Monday, March 26, 2018

चिदंबरम की तरह आप भी आउटडेटेड तो नहीं?

कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम के एक ट्वीट ने एक ऐसे विषय पर मंथन करने पर विवश कर दिया है, जिसे झेलते तो सब हैं, लेकिन चर्चा कम करते हैं। सार्वजनिक मंच से तो ऐसे विषयों पर चर्चा करना इगोस्टिक लगने लगता है। पर अच्छा हुआ कि पूर्व वित्तमंत्री को इतने सालों बाद इस विषय पर कुछ ज्ञान हुआ और इस दिव्य ज्ञान को उन्होंने सार्वजनिक मंच से व्यक्त भी कर दिया। लंबे समय तक भारत के वित्तमंत्री रहे पी. चिदंबरम को चेन्नई एयरपोर्ट पर इस बात का पता चला कि एयरपोर्ट पर साधारण चाय की कीमत भी कितनी अधिक होती है। चिदंबरम को चाय की कीमत इतनी अधिक लगी कि वे डर गए। हम आम लोगों को इस बात का शुक्रगुजार होना चाहिए कि इतने बड़े राजनेता को कीमत से डर लगा, क्योंकि शायद इस डर के बाद लूट का अड्डा बन चुके एयरपोर्ट्स लाउंज के बारे में मंथन करने की जरूरत पड़ेगी।
देश के पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम रविवार को चेन्नई एयरपोर्ट पर थे। चाय की तलब लगने पर उन्होंने आॅर्डर दे दिया। यह तलब राजनीतिक थी या सामाजिकयह तो पी. चिदंबरम ही बता सकेंगे, लेकिन उन्होंने चाय की कीमत को लेकर जो ट्वीट किया उसकी व्याख्या राजनीतिक और सामाजिक दोनों तरीके से अतिमहत्वपूर्ण होगी। चिदंबरम ने अपने ट्वीट में लिखा है कि कॉफी और चाय की एयरपोर्ट पर कीमतें देखकर मैं डर गया हूं। उन्होंने लिखा कि यहां 135 रुपए में एक कप चाय और 180 रुपए में कॉफी, ये कीमतें सुनकर मैं डर गया हूं। फिर उन्होंने सवाल पूछा है कि कहीं वो खुद आउटडेटेड तो नहीं हैं? चिदंबरम की मानें तो उन्होंने चेन्नई एयरपोर्ट पर एक कप चाय मांगी तो उन्हें कप में गर्म पानी और टी-बैग दिया गया और उसकी कीमत 135 रुपए बताई गई, जिसके बाद उन्होंने चाय खरीदने से इनकार कर दिया। उन्होंने पूछा है कि वो सही हैं या गलत?
यह बहुत आश्चर्यजनक तथ्य है कि जो व्यक्ति इतने लंबे समय तक देश के वित्तमंत्री सहित तमाम पदों पर रहा उसे आज विपक्ष में बैठकर एयरपोर्ट पर अधिक कीमतों पर मिलने वाले खाद्य पदार्थों के बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ है। दरअसल यह कोई नई बात नहीं है कि एयरपोर्ट पर मिलने वाले खाद्य पदार्थ ऊंची कीमतों पर मिलते हैं। पानी की एक बोतल भी आपको पचास से डेढ़ सौ रुपए तक मिलेगी। साधारण चाय और कॉफी की कीमत भी हैरान करने वाली रहती है। पर यह बेहद अफसोसजनक है कि सभी तथ्यों से रूबरू होने के बावजूद भी हमारी सरकारें इस पर कुछ भी करने में खुद को असमर्थ पाती हैं। लंबे समय तक वित्तमंत्री रहने वाले चिदंबरम भी चाहते तो लूट का अड्डा बन चुके एयरपोर्ट्स पर लगाम कसने के लिए किसी पॉलिसी में अपना योगदान दे सकते थे। पर वे ऐसा नहीं कर सके और आज विपक्ष में बैठकर 135 रुपए की चाय के लिए ट्वीट कर रहे हैं। खुद को आउटडेटेड बता रहे हैं। 

आउटडेटेड होना बेहद रोमांचकारी अनुभव होता है। क्योंकि आपको नई-नई चीजों के बारे में जानकारी होती है। अच्छा है चिदंबरम साहब को नई जानकारी मिली और उन्होंने ट्वीट किया, जिसने एक सार्थक बहस को तो जन्म दे ही दिया है। भारत के तमाम एयरपोर्ट्स से हर रोज लाखों यात्री यात्रा करते हैं। हर दिन उन्हें एयरपोर्ट पर मिलने वाले खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों से रूबरू भी होना पड़ता है। वे सबकुछ जानते समझते हुए भी ऊंची कीमत देकर चूप रह जाते हैं। क्योंकि यह स्टेट्स सिंबल से जुड़ा मामला होता है। वह 135 या दो सौ रुपए के लिए कोई हंगामा खड़ा करना नहीं चाहता। न ही वह सोशल प्लेटफॉर्म पर इस संबंध में चर्चा करना चाहता है। यह तो संयोगवश चाय की राजनीति का प्रश्न था जिसने पूर्व वित्तमंत्री को ट्वीट करने पर मजबूर कर दिया।
दरअसल हाल के दिनों में एयरपोर्ट ही नहीं, तमाम मल्टीप्लेक्स, मॉल, स्टेडियम आदि जगहों पर भी तयशुदा कीमतों से ज्यादा कीमत वसूलना आम बात है। लोग भी बिना किसी हिचकिचाहट के यह कीमत अदा कर देते हैं। पर सवाल यह है कि क्या यह सब सरकार और संबंधित विभागों की निगरानी में हो रहा है? अगर नहीं तो आखिर क्यों नहीं ऐसी जगहों पर कार्रवाई करने की हिम्मत जुटाई जाती है? आखिर संबंधित विभागों को किस बात का भय सताता है कि वह ऐसी तमाम जगहों पर छापेमारी से बचते हैं? केंद्र सरकार के अलावा तमाम राज्य सरकारों के पास भी अपनी पॉलिसी है। जिसमें इस बात का जिक्र होता है कि पैकेट बंद खाद्य पदार्थों के लिए अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी.) से अधिक नहीं वसूला जा सकता है। केंद्र सरकार ने भी दिसंबर 2016 में सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक ही शहर, जिले या राज्य में एक ही वस्तु पर अलग-अलग एमआरपी. लेने का चलन बंद करने का निर्देश दिया था। इस निर्देश से पहले भी 2009 में लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट बनाया गया था। 2011 में दो कदम आगे बढ़ते हुए केंद्र सरकार ने पैकेज्ड कमोडिटी रुल्स का भी गठन किया, ताकि एयरपोर्ट, सिनेमाघरों, मॉल आदि पर मिलने वाली खाद्य वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। पर अफसोस है कि ये सारे नियम-कानून कागजों पर ही हैं। 
  लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट एंड रुल्स में इतने सख्त प्रावधान हैं कि संबंधित विभाग चाहे तो किसी भी दुकान का लाइसेंस तक रद कर सकती है। पर ये सारे नियम कानून प्रभावहिन हो चुके हैं, क्योंकि केंद्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों ने भी कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया। शायद यही कारण है कि इतने साल केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद पी. चिदंबरम जैसे दिग्गज नेताओं को आज यह पता चला कि कैसे एयरपोर्ट लूट का अड्डा बन चुके हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि पूर्व वित्तमंत्री का यह ट्वीट आने वाले समय में केंद्र सरकार की एजेंसियों को मंथन करने पर मजबूर करे कि सार्वजनिक स्थानों पर खाद्य पदार्थों की कीमतों के नियंत्रण को लेकर कोई सख्त कदम उठाया जाए। और हां बिना किसी हिचक और स्टेटस सिंबल के इगो को किनारे रखते हुए आम और खास लोगों को भी इन कीमतों के नियंत्रण के लिए सार्वजनिक मंच पर अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए। मंथन करिए, नहीं तो आप भी पी. चिदंबरम की तरह आउटडेटेड ही रह जाएंगे।

Sunday, March 18, 2018

तो क्या ईवीएम से तय होगी गठबंधन की राजनीति?

एक बार फिर से ईवीएम की राजनीति चरम पर है। यूपी और बिहार के उपचुनाव में अप्रत्याशित नतीजों के बाद भी विपक्षी पार्टियां ईवीएम की विश्वनियता पर प्रश्न चिन्ह लगा रही हैं। मायावती हो या अखिलेश यादव या बिहार में आरजेडी के नेता। सभी एक सुर में भविष्य का चुनाव ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से करवाने की वकालत कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात शनिवार को शुरू हुए कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में देखने को मिली। इतने बड़े मंच से कांग्रेस ने भी ईवीएम की विश्वनियता पर सवाल उठाते हुए बैलेट पेपर से चुनाव करवाने की बात कही। आम आदमी पार्टी पहले से ही ईवीएम को कठघरे में पेश कर चुकी है। आप ने तो दो कदम आगे बढ़ते हुए दिल्ली विधानसभा की कार्यवाही के दौरान ईवीएम हैक करने का लाइव डेमो तक दे डाला था। ऐसे में कई बातें मंथन करने पर मजबूर कर देती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भविष्य की राजनीति जिसे गठबंधन की राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है, क्या वह ईवीएम के रास्ते तय होगी?
मंथन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ईवीएम से चुनाव करवाया जाने की शुरुआत ने भारतीय राजनीति की परिभाषा को बदल कर रख दिया था। उस दौर को अभी भुलाया नहीं जा सकता जब बूथ कैपचरिंग की बात सामान्य बात होती थी। चुनाव के दिन अघोषित कर्फ्यू का माहौल होता था। काफी कम संख्या में लोग वोटिंग के लिए बाहर आते थे। एक अनजाना सा भय उन्हें बाहर आने से रोकता था। सबसे खराब स्थिति महिलाओं के लिए थी। पर ईवीएम प्रणाली ने लोगों में लोकतंत्र के प्रति आस्था को मजबूती प्रदान की। बूथ कैपचरिंग की सूचना शायद ही कहीं से आई होगी। तमाम प्रयोगात्मक दौर से बाहर निकलते हुए आज चुनाव आयोग अपने सबसे बेहतर अवस्था में है। पर इसी बेहतर अवस्था में चुनाव आयोग और ईवीएम की विश्वनियता पर गंभीर सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। तमाम विपक्षी पार्टियों का स्टैंड ईवीएम को लेकर क्लियर है। कांग्रेस, राजद, सपा, आप, बसपा सहित तमाम दक्षिण की विपक्षी पार्टियों ने ईवीएम को देश की लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है। यह बात जानते हुए भी तमाम उपचुनाव के अलावा पंजाब में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है। अभी नार्थ ईस्ट में हुए चुनाव के रिजल्ट भी बहुत कुछ कह रही है। सभी चुनाव ईवीएम से ही हुए हैं। यह सारे उदाहरण सामने होने के बावजूद विपक्षी पार्टियों को लगता है कि ईवीएम के सहारे ही बीजेपी की जीत और मोदी नाम के लहर को रोका जा सकता है। जिस तरह मोदी को रोकने के लिए गठबंधन की राजनीति को मजबूती प्रदान की जा रही है, उसमें ईवीएम आने वाले समय में बड़ा रोल अदा कर सकता है। यूपी उपचुनाव में जीत के तुरंत बाद बसपा सुप्रीमो मायावती चंडीगढ़ में थीं। यहां उन्होंने रैली को संबोधित किया। मंच से उन्होंने एक बार फिर से ईवीएम राग को गया। उन्होंने भविष्य के चुनाव ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से करवाने की बात दोहराई। उधर, इंडिया न्यूज के मंच से यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी ईवीएम की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा किया।कांग्रेस के महाधिवेशन से भी ईवीएम के विरोध के स्पष्ट स्वर सुनाई दिया। ऐसे में इस बात को मजबूती मिल रही है कि आने वाले समय में ईवीएम मुद्दे को लेकर विपक्ष की एकता देखने को मिलेगी। शायद यह एक ऐसा मुद्दा होगा जो गठबंधन की राजनीति को आगे बढ़ाने में मददगार साबित होगा। जहां तक गठबंधन का सवाल और मोदी रथ को रोकने की राजनीति है उसमें भले ही ईवीएम को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। पर क्या इस बात से कोई इनकार कर सकता है कि कैसे ईवीएम प्रणाली ने देश की स्वतंत्र चुनाव प्रणाली को विकसित करने में अपना योगदान किया है। हम कैसे उस मंजर को भुला सकते हैं जब चुनावी दौर में गोलियों और बमों की दहशत से लोग कांपते थे। चुनाव में सैकड़ों लोगों की जान चली जाती थी। ये हालात सिर्फ इसलिए पैदा किए जाते थे क्योंकि बैलेट पेपर पर टेंपरिंग करना बेहद आसान था। भारतीय लोकतंत्र ने उस दौर को भी देखा है जब नकली बैलेट पेपर से प्रत्याशियों ने अपनी जीत सुनिश्चित करवा ली थी1 अपनी हार निश्चित मानने वाले प्रत्याशियों ने बैलेट बॉक्स में इंक डालकर सभी वोट खराब करवाने तक काम किया। चुनाव आयोग उस दौर में भी निश्पक्षता से चुनाव करवाने के लिए तत्पर रहता  था और आज भी उसी प्रतिबद्धता को दोहरा रहा है। चुनाव और वोटिंग प्रकिया को सुरक्षित करने के लिए ही ईवीएम जैसे उपाय करवाए गए। पर अफसोस है कि आज उसी ईवीएम की विश्वनियता पर सवाल उठाया जाने लगा है।
कई दूसरे देशों ने
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में ईवीएम प्रणाली पर अपना विश्वास जताते हुए यहां की प्रणाली साझा करने की मांग की है। पर अब हमारे देश में ही हाल जुदा है। विपक्षी दलों का कहना है कि कई यूरोपियन देशों में ईवीएम को बैन कर दिया गया है। पर यह कोई बताने को तैयार नहीं कि आखिर ईवीएम को बैन क्यों किया गया। दरअसल उन देशों में ईवीएम को और आगे ले जाने के लिए इसे इंटरनेट से कनेक्ट करने का प्रयोग किया गया। जो बूरी तरह असफल रहा। क्योंकि इंटरनेट की दुनिया सुरक्षा मामलों में बेहद कमजोर है। ऐसे में यह प्रयोग बूरी तरह असफल रहा। हालांकि उन यूरोपिय देशों में आज भी ईवीएम प्रणाली से ही बेहतर चुनाव करवाने के लिए तमाम रिसर्च हो रहे हैं।
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास काफी उथल पुथल भरा रहा है। खासकर चुनावी प्रकिया के मामले में यह इतिहास काफी स्याह रहा है। ऐसे में सिर्फ अपनी राजनीति स्वार्थ के लिए ईवीएम जैसे सुरक्षित प्रणाली को सिरे से खारिज कर देना कहीं से तर्कसंगत नहीं है। हां यह बात चुनाव आयोग ने भी स्वीकारी है कि तमाम प्रयोगों के कारण कुछ विसंगतियां जरूर सामने आई हैं, पर इसे तत्काल दूर भी कर लिया गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चुनाव आयोग जिस तरह पूरी निष्पक्षता से अपना काम कर रही है उसी निष्पक्षता और ईमानदारी से अपनी कमजोरियों को स्वीकारते हुए ईवीएम की विश्वनियता को कायम करने पर मंथन करेगी। आने वाले समय में खासकर 2019 में चुनाव आयोग की सबसे बड़ी परीक्षा है। यह परीक्षा ईवीएम के जरिए ही बेहतर तरीके से हो सकती है इस बात का विश्वास भारतीय जनता को भी दिलाना होगा। 

Tuesday, February 20, 2018

शहादतों के बदले हम हवन करेंगे..हवन करेंगे..हवन



मैंने अपने इसी मंथन कॉलम में कुछ दिन पहले इस बात की चर्चा की थी कि जब-जब सेना और सैनिकों के साथ राजनीति हुई, बहुत नुकसान हुआ है। सेना को कभी राजनीति का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए। पर भारतीय लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी विडंबना है कि हम कभी प्रत्यक्ष तौर पर कभी अप्रत्यक्ष तौर पर सेना का राजनीतिक इस्तेमाल होते देखते हैं। अब एक बार फिर कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। एक तरफ आतंकियों के हमले बढ़ते जा रहे हैं। पाकिस्तान ने तोप और मोर्टार का रुख कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों की ओर कर रखा है। हर रोज पलायन हो रहा है। सैनिक शहादत दे रहे हैं। बॉर्डर पर युद्ध जैसे हालात हैं। और दूसरी तरफ दिल्ली से राष्ट्रीय रक्षा महायज्ञ के लिए रथ यात्रा की शुरुआत हो चुकी है। जो गृहमंत्री पाकिस्तान और आतंकियों को करारा जवाब देने की बात दोहरा रहे हैं, वही राजनाथ सिंह इस महायज्ञ के लिए रथयात्रा को झंडी दिखा रहे हैं। मंथन करना चाहिए कि हवन और यज्ञ करने से हमें क्या हासिल होगा?
पिछले साल जब उड़ी में 17 सैनिकों ने शहादत दी थी, तो सेना जबर्दस्त गुस्से में थी। भारत सरकार ने उन्हें खूली छूट दी कि चाहे तो सेना सीमा पार जा कर शहादत का बदला ले सकती है। हुआ भी ऐसा ही। सर्जिकल स्ट्राइक ने पाकिस्तान को भयभीत कर दिया। सेना ने न केवल सैकड़ों की संख्या में आतंकियों का सफाया किया, बल्कि बॉर्डर एरिया में मौजूद कई आतंकी लॉन्चिंग पैड ध्वस्त किए। ऐसा नहीं है कि सेना ने ऐसा पहले कभी नहीं किया था। ऐसे सैन्य अभियानों को जल्दी बाहर नहीं आने दिया जाता है। पर उड़ी हमले के बाद भारत सरकार पर ‘बदला’ लेने का इस कदर दबाव था कि पूरे विश्व में इस बात का नगाड़ा पीटा गया कि हमने सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए पाकिस्तान में छुपे बैठे आतंकियों को कड़ा जवाब दिया है।
कभी इस तरह के आॅपरेशंस का ढिंढ़ोरा नहीं पीटा गया। पर उस वक्त की राजनीतिक मजबूरियां ही थी कि सेना को सामने आकर पूरे आॅपरेशन की कहानी बयां करनी पड़ी। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो केंद्र की बीजेपी सरकार को जबर्दस्त फायदा मिलता दिखा। जैसे ही यह फायदा अधिक दिखने लगा, तमाम विपक्षी पार्टियों ने सेना के आॅपरेशन को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। शायद यह पहली बार था कि सेना के किसी आॅपरेशन का सबूत तक मांगा जाने लगा। इससे शर्मनाक बात क्या होगी कि हमारी सेना की विश्वसनियता पर प्रश्न चिह्न लगा दिया गया। पाकिस्तानी अखबारों ने तमाम विपक्षी पार्टियों के बयान को बढ़ा चढ़ा कर अपने यहां प्रकाशित किया। उनका मोटिव था भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक को झूठा साबित करना। इस बात की यहां चर्चा इसलिए जरूरी है ताकि इस बात पर मंथन किया जा सके कि जैसे ही सेना के एक आॅपरेशन का राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया गया वैसे ही पूरा आॅपरेशन ही राजनीति की भेंट चढ़ गया। अफसोस इस बात का है कि सेना का राजनीतिकरण करते ही सेना की विश्वसनियता पर ही खतरा उत्पन्न हो गया। 
सर्जिकल स्ट्राइक से बीजेपी को कितना लाभ हुआ या अन्य विपक्षी पार्टियों को कितनी हानि हुई यह रिसर्च का विषय है। कालखंड में इसका विश्लेषण भी होगा। पर प्रत्यक्ष तौर पर क्या हुआ? पूरे विश्व में पाकिस्तान की भद पिटते ही वह घायल जानवर की तरह भारत की तरफ झपटने को बेताब हो गया। बॉर्डर पर अचानक से हमलों की बाढ़ आ गई। यहां तक कि सेना के अलावा निहत्थे ग्रामिणों तक को निशाना बनाया गया। बदले की आग में झुलसते हुए पाक प्रयोजित आतंकियों ने सेना के कैंपों और वाहनों पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। पिछले एक साल का आंकड़ा इस बात की गवाही दे रहा है कि हमारे कितने सैनिकों ने देश रक्षा में अपने प्राणों की आहूति दे दी। आंकड़ों की जुबानी देखा जाए तो हाल के महीनों में बॉर्डर एरिया से सबसे अधिक पलायन हुआ है। सेना की निगरानी में लोगों को सुरक्षित निकाला जा रहा है।
पर अब क्या हो रहा है? जहां पूरे देश में कश्मीर में हो रहे हमलों को लेकर चिंता और रोष का वातवरण कायम हो रहा है, वहीं भारत सरकार का रुख बेहद गैरजिम्मेदाराना सा प्रतीत हो रहा है। दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में 18 से 25 मार्च तक राष्ट्रीय रक्षा महायज्ञ प्रस्तावित है। इस यज्ञ से पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने जल मिट्टी रथ यात्रा को झंडी दिखाकर दिल्ली से रवाना किया है। बताया जा रहा है कि इस रथ के जरिए डोकलाम से लेकर कश्मीर के बॉर्डर इलाकों से मिट्टी लाई जाएगी। बद्रीनाथ सहित सभी धामों की मिट्टी और जल को भी यज्ञ से पूर्व एकत्र किया जाएगा। इन्हीं मिट्टी और जल से लाल किले के अंदर हवन कुंड तैयार होंगे, जिसमें 11 हजार पंडितों द्वारा यज्ञ किया जाएगा। प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक को इस यज्ञ के लिए आमंत्रित किया गया है। बीजेपी की तरफ से कहा जा रहा है कि देश की सीमाओं पर तैनात हमारे वीर जवानों और उनके त्याग एवं संघर्षों को भावनाओं में रखते हुए ' राष्ट्र रक्षा महायज्ञ' का आयोजन किया जा रहा है।
किसी भी यज्ञ या आयोजन को करवाना हर किसी का लोकतांत्रिक अधिकार है। चाहे वह व्यक्ति विशेष हो या पार्टी विशेष। कोई भी इस तरह का आयोजन करवा सकता है, इसमें दो राय नहीं। भारतीय जनता पार्टी भी अपने इसी अधिकार का उपयोग कर यह आयोजन करवा रही है। पर आपत्ति तब होती है जब इसमें पूरी केंद्र सरकार शामिल हो। जिस सरकार का दायित्व सेना का मनोबल ऊंचा रखना होता है, वही सरकार जब इस तरह के आडंबर को संरक्षित और पल्लिवत करे तो पूरे विश्व को क्या मैसेज जाएगा? इस पर मंथन करना जरूरी है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। ऐसे में किसी यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठान में सरकार और सरकारी तंत्र का जुटना क्या संविधान सम्मत है? पूरे देश को पता है कि बीजेपी 2019 के चुनाव में जुटी है। ऐसे में क्या एक बार फिर से सेना को राजनीतिक हवन कुंड में आहूति के लिए तैयार किया जा रहा है।
क्या किसी यज्ञ से राष्ट्र की सुरक्षा हुई है। एक तरफ दुश्मनों को करारा जवाब देने की बात कही जाती है, दूसरी तरह यज्ञ जैसे धार्मिक अनुष्ठान के जरिए राष्ट्र सुरक्षा का आडंबर का आखिर औचित्य क्या है? प्रतिदिन हमारे सैनिकों की शहादत को पूरा राष्ट्र देख रहा है, ऐसे में एक बार फिर से राजनीति हवन में सेना और सैनिकों को झोंकने की तैयारी हो रही है। हो सकता है राष्ट्र प्रेम के नाम पर राष्ट्र रक्षा यज्ञ के बीजेपी के लिए कई मायने हों। पर भारतीयों के लिए सेना का गर्व और गौरव एक अलग मायने रखता है। सैनिकों के त्याग और बलिदान को राजनीतिक हवन यज्ञ में शामिल करना कहीं से भी न्यायोचित नहीं है। बीजेपी हो या कोई अन्य दल वो स्वतंत्र रूप से इस तरह का यज्ञ कराएं, पर सरकार के अहम पद पर शामिल लोग जब इस तरह के आयोजनों का हिस्सा बनते हैं तो पूरे देश को मंथन जरूर करना चाहिए।
चलते- चलते..
और हां.. इस तरह सैनिकों के नाम पर होने वाले आयोजन तब और भी घेरे में आ जाते हैं जब इसका आयोजन लाल किले जैसे ऐतिहासिक धरोहरों के प्रांगण में होता है। जिस लाल किले ने अपनी प्राचीर से बुलंद भारत के गौरव को पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत किया हो, उसी लाल किले के प्रांगण में राष्ट्र सुरक्षा के नाम पर आडंबर सिर्फ चुनावी स्टंट हो सकता है। और कुछ नहीं।

Monday, February 12, 2018

सेना के मामले में तुष्टिकरण की नीति न अपनाएं


आज मंथन से पहले आप पहले इन दो खबरों को पढ़ें।
पहली खबर कश्मीर के शोपियां है। यहां पत्थरबाजों पर कार्रवाई करने पर मेजर आदित्य कुमार और उनकी टीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाती है। शोपियां में हिंसक हो चुके पत्थरबाजों से बचने के लिए मेजर आदित्य और उनकी टीम को फायरिंग करनी पड़ी थी। 
दूसरी खबर जम्मू से है। सुजवां आर्मी कैंप में आतंकी हमले में सेना के पांच जवान शहीद हो गए हैं। सबसे बुरी खबर यह है कि आतंकियों की इस कार्रवाई में एक जवान के पिता भी मारे गए, जबकि दस से अधिक महिलाएं और बच्चे घायल हैं। एक बच्ची की हालत बेहद नाजुक है। 
अब आप मंथन करें। उस जवान की मनोस्थिति को समझने की कोशिश करें। जिसके ऊपर आपके हमारे और पूरे देश के परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वह अपने पिता को बचा नहीं सका। उसके समाने ही आतंकियों ने उसके पिता सहित तमाम महिलाओं और बच्चों पर दनादन गोलियां बरसा दीं। आप उस मेजर आदित्य कुमार के पिता की मनोस्थिति को भी समझने की कोशिश करें। किन परिस्थितियों में मेजर आदित्य के पिता ने कोर्ट से गुहार लगाई होगी कि उनके बेटे सहित उनकी टीम पर की गई एफआईआर वापस ली जाए। एक तरफ एक बेटा है जिसकापिता आतंकियों द्वारा मार दिया गया। एक तरफ एक पिता हैं जो भगवान के शुक्रगुजार हैं कि उनका बेटा देशद्रोही पत्थरबाजों की हिंसक भीड़ से सुरक्षित निकल सका। आत्मरक्षा में अगर उनके बेटे और उनकी टीम ने फायरिंग न की होती तो शायद आज कोई पिता आंसू बहा रहा होता। 
पत्थरबाजों पर कार्रवाई के तत्काल बाद घड़ियाली आंसू लेकर टीवी चैनलों पर नुमायां होते रहने वाले, सोशल मीडिया पर सेना के खिलाफ जहर उगलने वाले, अवॉर्ड वापसी गैंग के तथाकथित बुद्धीजीवि वर्ग के लोग इस वक्त कहां हैं जब आतंकियों ने महिलाओं और बच्चों पर गोलियां बरसाने में भी हिचक नहीं दिखाई। पैलेट गन से घायलों के समर्थन में मानवाधिकार की पैरवी करने वाले वे तथाकथित पत्रकार और वकिलों की फौज भी क्या उन जवानों का हाल जानने पहुंचेगी जिन जवानों के सामने उनके परिवार वालों पर गोलियां बरसाई गर्इं। आप उन जवानों की मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश करें कि जिन जवानों के ऊपर पूरे देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी है वो अपने ही परिजनों को सुरक्षित न कर सके। उन जांबाजों पर क्या बीत रही होगी।
ऐसे में जब ये जवान अपने प्राणों की रक्षार्थ गोलियां चलाते हैं तो उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाकर जम्मू-कश्मीर की सरकार क्या संदेश देना चाहती है? केंद्र की सरकार इन एफआईआर को हटवाने के लिए किसका मुंह ताक रही है? ये कैसी तुष्टिकरण की नीति है जो हमारे सैन्यकर्मियों और उनके परिजनों का हौसला तोड़ रही है। मेजर आदित्य कुमार के पिता को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी है। उन्होंने अदालत से अपील की है कि उनके सैन्य अफसर बेटे और उनकी टीम के खिलाफ शोपियां में दर्ज की गई एफआईआर रद की जाए। आखिर ऐसी नौबत क्यों आई कि एक पिता को याचिका दाखिल करनी पड़ी। सवाल रक्षा मंत्रालय से भी पूछा जाएगा कि क्यों नहीं यहां बैठे वरिष्ठ अधिकारियों ने एफआईआर खारिज करवाने का प्रयास किया। क्या उन्हें नहीं पता कि कश्मीर में किन हालातों में सेना के जवान अपनी ड्यूटी दे रहे हैं। क्या उन्हें नहीं पता कि आखिर अपने ही देश में क्यों सेना के जवान मुंह पर काले कपड़े डाले कश्मीर में ड्यूटी कर रहे हैं। क्या उन्हें नहीं पता कि किस तरह पत्थराबाजों की आड़ लेकर आतंकियों को भगाया और संरक्षित किया जा रहा है। पूरा देश सवाल कर रहा है कि आखिर सेना के जवानों पर यह गैरजरूरी एफआईआर क्यों? 
कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सहित सहयोगी दल बीजेपी को भी मंथन करने की जरूरत है। एक तरफ केंद्र से सेना की हौसलाआफजाई की हुंकार भरी जाती है। रक्षा मंत्री बयान देती हैं कि सेना का मनोबल नहीं टूटने दिया जाएगा। खुद कश्मीर की मुख्यमंत्री बयान देती हैं कि कश्मीर में अभी ऐसे हालात नहीं हैं वहां अफस्पा (आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट) को हटाया जाए, और दूसरी तरफ कश्मीर की पुलिस को ही सेना के अधिकारी और जवानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया जाता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि तुष्टिकरण की इसी नीति ने जम्मू कश्मीर को उसके विकास से कई दसक पीछे धकेल रखा है। आज जब भारतीय सेना अपनी जान पर खेल कर घाटी में आॅपरेशन आॅल आउट चला रही है तो उनके हौसले को तोड़ने की साजिश रची जा रही है। क्या होगा ऐसी तुष्टिकरण की नीति अपनाकर। जिन पत्थरबाजों पर एफआईआर दर्ज करवाई गई उन्हें पहला मौका कहकर माफ करने की रणनीति के नतीजे क्या होंगे। क्यों ऐसे करीब 9730 पत्थरबाजों के खिलाफ दर्ज किए गए एफआईआर को सरकार ने वापस ले लिया। तुष्टिकरण की इसी नीति के चलते ही कश्मीर में आतंकियों के समर्थक पत्थरबाजों में न तो पुलिस का खौफ है और न आर्मी का। उनका दुस्साहस बढ़ता ही जा रहा है। 
पत्थरबाजों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने के पीछे का तर्क देते हुए जम्मू कश्मीर की सरकार का कहना है कि उन्होंने पहली बार यह गुनाह किया था। उन्हें माफ करने से अच्छा संदेश जाएगा। पर इस सवाल कर जवाब कोई देने को तैयार नहीं है कि इन पत्थरबाजों से जूझ रहे   सैन्य कर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने से कौन सा संदेश जाएगा। क्या सैन्यर्मियों के लिए मानवाधिकार नहीं है। क्या उन्हें अपनी रक्षा करने का हक नहीं है। केंद्र की मोदी सरकार अगले साल चुनाव की तैयारी में जुटी है। पर कश्मीर के हालातों पर जल्द मंथन नहीं किया गया तो हो सकता है उनकी यह तुष्टिकरण की नीति उल्टी न पड़ जाए। 
जम्मू कश्मीर के हालात को तमाम राजनीति परिवेश से अलग तरीके से देखने और समझने की जरूरत है। सेना के नाम पर अगर तुष्टिकरण किया गया तो हालात और भी बद से बदतर होते जाएंगे। सैन्यकर्मियों का मनोबल कई गुणा बढ़ जाता है जब देश का प्रधानमंत्री उनके साथ माइनस पचास डिग्री सेल्सियस में दीपावली मनाता है। इन जवानों का हौसला आसमान छूने को बेताब हो जाता है जब देश के रक्षामंत्री के रूप में एक महिला कमान संभालती है और पूरी दुनिया यह देखकर हैरत में पड़ जाती है कि कैसे यह महिला रक्षामंत्री सुखोई में उड़ान भर लेती है। भारतीय सेना हमेशा से ही उच्च गौरवशाली परंपराओं का निर्वहन करती आई है। जब-जब देश पर बाहरी और आंतरिक संकट आए हैं हमारे वीर जवानों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया है। ऐसे में चंद देशद्रोहियों, आतंक के समर्थकों और बेवजह मानवाधिकार का झंडा बुलंद करने वाले अवॉर्ड वापसी गैंग के सदस्यों के दबाव में आए बिना सेना को अपना काम करने की छूट मिलनी चाहिए। तुष्टिकरण की राजनीति में सैन्यकर्मियों को बलि का बकरा बनाने से हमारे जांबाजों का मनोबल टूटता है। भारतीय सेना में अनुशासन की इतनी उच्च परंपरा है कि वहां किसी गलती पर न किसी अधिकारी को बख्शा जाता है न किसी जवान को माफ किया जाता है। ऐसे में बेवजह इस एफआईआर की राजनीति से ऊपर उठने की जरूरत है।