे देश को पता है जब मंदिर या मस्जिद जलते हैं तो आम लोगों को सिर्फ धुुंआ ही नजर आता है। पर सियासतदानों के लिए जलते हुए मंदिर और मस्जिद बहुत उपयोगी होते हैं। शनिवार के पूरे दिन के घटनाक्रम पर गभीर मंथन करते हुए यह विचार आया कि हमें सियासती बाजीगरों से दूर रहने की ही जरूरत है।
अयोध्या मामले में जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली थी उसी दिन के बाद से पूरे देश में सांप्रदायिक माहौल को लेकर चिंता जताई जाने लगी थी। सभी राज्य अलर्ट मोड में आ गए थे। सबसे अधिक चिंता उत्तर प्रदेश को लेकर थी। फैसले के एक दिन पहले मुख्य न्यायाधीश ने भी यूपी के उच्च अधिकारियों को बुलाकर सुरक्षा व्यवस्था के पूरे निर्देश दिए थे। पर भारतीयों ने कहीं से भी इस बात का अहसास नहीं होने दिया था कि वो परेशान हैं। वो सामान्य तरीके से थे। फैसला आने के बाद भी लोगों ने इसे बेहद सामान्य तरीके से लिया। बधाई के पात्र हैं सोशल मीडिया के शूर वीर भी। इन शूर वीरों ने भी जिस संयम और सौहार्द का परिचय दिया वह एक नजीर बन गई है। भारतीय सोशल मीडिया आज तक इतना संयमित कभी नहीं रहा, जितना फैसला आने के बाद रहा। यही असली भारतीयता है। इसी आपसी भाईचारे ने हम भारतीयों को आज तक जिंदा रखा है। तमाम आक्रांताओं ने हिंदुस्तान को बर्बाद करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी, लेकिन वे न तो हिंदुस्तान को खत्म कर सके और न यहां के लोगों के अंदर के हिंदुस्तानियत को। इसमें भी दो राय नहीं कि सियासती लोगों ने अपने र्स्वाथों के कारण हिंदू-मुस्लिम के रूप में राजनीतिक रोटी को सेंकना जारी रखा। यही कारण है कि वैमनस्य भी बढ़ा। पर जिनके बीच वैमनस्व बढ़ा उन्हीं लोगों ने इसे दूर भी किया। वो कहते हैं न कि...
...हमारी दोस्ती से दुश्मनी शरमाई रहती है,
हम अकबर हैं हमारे दिल में जोधाबाई रहती है।
गिले-शिकवे जरूरी हैं अगर सच्ची मुहब्बत है,
जहां पानी बहुत गहरा हो थोड़ी काई रहती है।

अयोध्या में राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया है। लंबे विवादों और तमाम सुलह के प्रयासों के बाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है उसने भी राजनीति के कर्णधारों को करारा तमाचा मारा है। राम मंदिर पिछले करीब चार दशकों से भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा है। शायद ही ऐसी कोई राजनीतिक पार्टी हो जिसने इस मुद्दे का राजनीतिक फायदा नहीं उठाया हो। खासकर 1992 के बाद राम मंदिर मुद्दे ने भारतीय राजनीति की धारा को ही बदल कर रख दिया था। सियासी सियारों ने अपनी राजनीति को धार देने के लिए हिंदू मुस्लिमों के बीच एक ऐसी विचारधारा को जन्म दे दिया था जिसमें लोग अपने विवेक का इस्तेमाल करना भूल गए थे। बहुत कुछ खोने के बाद जब इस भूल का अहसास हुआ तो हर तरफ न तो मंदिर जलते दिख रहे थे और न मस्जिद जलते, सिर्फ धुंआ ही दिख रहा था।
इस धुंए में लोगों ने अपने आप को देखा। अपनों को देखा। गंगा-यमुनी तहजीब देखी। फिर जाकर अहसास हुआ कि हम कहां हैं। हम क्या कर रहे हैं। शनिवार का दिन भी कुछ ऐसा ही था। शायद यही कारण था कि लोकतंत्र अपने सच्चे मायनों में सामने था। न्यायतंत्र अपनी जगह सही था और लोकतंत्र के छाते के नीचे हर कोई सिर्फ एक हिंदुस्तानी था। यह देखना कितना सुखद है। राम की जीत हुई और सियासी रावणों का आज अंत हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है कि आज के बाद किसी भी राजनीतिक दल के पास राम मंदिर मुद्दा नहीं होगा। कोई भी दल मंदिर मस्जिद के नाम पर राजनीति चमकाने से पहले चार बार सोचेगा। अगर किसी ने मंदिर मस्जिद के नाम पर बांटने की कोशिश भी की तो हमें एक हिंदुस्तानी बनकर उन्हें करारा जवाब देना होगा। जैसा अभी दिया है।
मंदिर मस्जिद के नाम पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने, देश की अखंडता, एकता, समरसता पर कुठाराघात करने वालों को हिंदुस्तानियों जो करारा जवाब दिया है वह एक नजीर बन गई है। फैसला चाहे जो आता, लेकिन उस फैसले से पहले ही तमाम हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों ने यह बात स्पष्ट कर दी थी कि किसी भी कीमत पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने नहीं दिया जाएगा।

जरा मंथन करिए और सोचिए कि जिस राम मंदिर की वर्षों से सेवा करने वाला एक मुसलमान है। जिस पुरातत्व विभाग के रिपोर्ट को आधार बनाकर कोर्ट ने अपना फैसला दिया है उस रिपोर्ट को बनाने वाला एक मुस्लिम अधिकारी है। मुस्लिम पक्ष का मुकदमा लड़ने वाला वकील एक हिंदू है। ऐसे हिंदुस्तान में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वालों की क्या हैसियत। यह हमारी और आपकी ही जिम्मेदारी है कि इस तहजीब और सद्भाव को बनाएं। सियासत का मूल मंत्र ही है कि लड़वाओ और शासन करो। हमेशा से ऐसा ही होता आ रहा है। पर जब-जब एक आम आदमी ने अपनी अक्ल से काम लिया है ऐसे सियासतदानों को करारा जवाब ही मिला है।
फैसले के बाद जिस तरह ओवैसी जैसे नेताओं ने तीखे बोल से प्रतिक्रिया दी और लोगों को भड़काने का काम किया वो बेहद निंदनीय है। पर लोगों ने जिस समझदारी का परिचय दिया उसका कोई मोल नहीं। मंथन करें कि क्यों नहीं इस अनमोल समझदारी को हर एक हिंदुस्तानी हमेशा दिल में रखे। हमें समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र का आधार राजनीति है, पर राजनीति का आधार सांप्रदायिक नहीं हो सकता। अंत में चलते-चलते मेरे परम प्रिय शायर मुनव्वर राणा की इन चार पंक्तियों को जरूर पढ़ें और हमेशा गुनगुनाते रहें कि..
मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है,
सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है।
तवायफ की तरह अपने गलत कामों के चेहरे पर,
हुकूमत मंदिरों-मस्जिद का पर्दा डाल देती है।

Thursday, October 24, 2019

मोदी मैजिक और भाजपा की "दुर्गति" के मायने


त्वरित टिप्पणी
चुनाव से पहले का दृश्य...सभी कहते रहे : आर्थिक मंदी है, लोग परेशान हैं। आॅटो सेक्टर की बैंड बजी है।

भाजपा के नेता कहते रहे : कहां मंदी है? गाड़ियों की एडवांस बुकिंग ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है। आॅनलाइन शॉपिंग बाजार ने करोड़ों का बिजनेस कर लिया है।

सभी कहते रहे : युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है। सरकारी नौकरियों की भर्ती का रिकॉर्ड सबसे बुरे दौर में है।

भाजपा के नेता कहते रहे : हमने रिकॉर्ड नौकरी दी है। पुरानी सरकारों का रिकॉर्ड निकाल लो, फिर कहना।

मतदान के बाद का दृश्य

एग्जिट पोल कहते रहे : मोदी मैजिक फिर काम कर गया है। हरियाणा और महाराष्ट्र में रिकॉर्ड वोट से भाजपा सरकार बनाएगी।

वोटर्स ने कहा : सिर्फ मोदी मैजिक ही रटते रहोगे या जमीन स्तर पर काम करोगे, अभी टेलर दिखाया है। काम नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में दिल्ली, झारखंड सहित कई राज्यों में चुनाव है। पूरी फिल्म दिखाएंगे।

मोदी सरकार पार्ट-2 के बाद महाराष्ट्र और हरियाणा का विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना था। उम्मीद की जा रही थी कि दोनों ही राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन शानदार रहेगा। हरियाणा को लेकर तो स्थानीय नेतृत्व इतना उत्साह में था कि 75 प्लस से नीचे कोई बात ही नहीं करता था। पर वोटर तो वोटर ही है। उसने सभी नारों की ऐसी हवा निकाली कि सारा समीकरण ही उलट-पलट कर रख दिया। महाराष्ट्र में भी पिछले विधानसभा चुनाव से कम सीट भाजपा को मिली है। इसके अलावा 17 राज्यों में हुए उपचुनाव में भी भाजपा की स्थिति कमजोर हुई है। 52 में से सिर्फ 15 सीट मिलना ब हुत कुछ बयां कर रहा है। यहां तक कि गुजरात में भी भाजपा को वोटर्स ने स्पष्ट संदेश दे दिया है।


दरअसल, यह चुनाव जहां एकतरफ भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ था, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था। कांग्रेस ने तो अपनी लाइफ को रिचार्ज करवा लिया, लेकिन भाजपा की प्रतिष्ठा को गहरा ठेस पहुंचा है। निश्चित तौर पर हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों ही जगह भाजपा सरकार बना लेगी, पर इसके साथ ही पार्टी के लिए आत्ममंथन का दौर जरूर शुरू होगा। आत्ममंथन इस बात पर किया जाना जरूरी है कि आखिर मजबूत स्थिति में रहते हुए पार्टी ने कहां गलती कर दी। कुछ ऐसी ही स्थिति गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार जैसे राज्यों की भी रही है। नागपुर जैसे घोर भाजपा और आरएसएस वाले क्षेत्र में आए चुनावी परिणाम ने कड़ा संदेश दिया है। आरएसएस के गढ़ में इस बार कांग्रेस ने सेंध लगा दी है। इससे पहले हुए 2014 के विधानसभा चुनाव में जहां नागपुर जिले की 12 सीटों में से 11 पर बीजेपी का कब्जा था, लेकिन इस बार यह फासला आधे से भी कम हो गया।
अगर हरियाणा की बात की जाए तो 1982 से लेकर 2009 तक भाजपा ने कुल 47 सीट हासिल की थी, पर 2014 में एक साथ 47 सीटें जीत कर रिकॉर्ड बना लिया। हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में भी दस की दस सीट जीतकर भाजपा ने जता दिया था कि हरियाणा में भाजपा का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। पर अचानक से भाजपा का ग्राफ ऐसा गिरा कि चुनाव परिणाम ने सभी को वास्तविकता के धरातल पर लाकर पटक दिया।


ऐसा नहीं था कि भाजपा को हरियाणा में अपनी ग्राउंड रियलिटी का पता नहीं था, पर राज्य का कोई भी बड़ा नेता इसे स्वीकार नहीं कर रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सात बड़ी चुनावी रैलियों ने भी कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ा। हालात यहां तक खराब हुए कि सरकार के पांच कद्दावर मंत्री भी चुनाव हार गए हैं। हरियाणा में पूरे चुनावी कैंपेन के दौरान भाजपा ने सिर्फ और सिर्फ राष्टÑीय मुद्दों पर ही फोकस किया। राष्टÑीय नेता अगर कश्मीर, धारा 370, पाकिस्तान, अमेरिका आदि पर चर्चा करें तो समझ में भी आता है, लेकिन हाल यह था कि स्थानीय नेता भी चुनावी मंच से केंद्र सरकार का ही राग अलापते रहे।

लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में जमीनी अंतर होता है। जनता राज्य के अंदर अपनी बातों को खोजती है। उसे इस बात से अधिक मतलब नहीं होता है कि कश्मीर में शांति है कि नहीं, वहां व्यापार चल रहा है कि नहीं। उसे इस बात से मतलब होता है कि हमारे राज्य में व्यापारियों का क्या हाल है। युवाओं को रोजगार मिला की नहीं। प्रदेश में महिलाएं और बेटियां सुरक्षित हैं या नहीं। सिर्फ बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ के नारे वोट में तब्दील नहीं हो सकते हैं।
महाराष्ट्र में भी भाजपा निश्चित तौर पर सत्ता में वापसी कर चुकी है। पर यहां भी मोदी मैजिक के भरोसे पार्टी रही है। हालांकि यह कहने में गुरेज नहीं कि यहां मोदी मैजिक फीका ही रहा है। पंकजा मुंडे के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी की भव्य रैली करवाई गई। पर हाल देखिए स्वयं पंकजा मुंडे ही चुनाव हार गई हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे में भी भाजपा ने पूरी मनमानी की। शिवसेना बेबस और खामोश बनी रही। पर अब स्थिति दूसरी है। शिवसेना पूरी हनक के साथ अपनी शर्तों को मनवाने की तैयारी कर चुकी है। 2014 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना और बीजेपी दोनों अलग अलग चुनाव लड़े थे। तब बीजेपी ने 122 सीटें जीती थी और शिवसेना को 63 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। इस बार दोनों मिल कर चुनाव लड़े और शिवसेना फायदे में रही।
कांग्रेस ने निश्चित तौर पर तमाम झंझावतों को झेलते हुए अपना पुराना रंग दिखाया है। महाराष्ट्र, हरियाणा से लेकर भाजपा के गढ़ वाले इलाकों में भी अपनी शानदार धमक दिखाकर कांग्रेस ने जता दिया है कि अभी वह सिर्फ कमजोर हुई थी खत्म नहीं। हरियाणा में तो कांग्रेस ने इतने झंझावत झेले कि कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर ही पार्टी छोड़ गए। पर सोनिया गांधी ने अपनी पुरानी टीम पर भरोसा दिखाया। भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा की जोड़ी ने टिकट बंटवारे से लेकर स्थानीय मुद्दों पर फोकस करते हुए चुनावी कैंपेन को संचालित किया। इसका परिणाम आज सामने है। भले ही अभी सत्ता तक पहुंचने में उसे काफी पापड़ बेलने पड़ जाएंगे, लेकिन एक बात तो तय है कि दमदार विपक्ष के साथ भी वह भारतीय जनता पार्टी को आने वाले समय में चैन से नहीं रहने देगी। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है। हरियाणा कांग्रेस भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना सार्थक योगदान देगा इसकी उम्मीद की जाती है।
इस चुनाव के बाद निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी को आत्ममंथन करते हुए जनता से जुड़ी जमीनी दिक्कतों पर फोकस करना होगा। रोजगार, मंदी जैसे तमाम मुद्दों पर आंकड़ों की बाजीगरी से परे सरकार को ठोस काम करना होगा। नहीं तो मोदी मैजिक के भरोसे बहुत कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है।