Thursday, June 29, 2017

एक शाम नाथुला दर्रा के नाम ... जब मेघा जी की चीनियों से हुई झड़प

चीनी सैनिक के साथ मेघा।
इन दिनों चीन से भारत के संबंध कुछ बेहतर नहीं चल रहे हैं। चीन और भारत दोनों की सामरीक दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण नाथुला दर्रा (पास) भी चर्चा में है। कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों को भी यहीं रोक दिया गया है। अगर आप कभी बाघा बॉर्डर जाएंगे तो आपके चंद कदम की दूरी पर पाकिस्तानी फौज नजर आ जाएगी। ठीक इसी तरह जब आप नाथुला दर्रा से ऊपर भारत की सबसे अंतिम सैन्य पोस्ट पर जाएंगे तो आप चीनी सैनिकों के बेहद करीब होंगे। इतने करीब की आप उनसे हाथ तक मिला सकते हैं। गले मिलकर फोटो भी खींचवा सकते हैं। पर इसी मेल मिलाप के दौरान मेरे साथ गर्इं मेरी वाइफ मेघा की चीनियों के साथ झड़प हो गई। भारतीय सैनिकों ने भी साथ दिया। जीत की मुस्कान के साथ मेघा ने जश्न मनाया। आज उस कहानी को कलमबद्ध कर रहा हूं, इसलिए कि यह बता सकूं कि चीनियों की फितरत क्या है?
बात मार्च 2011 की है। मैं और मेघा (मेरी वाइफ) सिक्किम की राजधानी गंगटोक घूमने गए थे। मैंने मेघा को नहीं बताया था कि हम वहां से काफी ऊंचाई पर स्थित नाथुला पास भी जाएंगे। जानता था पहले बता दिया तो प्रोग्राम में फेरबदल भी करवाया जा सकता है। खैर गंगटोक की सुनहरी वादियों का दो दिनों तक लुत्फ उठाकर मैंने अचानक तीसरे दिन मेघा को सुबह सुबह बताया कि आज हम नाथुला पास जाने वाले हैं। चीन के बॉर्डर पर। मेघा ने नाथुला पास के बारे में बहुत कुछ पढ़ रखा था, इसीलिए ठंड में भी उसका पारा हाई हो गया। जब मैंने बताया कि मैंने गंगटोक आते ही वहां जाने के लिए अप्लाई कर दिया है, आौर कल शाम कंफर्मेशन भी आ गई है। हमें 11 बजे वाली टैक्सी से जाना है। बुझे मन से मेघा तैयार हुई।

नाथुला पास पर चीनी सैन्य पोस्ट के ठीक सामनेपोज देती मेघा।

आप लोगों के लिए बता दूं कि नाथुला पास जाने के लिए आपको भारत सरकार से अनुमति लेनी होती है। गंगटोक में ही टूरिस्ट डिपार्टमेंट के पास आपको अपनी दो-दो रंगीन फोटो, फोटो युक्त आईडी जमा करानी होती है। अपना फोन नंबर और होटल या जहां आप ठहरे हैं वहां का पता देना पड़ता है। 24 घंटे बाद कंफर्मेशन आता है। जरूरी नहीं कि आपको वहां जाने की अनुमति मिल ही जाए। विदेशियों का वहां जाना प्रतिबंधित है। नाथुला पास को सिल्क रूट के नाम से भी जाना जाता है। इसी रास्ते से चीनी यात्री ह्यूनसांग, फाहियान और मार्कोपोलो जैसे प्रतिभाशाली लोगों ने भारत में प्रवेश किया था। इन्होंने भारतीय विविधता की खोज की और भारत और चीन के बीच दोस्ती की नींव डाली। इस नींव में सबसे बड़ी दरार भारत-चीन के 1962 की लड़ाई के बाद पड़ी। लड़ाई के बाद इस अति महत्वपूर्ण रुट को पूरी तरह बंद कर दिया गया था। दोनों देशों की फौजें हमेशा अपनी भृगुटी ताने आमने सामने की पोस्ट पर मौजूद रहती। वर्ष 2006 में तमाम प्रयासों के बाद यह रूट दोबारा शुरू हुआ। इस रूट के खुलने के बाद भारत के साथ-साथ चीन का व्यापारिक वर्ग भी बेहद खुश हुआ। इस खुशी का परिणाम हम आज भारत के गली मोहल्लों की दुकानों में भी देख रहे हैं। हर जगह चीन के दो नंबर के प्रोडक्ट मौजूद हैं।
नाथुला पास के रास्ते में एक पड़ाव।

खैर हम खुशनसीब थे कि हमें नाथुला पास जाने का मौका मिल गया था। नाथुला पास सिक्कम की राजधानी गंगटोक से मात्र 58 किलोमीटर की दूरी पर है। नाथुला दरअसल हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा है जो भारत के सिक्किम और तिब्बत की चुम्बी घाटी को जोड़ता है। नाथुला दो तिब्बती शब्द नाथु (Listenings Ears) और ला (Pass)
से मिलकर बना है। हमने पता कर लिया था कि वहां काफी अधिक ठंड होगी, इसलिए हम पूरी तैयारी के साथ तय समय पर टूरिस्ट इंफॉर्मेशन सेंटर पहुंच गए। ठीक 11 बजे टैक्सी भी आ गई। सबकी सीट अलॉटेड थी, क्योंकि टैक्सी का भाड़ा पहले ही ले लिया गया था। अगर आप शेयर्ड टैक्सी से नहीं जाना चाहते तो आपको करीब 8 से दस हजार रुपए खर्च करने होंगे,  इसमें यात्रा परमिट शामिल नहीं होगी। हमने शेयर्ड टैक्सी का आॅप्शन लिया था, क्योंकि हम दो ही लोग थे और उस जगह से अनजान थे। किसी अनजान जगह जाने के लिए शेयर्ड टैक्सी का आॅप्शन बेस्ट होता है क्योंकि आपके साथ अधिक लोग होते हैं, और यह इकोनॉमिकल भी होता है। शेयर्ड टैक्सी का भाड़ा 8 सौ रुपए प्रति व्यक्ति था, जिसमें यात्रा परमिट भी शामिल था।
नाथुला पास की यात्रा शुरू होने के करीब दस मिनट बाद ही हमें इस बात का अहसास हो गया था कि यह कोई आम यात्रा नहीं है। शहर से ऊपर निकलते ही बेहद संकरी सड़कों ने हमारा स्वागत किया। सांस थाम देने वाली इन सड़कों पर हमारी टैक्सी यूं सरपट भाग रही थी जैसे हम फार्मूला वन की ट्रैक पर चल रहे हों। हिंदी गाना सुनते हुए सिक्कम का वह टैक्सी ड्राइवर इतने इत्मीनान से गाड़ी चला रहा था कि हम हैरान थे। करीब 58 किलोमीटर की यात्रा हमें चार घंटे में पूरी करनी थी। दिल की धड़कनों को काबू करते हुए हमारा पहला पड़ाव आया छांगू लेक। खतरनाक रास्तों को देखते हुए यहां पहुंचना किसी एडवेंचर से कम नहीं। एकबारगी मुझे भी यही लगा था कि कहीं यहां का प्रोग्राम बनाकर मैंने कुछ गलत तो नहीं कर लिया। छांगु लेक समुद्र से 12300 फीट ऊपर है। यहां करीब आधे घंटे का ठहराव था। सैलानियों की यहां अच्छी खासी भीड़ थी। यॉक के ऊपर बैठकर तस्वीर खिंचवाने की चाहत ने हमें यहां रोक दिया था। मैगी यहां की खास डिश है। इसे कई तरह से बनाया जाता है। समुद्र तल से हजारों मीटर ऊपर गरमा गरम मैगी खाने का स्वाद ही अलग था। मैगी खाने के बाद हमारी यात्रा दोबारा शुरू हुई। 25 किलोमीटर का सफर फिर शुरू हुआ।

नाथुला पास के रास्ते में एक पड़ाव।
अब हर तरफ फौज की उपस्थिति नजर आने लगी थी। फौजी गाड़ियां और बर्फ से आच्छादित पड़ाड़ियों के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था। बिना बैरिकेट के मौजूद सड़क से नीचे देखने की हिम्मत नहीं थी, इसीलिए मैंने अपनी जगह बदल ली थी। नाथुला पास पहुंचने के पांच किलोमीटर हमारी गाड़ी रोक दी गई। भारतीय फौज के जवानों ने बताया कि मौसम की चेतावनी जारी की गई है। भारी बर्फबारी की संभावना है। आपको यहीं से लौटना होगा। हम बेहद निराश हो गए। पर मेघा और उसकी एक दोस्त (यह दोस्त टैक्सी में बनी थी)। नाम मुझे ठीक से याद नहीं, हां यह याद है कानपुर की कोई मुस्लिम फैमिली थी। मैं और मेरे सहयोगी जब फौजियों को राजी नहीं कर सके, तब इन दोनों सखियों ने मोरचा लिया। दोनों ने उसे पोस्ट के सबसे सीनियर अधिकारी को करीबन हड़काने के अंदाज में बोलना शुरू कर दिया। हम इतनी दूर से आए हैं। जब खतरनाक रास्ते हमारा हौसला नहीं बिगाड़ सके तो आप हमें ऊपर जाने से कैसे रोक सकते हैं। मेघा ने कहा कि हम झेल लेंगे बर्फबारी, आप हमें जाने दें। हम ज्यादा देर ऊपर नहीं रुकेंगे, जाएंगे और चले आएंगे। महिलाओं से बहस में कोई जीत नहीं सकता। भारतीय सैनिक भी नहीं। हमें ऊपर जाने की अनुमति मिल गई। सिर्फ एक घंटे के लिए।
चीन से बिल्कुल आमनेसामने की पोस्ट पर मैं और मेघा।

नाथुला पहुंचना मेरे सपने के पूरा होने जैसे ही था। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ। सर्द हवाओं ने हमें घेर रखा था। ऐसा लग रहा था मानों शरीर में कुछ बचा ही नहीं है। तमाम गर्म कपड़ों के बावजूद हम कांप रहे थे। सीढ़ियों से चढ़कर हमें ऊपरी पोस्ट तक जाना था। करीब चालीस पचास सीढ़ी चढ़कर आखिर हम वहां पहुंच चुके थे जहां तक पहुंचने के लिए इतने पापड़ बेले थे। 14200 फीट की ऊंचाई पर भारतीय सैन्य पोस्ट और चीनी सैन्य पोस्ट के बीच सिर्फ आधी फीट ऊंची दीवार थी। दीवार के ऊपर नाम मात्र के कंटीली तार लगे थे। सामने चीनी सैनिक बिना किसी हथियार के इधर-उधर टहल रहे थे। हल्की बर्फबारी भी शुरू हो चुकी थी। भारतीय सैनिक वहां हम जैसे मौजूद कुछ पर्यटकों को कंटीली तार से दूर रहने की सलाह देते हुए पोस्ट के बारे बता रहे थे। कैप्टन रैंक के अधिकारी को मेघा ने घेर रखा था और पूरे नाथुला का इतिहास और भूगोल की जानकारी ले रही थी। तभी एक चीनी सैनिक कंटीले तार के पास आ गया। मेघा ने तत्काल उसे भी घेर लिया। न उस चीनी सैनिक को अंग्रेजी आ रही थी और न मेघा को चीनी भाषा समझ में आ रही थी। पर उस सैनिक ने इतना जरूर समझ लिया कि यह भारतीय महिला उससे हाथ मिलाना चाह रही थी। चीनी सैनिक जहां था वहां से ठीक हाथ मिलाना संभव नहीं थी, इसीलिए वह दीवार के ऊपर चला आया। फिर क्या था मेघा ने उससे न केवल हाथ मिलाया, बल्कि तस्वीरें भी खिंचवाई। वह बेहद खुश था। इसी बीच उसका दूसरा साथी भी आ गया। उस चीनी को थोड़ी अंग्रेजी आती थी। उसने मेघा से पूछा कि डू यू वांट टू टेक समथिंग फ्रॉम अस। मेघा ने यस किया, तो उसने तत्काल सौ रुपए मांग लिए। मैं कुछ बोलता इससे पहले मेघा ने अपने पॉकेट से सौ रुपए निकालकर उसे दे दिए और इसके बदले उस चीनी सैनिक ने चीन के नोट मेघा को थमा दिए।
मेघा का चीनी सैनिक के साथ जीत का जश्न।

सौ रुपए के बदले एक युआन। मेघा की खुशी का ठिकाना नहीं था। पर तभी कैप्टन साहब ने मेघा को बता दिया कि उसने आपके सौ रुपए के बदले सिर्फ एक युआन दिया है। आपको करीब साठ रुपए का घाटा हो रहा है। फिर क्या था मेघा असली भारतीय महिला के रूप में आ गई। भिड़ गई उस चीनी सैनिक से। मेघा उससे और रुपए मांग रही थी और वह सैनिक आई हैव नो मोर मनी, आई हैव नो मोर मनी कहता हुआ इधर उधर झांक रहा था। मेघा भी कहां हार मानने वाली थी। उसने जब उसे डांटा तो उसने और पैसे निकाले। अबकी बार दो नोट थे। फिर भी सौ रुपए के बदले दस रुपए कम थे। मेघा ने उससे फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाकर किप द रेस्ट मनी का टोंट मारा और दोबारा तस्वीर खींचवाई। किसी भारतीय विरांगना तरह मेघा खुश नजर आ रही थी। मानो चीन को को युद्ध में हरा दिया। मेघा के ये तेवर देखकर कैप्टन साहब और उनकी टीम ने तालियों के साथ मेघा का स्वागत किया। साथ ही यह बताया कि ये चीनी सैनिक भारतीय पर्यटकों के साथ ऐसा ही करते हैं। पर पहली बार उनका सामना किसी वीर भारतीय महिला से हुआ जो अपना हक लेना जानती है। कैप्टन साहब ने मेरी और मेघा की भारतीय तिरंगे के साथ तस्वीर खींची। उन्होंने हमें चाय आॅफर की। पर हमारी टैक्सी वाली टीम नीचे जा चुकी थी, क्योंकि बर्फबारी तेज होती जा रही थी। हम बर्फबारी में फंस सकते थे।
जीत के बाद भारतीय सैनिकों ने किया मेघा का स्वागत।

मुझे भारतीय सैनिकों से बातचीत करने का काफी मन था, पर समय ने ऐसा करने नहीं दिया। हमने भारतीय सैनिकों के साथ तस्वीरें खिंचवाई और उनके इस कर्तव्यनिष्ठा, देशप्रेम और कठिन परिस्थितियों के बीच सीमा की चौकसी की ड्यूटी को सैल्यूट किया। इस बात की अफसोस रहा कि हम उस बाबा हरभजन सिंह के बंकर का दर्शन नहीं कर पाए, जिनके बारे में न जाने कितनी किंवदंतियां प्रचलित हैं। बाबा हरभजन सिंह के बारे में कभी विस्तार से लिखूंगा। आज भी भारतीय और चीनी सेना की यह मान्यता है कि बाबा हरभजन हर दिन यहां मौजूद रहते हैं। सेना में हर साल उनका प्रमोशन होता है और वे छुट्टियों में अपने घर भी जाते हैं। तेजी से बदल रहे मौसम के कारण हम उस बंकर तक नहीं पहुंच सके जहां उनका निवास है। इस उम्मीद के साथ हम वहां से रुख्सत हुए कि दोबारा यहां पहुंचेंगे और बाबा के दर्शन करेंगे और भारतीय सैनिकों के साथ कुछ घंटे बिताएंगे। आज छह साल होने जा रहे हैं दोबारा जाने का मौका नहीं मिला। पर नाथुला दर्रा पर हो रही घटनाओं ने वहां की याद ताजा कर दी।  


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