Sunday, June 5, 2016

‘राम’ नाम की लूट है, लूट सके तो लूट


भगवान राम ने भले ही कभी सत्ता या जमीन के भोग का लालच नहीं किया। पर कलयुग में उनके नाम को अपने नाम के आगे जोड़कर धर्म की ठेकेदारी करने पर आमदा लोगों ने विध्वंसक स्थिति ला दी है। धर्म के नाम पर, आंदोलन के नाम पर, सत्याग्रह के नाम पर इन राम नामधारी लोगों ने बलवा, हत्या, लूट के अलावा कॉरपोरेट कल्चर तक में अपनी पैठ बना ली है। हद यह है कि सबकुछ देखते हुए, जानते हुए, समझते हुए भी अंधभक्तों की फौज इनके साथ जुटती है। सबसे अहम यह है कि सत्ता की सांठगांठ इन राम नामधारियों को इतनी ऊंची हैसियत तक पहुंचा देती है कि चाहकर भी कोई कुछ नहीं कर पाता है। समय आने पर ऐसे ही लोग अपनी अंधभक्तों की फौज की बदौलत भारतीय कानून व्यवस्था को चुनौती देते हुए गृहयुद्ध का शंखनाद कर देते हैं।
कुछ दिन पहले मथुरा में जो कुछ भी हुआ उसका ट्रेलर कई मौकों पर पहले भी देखा जा चुका है। ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं। पिछले साल ही हरियाणा में बाबा रामपाल का कहर पूरे देश ने देखा था। एक स्वयंभू संत ने किस तरह पूरी हरियाणा सरकार को पंगू बना दिया था। पुलिस और प्रशासन को अपने आगे नतमस्तक कर दिया था। अपने भक्तों के दम पर कोई बाबा इतना शक्तिशाली हो सकता है इसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता था। जिस आश्रम में धार्मिक प्रवचनों के तीर चलते थे, उसी आश्रम से गोलियां बरस सकती हैं यह आश्चर्यजनक था। पूरी तरह ट्रेंड आर्मी की तरह अंधभक्तों की फौज तेजाब और गोला बारूद से लैस होकर हरियाणा पुलिस के खिलाफ मोरचा खोल देती है और हमारी व्यवस्था मुकदर्शक बनी देखती रहती है। जब इनके खिलाफ मोरचा खोला जाता है तो महिलाओं और बच्चों को ढाल की तरह प्रयोग में लाया जाता है। कुछ ऐसा ही नजारा मथुरा में देखने को मिला।
रामवृक्ष यादव नाम का एक शख्स कैसे अपने दम पर स्वयंभू सरकार बन जाता है और संवैधानिक सरकार चुपचाप तमाशा देखती रहती है, यह एक गंभीर मंथन का विषय है। किसी संत के आश्रम से निकाला हुआ व्यक्ति कैसे एक-दो साल के भीतर हजारों अंधभक्तों की फौज जमा कर लेता है। गोला, बारूद, असलहा एकत्र कर सरकार के खिलाफ लड़ाई की योजना बना लेता है। समय समय पर सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को न केवल धमकाता है बल्कि उन्हें बंधक तक बना लेता है। और पूरी संवैधानिक व्यवस्था उसे ऐसा चुपचाप करने देती है। यह पराकाष्ठा है हद दर्जे की दब्बूपने की। क्या हम इतने कमजोर हैं, क्या हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था इतनी कमजोर बन चुकी है कि हम रामपाल और रामवृक्ष जैसे कुत्सीत मानसिकता वाले लोगों के सामने घुटने टेक दें। इन्हें जब मर्जी आए हमारी व्यवस्था को चुनौती दें और हम सिर्फ इसलिए चुप रहें क्योंकि इनके साथ अंधभक्तों की फौज है। रामपाल और रामवृक्ष के अंधभक्त बिना किसी की इजाजत के हमारे जवानों पर लाठी डंडे बरसाएं, आॅटोमेटिक गन से गोलियां चलाएं और हमारे जवान सरकारी तंत्र की इजाजत का इंतजार करें। यह कैसी व्यवस्था है। जब गोलियों का जवाब गोली से तत्काल नहीं देने की बाध्यता है तो क्यों हमारे जवानों को झोंक दिया जाता है इन भट्टीयों में। क्या उन दो जांबाज पुलिस अधिकारियों की आत्मा हमारी व्यवस्था को कभी माफ कर सकती हैं जिन्हें चंद गुंडों ने बेहरमी से मौत के घाट उतार दिया।
जिस तरह रामवृक्ष यादव ने सरकार को चुनौती दे रखी थी यह अपने आप में एक ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब खोजने में लंबा वक्त गुजर जाएगा। जांच बैठ चुकी है, दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है, कर्तव्यनिर्वहण में दो जांबाज शहीद हो चुके हैं, पर इस बात की पूरी गारंटी है कि असली दोषी कभी सामने नहीं आएंगे। बिना किसी राजनीतिक सपोर्ट के एक साधारण सा व्यक्ति इतना दबंग कैसे बन सकता है इसका जवाब शायद कभी ही सामने आए। पर इतना जरूर है कि उस एक व्यक्ति ने पूरे भारतवर्ष के सम्मान पर एक ऐसा करारा तमाचा मारा है जिसकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देगी। इस गूंज में हमें सुनाई देगा आसाराम जैसे लोगों की भ्रष्ट लीला। इस गूंज में हमें सुनाई देगा बाबा रामपाल जैसे स्वयंभू संतों की हिंसक लीला। इस गूंज हमें सुनाई देगा बाबा राम-रहीम का स्टारडम। इस गूंज में हमें सुनाई देगा बाबा रामदेव का योग के साथ कॉरपोरेट ज्ञान। और इसी गूंज के बीच हमें देखने की कोशिश करनी होगी आने वाले राम नामधारी स्वयंभू अवतारों की नई पीढ़ी की परछाइयों को।

मंथन का वक्त है क्या हम ऐसे ही अंधभक्ति में पागलपन की हद तक पहुंच जाएं, या फिर देश के विकास के लिए अपनी ऊर्जा लगाएं। जिस ऊर्जा के साथ हमें स्वयंभू अवतारों के पीछे भागते हैं क्या उसी ऊर्जा के साथ हम देश के विकास के लिए भाग सकते हैं। या फिर हम  हम राम नाम की लूट में शामिल होकर आश्रम, मंदिर के नाम पर जमीनों पर अवैध कब्जा करवाने में जूट जाएं। अब भी वक्त है हमें पढ़ लिखकर भी अपनढ़ और गंवार बनने से बचना ही होगा, नहीं तो ऐसे ही लोगों के सामने हम खुद को बेबस पाएंगे और आसाराम और रामपाल जैसा संत हमें लूटता जाएगा और रामवृक्ष जैसा सम्मोही हमें सम्मोहन के मोहपाश में बांधकर नक्सली बना देगा।




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