Saturday, August 1, 2015

देशद्रोही के मृत्युदंड पर शोर क्यों?

अपने कार्यकाल के दौरान एक बार प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कहा था कि इस देश में केवल आतंकवादियों के लिए मानवाधिकार है, जनसाधारण के लिए नहीं। आज भी उनका यह कथन कितना प्रासंगिक है, यह हमें देशद्रोही याकूब मेमन के फांसी की रात देखने को मिला। ऐसा लग रहा था मानो पूरे न्यायिकतंत्र को चंद लोगों ने बंधक बना लिया है। ऐसा थ्रिलर सस्पेंस था जैसा रामगोपाल वर्मा की फिल्म में होता है। एक देशद्रोही अपराधी के लिए देश के तथाकथित बड़े और नामी वकीलों की फौज खड़ी हो गई थी। हद तो यह थी कि सर्वोच्च न्यायालय जैसी संस्था भी बेबस लग रही थी। ऐसी स्थिति तब थी जब एक अपराधी की दया याचिका दो बार राष्टÑपति के पास से खारिज हो चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट में ही कई बार सुनवाई हो चुकी थी। तीन सौ पन्नों में उसका अपराध दर्ज कर उसे दोषी करार दिया गया था। मंथन का समय है कि क्या हमें एक दोषी करार दिए गए अपराधी के लिए इतना सब करने की जरूरत थी? वह भी उस स्थिति में जब उस अपराधी पर आधिकारिक तौर पर 257 लोगों की जघन्य हत्या में शामिल होने का दोष सिद्ध हो चुका था।
अंतत: याकूब मेमन को फांसी तो हुई, पर जो ड्रामेटिक सीन क्रिएट हुआ उसने चाहे-अनचाहे याकूब को हीरो बना दिया। पूरी मुंबई में अघोषित रूप से कर्फ्यू लगाने के साथ ही देश में हाई अलर्ट जारी कर संदेश दिया गया कि हम कितने भयभीत हैं। धन्य है हमारा लोकतंत्र, एक तरफ अपराधी को सजा भी दें और आम लोगों में इतना डर पैदा कर दें कि वह घर से निकलने में भी संकोच करे। क्या हम इतने बेबस हैं कि किसी अपराधी को सजा देने में भी हमारे हाथ-पांव फूलने लगे हैं?
याकूब मेमन की फांसी पर रोक लगाने को जिन तथाकथित संभ्रात लोगों की फौज सामने आई उनमें से किसी को यह नजर नहीं आ रहा था कि ऐसे ही किसी आपराधिक षडयंत्रकारी के कारण गुरदासपुर में आतंकी घुस आए और उन्होंने वहां बेकसूर लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इन आतंकियों से मुकाबला करने में एक एसएसपी भी शहीद हो गए। यह तो संयोग ही है कि कोई आतंकी जिंदा नहीं पकड़ा गया, नहीं तो मानवाधिकार के ये पैरोकार उस आतंकी को बचाने की पैरवी में भी जुट जाते। इन तथाकथित संभ्रात लोगों ने एक बार भी गुरदासपुर की घटना का विरोध या प्रतिक्रिया अपने ट्विटर अकाउंट या अन्य किसी प्लेटफॉर्म पर नहीं किया। पर याकूब के हर एक पल की अपडेट और अपनी भावनाओं का बखूबी इजहार कर रहे थे। किसी ने उस शहीद एसएसपी को श्रद्धांजलि नहीं दी, पर याकूब की फांसी पर इतने आंसू बहा दिए कि सर्वोच्च न्यायलय को रात में कोर्ट लगानी पड़ गई।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि याकूब के मामले में न्यायिक प्रक्रिया को बंधक बना लिया गया। कानून का इतना दुरुपयोग कभी नहीं देखा गया। सरकार और सर्वोच्च न्यायालय ने शायद यह सब इसलिए किया ताकि बाद में कोई आरोप न मढ़ दिया जाए। पर क्या इसके बावजूद आरोप नहीं लग रहे हैं?
मंथन का वक्त है कि आखिर नरेंद्र मोदी सरकार की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उसने याकूब मेमन जैसे देशद्रोही की फांसी की सजा की तारीख को सार्वजनिक कर दिया। क्यों नहीं कसाब और अफजल गुरू के मामले में अपनाई गई रणनीति लागू की गई? क्या यह एक राजनीतिक चूक है या फिर सोची-समझी राणनीति के तहत ऐसा किया गया? सामान्य जनता मीडिया को भी आरोपों के कठघरे में खड़ा कर रही है कि बेवजह याकूब मेमन के मामले को इतना दिखाया गया। मीडिया ने उसकी फांसी को किसी सेलिब्रिटी आइटम की तरह ट्रीट किया। पर मीडिया पर दोषारोपण बेवजह है। मीडिया ने तो वही दिखाया जो हो रहा था। अगर देर रात में न्यायिक प्रक्रिया को चंद लोग कानून का सहारा लेकर बंधक बना लें तो क्या यह खबर नहीं दिखाई जानी चाहिए? अगर एक अपराधी की मौत पर पूरे देश को हाई अलर्ट पर डाल दिया गया तो क्या यह खबर रोक देनी चाहिए? पूरी मुंबई की पुलिस सहित अर्द्धसैनिक बलों को सड़कों पर उतार दिया जाए तो क्या यह खबर नहीं है? मीडिया पर दोष मढ़ देना सबसे आसान काम बन गया है। मीडिया तो अपना काम ही कर रही है, यह पेशागत मजबूरी है कि खबरों को दिखाया जाए। जो लोग मीडिया पर दोष मढ़ते हैं वे लोग ही समाचार चैनल बदल-बदल कर इसकी कवरेज भी देख रहे होते हैं। और दूसरे दिन दो-तीन तरह के अखबार भी खरीद लाते हैं, ताकि विस्तार से खबरों को पढ़ सकें।
याकूब की फांसी के बाद एक बार फिर मृत्युदंड पर बहस तेज हो गई है। बहस इस बात पर हो रही है कि क्या कठोरतम दंड के रूप में फांसी की सजा ही एकमात्र विकल्प है? क्या यह प्रावधान बरकरार रहना चाहिए? पुरातन काल से मानवीय इतिहास में मृत्युदंड की परंपरा रही है। तर्क दिया जाता है कि जो जैसा करेगा वैसा भुगतेगा, तथा दूसरे लोगों में भी सजा का भय कायम होगा। हालांकि, आधुनिक समाज में इस दंड को अमानवीय कहा जाता रहा है। करीब 160 देशों ने इस दंड का प्रावधान अपने संविधान से हटा दिया है। संयुक्त राष्टÑ ने भी 2007 में इस दंड के विरोध में प्रस्ताव पारित किया था। पर यह जानना भी जरूरी है कि अमेरिका, जापान, चीन जैसे विकसित देशों में यह सजा पूर्णत: लागू है। चीन में तो हर साल फांसी की सजा का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। भारत तो इस मामले में काफी   पिछड़ा है। पिछले दस साल में 1303 अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई, पर लोकतांत्रिक और न्यायिक व्यवस्था के कारण सिर्फ तीन को फांसी पर लटकाया गया। याकूब चौथा अपराधी था। सर्वोच्च न्यायालय ने तो अस्सी के दशक में ही यह व्यवस्था कर दी थी कि सिर्फ रेयरेस्ट आॅफ रेयर मामले में ही फांसी दी जाए। ऐसे में बेवजह इस बात पर बहस हो रही है कि फांसी की सजा जायज है या फिर इसे खत्म कर देना चाहिए। अगर किसी ने अपराध किया है तो उसे सजा भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। याकूब जैसे देशद्रोही के लिए सारे विकल्प खत्म हो चुके थे।


चलते-चलते
राजनीति में मुर्दे दफन नहीं होते
सोशल मीडिया के बहकावे में आकर भारतीय जनमानस भी अपनी भावनाओं को उससे जोड़ देता है। ऐसा ही याकूब के मामले में हो रहा है। सोशल मीडिया और ओवैसी जैसे लोगों के बहकावे में आकर प्रश्न किया जा रहा है कि राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी की सजा क्यों नहीं? यहां भी हिंदू और मुस्लिम की बातों को फैलाया जा रहा है। पर सच्चाई यह है कि मोदी सरकार ने ही उन हत्यारों को फांसी देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल किया। यह क्यूरेटिव पिटीशन इसलिए दिया गया था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया था। कोर्ट ने इसी बुधवार को केंद्र सरकार की पिटीशन को इस आधार पर खारिज कर दिया क्योंकि दया याचिका पर विचार करने में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को 11 साल का वक्त लग गया था। ऐसे में इतना वक्त गुजर जाने के बाद कोर्ट के पास दूसरा आॅप्शन नहीं था। सवाल तो उठेगा ही कि क्यों नहीं कांग्रेस का कोई बड़ा नेता इस सवाल का जवाब दे रहा है कि कांग्रेस सरकार को दया याचिका पर विचार करने में इतना लंबा वक्त क्यों लग गया था। जबकि, दस साल से कांग्रेस ही केंद्र में थी। राजीव गांधी भी कांग्रेस के ही नेता थे। ठीक ही कहा गया है कि राजनीति में मुर्दे दफन नहीं होते, उन्हें जिंदा रखा जाता है, ताकि उन्हें समय पर जिंदा किया जा सके।
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