Friday, August 24, 2018

सरकार मीडिया में हस्तक्षेप करती है क्या?



जब देहरादून में जागरण ग्रुप के साथ था तब की एक कहानी है। पढ़िए फिर पता चलेगा कि सरकार मीडिया के साथ क्या करती है और क्या नहीं कर सकती है?

पिछले कुछ दिनों से मीडिया की आजादी उसकी बेबाकी और उस पर प्रतिबंध को लेकर बहुत कुछ कहा जा रहा है। खासकर तब, जबसे टीवी न्यूज के कुछ प्रमुख चेहरों की विदाई हुई है। उन लोगों को मीडिया के एक धड़े ने अघोषित शहीद का दर्जा दे दिया है। उनके नाम से मोदी सरकार को कोसा जा रहा है। कहा जा रहा है मीडिया पर ऐसा प्रतिबंध लगा दिया गया है कि वह न कुछ बोल सकता है, न लिख सकता है। सरकार ही तय करेगी कि क्या लिखना है, क्या बोलना है। आपको यह कुछ ज्यादा हास्यास्पद नहीं लगता?
अगर ऐसा ही है तो शहीद का दर्ज मिलने के बाद वे कैसे लिख रहे हैं? अब उनपर कैसे प्रतिबंध नहीं लग रहा। जिस दुर्भावना से प्रेरित होकर वो अपनी बातों को बेबाकी से सोशल मीडिया और वेब न्यूज प्लेटफॉर्म पर लिख रहे हैं वह कैसे संभव हो रहा है? जब मोदी सरकार न्यूज चैनल पर प्रतिबंध (जैसा की शहीद पत्रकारों द्वारा बताया जा रहा) लगा सकती है तो वेब न्यूज प्लेटफॉर्म को तो झटके में ब्लॉक करवा सकती है। फिर कूदते रहिए। और हां सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की टीआरपी तो ऐसी है कि उस तक पहुंचने में चैनल्स को सात जनम तक लग जाएंगे। वहां तो आप बेबाकी के साथ, पूरी हनक के साथ लिख रहे हैं। कौन रोक रहा है आपको? अब सवाल उठता है कि सरकार मीडिया के मामले में हस्तक्षेप करती है या नहीं।

इसका जवाब हां में है बिल्कुल सच है सरकार मीडिया के मामले में कुछ हद तक हस्तक्षेप करती है। खासकर तब जब उसे दर्द होता है। इस दर्द के भी कई प्रकार होते हैं। उसकी चर्चा फिर कभी। फिलहाल बात सरकार के हस्तक्षेप की।
आप अपनी निजी जिंदगी में झांक कर देखिए। आप किसी को दो पैसे भी देते हैं तो उसे आप अपना अहसानमंद मान लेते हैं। अपेक्षा रखते हैं कि वह आपकी हर बात माने। घर के बच्चे को भी पांच रुपए का लॉलीपॉप देकर आप उससे अपने अनुसार काम करवाने की इच्छा रखते हैं। बच्चा नहीं करता है तो उसे जरूर कहते हैं जाओ, अब तुम्हें मैं लॉलीपॉप नहीं दूंगा। फिर आप कैसे यह कैसे सोच सकते हैं कि जो सरकार आपको करोड़ों रुपए का विज्ञापन दे रही है वह आपसे अपेक्षा नहीं रखेगी?
सरकारें अपेक्षा रखती हैं। बहुत ज्यादा अपेक्षा रखती हैं। तभी तो केंद्र में इतना भारी भरकम सूचना और प्रसारण मंत्रालय अस्तित्व में है। राज्य में डिपार्टमेंट आॅफ पब्लिक रिलेशन है। यहां तक की जिलों और तहसीलों तक में सूचना विभाग के प्रतिनिधि मौजूद हैं। यही वो लोग हैं जो मीडिया और सरकार के बीच रिलेशनशिप बनाए रखते हैं। इन्हीं के माध्यम से अखबार या चैनल्स को विज्ञापन मिलता है जहां से करोड़ों रुपए की आमदनी मीडिया हाउसेस के खाते में जाती है। बताइए जरा इतनी भारी भरकम रकम देने वाली सरकार क्यों नहीं अपेक्षा रखेगी। लेकिन क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि सरकार के हाथों मीडिया हाउसेस बिक गई?

इसका जवाब न में हैलोकतंत्र का चौथा स्तंभ इतना भी कमजोर नहीं है।
विज्ञापन एक साधन है, साध्य नहीं। यह सरकार की भी मजबूरी है कि वह विज्ञापन देकर अपने कार्यों का प्रचार-प्रसार करवाए। अखबार के पन्नों और चैनल्स की टाइमिंग में सभी के रेट्स तय हैं। सब इसी के अनुसार होता है। हां सरकार जरूर चाहती है कि उसके कामों का न्यूज के जरिए भी प्रचार प्रसार हो, ताकि आम लोग लाभांवित हो सके। अब इस अपेक्षा को हस्तक्षेप मान लिया जाए तो इसमें दोष किसका है? अगर हस्तक्षेप कह दिया जाए तो सरकार के इतने बड़े-बड़े घोटाले मीडिया के जरिए कैसे सामने आ जाते हैं? क्यों मीडिया की ही रिपोर्ट पर कई मंत्री और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक चली जाती है। यह मीडिया की मजबूती ही है कि वह अपेक्षा और हस्तक्षेप में समानांतर लकीर खींच कर चलती है। अब बात आती है कि आखिर क्यों मीडिया का एक तबका अपने ही प्रोफेशन को बिका हुआ बताने पर तुला हुआ है।
इस सवाल का जवाब देने से पहले अपनी निजी जिंदगी के दो अनुभवों से आपको रू-ब-रू करवाता हूं।
पहला अनुभव है उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का। जुलाई 2011 की बात है। पत्रकार से नेता बने रमेश पोखरियाल निशंक उस वक्त उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे। वे खुद दैनिक जागरण में रिपोर्टर के तौर पर नौकरी कर चुके थे। एक अच्छे पत्रकार के रूप में उनकी पहचान थी, शायद आज भी उनके स्वामित्व का एक समाचार पत्र देहरादून से प्रकाशित होता है। बाद में वे राजनीति में आ गए। राजनीतिक पारी दमदार तरीके से निभा रहे हैं। उत्तराखंड सरकार में मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचना एक बड़ी उपलब्धि रही। इस वक्त हरिद्वार से सांसद भी हैं। 

तो मैं बता रहा था निशंक मुख्यमंत्री थे। चूंकि मुख्यमंत्री बनने से पहले वे स्वास्थ मंत्री थे, इसलिए यह विभाग भी उन्होंने अपने ही पास रखा था। मैं उस वक्त देहरादून में दैनिक जागरण ग्रुप के बाइलिंगवल टैब्लॉइड न्यूजपेपर ‘आई-नेक्स्ट’ का संपादकीय प्रभारी था। भारत में टैब्लॉइड जर्नलिज्म के क्षेत्र में जागरण गु्रप का यह अभिनव प्रयोग था। टैब्लॉइड जर्नलिज्म के इतिहास को जानेंगे और पढ़ेंगे तो समझ में आएगा टैब्लॉइड जर्नलिज्म का मतलब था सनसनी। पर आई-नेक्स्ट ने इसके विपरीत आम लोगों की भाषा में अखबार निकालकर और गंभीर पत्रकारिता के जरिए अपनी अलग पहचान कायम थी।
आई नेक्स्ट की रिपोर्टिंग टीम में आफताब अजमत मेडिकल और एजुकेशन की बीट कवर करते थे। आफताब इन दिनों अमर उजाला देहरादून की सिटी टीम को हेड कर रहे हैं। उन दिनों हेल्थ बीट उन्हें नई-नई मिली थी। उनके हाथ एक दस्तावेज लगा। यह दस्तावेज क्या था बम था। धमाका था। वे उसे लेकर मेरे पास आए। कहा, सर इस दस्तावेज को देखिए मुझे तो बड़ा घालमेल वाला मामला लग रहा है। मैंने उस दस्तावेज को रख लिया और कहा कल इसे देखेंगे। आज वाली खबरों पर फोकस करो। दूसरे दिन सुबह की मीटिंग के बाद जब मैंने दस्तावेज का अध्ययन किया तो बड़ी खबर हाथ लग गई। मेरी एक दो और क्योरी थी, जिसे आफताब ने अपने सूत्रों से बातचीत कर क्लियर कर दिया। शाम तक एक बड़ी खबर डेवलप हुई।
खबर सीधे तौर से मुख्यमंत्री से जुड़ी थी। उनके स्वास्थ विभाग में बड़ा घोटाला हो रहा था। एक साधारण इंजेक्शन जिसकी मार्केट वैल्यू रीटेल में 4 रुपए थी, उसे करीब 15 रुपए के हिसाब से खरीदा जा रहा था। जबकि थोक भाव में वही इंजेक्शन करीब दो रुपए पचास पैसे की पड़ रही थी। इसी तरह करीब 35 दवाइयों और लाइफ सेविंग इंजेक्शन की पूरी डिटेल हमारे पास थी। बड़ी खबर बन गई। पूरे तथ्यों के आधार पर।

आई-नेक्स्ट अब जागरण के मूल अखबार के साथ मर्ज हो गया है। नाम भी इसका दैनिक जागरण आई-नेक्स्ट हो गया है। अब तो कोई कॉम्टिशन ही नहीं। पर उस दौर में एक ही आर्गेनाइजेशन के अखबारों के बीच जबर्दस्त प्रतिद्वंदिता थी। यह प्रोफेशनल कॉम्पिटशन था। कोई निजी अदावत नहीं थी। खैर हम लोगों ने यह खबर चुपके-चुपके बनाई। आज यह बड़ा हास्यास्पद लगता है, पर उस वक्त दोनों ही तरफ के लोगों को यह शक होता था कि हमारी खबरें चुरा ली जाती हैं। मैंने यह पेज और खबर अंतिम समय तक अपनी टीम से भी डिस्कस नहीं की। सिर्फ मुझे और आफताब को इस बात की जानकारी थी। पेज डिजाइनर हरीश भट्ट से पेज बनवाकर मैंने उसे अलग फोल्डर में रखवा दिया।
इतना तो तय था कि कल उत्तराखंड सरकार की थू-थू तो होगी और मामला गरम होगा। जागरण के संपादक थे कुशल कोठियाल जी। वह अब स्टेट हेड के तौर पर जागरण में हैं। हमेशा मेरे आदरणीय रहे। हमारी टीम में भले ही अंदरुनी तौर पर प्रोफेशनल कॉम्पिटशन था पर हम दोनों के बीच ऐसी कोई बात नहीं थी। मैं हर बात उनसे शेयर करता था। खासकर किसी बड़ी खबर को लेकर। रात साढ़े दस बजे मैं ऊपरी तल पर उनके पास गया। वहां उनसे इस खबर के बारे में चर्चा की। वे हैरान हो गए। बोले, यह तो बहुत बड़ी खबर है। पूछा आपके पास सभी तथ्य तो हैं। मैंने कहा बिल्कुल। उन्होंने एप्रीशिएट किया, पर उनकी भी दाद देनी होगी, उन्होंने भी अपनी टीम को इसकी भनक तक नहीं लगने दी कि सुबह क्या धमाका होने जा रहा है।

जैसा की उम्मीद थी सुबह खबर के प्रकाशित होते ही सरकार की हालत खराब हो गई। विरोधियों ने सरकार को निशाने पर ले लिया। सरकार के पुतले फूंके जाने लगे। हाल यह हुआ कि दिल्ली में कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर प्रेस कॉन्फे्रंस तक कर दी। चूंकि मामला स्वास्थ विभाग से जुड़ा था और यह विभाग मुख्यमंत्री निशंक के पास ही था, इसलिए निशंक की अपनी ही पार्टी के लोग भी मुखर हो गए।

बात यहीं थमती तो ठीक। पर निशंक ने सीधा फोन किया जागरण के मालिकों को। चूंकि वे जागरण में ही रिपोर्टर रह चुके थे। इसलिए मालिकों से उनके सीधे संबंध थे। सीधा फोन गया नोएडा में बैठे संजय गुप्ता जी के पास। उनका फोन आया जागरण देहरादून के यूनिट हेड अनुराग गुप्ता जी के पास। सभी तरफ जबर्दस्त टेंशन का माहौल बन गया था। मेरी भी पेशी हो गई। यूनिट हेड अनुराग जी के केबिन में मैं, कुशल जी और अनुराग जी बैठे थे। संजय गुप्ता जी उधर से फोन पर थे। फोन स्पीकर पर करवा दिया गया था। पहला सवाल मुझसे पूछा गया। क्या आपकी खबर सही है। मैंने पूरे कॉन्फिडेंस के साथ कहा, हां। यह पूरी तरह तथ्यों के आधार पर है। फिर सवाल कुशल कोठियाल जी से था। वह रेफरी की भूमिका में थे। उनसे भी यही पूछा गया। कुशल जी ने भी कहा सर खबर काफी अच्छी है और पूरे तथ्यों के आधार पर है। फिर सवाल था, तो मुख्यमंत्री क्यों नाराज हैं? निशंक कुशल जी के अच्छे मित्रों में रहे हैं।

कुशल जी ने बताया कि मेरे पास भी निशंक जी का फोन सुबह-सुबह आया था। वो खबर के लिए नाराज नहीं थे, बल्कि खबर के साथ उनकी बड़ी सी फोटो लग गई है इसीलिए नाराज हैं। उनको खबर से अधिक फोटो से आपत्ति है। कुणाल युवा खून हैं। उन्होंने अति-उत्साह में उनकी बड़ी फोटो भी लगा दी थी। मुझे अति-उत्साह से बचने की सलाह देने के साथ बरी कर दिया गया।
पर असली कांड अब शुरू हुआ। एक मालिक, एक डायरेक्टर और संपादक की हैसियत से संजय गुप्ता जी ने जो कुछ भी किया वह मेरी पत्रकारिता की जिंदगी के लिए एक सबक बन गया। दरअसल उत्तराखंड सरकार ने जागरण गु्रप को झुकाने के लिए दो दिन बाद प्रकाशित होने वाले सप्लीमेंट से अपना हाथ एक झटके में पीछे खींच लिया था। मुझे ठीक से तो मालूम नहीं, लेकिन यह विज्ञापन डील करीब 35 से 40 लाख रुपए की थी। संजय गुप्ता जी ने साफ निर्देश दिया। अगर खबर सही है। तथ्यात्मक है। किसी बायसनेस से नहीं है, तो फिर झुकने की जरूरत नहीं। ऐेसे लाखों रुपए की कोई वैल्यू नहीं। खबर है तभी अखबार है।

कुशल जी को निर्देश मिले कि जो आई-नेक्स्ट में प्रकाशित होगा वही खबरें आप भी जागरण के मुख्य एडिशन में लगाएं। मन गदगद हो गया। कहां मैं कठघरे में था, कहां पूरे ग्रुप के संपादक ने खबरों को लेकर ऐसा स्टैंड लिया। मन हो रहा था, काश फोन की जगह सामने संजय गुप्ता जी होते, सैल्यूट जरूर कर देता। पूरे तेवर के साथ खबरों को लगाया गया। जबर्दस्त फॉलोअप में पूरी टीम को झोंक दिया गया। एक से बढ़कर एक फॉलोअप किया गया। एक फॉलोअप की चर्चा जरूर करना चाहूंगा।

हमारी टीम सभी सरकारी अस्पतालों में गई। जिन मरीजों को मुफ्त में दवाइयां दी जाती थीं, उनसे भी कैसे बाहर से दवाइयां मंगाई जा रही थी, इसकी पड़ताल की गई। इसी को फोकस करती हुई खबर प्रकाशित हुई...हेडिंग थी .. यह घोटाला करतम सिंह के साथ है.. दरअसल करतम सिंह एक मरीज का नाम था। करतम सिंह बाद में घोटाले का पोस्टर ब्वॉय बन गए। स्टोरी का थीम था कि चलो महंगी दवाइयां खरीद ली गई, पर यह करतम सिंह जैसे जरूरतमंद मरीजों तक तो पहुंचे।

उधर, सबसे खराब स्थिति निश्ांक जी की थी। कहां वो जागरण के मालिकों से सीधी बात कर अपनी हनक दिखा रहे थे। लाखों का विज्ञापन रोक कर दबाव बना रहे थे। कहां, अब लारजेस्ट सर्कुलेशन वाले अखबार में उनकी पोल पट्टी खुलने लगी। आई-नेक्स्ट का सर्कुलेशन देहरादून सिटी तक ही सीमित था, क्योंकि इसे शहर का अखबार ही बनाया गया था। लेकिन जागरण की धमक पूरे उत्तराखंड में थी। दैनिक जागरण के जरिए देहरादून से लेकर गंगोत्री तक उत्तराखंड सरकार का दवाई घोटाला सामने आ गया। हर तरफ सरकार की थू-थू होने लगी। सरकार बैकफुट पर आ गई। अनआॅफिशियली सबसे पहले विज्ञापन रोकने को लेकर माफी मांगी गई। सप्लीमेंट का प्रकाशन भी हुआ। बावजूद इसके दवाई घोटाले से जुड़ी खबरें नहीं रुकी। उधर, सरकार ने अपनी साख बचने के लिए दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की। हालांकि बाद में निशंक को भी इस्तीफा देना पड़ा था। आॅफ द रिकॉर्ड यही दवा घोटाला निशंक की कुर्सी खिसकाने के लिए जिम्मेदार था।

लौटते हैं मोदी सरकार के सेंसरशिप वाले प्रोपेगेंडा की तरफ। मीडिया के ही कुछ शहीद टाइप पत्रकारों ने यह बात फैलानी शुरू की है कि मोदी सरकार ने मीडिया पर लगाम कस रखा है। पर यही शहीद पत्रकार वेब मीडिया पर, सोशल मीडिया पर अपनी खूब भड़ास निकाल रहे हैं। इनसे कोई क्यों नहीं पूछता कि यहां उन पर लगाम क्यों नहीं लग रही?

दरअसल बात पत्रकारिता में बैलेंंस और बायसनेस की है। आपकी रिपोर्ट कितनी बैलेंस है, इस पर निर्भर करती है आपकी क्रेडेबिलिटी। हर चीज को अगर आप बायसनेस से रिपोर्ट करेंगे तो किसी को भी कष्ट होगा ही। खासकर आपके संस्थान को, क्योंकि उसकी क्रेडेबिलिटी डाउन होती है। बार-बार की चेतावनी के बाद भी अगर आप एजेंडा पत्रकारिता करेंगे तो आपका खात्मा तय है। कारक कोई भी हो सकता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि तमाम घोटाले पत्रकारों ने ही उजागर किए हैं। वो आज भी उसी हनक के साथ पत्रकारिता कर रहे हैं। कोई भी सरकार नहीं चाहती कि मीडिया से उसका छत्तीस का आंकड़ा हो। निंदक नियरे राखिए के फॉर्मूले पर सरकार चलती है। लोकतंत्र चलता है। तमाम खबरों पर ही सरकार एक्शन लेती है, तभी पत्रकारिता की साख कमजोर नहीं होती है। यह नहीं भूलना चाहिए। पत्रकार के तौर पर आप सरकार को आइना दिखाइए। एजेंडा मत चलाइए।

दूसरे भाग में एक और उदाहरण के जरिए आपको बताऊंगा कि अगर आपकी पत्रकारिता बायसनेस से भरी नहीं है तो सरकार क्यों आपके साथ चलती है।

Wednesday, August 22, 2018

हे! बीजेपी के कर्णधारों अटल जी की आत्मा तुम्हें कभी माफ नहीं करेगी



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आराध्य अटल बिहारी वाजपेयी जी की शवयात्रा में जो उदाहरण प्रस्तुत किया वह अतुलनीय है। यही हिन्दु संस्कार है। शवयात्रा में शामिल लोग पार्थिव देह के पीछे-पीछे शवदाह गृह तक जाते हैं। प्रधानमंत्री और बीजेपी के राष्टÑीय अध्यक्ष सहित कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सांसद, वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ताओं ने इसी वैदिक परंपरा का निर्वहन किया। पूरा विश्व इसका साक्षी बना। पर अब जो बीजेपी कर रही है उसने तो संपूर्ण हिन्दू वैदिक परंपरा का मजाक ही बना डाला है। एक ऐसा मजाक जिसे अटल जी आत्मा कभी माफ नहीं करेगी। हिन्दू धर्म और वैदिक परंपरा की दुहाई देने वालों ने राजनीति के हमाम में अपना एक ऐसा दुषित चेहरा सामने ला दिया है जिससे हर एक हिन्दू शर्मशार है। जिस शवयात्रा में पैदल चलने को वैदिक संस्कार माना गया, क्यों उसी संस्कार को बीजेपी के कर्णधारों ने अस्थि कलश के विसर्जन में तिलांजलि दे दी। आइए पहले समझते हैं कि वैदिक परंपराओं में अस्थि विसर्जन को लेकर क्या-क्या कहा गया है।

आपने कभी सोचा है कि क्यों अपने प्रियजनों की मृत्यु के वक्त हम गंगाजल उनके मुंह में डालते हैं?

इसका सीधा जवाब है। वैदिक काल से यह परंपरा चली आ रही है। वेद पुराणों में भी इसका कई जगह वर्णन मिलता है। माना जाता है कि गंगा जीवनदायनी है। इसमें स्रान करने मात्र से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। यहां तक की मृत्यु के बाद भी गंगा नया जीवन प्रदान करने वाली मानी जाती है। यही कारण है कि दाह संस्कार के बाद भी एक वैदिक संस्कार के निर्वहन के लिए हम मां गंगा के तट तक जाते हैं। माना जाता है कि इसके बिना किसी मृत देह से आत्मा की मुक्ति संभव नहीं।

आइए एक नजर वैदिक और वैज्ञानिक तथ्यों पर भी डालें

आपमें से अधिकतर लोगों ने डीएनए जांच की बात सुनी होगी। डीएनए को लेकर सामान्य सी बात हम सभी समझते हैं कि मृत्यु के काफी समय बाद भी, मृत शरीर के जला देने के बाद भी, लाश सड़गल जाने के बाद भी दांत, हड्डी, नाखून या एक छोटे बाल से भी डीएनए टेस्ट के द्वारा हम उस मनुष्य के बारे में सभी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। अब इसका वैदिक आधार आपको समझने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। कहने का तात्पर्य है कि मृत शरीर का जब दाह संस्कार किया जाता है उसके बाद चिता की राख को एकत्र कर हम उसे किसी नदी में प्रवाहित कर देते हैं। अमूमन गंगा में प्रवाहित करने की प्रथा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शरीर जल जाने के बाद भी राख में मौजूद हड्डी, दांत आदि में आत्मा का बसेरा होता है। उसमें स्पंदन होता है। वह तभी मुक्ति पाती है जब तक की उसे जल में प्रवाहित न किया जाए। अस्थियों में विद्यमान मृतदेह के अवशेष के एक छोटे से कण के स्पंदन तथा तरंगें भी व्यक्ति के स्पंदन तथा तरंगों से मेल खाती हैं। वैदिक आधार है कि अनिष्ट शक्यिां मृत देह की अस्थियों में स्पंदन के कारण अपना निवास खोजती हैं। यह अनिष्ठ शक्तियां जैसे भूत-प्रेत-पिसाच तामसिक स्वरूप के होते हैं और ये मृत शरीर और उनकी अस्थियों के मध्य एक सूक्ष्म बंधन में बंधे होते हैं। इसी कारण माना जाता है कि जब अस्थियों का विसर्जन हो गया तो मृत शरीर से निकली आत्मा ने मुक्ति पा ली।
जिस डीएनए टेस्ट की बात मैंने ऊपर की है वह मृत शरीर के अवशेषों का स्पंदन ही होता है। अग्नि संस्कार के बाद अस्थियों का जल में विसर्जन करने के पीछे भी वैदिक संस्कार और आधार ही है। मृत पुर्वजों को मृत्योत्तर जीवन में गति मिले और उनके जीवित परिजनों पर न्यूनतम नकारात्मक प्रभाव हो, यही इसका प्राथमिक उद्देश्य है ।
गरुड़ पुराण भी में इस बात का जिक्र है कि अस्थियां एकत्र करने के बाद तत्काल उसका विसर्जन जरूरी होता है। हालांकि विभिन्न हिन्दू परंपराओं में इसके दिन को लेकर अलग-अलग प्रचलन और मान्यताएं मौजूद है। पर सामान्यत: तीन दिन बाद अस्थियां एकत्र की जाती हैं। माना जाता है कि दाह संस्कार के बाद दो से तीन दिन तक वहां अग्नि का वास होता है। इस राख को ठंडा होने के बाद अस्थियां एकत्र की जाती हैं। गरुड़ पुराण ही कहता है कि तीन दिन के बाद अगर किसी कारणवश इसका विसर्जन संभव नहीं तो इसे घर में नहीं रखना चाहिए, इसे मिट्टी के कलश में बंद कर घर के बाहर किसी वृक्ष पर लटका देना चाहिए। पुराणों में कहा गया है कि जल सर्वसमावेशक होता है। अत: वह अस्थियों में विद्यमान मृतदेह के शेष स्पंदनों को अपने अंदर समाहित कर लेता है।

आइए अब सांसरिक लोक में लौटते हैं

ये तो रही वैदिक बातें। अब सांसरिक दुनिया में आते हैं। हरदिल अजीज नेता अटल जी की मृत्यु के बाद क्या हुआ इस पर फिर से लौटते हैं। शवयात्रा में वैदिक परंपराओं का निर्वहन करनेवालों ने अस्थि विसर्जन को इतना राजनीतिक अखाड़ा क्यों बना दिया है? अटल जी के दाहसंस्कार के बाद सबकुछ बेहतर हुआ। सभी रीति रिवाजों से उनकी अस्थियां एकत्र की गर्इं। परिजनों के हाथों उसका मां गंगा की कोख में विसर्जन भी कर दिया गया। वैदिक परंपरा तो कहती है कि यहीं उस मृत आत्मा की यात्रा संपन्न हो गई।

पर बीजेपी क्या कर रही है? 

अब भी अटल जी की अस्थियों को विभिन्न कलशों में लेकर पूरे देश में यात्राएं निकाल रही है। आखिर अटल जी की अस्थियों को इतना ग्लैमराइज करने की क्या जरूरत आ पड़ी है। बीजेपी की इस अस्थि नौटंकी में राजनीति की शुरुआत तो उसी दिन हो गई थी जब अस्थियों को हरिद्वार लाया गया था।

उत्तराखंड की धरती से शुरू हुआ यह अस्थि पॉलिटिक्स अब कई राज्यों में अपना जलवा दिखाएगा। पहला जलवा तो हरिद्वार से ही शुरू हो गया। उत्तराखंड के दो कैबिनेट मंत्रियों सतपाल महाराज और मदन कौशिक की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता सामने आई। सतपाल महाराज जहां इन अस्थियों को प्रेमनगर आश्रम में रखवाना चाहते थे, बात लगभग फाइनल भी हो गई थी, लेकिन मदन कौशिक ने अपना दबाव कायम कर इसे शांतिकुंज में रखवाने का प्रोग्राम बना डाला। बात यहीं थम जाती तो ठीक था, पर हुआ क्या? फाइनली न तो प्रेमनगर से अस्थि यात्रा निकली न शांतिकुंज से। यात्रा निकली भल्ला इंटर कॉलेज से। यह वही इंटर कॉलेज है जहां कभी अटल जी ने अपनी जनसभाएं की थी। भल्ला इंटर कॉलेज ने बीजेपी के दिग्गज नेताओं के बीच सीधे टकराव को तो टाल दिया, लेकिन मैसेज क्या गया?

मैसेज साफ है। यह अस्थि यात्रा सिर्फ एक राजनीतिक प्रोपगेंडा है। वोटों के धु्रवीकरण का एक नायाब तरीका है। अटल जी जैसी शख्शियत की मृत्यु को राजनीतिक महत्वाकांक्षा की बलिवेदी पर चढ़ाना है। यह बेहद दुखद स्थिति है। जिस वैदिक परंपरा की दुहाई दी गई, उसी वैदिक परंपरा को तार-तार किया जा रहा है। जिस धूमधाम से विभिन्न राज्यों के बीजेपी प्रभारियों या बड़े नेताओं के बीच अस्थि कलश का वितरण किया गया उसे देखकर दुख हुआ। अब उसी तरीके से विभिन्न राज्यों में इन अस्थियों के विसर्जन का पूरा शेड्यूल मीडिया के पास भेजा जा रहा है।

जब हरिद्वार में मुक्ति मिल गई तो फिर अस्थियों के अवशेषों को सहेजने की जरूरत नहीं थी। अगर बीजेपी को अटल जी की मौत का राजनीतिक फायदा ही लेना था तो वैदिक परंपराओं के साथ नहीं खेलना चाहिए था। अटल जी याद में तमाम कार्यक्रमों का आयोजन किया जा सकता था। श्रद्धांजलि सभाओं का वृहत आयोजन किया जा सकता था। उनकी जिंदगी की यादों, उनको मिले सम्मानों आदि के साथ एक बस या ट्रेन को डेकोरेट कर पूरे देश भर में निकाला जा सकता था। अटल यात्रा के नाम से उनकी जीवनी को पूरे देश में प्रदर्शित करने से भी राजनीतिक फायदा उठाया जा सकता था। ‘रथयात्रा’ बीजेपी के लिए जीवन दायनी बनी थी। ठीक उसी तरह उत्तरप्रदेश सहित तमाम राज्यों में रथयात्रा के रूप में अटल यात्रा का आयोजन किया जा सकता था।

पर अफसोस ऐसा नहीं हो सका। वैदिक परंपराओं के अनुसार आज भी अटल जी की आत्मा अपनी मुक्ति की राह देख रही होगी। मुक्ति के मार्ग पर चली उनकी यह अस्थि यात्रा कब जाकर समाप्त होगी, इसका इंतजार रहेगा। पर हिन्दू धर्म की दुआई देने वालों ने हिन्दू धर्म की सारी परंपराओं का सर्वनाश कर दिया है। इसका मुझे अफसोस रहेगा।

Saturday, August 18, 2018

गुरू ! वो कॉमेडी का मंच नहीं था कि उठे और लिपट लिए


अपने इसी कॉलम ‘मंथन’ में मैंने पिछली बार सिद्धू के पाकिस्तान जाने का समर्थन किया था। मैंने लिखा था यह दोस्ती से ज्यादा एक राजनीतिक मंच है। वह भी ऐसे देशों के बीच जहां दोस्ती को भी शक की निगाह से देखा जाता है। ऐसे में इमरान खान की तरफ से बढ़े दोस्ती के हाथ को भी संभल कर मिलाने में ही भलाई होगी। सिद्धू को पाकिस्तान जाने से पहले मंथन जरूर करना चाहिए था। पर शायद अति उत्साह में वह जो कर बैठे हैं वह लंबे समय तक भारतीयों को सालता रहेगा।
नवजोत सिंह सिद्धू एक क्रिकेटर, एक कमेंटेटर, एक हास्य कलाकार, एक होस्ट के अलावा कांग्रेस के बड़े नेता हैं। पर अब वो भारतीयों के नजर में एक खलनायक की भूमिका में भी नजर आएंगे। पाकिस्तान में उनके क्रिकेटर दोस्त के साथ दोस्ती निभाते निभाते उन्होंने अपने देश में एक झटके में कई दुश्मन बना लिए। हाल यह हुआ है कि उनकी अपनी ही पार्टी उनसे किनारा करने में भलाई समझ रही है। सिद्धू का पाकिस्तान जाना शुरू से ही विवादों को जन्म दे रहा था। तमाम तर्क और वितर्क के बीच उन्होंने वीजा के लिए अप्लाई किया। सिद्धू के अलावा कई अन्य भारतीय क्रिकेटर्स के साथ भी इमरान खान के अच्छे रिश्ते हैं। इन्हीं रिश्तों को और मजबूती देने के लिए उन भारतीय क्रिकेटर्स को भी इमरान ने न्योता भेजा था। पर सिद्धू के अलावा सभी ने शुरूआती दौर से ही इस न्योते को नकार दिया था।
सिद्धू ने सभी आलोचनाओं को दरकिनार कर न्योता कबूल किया। कई प्लेटफार्म पर इसकी तरीफ भी की गई। मैंने खुद इस कॉलम में सिद्धू की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि खेल के मैदान में जिस तरह खेल की भावना दिखती है वैसी ही भावना यहां दिखनी चाहिए। यह राजनीतिक मंच नहीं बनना चाहिए। यह स्पोर्ट्स स्प्रीट के साथ की जाने वाली डिप्लोमेसी है। इसी स्प्रीट के साथ इसे अंजाम तक पहुंचाना चाहिए। शायद मैं गलत था। मैं सिद्धू की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भांप नहीं सका। क्योंकि सिद्धू शुरू से ही इस मामले का राजनीतिकरण करना चाहते थे। वे शायद यह दिखाना चाहते थे कि कांग्रेस कितनी उदारवादी नीति का अनुसरण कर रही है।
यही कारण है कि उन्होंने वीजा अप्लाई करते ही मीडिया में यह बात उछाल दी कि अब केंद्र सरकार के ऊपर है कि वह उन्हें जाने की परमिशन देती है की नहीं। सिद्धू की मंशा उसी वक्त जाहिर हो गई थी जब उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार को बीच में घसीट लिया था। भला केंद्र को क्या आपत्ती होगी। क्या मोदी सरकार के रणनीतिकार इतने कमजोर हैं जो बैठे बिठाए विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा दे देंगे। तत्काल सिद्धू को ग्रीन सिग्नल मिल गया। अब सिद्धू के पास वो बहाना भी नहीं था कि वे नहीं जा सकते। जबकि फिर दोहरा दूं कि उनके हमराही रहे दोस्तों ने इमरान के न्योते को बिना किसी हिचक के साथ अस्वीकार कर दिया था।
इसी बीच अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सर्वमान्य नेता के देहांत ने पूरे देश को शोकाकुल कर दिया। सिद्धू के ही पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी सहित तमाम दिग्गज कांग्रेसी नेता न केवल एम्स में अटल जी का हाल पूछने गए, बल्कि उनके देहावसान से लेकर उनके अंतिम संस्कार तक पूरे समय मौजूद रहे। क्या सिद्धू को अपनी दोस्ती इतनी प्यारी थी कि वे एक बड़े नेता को श्रद्धांजलि देने तक का समय नहीं निकाल पाए। बताता चलूं कि अमृतसर होते हुए बाघा बॉर्डर पहुंचे सिद्धू ने अमृतसर में समय निकालकर वहां आयोजित कार्यक्रम में भी भाग लिया था। एक तरफ जहां पूरा देश शोकाकूल था, अटल जी को याद कर रहा था। सिद्धू के मूंह से उनके लिए दुख के एक शब्द नहीं निकले। सिद्धू को अपने यहां बुलाकर इमरान ने भले ही दोस्ती का पैगाम भेजा हो। पर इससे कौन इनकार कर सकता है कि पाकिस्तान में कमान पूरी तरह सेना के हाथ में होती है। पाक सेना ने सिद्धू के आने पर अपनी पूरी स्ट्रेटजी तैयार की और इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में जो कुछ भी हुआ उसे पूरे विश्व ने देखा।
डिप्लोमेटिक स्ट्रेटजी में पाकिस्तान ने सिद्धू को ऐसी बुरी तरह घेर कर रख दिया कि अब सिद्धू को न इसे निगलते बनेगा न उगलते। पाक सेनाध्यक्ष को गले लगाने पर भारतीयों का गुस्सा सोशल मीडिया पर साफ तौर पर नजर आया। आम लोगों के गुस्से को देखते हुए कांग्रेस ने भी सिद्धू की इस हरकत से खुद को अलग रखना ही बेहतर समझा। इमरान खान के शपथ ग्रहण की तस्वीर और वीडियो के वायरल होते ही लोगों की टिप्पणियों की झड़ी लग गई। तस्वीरों और वीडियो में सिद्धू को साफ तौर पर पाक सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के गले लगते देखा जा सकता है। जिस आत्मीयता से सिद्धू ने उन्हें लगाया वह अपने आप में कई सवालों और शंकाओं को जन्म दे गया। सवाल उठने लगे कि यह पाक सेना प्रमुख की सोची समझी रणनीति का हिस्सा था या सिद्धू की बचकानी हरकत। यह महज संयोग नहीं हो सकता कि जिस वक्त इमरान खान शपथ ले रहे थे पाकिस्तानी सेना द्वारा जम्मू कश्मीर बॉर्डर पर भारत की तरफ गोले दागे जा रहे थे और इधर गले लगाने का कार्यक्रम चल रहा था। गले लगने के बाद एक और वीडियो सामने आया जिसमें सिद्धू को पाक अधिकृत कश्मीर के राष्टÑपति मसूद खान के साथ बैठा देखा जा सकता है। क्या सिद्धू की राजनीतिक समझ इतनी कमजोर है कि वह पाकिस्तान की इस डिप्लोमेटिक स्ट्रेटजी को भांप नहीं सके। क्रिकेट की पिच पर अपने प्रतिद्वंदियों का सामना करने के लिए जितनी स्ट्रेटजी और प्लानिंग करनी पड़ती है, उससे भी कहीं ज्यादा सियासत की जमीन पर तैयारी करनी पड़ती है। वह भी जब सामने पाकिस्तान जैसा देश हो। तो क्या मान लिया जाए कि सिद्धू जैसा क्रिकेट का बड़ा खिलाड़ी और सियासत का दलबदलू खिलाड़ी पाकिस्तान के लिए किसी तैयारी के साथ नहीं गया था। शपथ ग्रहण समारोह में अन्य देशों के प्रतिनिधि भी पहुंचे थे। वे डिप्लोमेट्स के लिए निर्धारित स्थान पर बैठे थे। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि सिद्धू पीओके राष्टÑपति के ठीक बगल में बैठ गए। यह मान भी लिया जाए कि पाकिस्तान ने सिद्धू के लिए वहां स्थान निर्धारित किया था, लेकिन क्या सिद्धू इस बात को भांप नहीं सके कि आखिर उनको ही यह स्थान क्यों दिया जा रहा है? 

सिद्धू को यह नहीं भूलना चाहिए था कि वह एक दोस्त से ज्यादा करोड़ों भारतवासियों का वहां प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनकी हर एक हरकत पर भारतीयों की नजर होगी। आज भारत का हर एक व्यक्ति आशंकित है कि सिद्धू की तस्वीरों का पाकिस्तान किस प्लेटफॉर्म पर कैसे इस्तेमाल करेगा। एक दोस्त के नाते सिद्धू ने जरूर दोस्ती निभाई, लेकिन एक भारतीय होने के नाते सिद्धू ने क्या किया इसे पूरे विश्व ने देख लिया। सिद्धू ने इमरान खान के शपथ समारोह की सराहना करते हुए कहा है कि उनके लिए यह एक बहुत भावुक अवसर है। वह अत्यंत भाग्यशाली हैं कि उन्हें इमरान खान को देखने का मौका मिला। उन्होंने कहा, मेरा यार दिलदार, वजीर-ए-आजम पाकिस्तान। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनका यार पीठ पर वार न करे। क्योंकि जब-जब ऐसी दोस्ती का पैगाम सरहद पार से आया है पीठ पर वार ही हुआ है।

Thursday, August 16, 2018

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?



कहीं सुना था...जिंदगी की शोर, राजनीति की आपाधापी। रिश्ते नातों की गलियों और क्या खोया क्या पाया के बाजारों से आगे, सोच के रास्ते पर कहीं एक ऐसा नुक्कड़ आता है जहां पहुंच कर इंसान एकांकी हो जाता है। तब जाग उठता है कवि। फिर शब्दों के रंगों से जीवन की अनोखी तस्वीरें बनती हैं। कविताएं और गीत सपनों की तरह आते हैं और कागज पर हमेशा के लिए अपने घर बना लेते हैं। अटल जी की कविताएं ऐसे ही पल, ऐसे ही क्षणों में लिखी गर्इं। जब सुनने वाले और सुनाने वाले में तुम और मैं की दीवारें टूट जाती हैं। दुनिया की सारी धड़कनें सिमट कर एक दिल में आ जाती हैं। और कवि के शब्द दुनिया के हर संवेदनशील इंसान के शब्द बन जाते हैं।

इमरजेंसी के दौर में जब बंगलौर की जेल में अटल जी थे तब उनकी तबियत खराब हो गई थी। उन्हें दिल्ली लाया गया। यहां आॅल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट एंड साइंस (एम्स) में रखा गया था। चौथी या पांचवीं मंजिल पर उनका कमरा था। चारों तरफ काफी सुरक्षा थी। रोज सुबह करीब पांच से साढ़े पांच बजे के बीच अटल जी की नींद खुल जाती थी। उनकी नींद लोगों के रुदन, क्रंदन से टूटती थी। अटल जी को आश्चर्य होता था रोज सुबह यहां कौन रोता है। अपने लोगों को उन्होंने पता करने के लिए कहा। पता चला कि जहां उनका कमरा था वहां से थोड़ी दूर नीचे की फ्लोर पर एम्स का शवगृह था। एम्स में इलाज के दौरान जिंदगी की जंग हार जाने वालों के परिजनों को रोज सुबह इसी जगह पर शव सौंपा जाता था। वह रुदन क्रंदन की आवाज यहीं से आती थी। अटल जी ने अपने संस्मरणों में बताया था कं्रदन की आवाज दूर से सुनाई पड़ती थी, लेकिन हृदय को चीर कर चली जाती थी। कवि हृदय अटल जी की कलम से जो शब्द निकले वह जगजीत सिंह के द्वारा गायी गई गजलों में आज भी सुनी जाती हैं। उनके शब्द थे..

दूर कहीं कोई रोता है
तन पर पहरा भटक रहा मन
साथी है केवल सुनापन
बिछड़ गया क्या स्वजन किसी का
कं्रदन सदा करुण होता है
दूर कहीं कोई रोता है
जन्मदिवस पर हम इठलाते
क्यूं न मरन त्योहार मनाते
अंतिम यात्रा के अवसर पर
आंसू का अशगुन होता है
दूर कहीं कोई रोता है
अंतर रोये आंख न रोये
धुल जाएंगे स्वप्न संजोए
छल न भरे विश्व में केवल
सपना भी तो सच होता है
इस जीवन से मृत्यु भली है
आतंकित जब गली गली है
मैं भी रोता आसपास जब
कोई कहीं नहीं होता है
दूर कहीं कोई रोता है
पर क्या कोई सोच सकता है जिस एम्स के कमरे में बैठकर उन्होंने मृत्यु से साक्षात्कार करती यह कविता लिखी आज उसी एम्स में वे अंतिम सांस लेंगे। यह अटल जी का निश्चछल और पवित्र दिल ही था जिसने कभी सच्चाई से मुख नहीं मोड़ा। उस अटल सत्य को उन्होंने कविता की पंक्तियों में ढालकर अपनी मौत को भी अमर कर दिया। आज पूरा देश रो रहा है। कं्रदन ऐसा है कि सभी नि:शब्द हैं। मौत साश्वत है। पर इस सत्य को कोई स्वीकार नहीं कर पा रहा है। उनके चाहने वाले कं्रदन कर रहे हैं पर दिल से उस शख्स को मृत्युशैया पर नहीं देख पा रहे हैं। यह अटल जी की महानता की पराकाष्ठा ही थी कि आज धर्म, जाति, ऊंच, नीच, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर लोग अपनी भावनाओं को सहेज रहे हैं। उनकी यादों को आत्मसात करने की कोशिश कर रहे हैं।
अपने संस्मरणों को सुनाते हुए उनकी एक रिकॉर्डिंग मेरे आॅडियो कलेक्शन में मौजूद है। उसमें अटल जी कहते हैं। राजनीति की आपधापी और व्यस्तताओं के बीच उन्हें कविता लिखने का अब समय नहीं मिलता। पर पिछले कुछसालों से अपने जन्मदिन के दिन वो एक कविता जरूर लिखते हैं। इन्हीं कविताओं में से उनकी लिखी एक कविता की पंक्तियां हैं.....
जो कल थे वो आज नहीं हैं
जो आज हैं वो कल नहीं होंगे
होने न होने का क्रम इसी तरह चलता रहेगा
हम हैं हम रहेंगे ये भ्रम भी सदा बनता रहेगा
सत्य क्या है
होना या न होना
या दोनों ही सत्य हैं
जो है उसका होना सत्य है
जो नहीं है उसका न होना सत्य है
मुझे लगता है कि होना या न होना
एक ही सत्य के दो आयाम हैं
इसलिए सब समझ का फेर
बुद्धि के व्यायाम हैं
यह पंक्तियां कोई असाधारण व्यक्ति का स्वामी ही लिख सकता है। अटल जी ऐसे ही असाधारण व्यक्ति थे। शायद यही कारण है कि जब एम्स में उनका इलाज चल रहा था पूरे देश में दुआओं का दौर चल रहा था। सभी राजनीतिक दल के लोग उनकी सेहत का हाल चाल पूछने एम्स पहुंच रहे थे। हर एक व्यक्ति गमगीन था। हर एक की आंखों में आंसू थे। अटल जी जब राजनीति में एक ऊंचे मुकाम पर थे तब भी उनका कवि हृदय हमेशा कुछ न कुछ नया लिखता था। उनके लिखे एक-एक शब्द सौ-सौ गोलियों पर भारी पड़ते थे। इमरजेंसी के दौर में जब एक साल बीत गया था। उस दौरान उनकी लिखी ऐसी ही एक कविता की पंक्तियों में वो कहते हैं..
झुलासाता जेठ मास, शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का, अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
सीकचों में सिमटा जग, किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
पथ निहारते नयन , गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा , मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया
   

अटल जी चाहे संसद के अंदर रहे या बाहर। हमेशा उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा को व्यक्तिगत आरोपों प्रत्यारोपों से दूर रखा। आज उनके जैसे बिरले ही जन प्रतिनिधि दिखते हैं। आज उनका जाना राजनीति के एक स्वर्णिम युग का अवसान है। यह अवसान लंबे समय तक भारतीय लोकतंत्र के प्रहरियों को सालता रहेगा। पूरा देश गमगीन है। रो रहा है। दिल से कोई उनकी मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। पर मृत्यु अटल है। यह समझना भी जरूरी है। अटल जी के शब्दों में ही..
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?
अटल जी जैसा व्यक्ति सदियों में पैदा होता है। वे लौट कर आएंगे या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता है। पर अपने सिद्धांतों और असाधारण व्यक्तित्व के जरिए वो हर एक भारतीय के दिलों में जिंदा रहेंगे। नमन ऐसे ‘अटल’ को।