Sunday, February 17, 2019

जज्बातों को सहेज कर रखें, होश खोने की जरूरत नहीं

पूरा देश शोकाकुल है। हर तरफ भावनाओं का ज्वार उफान मार रहा है। सोशल मीडिया का हाल यह है कि हर तरफ आवाज आ रही है कि आज ही पाकिस्तान को मिट्टी में मिला दिया जाए। तरह-तरह के जज्बात भरे मैसेज इधर से उधर सर्कुलेट हो रहे हैं। पर मंथन करने की जरूरत है कि क्या इन जज्बातों से समस्या का हल निकल जाएगा। जज्बातों का असर यह है कि देश के तमाम भागों में कश्मीर के युवा खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने तमाम राज्यों को एडवाइजरी जारी करते हुए कहा है कि अपने राज्य में पढ़ रहे और नौकरीपेशा कश्मीरी युवाओं की सुरक्षा का ध्यान रखें।
यह स्थिति अच्छी नहीं है। पूरा देश गमगीन है। हर कोई चाहता है कि शहीद सैनिकों का बदला लिया जाए। पर क्या अपने राज्य में रह रहे कश्मीर युवाओं पर हमला कर ही बदला लिया जा सकता है? इस तरह की मूर्खतापूर्ण हकरत करने वालों को एक्सपोज करने की जरूरत है। भारत सरकार को जो करना है वो कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि सेना को पूरी छूट दी गई है। वह सीमा पार से आतंक को प्रश्रय दे रहे लोगों पर किस तरह से कार्रवाई करती है। समय और स्थान उन्हें तय करना है। ऐसे मेंं हमें उद्वेलित होकर कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए कि हमारे आसपास का माहौल सांप्रदायिकता के रंग में तब्दील हो जाए। ऐसा नहीं है कि सेना पहली बार कोई कदम उठाएगी। जब-जब जरूरत पड़ी है हमारे जांबाज सैनिकों ने दुश्मनों को माकूल जवाब दिया है। आज भी जब और जैसे जरूरत पड़ेगी वो जवाब देने में पीछे नहीं हटेंगे। पर जज्बातों के इस दौर में हमारे और आपके जैसे लोगों को होश खोने की जरूरत नहीं है। कश्मीर भी हमारा ही अंग है और यहां के रहने वाले बाशिंदे भी भारतीय नागरिक हैं। पर जिस तरह से खबरें आ रही हैं कि कश्मीर के युवाओं को कैसे धमकाया जा रहा है वह तस्वीर डरा रही है। डर इस बात का है कि कहीं हम सच में पाक के प्रोपगेंडा में तो नहीं फंस रहे हैं। पाकिस्तान यही तो चाहता है कि हमारे देश के अंदर का माहौल प्रदूषित हो। हम आपस में लड़ते रहें। हमारे बीच हिंदू मुसलमान के वैमनस्य की खाई बढ़ती जाए। ताकि वह अपने नापाक मंसूबों को और मजबूती प्रदान करे।
इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि हाल के दिनों में कश्मीर के युवा तेजी से पाक प्रयोजित प्रोपगेंडा से प्रभावित हुए हैं। यह भी सही है कि कश्मीर के अंदर उन्होंने पत्थरबाजों के रूप में एक ऐसा स्लीपर सेल तैयार कर लिया है जिसे वो जब चाहे और जैसे चाहे यूज कर रहा है। पुलवामा में हुआ आत्मघाती हमला भी इसी का परिणाम था। नहीं तो जो युवा एक साल पहले धर्मांध होकर आतंकी संगठन में शामिल होता है वह कैसे आत्मघाती हमलावर बन जाता। यह भी अपने आप में आश्चर्य है कि यूनिवर्सिटी पासआउट युवा एक साल के अंदर ही आतंक का इतना बड़ा नाम कैसे बन गया। कैसे उसने खुद को आत्मघाती हमलावर के रूप में तैयार कर हमारे चालीस जवानों की जान ले ली। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि आज भी विभिन्न राज्यों के कॉलेज और यूनिवर्सिटी में रह रहे कुछ कश्मीरी युवाओं ने पुलवामा हमले का जश्न मनाया है।
यह साधारण बात नहीं है। दरअसल कश्मीर में आतंकियों के साथ छद्म युद्ध के साथ-साथ हमारी सेना एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक युद्ध भी लड़ रही है। यह मनोवैज्ञानिक युद्ध कश्मीर के उन युवाओं के साथ है जो भटकाव का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। भटके हुए युवाओं को सेना सबक भी सीखा रही है। विभिन्न राज्यों की पुलिस ने भी जश्न मना रहे तमाम कश्मीर युवाओं को गिरफ्तार कर स्पष्ट संकेत भी दिए हैं कि यह नाकाबिले बर्दास्त है कि भारत में रहकर ही भारत के खिलाफ आग उगलो। अगर ऐसा करोगो तो सजा भी पाओगे।
पर एक बात समझने की जरूरत है कि कश्मीरी युवाओं में भटकाव के जिम्मेदार कहीं न कहीं हमलोग भी हैं। करीब पांच साल पहले मुझे कश्मीर जाने का मौका मिला था। वहां मैं सात दिनों तक रहा। इस दौरान कश्मीर को अंदर से समझने और जानने का मौका मिला था। मैं वहां डल झील में एक शिकारा होटल में था। प्रतिदिन वहां से एक छोटे शिकारे के जरिए मेन रोड पर आना होता था। उस शिकारे को एक पढ़ा लिखा युवा चलाता था। एक दिन डल झील की सैर के दौरान मैंने उससे पूछ लिया कि तुम पढेÞ लिखे लगते हो, फिर यहां सौ दो सौ रुपए के लिए शिकारा क्यों चलाते हो। उस युवा ने बताया कि उसने एमबीए किया है। इसके बाद वह मुंबई में नौकरी के लिए चला गया। वहां कश्मीर का जान लोग उससे ठीक व्यवहार नहीं करते थे। उसके बाद वह किसी दोस्त के कहने पर देहरादून चला आया। यहां भी छह महीने एक बैंक में नौकरी की। यहां भी लोगों का व्यवहार थोड़ा दूसरा था। ऐसी स्थिति में मैं खुद को असहज महसूस करता था। इसीलिए वापस कश्मीर आ गया। यहां अपने पुस्तैनी धंधे में जुट गया। अब शिकारे से जो दो पैसे की आमदनी होती है उससे ही घर का खर्च चलाता हूं।
मैं उस कश्मीरी युवा की कहानी आपको इसलिए बता रहा हूं ताकि आप उस मनोवैज्ञानिक युद्ध को बेहतर तरीके से समझ सकें, जिससे हमारी भारतीय सेना कश्मीर में जूझ रही है। यह सिर्फ एक युवा अहमद डार की आतंकी बनने की बात नहीं है। बल्कि कश्मीर के उन हजारों युवा की बात है जो इस वक्त उसी मनोस्थिति से गुजर रहे हैं जिससे वह शिकारे वाला युवा गुजर रहा था। मंथन करने का वक्त है कि आप और हम कश्मीर में होने वाली घटनाओं पर किस तरह रिएक्ट करते हैं। क्या वहां होने वाली प्रत्येक घटना के लिए हम कश्मीरी युवाओं को दोषी करार दें। हर बात में उन्हें आतंकी घोषित कर दें। रोजी रोजगार की तलाश में कश्मीर से बाहर आने वाले युवाओं को अपनी भावनाओं के ज्वार से इतना भयाक्रांत कर दें कि वह वापस उसी जिंदगी में लौट जाएं, जहां पाकिस्तान प्रयोजित प्रोपगेंडा में वह फंस जाए। और चंद रुपयों के लिए मुंह पर कपड़ा लपेटे, आईएसआईएस का झंडा उठाए, पत्थर फेंकता नजर आए। 

हमारी सेना, हमारी पुलिस, हमारी खुफिया तंत्र काफी मजबूत है। इसीलिए हम खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। हमें किसी से डरने की जरूरत नहीं है। भारतीय सेना जिस तरीके से पाकिस्तान प्रयोजित युद्ध का जवाब दे रही है उस पर हमें गर्व होना चाहिए। जब भी जरूरत पड़ी है हमारे जांबाजों ने आतंकियों को उनके घर में घुसकर ढेर किया है। ऐसे में हमें चिंता करने की जरूरत नहीं है। पुलवामा में शहीद हुए चालीस सैनिकों का बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाएगा। केंद्र सरकार से लेकर हमारे सुरक्षाबलों ने भी आश्वासन दे रखा है। ऐसे में जज्बातों में बहकर हमें होश खोने की जरूरत नहीं। सोशल मीडिया पर क्रांति करने वालों और उन क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर उटपटांग हरकत करने वालों को मंथन करने की जरूरत है। अपने आसपास के माहौल को खराब करने की जरूरत नहीं है। जो गुनाहगार हैं उन्हें उनके किए की सजा जरूर मिलेगी। पर प्रोपेगेंडा में फंसकर हर किसी को गुनाहगार बताने की जरूरत भी नहीं है।

Monday, February 4, 2019

सीबीआई न हुई कि मंदिर का घंटा हो गया, जिसे देखो वही बजा रहा है



हाल के दिनों में सीबीआई जैसी प्रतिष्ठित जांच एजेंसी का जो हश्र हुआ है उसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की होगी। पूर्व में उसे तोता तो कहा जाता था, लेकिन जिस तरह कैट फाइट में इसे उलझा दिया गया है उसने इसके पतन का इतिहास लिख दिया है। सीबीआई का नाम अब मंदिर का घंटा रख देना चाहिए, जिसे देखो वही मुंह उठाए चला आ रहा है और इसे बजा दे रहा है।
कांग्रेस की सरकार में बीजेपी के नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई होती थी, तब भी इसे राजनीतिक रंग ही दिया जाता था। अब जब बीजेपी की सरकार है तब भी वही स्थिति है। पर सवाल सीबीआई की साख है। क्या ऐसे ही चलता रहेगा। जब राज्य सरकारें किसी बड़े मामले को लेकर यह बयान देती है कि फलां मामले की जांच सीबीआई से करवाई जाएगी, तब ऐसा लगता है कि वाह सरकार ने क्या बड़ा कदम उठाया है। अब तो निष्पक्ष जांच होगी। पर वही सीबीआई जब सरकार के खिलाफ ही जांच करने जाती है तो उसे बंधक बना लिया जाता है। यह कैसी विडंबना है।
जब सवाल लोगों का हो। जब सवाल लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा का हो। और जब सवाल सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हो तो इसमें राजनीतिक एंगल नहीं खोजना चाहिए। पश्चिम बंगाल में जो कुछ भी हो रहा है इसके पीछे की राजनीति को समझने में ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार बनने के 14 दिन पहले इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी थी। सीबीआई को जांच सौंपने के पीछे निश्चित तौर पर कोर्ट की यह मंशा होगी कि यही एक एजेंसी है जो ठगे गए लोगों को इंसाफ दिला पाएगी। और ठगे गए लोगों को भी विश्वास था कि सीबीआई ही उनके लिए मरहम का इंतजाम कर सकेगी। अब इसमें मोदी सरकार ने क्या किया और क्या नहीं किया इसे ममता बनर्जी ही ठीक से बता सकती हैं।
ममता बनर्जी को बंगाल की शेरनी भी कहा जाता है। पर उनसे बड़ी नौटंकी कोई और नहीं कर सकता है। जब-जब मौका मिला है उन्होंने सहानुभूति की ऐसी राजनीति खेली है कि चारों तरफ से उन्हें समर्थन मिल जाता है। रविवार को सीबीआई द्वारा की गई ‘छोटी सी गलती’ ने उन्हें फिर से मौका दिया। उन्होंने रिएक्ट भी वैसा ही किया। एक बॉस की जिम्मेदारी उन्होंने खूब निभाई। वैसा बॉस जो अपने इंप्लॉई के हितों की रक्षा के लिए किसी से भी टकरा जाए। मालिकों से टकरा जाए, मैनेजमेंट से टकरा जाए। ममता ने अपना दांव बखूबी खेल दिया है। भले ही बंगाल के बाहर के लोग ममता को कोस रहे हैं, पर मुझे नहीं लगता कि बंगाल के भीतर उन्हें कोई हानि हो रही है। उल्टे अब वहां के लाखों कर्मचारी जरूर ममता के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़े हो गए हैं। अभी बंगाल की स्थिति वैसी ही है जब नैनो फैक्ट्री के समय थी। उस वक्त भी बंगाल की शेरनी की तरह ममता बनर्जी ने खूब अपनी वाहवाही करवाई थी। रिजल्ट क्या हुआ था यह बताने की जरूरत नहीं।
ममता बनर्जी ठीक वैसी ही हैं जैसी एक शेरनी होती है। शेरनी सबसे अधिक डरी हुई होती है। वह हमेशा अपने आसपास के खतरों से डरी सहमी रहती है। ममता भी इतनी डरी हुई हैं कि कभी अमित शाह को रोकने में अपनी पूरी ताकत झोंक देती हैं, कभी योगी आदित्यनाथ के हेलिकाप्टर को रोकने में अपनी ताकत का इस्तेमाल करती हैं। डर के हालात यह हैं कि बीजेपी के खिलाफ जो कुछ भी संभव है वह कर रही हैं। ममता का यह रिएक्शन एक सामान्य रिएक्शन है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि यही राजनीति है।
पर सीबीआई अधिकारियों के साथ इस तरह का विहेवियर न केवल गैरजिम्मेदाराना है, बल्कि असंवैधानिक भी है। डरी हुई शेरनी अचानक शिकार देखकर जैसे टूट पड़ती है, ठीक उसी तरह ममता बनर्जी ने किया है। सीबीआई के रूप में उन्हें एक ऐसा शिकार मिला जिसे झप्पटा मार कर पकड़ लिया। अब नैनो फैक्ट्री की तरह ही बंगाल में सिंपैथी वोट गेन करने की पॉलिसी पर काम शुरू हो गया है।
यहां तक तो सब ठीक है। पर फर्ज करिए अभी बंगाल में कोई बड़ा मामला फंस जाए। जनभावना ऐसी हो कि सरकार को उस मामले की निष्पक्ष जांच करवानी पड़ जाए। फिर ममता बनर्जी कहां जाएंगी? इंटरपोल के पास या सीआईए के पास? या उसी सीबीआई के पास जाएंगी जिनके अधिकारियों के साथ उन्होंने ऐसा सलूक किया।
हां इसमें भी दो राय नहीं कि सीबीआई ने भी कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी दिखाई। दो दिन पहले ही नए सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति हुई। फिर ऐसी क्या जल्दबाजी थी कि अचानक से यह धावा बोल दिया गया। कम से कम नए डायरेक्टर की ज्वाइनिंग का तो इंतजार किया ही जा सकता था। वैसे भी कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस चिटफंड मामले में समनिंग पर रोक लगा रखी है। ऐसे में क्या सीबीआई अधिकारी इतने बेवकूफ हैं कि बिना किसी प्लानिंग के बंगाल जैसे बड़े राज्य के पुलिस मुखिया को घेरने और दबोचने चले जाएं। क्या उन्हेंं हाईकोर्ट के आॅर्डर का पता नहीं। क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वो कोर्ट के जरिए पुलिस मुखिया से पूछताछ की इजाजत लें। क्या पुलिस मुखिया की इतनी औकात है कि वह न्यायपालिका के निर्देशों की अवहेलना कर दे और पूछताछ में सहयोग न करे।
फिलहाल सीबीआई अपनी करनी के लिए खुद ही जिम्मेदार है। उनके साथ जैसा सलूक हुआ उसके लिए कोई और दोषी नहीं हो सकता। पुलिसकर्मियों ने अपने बॉस को प्रोटेक्ट करने के लिए जो कुछ भी किया वह असंवैधानिक तो हो सकता है, लेकिन मोरल लेवल पर गलत नहीं हो सकता है। ममता बनर्जी भी जिस तरह अपने कर्मियों के खिलाफ मोरचा ले रही हैं उसे भी मोरल लेवल पर अस्विकार नहीं किया जा सकता है। एक बॉस को ऐसा ही होना चाहिए।

पर एक मुख्यमंत्री के तौर पर उनका यह कृत सदियों तक उदाहरण के तौर पर देखा जाएगा।  चिटफंड मामले में करोड़ों रुपए का गेम हुआ है। यह गेम भी आम लोगों के साथ हुआ है। ऐसे में क्या ममता बनर्जी की यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वह अपने लोगों को न्याय दिलाने के लिए मोरचा ले। क्यों नहीं उन्होंने चिटफंड घोटाले की जांच में इतना एग्रेशन दिखाया। क्यों नहीं जांच एजेंसियों को उस हद तक मदद पहुंचाई जिसकी दरकार थी, ताकि पीड़ितों को न्याय दिलाया जाए।
जिस मुकुल रॉय को लेकर मुद्दा बनाया जा रहा है कि वह बीजेपी में शामिल हो गए, उस मुकुल रॉय को भी सीबीआई ने घंटों बिठाकर पूछताछ कर रखी है। अभी उन्हें क्लीन चिट नहीं मिली हुई है। अगर दोषी होंगे तो वह भी सजा के हकदार होंगे। ऐसे में ममता बनर्जी की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्होंने बंगाल के पुलिस कमिश्नर को सीबीआई की पूछताछ से दूर करने के लिए एक्ट में ही संशोधन करवा लिया। हाईकोर्ट तक का सहारा ले लिया। अगर ममता को बंगाल के लोगों की इतनी चिंता है तो क्यों नहीं उन्होंने अपने पुलिस मुखिया को कहा कि जब सीबीआई समन कर रही है तो चले जाओ पूछताछ के लिए।
सवाल तो बहुत हैं। आगे भी उठेंगे। पर सबसे बड़ा सवाल बंगाल के ठगे गए लोगों का है। क्या उन्हें न्याय दिलाने के लिए ममता बनर्जी ऐसे ही धरना देंगी, जैसे अपने पुलिस कमिश्नर को बचाने के लिए दे रही हैं?

Thursday, January 24, 2019

#दस साल चैलेंज : नवाजुद्दीन को दस साल का चैलेंज दिया था, अभी तो नौ साल ही हुए हैं



सोशल मीडिया पर टेन ईयर चैलेंज चल रहा है। लोग अपनी तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं। पहले मैं कैसा अब कैसा हूं। चलिए, मैं भी आपको एक तस्वीर से रूबरू करवाता हूं। पर, इस तस्वीर को समझने के लिए आपको नौ साल पीछे लेकर जाऊंगा। चैलेंज तो दस साल का था, लेकिन नौ साल में ही इस तस्वीर में दिख रहे शख्स ने जो कुछ कर दिखाया है वह किसी के लिए प्रेरणा बन सकती है। आज जब आप मुसाफिर पर इस तस्वीर की कहानी पढ़ रहे होंगे तो इस शख्स ने एक और रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया होगा। तो आईए आपको लेकर चलता हूं नौ साल पहले।

आपने ठीक पहचाना तस्वीर में मेरे साथ दिख रहा शख्स और कोई नहीं आज सफलता की बुलंदियों को छू रहा हर दिल अजीज एक्टर नवाजुद्दीन सिद्की ही है। यह तस्वीर सितंबर 2010 की है। मैं उस वक्त जागरण ग्रुप के बाईलैंगुअल अखबार आई-नेक्स्ट के देहरादून संस्करण का एडिटोरियल हेड था। उस वक्त कलर्स पर आने वाले धारवाहिक बालिका बधु की धूम थी। इसी में सुगना का रोल प्ले करने वाली विभा आनंद ने टीवी की दुनिया में अच्छा नाम कमा लिया था। विभा आनंद देहरादून की रहने वाली हैं। विभा के पापा से दो-तीन बार मुलाकात हुई थी। उन्होंने एक दिन फोन किया। बताया कि विभा बालिका बधु से ब्रेक ले रही हैं। वह देहरादून आई हैं। उन्होंने बताया कि मैंने अपना प्रोडक्शन हाउस यूवी के नाम से खोला है। उसी के बैनर तले में विभा को लेकर शॉर्ट फिल्म बना रहा हूं। उन्होंने उस शॉर्ट फिल्म की शूटिंग मुहूर्त पर मुझे विशेष तौर पर आमंत्रित किया था। तय दिन और समय पर मैं आई-नेक्स्ट की रिपोर्टर कोमल नेगी और फोटोग्राफर अरुण सिंह को लेकर वहां पहुंच गया। शूटिंग देहरादून से करीब तीस किलोमीटर दूर सेलाकुंई के गांव में थी। हमारे अलावा कोई और मीडियाकर्मी वहां नहीं था। गर्मजोशी के साथ विभा और उसके पिता से मुलाकात हुई। मैंने फोटो जर्नलिस्ट अरुण सिंह को कहा कि विभा की कुछ अच्छी फोटो गांव के परिवेश में कर लो। कोमल भी उनके साथ ही खेतों की तरफ चली गई।
मैं वहीं झोपड़ीनुमा कमरे में बैठ गया। वहीं विभा के पिता ने चाय नाश्ते का प्रबंध कर रखा था। वो मेरे साथ बैठे थे। बगल के ही एक खाट पर एक और शख्स बैठा था, जो देखने में बिल्कुल किसी मजदूर की तरह लग रहा था। मैंने उसे सिर्फ एक झलक देखा और विभा के पिता से बात करने लगा। करीब दस मिनट बाद ही यूनिट का ही एक व्यक्ति विभा के पिता को बुलाकर ले गया। अब वहां झोपड़ी में मैं और वह शख्स ही बैठा था। मैंने औपचारिकता के तौर पर उसे भी बिस्कुट आॅफर किया। उसने शालीनता से नकार दिया। फिर उससे बातचीत शुरू हो गई।
मैंने पूछा कि आप भी फिल्म में हैं क्या? तो उसने कहा जी हां। मैं इस फिल्म में हीरो के तौर पर हूं। एक मुस्लिम किरदार है। मैं चौंक गया। विभा के पिता ने उससे परिचय भी नहीं कराया था। मैंने उससे नाम पूछा तो उसने अपना नाम नवाजुद्दीन सिद्दकी बताया। फिर बातचीत का सिलसिला निकल पड़ा। नवाजुद्दीन को उस वक्त तक फिल्म इंडस्ट्री में तो कुछ लोग जरूर पहचानते थे, लेकिन बाहरी दुनिया में जानने वाले कम ही थे। तब तक उन्होंने इस इंडस्ट्री में करीब 11 साल का लंबा संघर्ष कर लिया था।
मैं बहुत व्यग्र हो गया नवाजुद्दीन की कहानी सुनने को। व्यग्र इसलिए था क्योंकि मेरा छोटा भाई शशि वर्मा भी उन दिनों फिल्मी दुनिया में वैसा ही संघर्ष कर रहा था। टैलेंट की कोई कमी नहीं थी, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष अच्छे-अच्छों का हौसला डिगा देती है।
नवाजुद्दीन ने बताया कि वैसे तो मैं मुजफ्फरनगर का रहने वाला हूं पर मेरा देहरादून से गहरा नाता है। यहीं मेरे भाई और परिवार के अन्य लोग रहते हैं। मैंने उनकी कहानी को विस्तार से सुनना चाहता था, लेकिन नवाजुद्दीन जैसा शर्मिला और दिलकश व्यक्ति मुझे आज तक नहीं मिला। लाख कुरेदने पर भी नवाजुद्दीन टुकड़ों में अपनी बात कहते और चुप हो जाते थे। शुन्यता में देखने लग जाते थे, ऐसा लग रहा था मानो अपनी अच्छी-बुरी यादों को सहेज रहे हों। पर मेरा मन अलग ही ताना बाना बुनने में लगा था।
मैंने कहा, नवाज भाई प्लीज अपनी बात कहिए। मैं आपका इंटरव्यू छापना चाहता हूं। आपके संंघर्ष को युवाओं को बताना चाहता हूं, ताकि घर बार छोड़कर मुंबई की तरफ भागने वाले युवाओं को भी पता चले कि जिंदगी इतनी भी आसान नहीं है। पर नवाज इंटरव्यू के नाम पर घबरा गए। घबराहट इस बात की नहीं थी कि वो कुछ बताना नहीं चाहते थे, बल्कि इस बात की थी कि जिस विभा आनंद के पिता ने उन्हें काम दिया है वो न नाराज हो जाएं। मैंने उनकी स्थिति भांप ली थी। मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि आपको नुकसान नहीं होने दूंगा। विभा के पिता से भी बात कर लूंगा। फिर उन्होंने बड़ी हिम्मत करके मुझे कहा, पूछिए आप क्या जानना चाहते हैं।
फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। नवाज ने कहा कि भाई आपने हाल ही में आई पिपली लाइव देखी है। मैंने न में सिर हिला दिया। उन्होंने बताया कि मैं इस फिल्म में रिपोर्टर के रोल में था। दो बार पर्दे पर दिखा था। फिर उन्होंने बताया कि मेरे नौ भाई बहन हैं। मैं एक संपन्न किसान परिवार से हूं। पढ़ना-लिखना चाहता था इसीलिए गांव से बाहर निकल आया। हरिद्वार से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। थोड़े दिन एक फॉर्मिस्ट कंपनी में नौकरी की। पर मन नहीं लगा। कुछ अलग करने का मन था। पर, क्या करूं समझ नहीं आ रहा था। फिल्में देखने का शौक तो था ही, एक दिन विचार आया कि फिल्मों ही काम करूंगा। दोस्तों से सलाह ली तो बताया कि इसके लिए पहले एक्टिंग सीखनी होगी। पता किया तो दिल्ली के नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा (एनएसडी) के बारे में जानकारी मिली। पर यहां भी संघर्ष था। तमाम टेस्ट के अलावा यह भी जरूरी था कि आप किसी थियेटर से जुड़े हों। दिल्ली में ही मैंने प्ले ग्रुप ज्वाइन कर लिया। नाम था साक्षी थियेटर ग्रुप। यहीं मनोज वाजपेयी और सौरभ शुक्ला जैसे लोग भी थे। मैं भी इसका हिस्सा बन गया। दिल्ली में गुजारा करने के लिए मैंने सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी तक की। तबतक जुनून सवार हो गया था कि एक्टिंग ही मेरी लाइफ है, यही मेरी मंजिल है। 1996 में एनएसडी से पास हुआ। पर, हाथ में कोई काम नहीं था। नाटकों में तो हिस्सा लेता था, लेकिन वहां पैसे नहीं थे। दिल्ली के शहादरा में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के भरोसे जीवन की नांव हिचकोले खाते आगे बढ़ रही थी। एनएसडी की ट्रेनिंग पर तो पूरा भरोसा था, लेकिन इंडस्ट्री में कोई गॉडफादर नहीं था। जो करना था अपने बलबुते करना था। फिर मैंने मुंबई की तरफ रुख किया। बहुत सुना था मुंबई सबको अपना बना लेती है। पर, सच कहूं तो यहीं से मेरी जिंदगी का असली संघर्ष शुरू हुआ। हालात ये थे कि मैं छोटे-मोटे रोल तो छोड़िए भीड़ का हिस्सा बनने को भी तैयार था। रिजेक्शन का ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसने मुझे अंदर से हिला कर रख दिया। आज इस इंडस्ट्री में 11 वर्षों के संघर्ष के बाद उपलब्धि के नाम पर कुछ नहीं है।
मैं नि:शब्द था। स्तब्धता के साथ नवाज भाई की बात सुन रहा था। नवाज कह रहे थे, फिल्मों के नाम पर चंद फिल्मों के नाम आपको गिना दूंगा। सरफरोश, शूल, जंगल यहां तक की मुन्ना भाई एमबीबीएएस तक का नाम बता दूंगा। पर मैं वहां कहां हूं यह आपको खोजना होगा।
मुन्ना भाई एमबीबीएस का नाम सुनकर मैं चौंक गया। मैंने दोबारा पूछा। क्या कहा नवाज भाई, आप मुन्ना भाई एमबीबीएस में भी हैं? नवाज ने हल्की मुस्कान दी। पर मैं स्पष्ट तौर पर देख पा रहा था कि उस मुस्कान के पीछे भी बेसुमार दर्द लिपटा था। नवाज ने कहा, देखा... मैंने आपको कहा न कि फिल्मों के नाम तो गिना दूंगा पर आप मुझे नहीं खोज पाओगे। मुन्ना भाई में मैंने पॉकेटमार का रोल किया है। सच कहूं तो नवाज भाई के बताने के बाद भी मैं उस कैरेक्टर को तत्काल खोज नहीं पाया। जबकि मैंने वह फिल्म दो या तीन बार देखी थी।
खैर, बातों का सिलसिला खत्म हुआ। अरुण, कोमल इंटरव्यू और फोटो शूट कर विभा के साथ हमारे पास आ गए। नवाज बिल्कुल खामोश हो गए। खुद को ऐसे समेट लिया, जैसे वो वहां मौजूद ही न हों। चाय-नाश्ते का दौर खत्म हुआ। हम लोग निकलने लगे। मैंने अरुण को कहा कि इनकी भी एक तस्वीर ले लो। अरुण थोड़ा सकुचाए। पर, मेरी गंभीर मुद्रा को देख तुरंत कैमरा निकाल लिया। मैं जबर्दस्ती नवाज को बाहर लेकर आया। वो तस्वीर खींचवाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। विभा आनंद की उस दिन पचासों तस्वीर खींचने वाले अरुण सिंह ने नवाज की दो या तीन तस्वीर लेने के बाद ही ओके कर लिया। फिर मैंने अपने साथ नवाज भाई की तस्वीर लेने को कहा। जो मैंने यहां लगाई है। आप इस तस्वीर में भी देख सकते हैं उनके चेहरे का हाव भाव। बेहद ही अनमने तरीके से उन्होंने अपनी तस्वीर खिंचवाई। वो खुद को बेहद असहज महसूस कर रहे थे।
मैंने नवाज को थोड़ा सहज करने के लिए अरुण से पूछा कि तुमने पिपली लाइव देखी है। मुझे पता था कि अरुण ने उस फिल्म को कई बार देखा है, क्योंकि अरुण ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कहानी पर आधारित इस फिल्म के बारे में मुझसे कई बार चर्चा की थी। चर्चा क्या की थी सच कहूं तो हर प्रेस कांफ्रेस या कार्यक्रम से लौटने के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों को गाली बकते हुए उसने मुझे बुरी तरह पकाया था।
अरुण ने तुरंत हां कहा। कहा सर बिल्कुल देखी है। अब मेरा दूसरा सवाल सुनकर अरुण हैरान हो गए। मैंने कहा इन्हें उस फिल्म में देखा है। अरुण गौर से उन्हें देखने लगे। गौर से देखते ही अरुण सिंह की पारखी नजरों ने उन्हें पहचान लिया। अरे सर हां पहचान गया, ये तो उस फिल्म में रिपोर्टर के रोल में है। नवाज भाई के चेहरे पर पहली बार खुशी वाली हंसी थी। फिर अरुण ने भी उनके साथ तस्वीर खिंचवाई। नवाज खुद को थोड़ा सहज महसूस कर रहे थे।

गले मिलकर जब नवाज हमें विदा कर रहे थे तो मैंने उन्हें दस साल का चैलेंज दिया था। मेरी मां कहती हैं कि दिन में एक बार किसी भी व्यक्ति के मुंह में सरस्वती वास करती है। जो दिल से निकली बात होती है। मैंने नवाज भाई से कहा था आज आपके साथ यह तस्वीर ले रहा हूं, पता नहीं दस साल बाद आप कहां होंगे और मैं कहां रहूंगा। पर, मेरा विश्वास है कि दस सालों में आप सफलता की उस शिखर पर रहोगे कि हम आपको याद करेंगे। दोबारा कस कर गले लगाकर नवाज ने पहले आमीन किया फिर शुक्रिया अदा किया। दूसरे दिन जब इंटरव्यू प्रकाशित हुआ तो सुबह सुबह सबसे पहला फोन नवाज का आया। वो बेहद खुश थे। कहा भाई शुक्रिया। आज जिंदगी में पहली बार मेरा इंटरव्यू छपा है। मैंने कहा आज तो यह जबर्दस्ती लिया गया इंटरव्यू छपा है। मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन आपसे इंटरव्यू लेने वालों की लाइन लगेगी।
आज इस कहानी को नौ साल हो रहे हैं। एक साल और बचा है। पर आज यह कहानी इसलिए बता रहा हूं कि क्योंकि आज ही नवाजुद्दीन की एक ऐसी फिल्म परदे पर आ रही है जो नए रिकॉर्ड कायम करेगी। शुक्रवार सुबह की शुरुआत ही एक ऐसे रिकॉर्ड और सम्मान से होगी जो अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार जैसे कलाकारों को भी नसीब नहीं हुई।
दरअसल, 25 जनवरी को परदे पर आ रही नवाज की फिल्म ठाकरे को महाराष्टÑ के सिनेमाघर में सुबह चार बजे का शो मिला है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में यह पहली बार होगा कि किसी फिल्म का ओपनिंग शो सुबह चार बजे होगा। कभी ऐसा क्रेज अमिताभ, दिलीप कुमार, राजेश खन्ना जैसे सुपर स्टार के लिए हुआ करता था। सुबह छह बजे का शो तो इन स्टार के लिए हुआ, लेकिन यह पहली बार होगा जब सुबह चार बजे का ओपनिंग शो होगा।
दिल से बधाई आपको नवाज भाई। मेरा दस साल का आपको दिया चैलेंज नौ साल आते-आते आपकी उपलब्धियों के कारण बहुत फिका हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि दसवें साल में आप आॅस्कर तक का सफर पूरा करके इस चैलेंज को पूरी तरह धुमिल कर दोगे।



Sunday, October 7, 2018

हम ‘सेव द टाइगर’ कहते रहे, संकट में शेर घिर गए


70 के दशक में पूरे विश्व में बाघों की घटती संख्या को लेकर मंथन शुरू हुआ। वैश्विक स्तर पर इस पर मुहर लग चुकी थी कि आने वाले दस वर्षों में यह प्रजाति विलुप्त हो जाएगी। सबसे अधिक चिंता भारत के लिए थी। भारत में इस मंथन का सबसे अधिक असर हुआ क्योंकि पूरे विश्व में उस वक्त मौजूद बाघों में आधे से ज्यादा संख्या भारत में ही थी। ‘सेव द टाइगर’ मुहिम की शुरूआत ने भारत के बाघों को खत्म होने से तो बचा लिया, पर अब एक बार और उसी तरह के मंथन की जरूरत आन पड़ी है जो 70 के दशक में किया गया था। इस बार मंथन एशियाई शेरों के लिए करना होगा, क्योंकि हम ‘सेव द टाइगर’ का नारा लगाते रहे, उधर एशियाई शेर संकट में घिर गए हैं। हैरान करने वाले आंकड़े हैं कि पिछले कुछ महीने में करीब 70 शेर ने गिर के जंगलों में दम तोड़ दिया है। पिछले तीन हफ्तों में ही करीब दो दर्जन शेर मर चुके हैं।
पहली बार भारत में 1972 में बाघों की गणना की गई थी। बेहद चुनौतीपूर्ण इस कार्य में कई महीनों का वक्त लगा। इस जनगणना के बाद भारत सरकार को बेहद चौंकाने वाले आंकड़े मिले थे। इन आंकड़ों ने यह बात स्थापित कर दी थी कि निश्चित तौर पर आने वाला वक्त एशियाई बाघों के लिए सबसे कठिन है। अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए तो बाघ सिर्फ किस्से, कहानियों, किताबों और फोटो में ही नजर आएंगे। उस वक्त देश में मात्र 1,827 बाघ ही शेष बचने का रिकॉर्ड सामने आया था। इसी गणना के बाद अस्तित्व में आया था ‘सेव द टाइगर’ मुहिम। सात अप्रैल 1973 को केंद्र सरकार ने बाघ बचाओ परियोजना का शुभारंभ किया था। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण तथा बाघ व अन्य संकटग्रस्त प्रजाति अपराध नियंत्रण ब्यूरो के गठन संबंधी प्रावधानों की व्यवस्था करने के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 में संशोधन किया गया। तत्काल बाघों के संरक्षण के लिए नौ बाघ अभयारण्य बनाए गए। धीरे-धीरे इन अभयारण्यों की संख्या आज 50 के करीब पहुंच चुकी है। बाघ के शिकार पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ सख्ती भी की गई। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि साल 2014 की गणना में इनकी संख्या 2,226 रिकॉर्ड की गई। यह आंकड़ा उत्साहवर्द्धक इसलिए था क्योंकि 2010 की गणना में इनकी संख्या मात्र 1,706 रिकॉर्ड की गई थी। 2018 में एक बार फिर से बेहद हाईटेक और व्यापक स्तर पर भारत में मौजूद वन्य जीवों की गणना की गई है। उम्मीद जताई जा रही है इस गणना के भी बेहतर रिजल्ट आएंगे। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा वर्ष 2022 तक बाघों की संख्या दो गुनी तक करने का लक्ष्य रखा गया है। इस समय पूरी दुनिया में मात्र 3200 बाघ ही शेष बचे हैं। इनमें से आधे भारत में निवास करते हैं।
एक तरफ ‘सेव द टाइगर’ मुहिम चलता रहा, बाघों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी दर्ज होती गई, लेकिन बेहद अफसोसजनक है कि हमारे एशियाई शेर हमसे बिछड़ते गए। एशियाई शेरों के लिए सुरक्षित अभयारण्य के रूप में गिर नेशनल पार्क ने विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। पर पिछले कुछ महीनों में यहां शेरों की लगातार हो रही मौत ने मंथन करने पर विवश कर दिया है। वर्ष 2014-15 की गणना के दौरान करीब 523 एशियाई शेरों के होने की पुष्टि हुई थी। अब इतनी बड़ी तादात में हो रही मौत ने सभी को हैरान कर दिया है। एशियाई शेरों का वैज्ञानिक नाम पेंथरा लियो पर्सिका है। पूरे एशिया में गुजरात के गिर क्षेत्र में स्थापित अभयाराण्य ही एकमात्र संरक्षण स्थल है जहां एशियाई शेर अपने प्राकृतिक रूप में निवास कर रहे हैं। गुजरात का जूनागढ़, अमरेली और भावनगर जिलों में गिर के जंगल करीब 2,450 हेक्टेयर भूमि पर फैले हुए हैं। वर्ष 1965 में शेरों के लिए आरक्षित वन क्षेत्र घोषित किया गया। 

भारतीय शेरों के शिकार के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान अंग्रेज शिकारी विशेष तौर पर भारत आया करते थे। भारत सरकार के आंकड़ें कहते हैं कि 1900 आते-आते भारत में शेरों की संख्या सिर्फ 15 रह गई थी। गिर वन क्षेत्र को संरक्षित घोषित करने के बाद निश्चित तौर पर शेरों के शिकार पर रोक लगी और इनकी संख्या लगातार बढ़ती गई। प्राकृतिक रूप में इनका विकास तो हो ही रहा था। भारत सरकार ने जूनागढ़ के सक्करबाग प्रणी संग्रहालय में लॉयन ब्रीडिंग प्रोग्राम की नींव डाली। कृतिम रूप से शेरों का प्रजनन करवाया गया। इसमें भी अप्रत्याशित सफलता मिली और करीब ढ़ाई से तीन सौ शेरों का सफल प्रजनन हो चुका है। निश्चित तौर पर शेरों को बचाने के लिए प्रयास हुए, पर गंभीरता से मंथन करने की जरूरत है कि क्या उस स्तर पर हुए जिसकी आज जरूरत है। एशियाई शेरों के अस्तित्व पर आए संकट का एक बड़ा कारण उनका एक ही क्षेत्र में निवास और संरक्षण करना है। कभी यह प्रयास नहीं किया गया कि गिर वन क्षेत्र के अलावा भारत के अन्य वन्य क्षेत्रों में भी इनके संरक्षण और पल्लवन के लिए रास्ता बनाया जाए। ऐसे वन क्षेत्र विकसित किए जाए जहां इनका प्राकृतिक रूप से संरक्षण किया जा सके। 

शेरों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा संकट उनमें तेजी से फैलने वाला संक्रमण है। वर्ष 1994 में तंजानिया के सेरेनगेटी अभयारण्य में करीब एक हजार शेरों की जान इसी तरह के संक्रमण ने ले ली थी। कारण स्पष्ट था कि एक क्षेत्र विशेष में ही इनका निवास स्थान बना दिया गया था जहां वे एक दूसरे के करीब थे। ऐसा ही कुछ गुजरात के गिर वन क्षेत्र के साथ हो रहा है। संक्रमण के कारण होने वाली बीमारियों और आपदा के कारण इनका बचना मुश्किल हो जाता है। शायद यही कारण है कि आचनक पिछले तीन हफ्तों में दो दर्जन एशियाई शेर असमय मौत के आगोश में चले गए हैं। हालत इतने चिंताजनक हो चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इन मौतों का स्वत: संज्ञान लिया है। सर्वोच्य अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को इस पर गंभीरता से ध्यान देने की बात कही है। हर वर्ष ‘सेव द टाइगर’ प्रोजेक्ट के लिए करोड़ों रुपए का बजट जारी होता है। शेरों के संरक्षण के लिए भी अलग से बजट का प्रावधान है। पर गंभीरता से मंथन करने की जरूरत है कि इस बजट को शेरों के संरक्षण के लिए कहां और किस तरह खर्च किया जाए।
वायरल इंफेक्शन और प्रोटोजोआ संक्रमण के कारण सबसे अधिक इनकी मौत होती है। इसके अलावा केनाइन डिस्टेंम्पर वायरस (सीडीवी) भी इनकी मौत का अहम कारण है। यह सभी संक्रमण तेजी से शेरों में फैलते हैं। ऐसे में सबसे अधिक जरूरत अन्य शेर अभराण्य विकसित करने की है। वर्ष 1850 से पहले बिहार, पूर्वी विंध्यास, बुंदेलखंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य भारत सहित पश्चिम भारत में एशियाई शेरों की उपस्थिति के प्रमाण मिलते हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में भी शेरों के लिए सुरक्षित ठिकाने बनाने और खोजने पर मंथन किया जा सकता है। ताकि गुजरात के अलावा भी ये अपने प्राकृतिक संरक्षण में पल और बढ़ सकें। ‘सेव द टाइगर’ मुहिम की तरह ही ‘सेव द लॉयन’ मुहिम को भी व्यापक स्तर पर लॉन्च करने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि हम ‘सेव द टाइगर’ रटते रहे और हमारे भारत के गर्व का सर्वोच्य निशान हमसे बिछड़ जाए।
(लेखक आज समाज के संपादक हैं )