Friday, October 9, 2015

गाय को लेकर आंदोलन और दंगे


गो-हत्या पर इन तथ्यों को जानकर हैरान हो जाएंगे आप  पार्ट-3
अब तक आपने पढ़ा कैसे गाय और गो मांस को लेकर समाज में बदलाव आ रहा था। मुगल शासकों की गाय के प्रति क्या सोच थी। एक तरफ मुगल काल के शुरुआती दौर में मुगल शासकों की गाय और गोहत्या के प्रति सोच बेहद नरम थी, पर दूसरी तरफ जैसे-जैसे अंग्रेजों ने भारत में अपनी जड़ें समानी शुरू की वैसे-वैसे गाय को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई। अंग्रेजों की रणनीति थी डिवाइड एंड रुल की। अर्थात फूट डालो और शासन करो। मुगल शासकों को भारतीय हिंदुओं ने दिल से स्वीकारना शुरू कर दिया था, जिसके कारण हुमांयू, अकबर, जहांगीर, शाहजहां जैसे मुगल शासकों के दौर में भारत ने समृद्धि की नई ऊचाइयों को छूआ। हिंदु और मुसलमानों में कोई खास बैर सामने नहीं आया। पर अंग्रेजों ने भारत में प्रवेश के साथ ही फूट डालो की रणनीति पर काम किया। अंग्रेजों ने भी सहारा लिया गाय का ही।

पश्चिमी सभ्यता में गो-मांस लोकप्रिय
दरअसल यूरोपियन कंट्रीज में गाय का मांस बड़े चाव से खाया जाता था। भारत में कई क्षेत्रों में यह पूर्णत: प्रतिबंधित था। अंग्रेजों को साथ मिला मुगल शासक औरंगजेब का। औरंगजेब को भारतीय इतिहास का सबसे कट्टर मुस्लिम शासक माना जाता है। अपने पिता शाहजहां से गो-मांस को लेकर शुरू हुए विवाद के बाद उसने कभी शाहजहां की बात नहीं मानी। अंतत: जब उसे शासन मिला तो उसने सबसे पहले गो-हत्या पर से प्रतिबंध हटा दिया। 1658 से 1707 तक उसने शासन किया इस दौरान हिंदु और मुसलमानों के बीच गोमांस को लेकर वैमनस्य पैदा हो चुके थे। औरंगजेब के बाद भी कई मुगल शासकों ने शासन किया, पर गो मांस को लेकर किसी ने संजीदगी से नहीं सोचा। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने अपने अंतिम दिनों में इस बात को स्वीकार किया कि अंग्रेजों को रोकने का बस एक ही तरीका है कि हिंदुओं और मुसलमानों को एकजूट करें। इसके लिए बहादुर शाह जफर ने भी गाय का ही सहारा लिया। इस अंतिम मुगल शासक ने गो-हत्या को पूरी तरह प्रतिबंधित करते हुए हिंदुओं और मुसलमानों को एकजूट करने का प्रयास किया, पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। भारत में मजबूती से पैर जमा चुके अंग्रेजों ने बहादुरशाह को सितंबर 1857 में निर्वासित कर बर्मा भेज दिया। वहीं 1882 में उसका निधन हो गया।
1857 की क्रांति में गो-मांस
  आमिर खान की फिल्म मंगल पांडे में आप 1857 की
क्रांति का बेहतरीन चित्रण देख सकते हैं।
अंग्रेजों के खिलाफ पहले स्वतंत्रता आंदोलन में भी गो-मांस का सबसे बड़ा रोल था। बहादुरशाह जफर ने हिंदुओं और मुसलमानों को एकजूट करने के लिए गो-मांस का सहारा लिया था। यह अभियान 1856 या उससे पहले से ही शुरू हो चुका था। सबसे पहले यह बात अंग्रेजी सेना में शामिल भारतीयों में फैलाई गई कि बंदूक में भरी जाने वाली गोलियों या गन पाउडर के रैपर को गाय की चर्बी से बनाया जाता है। इस गनपाउडर को खोलने के लिए दांतों का सहारा लिया जाता था। हिंदु सैनिकों को यह कतई मंजूर नहीं था कि उन्हें गो-मांस को अपने मुंह में लेना पड़ता है। कई इतिहासकारों का मानना है कि यह महज अफवाह थी कि गनपाउडर का रैपर गाय की चर्बी से बनाया जाता है। वहीं दूसरी तरफ मुस्लिमों को एकजूट करने के लिए यह बात भी फैलाई गई कि गनपाउडर वाले रैपर में गाय की चर्बी के साथ-साथ सूअर की चर्बी का भी उपयोग किया जाता है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के पीछे चाहे जितने भी कारण गिनाए जाते हों, पर इस ऐतिहासिक सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का तात्कालिक कारण गो-मांस ही बना। सैनिकों के विद्रोह ने भयंकर रूप लिया, पर यह अफसोस जनक रहा कि इस आंदोलन को एक स्थाई नेतृत्व नहीं मिल सका, जिसके कारण अंग्रेजों ने चंद दिनों में ही आंदोलन को कुचल दिया। ठीक इसी वक्त अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफर को भी बर्मा निर्वासित कर अंग्रेजों ने भारतीयों की रही सही एकजूटता को भी पूरी तरह तोड़ कर रख दिया।

अंग्रेजों का गोमांस के प्रति रवैया
अंग्रेजों के समय हिंदु और मुस्लमानों के बीच एक जबर्दस्त विभाजन रेखा खींच दी गई। सबसे पहला स्लटर हाउस अंग्रेजों ने ही खोला। बंगाल प्रांत के गवर्नर रॉबर्ट क्लाइव ने 1760 में पहला स्लटर हाउस कलकत्ता में खुलवाया। बताया जाता है कि हर दिन यहां करीब तीस हजार गायों की हत्या की जाती थी। इसके बाद अंग्रेजों ने बंबई और मद्रास में भी कई स्लटर हाउस खोलने की इजाजत दी। बताया जाता है कि 1910 ई. तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में करीब तीन सौ आधिकारिक स्लटर हाउस खुल गए थे। गाय के प्रति अंग्रेजों के नजरिए ने भारतीय हिंदुओं में काफी रोष उत्पन्न किया। हालांकि गो-मांस के मामले में हिंदु भी काफी बंट गए थे। बंगाल में हजारों की संख्या में कटने वाली गायों के कारण इसका मांस काफी सस्ते में उपलब्ध था। यही कारण था कि बंगाल में बसने वाले बंगाली हिंदुओं ने भी इसे खाना शुरू कर दिया। हाल यह है कि आज भी पूरे भारत में सबसे अधिक गाय मांस की खपत वाला प्रांत पश्चिम बंगाल ही है। आज भारत के कई राज्यों में गो-मांस पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगे हैं, पर जब भी बंगाल में इस पर प्रतिबंध की बात होती है वहां के लोग आंदोलन शुरू कर देते हैं। सच्चाई यही है कि वहां के बंगाली हिंदु इन प्रदर्शनों में सबसे आगे होते हैं।

सिखों ने किया आंदोलन
गो-हत्या को   लेकर सिखों ने सबसे पहला आंदोलन शुरू किया। नामधारी सिखों ने 1870 संगठित रूप से गायों को बचाने की पहल शुरू की। इतिहास में इसे कुका आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। इसके बाद स्वामी दयानंद सरस्वती ने गौ-संवर्द्धनी सभा और गौ-रक्षणी सभा का गठन कर संगठनात्मक रूप से गायों को बचाने की पहल शुरू की। यह एक ऐसा दौर था जब गाय को लेकर राजनीति भी शुरू हो चुकी थी। पर अंग्रेजों के खिलाफ हिंदुओं को एकजूट करने के लिए गाय के अलावा दूसरा कोई जरिया भी उस वक्त के समाज सुधारकों को नजर नहीं आ रहा था। यही कारण है कि विभिन्न संगठनों का गठन शुरू हुआ। धीरे-धीरे गाय को लेकर यह आंदोलन पूरे भारत में फैलता चला गया।

शुरू हुआ दंगों का दौर
एक तरफ जहां गाय और गो-मांस को लेकर हिंदु संगठन एक हो रहे थे, वहीं दूसरी तरफ दंगों की नींव भी डाली जा चुकी थी। आज के उत्तरप्रदेश तब के अवध क्षेत्र में पहला दंगा भड़का। मुस्लिम बहुत क्षेत्र आजमगढ़ जिले के मऊ में भारत का पहला आधिकारिक दंगा सामने आया। यहां से गो-मांस को लेकर दंगों का जो सिलसिला शुरू हुआ उसने जल्द ही बंबई से लेकर पूरे देश दंगों की आग में जलने लगा। ब्रिटिश गजट के अनुसार छह महीने में करीब 40 से 45 कम्यूनियल राइट हुए, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। ब्रिटिश काल और उसके बाद  गायों और स्लटर हाउस को लेकर 1717 से 1977 तक देश भर में हिंदु और मुसलमानों के बीच 167 दंगों का आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद है। गायों को लेकर शुरू हुई यह राजनीति कई दौरों से होते हुए आज भी उसी मुकाम पर मौजूद है जहां कोई सार्थक हल नहीं निकाला जा सका है। आज गो-मांस को राजनीतिक फायदे के रूप में देखा जाने लगा है। यही कारण है कि देश में साक्षरता की दर बढ़ने के बावजूद धार्मिक भावनाएं भड़काने के लिए गाय का सहारा ही लिया जाता है। हाल में हुई कई घटनाएं इसका जीता जागता उदाहरण है।

गो-हत्या से लेकर गो-मांस तक की यह सीरिज आपको कैसे लगी। हमें जरूर बताएं।
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