Saturday, April 4, 2015

सेक्स की आजादी व सशक्तिकरण

मैं चाहूं ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मेरी मर्जी। यही तो दीपिका पादुकोण कह रही हैं। अंग्रेजी में। माई च्वाइस में, शॉर्ट फिल्म के जरिए। 99 सहयोगियों के साथ। मैसेज दे रही हैं। महिला सशक्तिकरण के लिए यह जरूरी है। जिस देश में आज भी सेक्स जैसे मुद्दे पर छिप कर बोला और कहा जाता है। इस मुद्दे को दीपिका ने बेबाकी से उठाया है। बहस छिड़ी है। महिलाओं को सेक्स और सेक्सुअल रिलेशनशिप में भी आजादी मिलनी चाहिए। पर क्या यही महिला सशक्तिकरण है? आधुनिक भारतीय महिलाओं की आजादी और उनके तथाकथित सशक्तिकरण का यही एकमात्र जरिया है। मंथन जरूरी है कि क्या सिर्फ आधुनिक कपड़ों और सेक्स में आजादी से महिला सशक्तिकरण के पैरामीटर तय हो जाएंगे।
कहने को हम 21वीं सदी के बाशिंदे हैं। पूरा देश तरक्की के नए आयाम को महसूस कर रहा है। महिलाएं हर क्षेत्र में बेहतर काम कर रही हैं। ऐसे में दीपिका पादुकोण माई च्वाइस के साथ एक ऐसे मुद्दे को सामने लेकर आई हैं, जिस पर अब भी बहुत लोग खुलकर नहीं बोल पा रहे हैं। सोनाक्षी सिन्हा और आलिया भट्ट ने तो खुलकर बोला। पर क्या इस संवेदनशील मुद्दे और लुक छिप कर टीका-टिप्पणी करने वाले इस मुद्दे पर और कोई खुलकर सामने आया? खासकर महिलाएं या महिला सेलिब्रेटी। जवाब न में होगा। आखिर ऐसा क्यों है कि हम आज भी सेक्स पर बातचीत के मुद्दे पर इतने डरे सहमे हैं। क्यों ऐसी सोच पनपी है कि मैं अगर कुछ बोल दूंगा तो वह क्या सोचेगा। अरे मत बोलो, फैमिली वाले क्या सोचेंगे? यह भारतीय मानसिकता है या दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय संस्कार हैं, जो हमें आज भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर चर्चा करने में शर्म का अहसास दिलाती हैं।
ऐसे में दीपिका का बेबाकी से यह कहना कि महिलाओं को भी यौन इच्छाओं में आजादी मिलनी चाहिए। उसे यह आजादी मिलनी चाहिए कि वह शादी के पहले सेक्स करे या न करे। वह शादी के बाद किसी दूसरे से संबंध रखे या नहीं। वह आजाद ख्यालों के साथ समाज में रहे। एक बार फिर बहुत लोगों को दीपिका की यह बेबाकी अच्छी नहीं लग रही है। भले ही दीपिका की माई च्वाइस शॉर्ट फिल्म को महज चार से पांच दिनों में यू-ट्यूब पर 35 लाख से अधिक हिट मिल चुके हैं पर उंगलियों पर गिने जाने वाले सेलिब्रेटी ने इस पर अपनी राय रखी है। चंद बड़े सितारों को छोड़ दिया जाए तो कोई भी इस इश्यू पर बोल नहीं रहा है। भारतीय समाज में महिलाओं को तो क्या पुरुषों को भी यह आजादी नहीं है कि सेक्स और सेक्सुअल रिलेशनशिप को खुले तौर पर स्वीकार कर लें। उंगलियों पर गिने जाने वाले लोग खुद को गे या लेस्बीन कहलाना पसंद करते हैं। विवाहेत्तर संबंधों की बातें भी परदे के पीछे रहती हैं। लुकछिप कर यह सबकुछ होता है। क्या कोई पुरुष यह कहने की हिम्मत दिखाता है कि उसके विवाहेत्तर संबंध हैं? क्या कोई पुरुष इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर सकता है कि उसके अपनी जिंदगी में कितनी महिलाओं के साथ संबंध
रहे हैं।
निश्चित तौर पर जवाब न में होगा। ऐसे में दीपिका पादुकोण महिलाओं से क्यों यह अपेक्षा रख रही हैं कि वह सेक्स के मामले में बेबाक होकर महिला सशक्तिकरण का उदाहरण प्रस्तुत करें? क्यों वह अपनी फिल्म में 99 सहयोगियों के साथ यह कह रही हैं कि हमें सेक्स के प्रति आजादी मिले?
महिलाएं सशक्त हो रही हैं इसमें दो राय नहीं है। वैवाहिक मामलों, प्रेम संबंधों, लिव इन रिलेशनशिप के मामलों में भी उनकी आजाद ख्याली भारतीय समाज में अब कोई अचंभा नहीं रह गई है। अपनी मर्जी का पार्टनर चुनने और शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भी अब उन्हें किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं रह गई है। अब भारतीय महिलाएं भी
होने वाले पति से शादी से पहले एचआईवी टेस्ट की रिपोर्ट मांगने में नहीं शर्मा रही हैं। शादी के बाद पार्टनर से अलग होने का फैसला और कोर्ट का दरवाजा भी वो अपनी मर्जी से खटखटा रही हैं। क्या यह महिला सशक्तिकरण नहीं है?
पर सवाल यह है कि सिर्फ सेक्स में आजादी को ही महिला सशक्तिकरण का पैमाना क्यों मान लिया जाए? क्यों यह सोच विकसित कर ली जाए कि छोटे और शरीर दिखने वाले कपड़े पहनने की आजादी मिलेगी तब ही महिला सशक्त होगी। क्यों यह प्रोवोक करने की जरूरत पड़ रही है कि महिलाएं सेक्सुअल आजादी की आवाज उठाएं। मंथन जरूरी है। यह सही है कि किसी शॉर्ट फिल्म के जरिए अपनी बातों को बोलने और भावनाओं को व्यक्त करने की आजादी सभी को है। ऐसे में दीपिका ने जो कुछ भी किया और कहा है वह सौ फीसदी सही है। इससे पहले भी कई फिल्मों, किताबों, नॉवेल्स में भी इस तरह के मुद्दों को उठाया गया है। पर जब बात किसी सेलिब्रेटी की आती है बहस होना स्वाभाविक है।
चलते-चलते
दीपिका आपने अच्छा किया यह मुद्दा उठाया। पर महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए आपके पास कुछ और भी मुद्दे हो सकते थे। सेक्स की आजादी जैसा सब्जेक्ट चुनना कहीं आपकी पॉपुलेरिटी का नया स्टैंड तो नहीं है क्योंकि वो आप ही हैं जिन्हें छोटे कपड़े पहनकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में आने से कोई परहेज तो नहीं रहता है, पर जब उन्हीं छोटे कपड़ों में आपकी तस्वीर छप जाती है तो आप बवाल खड़ा कर देती हैं। महिलाओं को सशक्त करने के लिए, उन्हें जागरूक करने के लिए
आपका धन्यवाद।
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