Saturday, August 22, 2015

लात का भूत बात से नहीं मानता


बहुत पुरानी कहावत है कि लात का भूत बात से नहीं मानता है। कुछ ऐसा ही है पाकिस्तान और भारत के बीच औपचारिक संवादों का रिश्ता। एक साल पहले भी कुछ ऐसा ही हुआ था। जब दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय वार्ता को रद कर दिया गया था, क्योंकि पाक ने हुर्रियत नेताओं को न्योता देकर पैंतरेबाजी की थी। पर अब देश की जनता बीजेपी सरकार से यह सवाल पूछ रही है कि आखिर एक साल में ऐसा क्या बदलाव आ गया कि सरकार पाकिस्तान के साथ आमने-सामने बैठकर बातचीत करने पर राजी हो गई है। अगर 23-24 अगस्त को नई दिल्ली में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच बैठक होती है तो निश्चित तौर पर कई प्रमुख मुद्दों को उठाया जाएगा। पर मंथन का वक्त है कि क्या इस तरह की बैठक से कोई रिजल्ट भी निकल सकेगा। बताने की जरूरत नहीं कि इस तरह कितनी और बैठकों को दौर पहले भी चल चुका है, रिजल्ट आज तक सामने नहीं आ सका है।
दरअसल पाकिस्तान ने हुर्रियत नेताओं को न्योता भेजकर शतरंज की एक ऐसी चाल चली है जिसमें भारत सरकार उलझ कर रह गई है। पिछले दिनों जब विदेशी धरती पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात हुई थी उसी समय इस बात पर मुहर लग गई थी कि दोनों देशों के सुरक्षा सलाहाकार आपस में बातचीत करेंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश साफ तौर पर गया कि दोनों देश इस दिशा में सकारात्मक रवैया अपना रहे हैं। इसी बीच पाकिस्तान ने कई पैंतरे चले। पहले जम्मू-कश्मीर की अंतराष्टÑीय सीमा पर जमकर सीजफायर का उल्लंघन किया। सीमावर्ती गांवों में सिविलियंस पर गोलियां दागीं। आतंकियों को सीमापार भेजा। गुरदासपुर में हमला हुआ। बीएसएफ के काफिले को निशाना बनाया गया। सभी का एकमात्र उद्देश्य था कि किसी तरह भारत एक बार फिर इस वार्ता को अपने स्तर पर रद कर दे। ताकि पाकिस्तान अंतरराष्टÑीय स्तर पर यह स्थापित करने में कामयाब रहे कि भारत बातचीत करना ही नहीं चाहता है।
मोदी सरकार के सामने बड़ी चुनौती है। अगर वह बातचीत अपने स्तर पर रद कर देती है तो पाकिस्तान अपने प्रोपगेंडा में कामयाब हो जाएगा। अगर बातचीत होती है तो पूरा देश सवाल कर रहा है कि मोदी सरकार इतना क्यों झुक रही है। चुनाव के पहले जो नरेंद्र मोदी पाकिस्तान को र्इंट का जवाब पत्थर से देने की बात करते थे आज वे इतने खामोश क्यों हैं। पर सच्चाई यही है कि पाकिस्तान कभी इस तरह की बातचीत होेने ही नहीं देना चाहता है। पूरे विश्व को यह बात पता है कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार होने के बावजूद वहां सेना का सरकार में कितना प्रत्यक्ष हस्तक्षेप है। साथ ही आईएसआई की भूमिका कितनी गहरी है इसे भी बताने की जरूरत नहीं। ऐसे में सेना और आईएसआई यह बात आसानी से कैसे स्वीकार कर लेगी कि इस तरह की बैठक में आतंकवाद का मुद्दा टारगेट नहीं होगा। हाल ही में जिंदा पकड़ाए आतंकी नावेद ने जितने खुलासे किए हैं वह यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि किस तरह पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई भारत को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रही है। ऐसे में एनएसए स्तर पर होने वाली बैठक में यह मुद्दा जरूर उठेगा। भारत की तरफ से तो एक लंबा चौड़ा डॉजियर भी तैयार कराया जा रहा है ताकि पाकिस्तान को सौंपा जा सके। ऐसे में पाकिस्तान द्वारा भारत के अलगाववादी नेताओं को न्योता देने पर आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।
भारत ने इससे पहले पिछले साल जुलाई में होने वाली बैठक में अपने विदेश सचिव को इसीलिए नहीं भेजा था क्योंकि उस वक्त भी पाकिस्तान ने अलगवादी नेताओं को न्योता भेजा था। पाकिस्तान ने अब इसी फिराक में अंतिम पैंतरा चला है। ऐसे में मंथन जरूर करना चाहिए कि ऐसी बैठकों का क्या नतीजा निकलेगा। पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार में सबसे गहरी पैठ रखने वाली सेना और आईएसआई कभी भी भारत के साथ दोस्ताना संबंधों को तवज्जो नहीं देगी, क्योंकि इससे उनके अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो जाता है। भारत विरोधी अभियान और विद्वेश के आधार पर ही पाकिस्तानी फौज मुस्लिम राष्टÑ को एकजुट रखती है। खुद पाकिस्तान आतंक से लंबे समय से जूझ रहा है, पर इस बात को पूरा विश्व जानता है कि आतंक का सबसे बड़ा गढ़ भी पाकिस्तान ही है।
भारत ने बेशक एक अच्छी पहल की है और पाकिस्तान के तमाम पैंतरेबाजी के बावजूद अब तक बातचीत रद नहीं की है। पर यह भी समझने की जरूरत है कि लातों के भूत बातों से कभी नहीं मानते। हम युद्ध के जरिए कोई हल भले ही नहीं निकाल सकते, लेकिन पाकिस्तान को काबू में रखने के लिए उस पर कड़ा अंतरराष्टÑीय  दबाव बनाना होगा। भारत को मजबूत तथ्यों और तर्कों के आधार पर पाकिस्तान को बेनकाब करना होगा। अंतरराष्टÑीय स्तर पर पाकिस्तानी झूठ को मजबूती से रखना होगा, तभी पाकिस्तान को काबू में रखा जा सकता है। पाकिस्तान को बेशक सैन्य कार्रवाई से नहीं, पर आक्रामक कूटनीति के जरिए तो दबाया ही जा सकता है। कई मौकों पर भारत ने ऐसा किया भी है। भारत ने फिलहाल पाकिस्तान के राष्टÑीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज के साथ होने वाली वार्ता को रद नहीं किया है। यह वार्ता रद भी नहीं होनी चाहिए, ताकि विश्व में संदेश साफ जाए कि   भारत हर तरफ से शांति चाहता है। पर साथ ही इस बात की भी तैयारी करनी चाहिए कि पाकिस्तान पर अंतरराष्टÑीय दबाव कैसे बनाया जाए।

चलते-चलते
पाकिस्तान की तरफ से हुर्रियत नेताओं को न्योता भेजने के बाद भारत ने जिस तरह से अलगाववादी नेताओं को चंद घंटों के लिए नजरबंद कर दिया यह कई मायनों में महत्वपूर्ण है। अब समय आ गया है कि ऐसे नेताओं को किसी भी तरह से छूट न मिले। बहुत हो चुकी है इनकी मनमानी। अब समय आ गया है कि भारत सरकार कड़े कदम उठाए।
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