Tuesday, September 15, 2015

मीट बैन : धार्मिक हिंसा नहीं तो क्या है?


इन् ादिनों महाराष्टÑ से लेकर गुजरात, पंजाब हरियाणा तक में मीट पर प्रतिबंध को लेकर नया बवाल चल रहा है। शायद यह पहली बार है कि इस तरह के प्रतिबंध को एक अलग दृष्टि से देखने की जरूरत महसूस की जा रही है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या हम किसी धर्म विशेष को खुश करने के लिए दूसरे धर्म के अनुयायियों के खाने की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित कर सकते हैं? क्या इस तरह का प्रतिबंध सिर्फ शाकाहार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के लिए है या फिर यह सब किसी दूसरे उद्देश्य से किया जा रहा है। मंथन का वक्त है कि क्या इस तरह मांस पर प्रतिबंध धार्मिक हिंसा के रूप में परिलक्षित नहीं हो रहा है।

बेशक यह सौ प्रतिशत धार्मिक हिंसा ही है। भारत एक पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक देश है। जहां हर धर्म के अनुयायियों को अपने अनुसार रहने, अपने अनुसार खाने-पीने, अपने अनुसार धर्म का प्रचार प्रसार की स्वतंत्रता प्राप्त है। भारत में धार्मिक स्वतंत्रता इस हद तक है कि अगर आप जैन धर्म के मुनी हैं या नागा साधु हैं तो आप सड़क पर पूर्ण रूप से नंगे भी चल सकते हैं, पर अगर आप उस धर्म के अनुयायी या मुनी नहीं हैं और सड़क पर नंगे चलने की कोशिश करेंगे तो आपके खिलाफ तमाम कानूनी धाराओं में कार्रवाई हो सकती है। अगर आपके द्वारा सार्वजनिक रूप से नि:वस्त्र रहने या सड़क पर नग्न चलने की किसी ने शिकायत कर दी तो आपके खिलाफ सार्वजनिक स्थल पर अश्लीलता फैलाने का मामला तक दर्ज हो सकता है। आईपीसी की धारा 294 के तहत आपको जेल भेजा जा सकता है। अगर किसी महिला के सामने आपने इस तरह की नग्न अश्लील हरकत की तो धारा 354 में आपके खिलाफ मुकदमा दर्ज होगा। यहां तक कि 81 पुलिस एक्ट में भी इस तरह का प्रावधान है। आपके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी, बदनामी होगी वह अलग।

तात्पर्य इतना है कि जिस देश में इस तरह की उच्चतम धार्मिक स्वतंत्रता आपको मिली है वहां यह कैसे स्वीकार किया जा सकता है कि आप किसी धर्म के विशेष सप्ताह के दौरान मांस खाने पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। मंथन का वक्त है कि इस तरह की जरूरत क्यों पड़ गई? क्या यह सब इसलिए किया जा रहा है जिसका राजनीतिक फायदा उठाया जा सके? या फिर इसलिए किया जा रहा है ताकि सच्चे अर्थ में जानवरों पर हो रहे अत्याचार को रोका जा सके? या फिर इसलिए भी किया जा रहा है ताकि किसी धर्म विशेष को यह संदेश दिया जाए कि आपकी जो मर्जी हो, हम तानाशाह हैं, हम आपके खाने-पीने पर भी प्रतिबंध लगवा सकते हैं। यह बेहद गंभीर विषय है।
हमारे देश में जितने धर्मों के अनुयायी हैं उनमें अगर परसेंटेज निकाला जाए तो मांसाहारियों का परसेंटेज निश्चित रूप से अधिक आएगा। मांस का भक्षण चाहे बीफ के रूप में हो, मटन के रूप में हो, चिकन के रूप में हो या पोर्क के रूप में। कहने का आशय इतना भर है कि किसी धर्म में गाय को मां से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है, तो किसी धर्म में सूअर को पाक माना गया है। हैं तो सभी जानवर हीं। फर्क बस इतना है कि उनके ऊपर धर्म का स्वघोषित लेबल लगा दिया गया है। ऐसे में किसी विशेष धर्म के अनुयायियों के पवित्र सप्ताह में मांसाहार पर प्रतिबंध लगाना कहां तक न्यायोचित है? और वह भी सिर्फ गौमांस पर। चिकन, मटन और मछली को इससे अलग रखा गया है।
भारत में सभी व्यक्ति को अपने धर्म के अनुसार रहने और खाने की स्वतंत्रता है। ऐसे में अगर आज बीफ पर बैन लगाया गया है तो कल हमें इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि दूसरे धर्म के अनुयायी भी अपने पवित्र सप्ताह में, पाक महीनों में किसी विशेष मांस के खाने पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगें। यह विवाद इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि जिन प्रदेशों में बीफ पर बैन लगाया गया है वहां किसी न किसी रूप में भारतीय जनता पार्टी की सरकार मौजूद है। ऐसे में किस तरह का संदेश जा रहा है यह बताने की जरूरत भी न हीं है। इस वक्त भले ही बीजेपी का समर्थन करने वाले इसे न्यायालय का निर्णय बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश में लगे हैं, पर इतना तय है कि बीफ बैन को लेकर शुरू हुई राजनीति आगे भी कई रंग दिखाएगी। बीफ बैन का समर्थन करने वाले इसे पशु प्रेम से जोड़कर भी देख रहे हैं। पर हमें पशु प्रेम और मांसाहार को बिल्कुल अलग करके देखना चाहिए। पशुप्रेम को बढ़ाने के लिए हमें किसी पवित्र सप्ताह या पवित्र माह का इंतजार नहीं करना चाहिए। मंथन जरूर करें कि हम इस तरह की धार्मिक हिंसा को कैसे रोक सकते हैं। यह अलार्मिंग सिचुएशन है। आने वाला समय हमें अलार्म बजाने का मौका नहीं देने वाला है।

चलते-चलते
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई में मीट बैन पर प्रतिबंध मामले की सुनवाई के दौरान शुक्रवार को कहा कि इस तरह की परंपरा गलत है। उधर महाराष्टÑ सरकार ने भी कोर्ट को बताया है कि मीट बैन को चार दिनों से घटाकर दो दिन कर दिया गया है। हालांकि वीरवार को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने प्रदेश में गौमांस पर प्रतिबंध को सख्ती से लागू करने का निर्देश राज्य सरकार को दिया था। पर यह सच्चाई भी जाननी जरूरी है कि कश्मीर में पिछले 150 वर्षों से गौमांस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा हुआ है। ऐसे में मीट बैन के समर्थकों को कोर्ट का हवाला देने वाली बातें नहीं करनी चाहिए।


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