Wednesday, February 25, 2015

भूमि अधिग्रहण : विकास और संघर्ष की कहानी

भूमि अधिग्रहण : विकास और संघर्ष की कहानी
अभी हाल ही में झारखंड की यात्रा कर के लौटा हूं। दो शहरों में ज्यादा वक्त बिताया। जमशेदपुर और रांची। ट्रेन यात्रा के दौरान बोकारो स्टील सिटी भी आया। दिल्ली पहुंचा तो अन्ना का आंदोलन भी पूरे चरम पर दिखा। भूमि अधिग्रहण के मामले को लेकर देश भर के किसान गांधी के सत्याग्रह की डगर पर चलते दिखे। भूमि अधिग्रहण के मामले पर भले ही देश भर के लोग मेरी तरह ही कंफ्यूज हैं, पर कुछ बुनियादी बातें हैं जिनसे मेरी तरह शायद आप भी इत्तेफाक रखते हों। अगर समय हो तो पूरा पढ़ें और समझने की कोशिश करें अधिग्रहण के पूरक के रूप में साथ चलते देश के विकास और लोगों के संघर्ष की कहानी को।
पहले बात बोकारो की। भारत की आर्थिक समृद्धि में बोकारो शहर ने काफी कुछ योगदान दिया है। छोटानागपुर पठार पर स्थित यह शहर स्टील सिटी के नाम से प्रसिद्ध है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू ने जब भारत के पहले स्टील प्लांट की परिकल्पना की थी, उसके बाद ही बोकारो की एक अलग पहचान बनी। स्टील प्लांट के लिए छोटानागपुर रियासत की हजारों एकड़ भूमि अधिग्रहित की गई। धीरे-धीरे प्लांट के विस्तार के साथ ही अधिग्रहण बढ़ता गया। क्षेत्र के आदिवासियों को इस अधिग्रहण का मुआवजा कितना मिला इसकी आधिकारिक जानकारी खोजने पर मिल सकती है, पर यहां के लोगों का आर्थिक विकास जरूर हुआ। बोकारो स्टील प्लांड ने समृद्धि और विकास की एक नई इबारत लिखी। हां यह बात दिगर है कि इसी छोटानागपुर पहाड़ से लगते इलाकों में धीरे-धीरे नक्सलवाद ने भी जड़ें जमार्इं। इसके कारणों की व्याख्या भी की जा सकती है। फिलहाल इतना काफी है कि एक तरफ स्टील सिटी के माध्यम से जहां देश विकास के मार्ग पर आगे बढ़ा, वहीं साथ-साथ आदिवासियों ने अपनी समृद्धि, जल, जमीन और जंगल के लिए संघर्ष की शुरुआत भी की।
अब बात जमशेदपुर की। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम के हिस्से में जमशेदपुर आता है। वहां जाकर भी आपको समृद्धता का अनोखा अनुभव होगा। पर सोच-सोच कर दिमाग की बत्ती जलने और बुझने लगेगी कि  कैसे एक कारखाने के लिए एक आद्यौगिक घराने को पूरा का पूरा शहर ही लीज पर दे दिया गया। अंग्रेज सरकार की कृपा से 1907 में इसे बसाया गया। पारसी व्यवसायी जमशेद जी नौशरवान जी टाटा ने इस शहर की परिकल्पना की और इसे मूर्त रूप दिया। खनिज संपदा से भरपूर इस क्षेत्र को पूरी तरह जमशेदजी टाटा को सुपूर्द कर दिया गया। भूमि अधिग्रहण के बाद इस क्षेत्र के लोगों के साथ-साथ दूसरे राज्यों के लाखों लोगों को रोजगार मिला। यह शहर भी भारत के विकास का प्रतीक बना। 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (टिस्को) की स्थापना से इस शहर की बुनियाद पड़ी। इससे पहले यह साक्ची नामक एक आदिवासी गांव हुआ करता था। साक्ची आज समृद्धता का प्रतीक बना हुआ है। हर तरफ अट्टालिकाएं खड़ी हैं, पर आदिवासी खोजे नहीं मिलेंगे आपको। अगर मिल भी गए तो हड़िया (स्थानीय पेय पदार्थ) बेचते या सब्जी की ठेली पर। अधिकतर मजदूर वर्ग भी इन्हीं आदिवासियों में से है।
अब बात करते हैं झारखंड की राजधानी रांची की। रांची तो अपने आप में एक बड़ा शहर है। पर इसी शहर में एक और शहर बसता है जिसे एचईसी के नाम से जाना जाता है। एचईसी का पूरा नाम है हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन। एचईसी को बसाने के लिए इतनी अधिक मात्रा में भूमि अधिग्रहित की गई कि उस एरिया में एक और शहर बसाया जा सकता है। आज भी वहां हजारों एकड़ जमीन खाली पड़ी हैं। इन जमीनों का कोई उपयोग नहीं है। आप जब एचईसी एरिया में प्रवेश करेंगे तो कई एरिया में ऐसा सन्नाटा पसरा मिलेगा जैसे वहां बरसों से कोई नहीं गया हो। 
भले ही विकास के नाम पर इन तीनों शहरों में लाखों एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया हो, पर एक बात जरूर समझने लायक है क्या उन किसानों और आदिवासियों का भला हो पाया, जिनका उस जमीन पर मालिकाना हक था। रांची प्रवास के दौरान झारखंड में पत्रकारिता के प्रमुख आधार स्तंभ माने जाने वाले  हरिनारायण सिंह जी के घर पर भी जाना हुआ। उनके ड्राइंग रूम में बैठी एक महिला को देखते ही आदिवासियों के संघर्ष की एक पूरी किताब सामने नजर आ गई। दयामनी दीदी के नाम से पूरे झारखंड में इनकी पहचान है। कभी आमने-सामने बात नहीं हुई पर सामने देखकर बस उन्हें समझने की कोशिश करता रहा। कैसे आदिवासियों के हक के लिए संघर्ष करते हुए इस औसत कद काठी की महिला ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। दीदी का संघर्ष आज भी जारी है।
जहां तक मेरी औसत समझ है उसके अनुसार साधारण शब्दों में मैं कह सकता हूं कि विकास के लिए भूमि अधिग्रहण जरूरी है, पर उन शर्तों पर नहीं जिससे कुछ लोगों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। देश के विकास में अपना योगदान देते वे इस बात की एहसास खो दें कि कभी वे भी इसी जमीन के लिए जीते थे।
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