Monday, April 27, 2015

कभी हालात...बेबसी पर रोना आया

ये किसान हैं। कोई इन्हें संपन्न कहता है कोई इन्हें बेबस कहता है। किसी को इनके हालात पर रोना आता है पर कभी इनके आंसू नजर नहीं आते हैं। बारिश हो जाती है। फसल बर्बाद हो जाती है। आंधी और तूफान में सब कुछ उड़ जाता है। खेत में खड़ी फसलें सपाट हो जाती हैं। आम और लीची की फसल पर ओले पड़ जाते हैं और रही सही कसर सरकार की मुआवजा नामक बीमारी पूरी
इस वक्त पूरे देश में किसानों के प्रति संवेदनाओं का ज्वार उत्पन्न हो गया है। अचानक वे वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर सभी के दिलों में एक कसक की तरह उभर रहे हैं। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, बिहार सभी जगह किसानों की एक ही दशा है। लंबे वक्त के बाद ऐसे दिन देखने को मिले कि बैसाखी के दिन किसानों के घर दिए नहीं जल रहे थे। मंदिरों और गुरुद्वारों में अपने आराध्य को अर्पित करने के लिए उनके पास फसल नहीं बची थी। हताशा और निराशा के इस दुर्दिन में आत्महत्या का एक ऐसा दौर चला कि अब तक पूरे देश में करीब अस्सी किसानों ने मौत को गले लगा लिया है। पूरा देश शोकाकुल है पर साथ ही विवश भी है किसानों के प्रति। जो अन्नदाता उनका पेट भरता है, उन्हें कैसे मदद पहुंचाई जाए? यह एक यक्ष प्रश्न है। हर छोटी बात पर धरना-प्रदर्शन को आतुर रहने वाले राजनीतिक दल किसानों के मुद्दे पर शांत बैठे हैं। राजनीति हो रही है तो सिर्फ इस बात को लेकर कि किसानों को मुआवजे की राशि कितनी मिलनी चाहिए। कांग्रेस शासन में अगर दस हजार रुपए प्रति एकड़ मुआवजा मिलता था तो वही कांग्रेस के नेता अब तीस हजार प्रति एकड़ देने की मांग कर रहे हैं। मुआवजे की राशि को लेकर बयानबाजी चल रही है पर जमीनी हकीकत से किसी को मतलब नहीं है।
कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ रहा है कि अपने पॉकेट से किसानों के लिए चंदा जमा करने की मुहिम शुरू करे। साधारण सी साधारण बात के लिए सोशल मीडिया कैंपेन चलाने वाले लोग भी किसानों के लिए किसी मुहिम की कल्पना नहीं कर पा रहे हैं। वोटिंग के दौरान किसानों के घरों तक आसानी से पहुंचने वाले भी इस समय ‘जेठ की दुपहरिया’ की दुहाई देकर एयर कंडिशन कमरों में किसानों की व्यथा पर मंथन कर रहे हैं। पर वह अन्नदाता कहीं अपनी खड़ी और बर्बाद हो चुकी फसल पर ट्रैक्टर चलाने को मजबूर है। कहीं वह एक बार फिर कर्ज लेने के लिए साहूकारों के घरों के आगे लाइन में लगा है। मध्यमवर्गीय परिवार को बात-बात पर लोन देने वाले बैंक भी खामोश हैं। गाड़ी के लिए लोन चाहिए, टीवी और फ्रिज भी आसान किस्तों पर उपलब्ध हैं। यहां तक कि बच्चे की लग्जरी साइकिल खरीदने के लिए भी ईएमआई की व्यवस्था करने वाले बैंक किसानों के लिए क्या कर रहे हैं इसे देखने वाला कोई नहीं। क्या कभी किसानों को भी फसलों की बुआई के लिए ईएमआई से रकम चुकाने की सहूलियत मिलेगी? क्या बैंकिंग सेक्टर इतनी दरियादिली दिखाएगा कि किसानों को दिए गए कर्ज की ब्याज राशि में कटौती कर दे? या सिर्फ यह दिखावा ही रहेगा कि हम किसानों के प्रति अपनी संवेदनाएं ही व्यक्त करते रहें। दिल्ली में राजस्थान के किसान गजेंद्र की आत्महत्या के पीछे की कहानी चाहे जो कुछ भी है पर गजेंद्र ने एक बात तो स्पष्ट कर ही दी है कि किसान अच्छे हालात में नहीं जी रहे हैं। उसकी आत्महत्या से पहले भी साठ से सत्तर किसान आत्महत्या कर चुके थे, पर गजेंद्र की हत्या ने संसद में नेताओं को हो-हल्ला करने पर मजबूर जरूर कर दिया। नेशनल मीडिया और इंटरनेशनल मीडिया में भारतीय किसानों पर बहस का दौर भी शुरू हो चुका है। अगर गजेंद्र ने दिल्ली में आत्महत्या न की होती तो शायद वह भी एक गुमनाम किसान की तरह अब तक मिट्टी में मिल चुका होता। अब तक जितने किसानों ने आत्महत्या की है उनमें किसी एक किसान का नाम भी लोगों को याद हो तो आपका उनके प्रति संवेदनात्मक आंसू सार्थक हो जाए पर अफसोस ऐसा नहीं है। न तो हमें किसी किसान का नाम याद है और न हम गजेंद्र को भूल पाएंगे। तो क्या एक बार फिर इस बात का प्रमाण मिल चुका है कि मीडिया ही है जो मुद्दे बनाता है और उसे संसद से लेकर सड़क तक ले जाता है। मंथन इस बात पर नहीं होना चाहिए कि कोई मुद्दा कब बड़ा हो जाए, मंथन इस बात पर होना चाहिए कि जमीनी स्तर का मुद्दा क्या है। गजेंद्र का रामलीला मैदान में भरी सभा में पेड़ पर लटकना मुद्दा है या फिर रोज-रोज तिल-तिल कर मर रहा किसान मुद्दा है। आम आदमी को भी इस पर मंथन करना चाहिए। हमें यह भी सोचना चाहिए कि अपने अन्नदाताओं की भलाई के लिए हम क्या कर सकते हैं? चलिए एक कदम ही सही, पर सार्थक तरीके से उनके बारे में सोचिए तो जरूर।
कर देती है। किसानों की यह कहानी कोई आज की नहीं है। सालों से यही कहानी चली आ रही है पर इस साल ऐसा क्या हो गया है कि किसान इतनी तादात में आत्महत्या कर रहे हैं। क्या उन्हें जून में फसलों को लगने वाला झुलसा रोग लग गया है या फिर सच में वे इस कदर परेशान हैं कि आत्महत्या ही उन्हें अंतिम विकल्प नजर आ रहा है। यह मंथन का समय है।

चलते-चलते

मेरे मित्र ज्ञानेन्द्र ने अपनी कविता के माध्यम से किसानों के दर्द को आप तक पहुंचाने का सार्थक प्रयास किया है। 
सो के उठा रामदीन तो देखा खेत पर
बिखरा था खून
हर जगह जिधर नजर घुमाता
सिर्फ   खून, खून ही खून
ठिठक कर बैठ गया धरा पर वह
सहलाने लगा मिट्टी को, सोचने लगा
कल तक तो यहां बालियां थीं, खुशहाली थी
आज खून कैसे?/अचानक याद आया उसे/रात आई भीषण बारिश थी
बेटे की आंखों में मैंने देखे थे आंसू
तभी, ठिठका कहीं यह वही खून तो नहीं जो मैंने, बेटे की आंखों में देखे थे
तब तक जमुनी दौड़ती हुई खेत पर आई और/रूहासे कंठ से बोली बाबा, जल्दी चलो, बाबू (पापा) उठ नहीं रहे।।
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