Friday, June 26, 2015

शर्म उनको मगर आती नहीं


एक बार फिर उत्तराखंड के पहाड़ों पर विपदा आन पड़ी है। सरकारी तंत्र के होनहारों ने हजारों तीर्थ यात्रियों को संकट में ला खड़ा किया है। बार-बार  की चेतावनी के बाद भी उत्तराखंड सरकार चेत नहीं रही है। बिना किसी ठोस बंदोबस्त के चार धाम और हेमकुंड साहिब की यात्रा को जारी करने को रजामंदी दे रही है। नतीजा सामने है। हजारों यात्रियों की जान संकट में है। पूरे देश की नजर उत्तराखंड पर टिक गई है। इतना सब होने के बावजूद उत्तराखंड सरकार के कारिंदे ऐसे हैं जिन्हें शर्म नहीं आ रही है।
दरअसल उत्तरखंड में बार-बार आ रही आपदा को समझने के लिए हमें इसके भौगोलिक विस्तार को गहराई से समझने की जरूरत है। जून 2013 में आ चुकी आपदा ने हमें चेता दिया था कि अगर पहाड़ों के साथ ज्यादा छेड़छाड़ की गई तो प्रकृति हमेशाअपना रौद्र रूप दिखाएगी। ऐसा भी नहीं है कि इससे पहले पहाड़ों में आपदा नहीं आई है, पर हाल के वर्षों में आ रही आपदाओं ने अपना नया रूप दिखाया है। नदियों ने अपना बहाव बदल दिया है। चाहे वह सोनप्रयाग हो या अगस्त्यमुनी या फिर रुद्रप्रयाग हो या चमोली, हर जगह नदियों ने अपना वर्षों पुराना रास्ता अख्तियार कर लिया है। कहा भी जाता है नदियां अपना मूल रास्ता कभी नहीं भूलती हैं। जिस तरह पहाड़ों में सभी नियमों की अनदेखी कर बेतहाशा निर्माण कार्य हो रहे हैं उसने पहले ही संकेत दे दिए थे कि आने वाला समय पहाड़ों के लिए भारी पड़ने वाला है। विकास के नाम पर नदियों के रास्ते तक अतिक्रमण का शिकार हुए। 2013 की आपदा में अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी ने जब अपना विकराल रूप दिखाया उसने सबकुछ उलट पुलट कर रख दिया। हाल यहां तक खराब हुए कि कई-कई किलोमीटर तक राष्टÑीय राजमार्ग नदियों के मुख्य बहाव की जद में आ गए।
उत्तराखंड को पुनर्जिवित करने के लिए हजारों करोड़ रुपए के मदद आए। पर विधानसभा के पटल पर रखी गई कैग रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किस तरह इन पैसों का दुरुपयोग हुआ। किस तरह हजारों करोड़ रुपयों को पानी में बहा देने के लिए छोड़ दिया गया। उत्तराखंड को पुनर्जिवित करने के लिए सबसे बड़ी जरूरत थी कि इसका बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जाए। जमीनी शुरुआत करने की जरूरत थी। पहाड़ को पहाड़ के नजरिए से देखते हुए पुनर्निमाण करने की प्लानिंग करनी थी। पर हुआ इसका उल्टा। सरकार का मुख्य उद्देश्य बन गया जैसे-तैसे चार धाम यात्रा शुरू करवा दी जाए। पुनर्निर्माण की जगह पूरा फोकस यात्रा शुरू करने पर कर दिया गया। 2014 में भी इसी तरह यात्रा शुरू हुई। उस साल भी सरकारी तैयारियों की पोल खुल गई। पर इससे भी सरकार ने कुछ सीख नहीं ली।
परिवर्तन बस इतना हुआ कि उत्तराखंड से पिता-पूत्र का शासन समाप्त हुआ। विजय बहुगुणा और उनके पुत्र साकेत बहुगुणा की राजशाही खत्म हुई और उसकी जगह हरीश रावत को कमान सौंपी गई। पहाड़ के लोगों के बीच उम्मीद की किरण जगी। चुंकि हरीश रावत को ठेठ पहाड़ी माना जाता है, इसीलिए उम्मीद थी कि वे पहाड़ के दर्द को समझेंगे। पर अफसोस ऐसा हो नहीं सका। वे भी उसी चाकरी से घिरे रहे जिन्होंने बहुगुणा के समय पहाड़ का शोषण किया और राहत और पुनर्निर्माण के नाम पर हजारों करोड़ रुपए डकार गए।
वक्त ने एक बार फिर पलट कर उत्तराखंड सरकार की तरफ देखा है। सत्ता परिवर्तन के ठीक एक साल बाद फिर पहाड़ कराह रहा है। पहाड़ को पुनर्जिवित करने के नाम पर हर जगह अस्थाई पुल बना दिए गए। जैसे-जैसे सड़क निर्माण कर दिए गए। सड़क भी चार धाम मुख्य यात्रा मार्ग के ही बनाए गए। जब पता था कि नदियां जब उभान पर आएंगी ये अस्थाई पुल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगे। बावजूद इसके न तो इनकी क्वालिटी पर ध्यान दिया गया और न ही स्थायित्व का ख्याल रखा गया। नतीजा यह हुआ कि हल्की बारिश में ही उत्तराखंड की हालत खराब हो गई। राष्टÑीय राजमार्गों की हालत भी खराब हो चुकी है। जगह-जगह हुई लैंड स्लाइडिंग ने यात्रियों के रास्ते रोक रखे हैं।
इसमें दो राय नहीं कि चारों धाम सहित हेमकुंड साहिब भारतीय सनातन धर्म के आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। हर साल लाखों यात्री यहां की यात्रा करना चाहते हैं। इन यात्राओं से सरकार को भी हजारों करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। पर मंथन का वक्त है कि क्या हम सिर्फ धार्मिक यात्राओं की दृष्टि से ही उत्तराखंड को देखें। या फिर इसे देखने का नजरिया बदलने की जरूरत है। उत्तराखंड को वास्तव में एक ऐसे ठोस तरीके से सजाने संवारने की जरूरत है जो लंबे समय तक कायम रह सके। क्या हुआ कि अगर एक दो साल यात्रा नहीं होगी तो। इससे कोई खास फर्क तो नहीं पड़ा जाएगा। 2013 की घटना के बाद से तो वैसे भी पूरा देश भयभीत है। फिर क्या जरूरत है करोड़ों रुपए विज्ञापन पर खर्च कर पूरे देश से यात्रियों को वहां बुलाने की।
न आपके पास प्लानिंग है, न आपके पास व्यवस्था है और न ही आपके पास ठोस निर्माण का व्यवस्थित ढांचा है। ऐसे में सभी यात्राओं को कुछ साल के लिए बंद कर ठोस निर्माण पर ध्यान दें तब जाकर ही हम अगले पचास साठ साल के लिए निश्ंिचत हो सकते हैं, नहीं तो हर साल ऐसे ही विपदा आएगी और हमारी जान संकट में रहेगी। पहाड़ के लोग तो हर वक्त त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही हैं, उत्तराखंड सरकार दूसरे राज्यों के लोगों को   भी क्यों सता रही है इसका जवाब कोई नहीं दे रहा है। कुछ तो शर्म करो उत्तराखंड सरकार। अब भी मंथन का वक्त है। अभी मंथन नहीं किया तो वक्त अपना हिसाब तो जरूर लेगा ही। तैयार रहना।


Wednesday, June 24, 2015

तो क्यूं विराट को ढो रही है टीम इंडिया


माना की आप युवा हो। यह भी मान लिया कि आपमें बहुत कुछ करने की क्षमता है। यह भी सच है कि आपने टीम इंडिया को बहुत कुछ दिया है। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि कप्तानी की लालच में आप इतना नीचे गिर जाओ। इंडियन टीम के ड्रेसिंग रूम से जो खबरें छन-छन कर बाहर आ रही है उसका साफ मतलब है कि इंडियन टीम दो भागों में बंट गई है। एक का नेतृत्व दिल्ली का मुंडा विराट कोहली कर रहा है, वहीं दूसरी टोली का नेतृत्व भारत का सर्वकालिक महान कप्तान महेंद्र सिंह धोनी कर रहा है। यहां यह भी कोट करना जरूरी है कि विराट कोहली के साथ जितने क्रिकेटर हैं उनमें अधिकतर अभिजात्य वर्ग से ताल्लुक रखते हैं और मुख्यत: वैसे स्टेट से विलांग करते हैं जहां के प्लेयर्स का दबदबा हमेशा टीम इंडिया में रहा है। वहीं दूसरी तरफ धोनी खुद एक लोअर मीडिल क्लास फैमिली से आते हैं और स्टेट भी ऐसा है जहां के प्लेयर बमुश्किल नेशनल और इंटरनेशनल लेवल तक पहुंच पाते हैं। धोनी से पहले तो बिहार-झारखंड से एक कीर्ति आजाद को छोड़ दिया जाए तो हमें कोई नाम याद नहीं जिसने इंटरनेशनल लेवल पर अपनी अलग पहचान कायम की।

वह तो धोनी की प्रतिभा और उनकी जीवटता ही थी जिसने इतने दिनों तक टीम इंडिया में कायम रखा। नहीं तो छोटे शहरों से आए सैकड़ो क्रिकेटर ऐसे रहे जो प्रतिभावान होते हुए भी हाशिए पर डाल दिए गए। क्रिकेट और राजनीति के कांबिनेशन ने भारतीय टीम में दिल्ली का दबदबा हमेशा कायम रखने में मदद की। धोनी एक अपवाद रहे जिनके ऊपर न तो कभी कोई आरोप लगा और ही उनके साथ टीम चयन को लेकर विवाद जुड़ा। एक बार फिर दिल्ली की लॉबी ने विराट कोहली को आगे रखकर एक ऐसी चाल चली है जिसमें धोनी खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। शायद इसी असहजता ने उन्हें बांग्लादेश में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कुछ ऐसा कहने पर मजबूर कर दिया, जिसने धोनी की नाराजगी को जगजाहिर कर दिया। धोनी के समर्थन में सौरव गांगुली और बिशन सिंह बेदी जैसे क्रिकेटर भी सामने आए हैं। उप कप्तान के रहते हुए आर अश्वीन का प्रेस कांफ्रेंस करना भी बहुत कुछ इशारा कर देता है।

अगर किसी टीम में प्रदर्शन के दम पर किसी क्रिकेटर को रहने का अधिकार है तो सबसे पहले विराट कोहली को ही बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। हमेशा अपनी पर्सनल लाइफ (गर्ल फ्रेंड) को लेकर चर्चा में रहने वाले इस किक्रेटर की अगर पिछली पंद्रह-बीस पारियों का आंकलन किया जाए तो इन्हें इंडियन टीम में तो क्या दिल्ली की रणजी टीम में भी खेलने का अधिकार नहीं। फिल्ड में जिस तरह का एटीट्यूट विराट कोहली का रहता है वह अब तक के भारतीय क्रिकेट में कभी नहीं देखा गया। जितने भी कप्तान हुए उनमें संयम के साथ समझदारी भी रहती थी। पर विराट कोहली की नाराजगी हमेशा लाइव टेलिकास्ट कर रहे कैमरों की जद में रहती है। ऐसे में किस अधिकार से विराट कोहली को भारतीय टीम के कप्तान के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है यह समझ से परे है।

विराट कोहली ने इस साल के शुरुआत में हुए ट्राई सीरिज के दौरान चार पारियां खेली। इस वन डे ट्राई सीरिज के चार मैचों में विराट ने क्रमश: 9, 4, 3 और 8 रन किए। यानि कुल मिलाकर 24 रन। इसके तुरंत बाद वर्ल्ड कप का आगाज हो गया। पहले पुल मैच में 103 रन की पारी की बात छोड़ दी जाए तो पूरे टूर्नामेंट के दौरान कभी भी विराट कोहली में आत्मविश्वास नहीं दिखा। पुल बी के अन्य मैचों में विराट ने क्रमश: 46, 33, 33, 44 और 38 रन बनाए। क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल में तो विराट की हैसियत और गिर गई। इन दोनों बड़े मैचों में विराट का रन क्रमश: 3 और एक था।
2014 के इंग्लैंड दौरे पर भी विराट ने चार मैच खेले थे। इन चारों मैच में विराट ने 0, 40, 1 और 13 रन बनाए थे। अब कुछ ऐसा ही हाल बांग्लादेश में ट्राई सीरिज के दौरान हुआ। पहले मैच में एक रन, दूसरे मैच में 23 रन और तीसरे वन डे में 29 रन बनाकर कोई कैसे कप्तानी की दावेदारी कर सकता है या सपने देख सकता है यह समझ से परे है। कप्तान बनकर धोनी ने दिखा दिया था कि कप्तान सिर्फ कप्तानी ही नहीं कर सकता है, बल्कि टीम के लिए एक ऐसा एग्जांपल सेट कर सकता है जिससे दूसरे खिलाड़ी प्रेरणा ले सकें। अपनी कप्तानी के दौरान महेंद्र सिंह धोनी ने कई मैचों में भारतीय टीम को न केवल संकट से उबारा, बल्कि मैच विनर भी बने।

सवाल यह उठता है कि विराट कोहली ही कप्तान क्यों? क्योंकि वो भारतीय टीम में उप कप्तान हैं, और स्वाभाविक तौर से कप्तान का ताज उन्हें ट्रांसफर कर दिया जाए? भारतीय टीम में कई ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने न केवल बेहतर प्रदर्शन से खुद को हमेशा आगे रखा है बल्कि कई मौकों पर बेहतरीन एग्जांपल भी सेट किया है। इनमें प्रमुख नाम है रोहित शर्मा और शिखर धवन। आर अश्वीन को भी कमतर नहीं आंका जा सकता।

मैं तो कहता हूं विराट कोहली को अगले दस मैचों के लिए प्लेइंग इलेवन से बाहर कर दिया जाए। फिर देखिए टीम की अंदरुनी राजनीति कैसे हवा हो जाएगी। टीम का प्रदर्शन भी ठीक हो जाएगा। इसमें दो राय नहीं कि विराट कोहली एक प्रतिभावान खिलाड़ी हैं। उनमें बहुत खेल बचा हुआ है। पर जिस तरह विवादों ने जन्म लिया है ऐसी स्थिति में उनको खुद भी सामने आकर स्थितियों   को स्पष्ट करना चाहिए। पर वे जब भी सामने आते हैं टीम इंडिया के बारे में कम और अपनी गर्लफ्रेंड के बारे ज्यादा सफाई देते हैं। कई बार सफाई नहीं देते तो पत्रकारों को गालियां बक देते हैं। वह भी सार्वजनिक रूप से।

यह सच है कि टीम की ड्रेसिंग रूम में जो कुछ चलता है वह हम और आप जैसे सामान्य लोग नहीं जान सकते हैं। सिर्फ कयास ही लगाए जाते हैं। पर बॉडी लैंग्वेज, आपकी परफॉर्मेंस भी बहुत कह देती है। खासकर भारत में जहां क्रिकेट के एक-एक रन और एक-एक बॉल को पान की दुकान पर बैठा शख्स भी एनालेटिकल होकर देखता है, वैसे में इस वक्त कप्तान धोनी की मनोदशा का आंकलन करना इतना दुरुह भी नहीं है।

फिलहाल बांग्लादेश का दौरा आज समाप्त हो रहा है और जिंम्बावे का दौरा कैंसिल हो चुका है। इस बीच टीम इंडिया को आराम करने का काफी मौका है। एक नई सोच और राजनीति से ऊपर उठने में यह विश्राम काफी मदद करेगा। पर विराट कोहली यह सोचना चाहिए कि वे प्रदर्शन के दम पर टीम इंडिया के कप्तान बनें या राजनीति के दम पर। वहीं धोनी को यह सोचना चाहिए कि उनमें अभी काफी क्रिकेट बचा है। वह टीम इंडिया को इस तरह नहीं छोड़ सकते हैं। हां कप्तानी छोड़ने जैसी बात कह कर उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कप्तान जैसे पद का उन्हें लालच नहीं है। वह तो सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट खेलने के लिए पैदा हुए हैं और जब तक क्षमता है वह क्रिकेट ही खेलेंगे, पॉलिटिकल गेम नहीं।

Saturday, June 20, 2015

थैंक्स पापा, इस बेहतर जिंदगी के लिए

पुत्र का खत, पिता के नाम 


पापा आपको तो पता भी नहीं होगा कि आज के दिन  दिन फादर्स डे भी होता है। आज तक हमने कभी फादर्स डे सेलिब्रेट नहीं किया। जब हम छोटे बच्चे थे उस वक्त इस तरह के स्पेशल डे का प्रचलन नहीं होता था। हमने भी नहीं जाना कि फादर्स डे क्या होता है। हम कितने खुशनसीब थे कि अपने पापा के लिए एक खास दिन नहीं निकालना पड़ता था। हमारे लिए तो हर दिन फादर्स डे ही होता था। हर दिन हम आपके साथ सेलिब्रेट करते थे।

बचपन में आपके सिर से पके हुए बाल उखाड़कर कटोरी में जमा करना। फिर एक पैसे के हिसाब से उसे काउंट करना। उस हिसाब के अनुसार आपसे मेहनताना लेकर आईसक्रीम वाले और पेड़े वाले बाबा का इंतजार करना। कभी-कभी चनाचुर गरम वाले की भी बारी आती थी। हमारे लिए तो वही खुशी फादर्स डे सेलिब्रेशन की तरह थी। हमारे लिए तो आप वर्ल्ड के बेस्ट पापा लगते थे जब शाम में सब्जी लाने के साथ-साथ आप गरमा गरम समोसे भी ले आते थे। खुशी इतनी होती थी कि शब्दों में बयां करना मुश्किल होता था।

हम कैसे भूल सकते हैं, मां द्वारा की जाने वाली सुताई। आपको ड्राइंग रूम में बंद करके मां मुझे और भईया को अंदर वाले कमरे में ले जाकर पीटती थी। आपको इसलिए इस सुताई कांड से बाहर रखा जाता था कि आप उल्टे मां पर ही भड़क जाते थे। हमारी सुताई कांड के बाद मां का आपसे झगड़ना कि आप तो कुछ बोलते ही नहीं हैं। आपके नहीं बोलने का ही नतीजा है कि दोनों भाई बिगड़ रहे हैं। पर आपका अपनी किताबों और फाइल से नजर न उठाना। चुपचाप पढ़ते रहना। यह सब हमारे जख्मों पर मरहम की तरह लगता था।

आपका संघर्ष भी हमने देखा है। हम मुजफ्फरपुर में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे और आप हमसे दूर अपने हथुआ स्थित कॉलेज में दूसरी जिंदगी जी रहे थे। सप्ताह में तीन दिन वहां और चार दिन हमारे साथ। यह सिलसिला करीब 22 सालों तक चला। आपके क्लास का रूटीन हमें भी याद हो गया था। कब आप जाएंगे, किस दिन आएंगे, हम मैथ के पहाड़ों की तरह रट चुके थे। जब हम छोटे थे, हमारे पास कोई साधन नहीं था तब हम भयानक ठंड और बरसात में भी आपको सुबह छह बजे की ट्रेन पकड़ने के लिए जाते देखते थे। मां सुबह-सुबह आपके लिए नाश्ता और दोपहर का खाना भी पैक कर देती थी। कई बार हम मां से पूछते भी थे कि दोपहर के बाद रात का खाना कौन देगा? मां मुस्कुरा देती थी और कहती थी पापा खुद बना लेंगे।
तीन दिन के क्लास के बाद आप जब लौटते थे तो घर आने की जल्दी में आप सीवान से शाम की ट्रेन पकड़ते थे, कई बार ट्रेन लेट होने के कारण आप देर रात घर पहुंचते थे। रात दस के बाद रिक्शा वाले आने से मना कर देते थे, तो आप पैदल ही घर तक सात किलोमीटर दूरी तय करते थे। हम कैसे भूल सकते हैं आपका वो संघर्ष।

वैसे तो यूनिवर्सिटी में 180 दिन का एकेडमिक सेशन होता था, उस पर से हड़ताल हमारे लिए किसी सौगात से कम नहीं होती थी, क्यों उन दिनों आप घर पर ही होते थे। आपका साइकिल चलाना भी हमें कई बार काफी अखरता था। जब दूसरे प्रोफेसर्स को हम स्कूटर, मोटरसाइकिल और कार पर देखते थे तो जलन होती थी। आप भी तो प्रोफेसर हैं फिर आपके पास क्यों नहीं। पर हमें पता था कि आपने कभी वो काम नहीं किया जो दूसरे प्रोफेसर्स करते थे। कोई ट्यूशन नहीं, कोई कोचिंग नहीं। आपका कॉलेज और हमारे साथ बिताए गए आपके पलों से अनमोल आपके लिए कुछ दूसरा नहीं था। आपकी ईमानदारी और काम के प्रति लगन ने हमें बहुत कुछ सीखाया। इसी के बदौलत हम आज अपने दम पर स्थापित हैं।

 मुझे अच्छी तरह याद है जब हमारे घर में पहला स्कूटर आया था। मंटू मामा के दोस्त सूरज मामा इंडियन ओवरसिज बैंक के मैनेजर बनकर मुजफ्फरपुर आए थे। जब आप उनके बैंक अपनी साइकिल से जाते थे तो वो आप पर नाराज होते थे। कहते थे, क्या जीजा जी आप स्कूटर तो ले ही सकते हैं। पर आप हंस कर टाल देते थे। पर दो-तीन महीने बाद उन्होंने जबर्दस्ती लोन देकर आपको स्कूटर खरीदवा दिया था। आपने भी इस लालच से खरीद लिया था कि दीदी की शादी में दहेज दे देंगे।
आपने तो सिर्फ दो दिन ही चलाने की कोशिश की। फिर न तो आपने सीखने की चाहत दिखाई और न ही हमने फोर्स किया। क्योंकि हम आजादी से स्कूटर उड़ा सकते थे। आपने भी कभी हमें नहीं टोका। आप अपनी साइकिल पर ही मस्त रहे। हां इतना जरूर था कि आपकी डेली रुटीन बन गई थी कि अपनी साइकिल के साथ स्कूटर को चमकाना। आपको इस बात की चिंता रहती थी कि स्कूटर पुरानी न हो जाए, नहीं तो दहेज में कौन लेगा।
स्कूटर आने के बाद आपको सुबह-सुबह स्टेशन छोड़ने के लिए हमारा सुबह जागने का सिलसिला शुरू हो गया था। पर कई बार आप ठंड को देखते हुए मना भी कर देते थे। पैदल ही निकलने के लिए तैयार हो जाते थे। पर स्कूटर आने के बाद मैंने और भईया ने कभी आपको पैदल नहीं जाने दिया। भईया तो कई बार आपको रात में स्टेशन से लेने भी पहुंच जाता था। मुझे रात में जाने की इजाजत नहीं होती थी। पर आपने कभी न छोड़ने की बात कही और न स्टेशन से लेकर आने का आॅर्डर दिया। आपका ही दिया संस्कार है कि हम सभी में आज भी वो प्यार और सम्मान कायम है। हम एक दूसरे से इतनी दूर होकर भी एक अनमोल डोर में बंधे हैं।

हमारी पढ़ाई-लिखाई और हमारे बेहतर भविष्य के लिए आपने जो त्याग किया उसकी कोई कीमत नहीं चुकाई जा सकती है। मुझे आज तक याद नहीं जब आपने कभी मेरे ऊपर हाथ उठाया हो या दीदी को कभी डांटा हो। हां भईया के ऊपर आपका गुस्सा आज भी याद है। जब भईया आपके मना करने के बावजूद उस दिन क्रिकेट खेलने चला गया था। वहां उसके नाक पर चोट आई थी। प्रमोद चाचा ने उसे डॉक्टर से दिखलाया और घर ले आए। चोट के कारण भईया को दर्द काफी हो रहा था और उसे सुला दिया गया था। चुंकि शाम का वक्त था और मच्छर काफी थे इसीलिए दीदी ने मच्छरदानी लगा दी थी। मां को तो जितना कुछ कहना था   उन्होंने कह दिया था पर हम सभी आपके आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। हमें नहीं पता था कि दवाई लाने जा रहे प्रमोद चाचा ने आपको पूरे प्रकरण की जानकारी पहले ही दे दी है। आप घर में घुसते ही भईया पर चिल्लाए और उसके रूम में जाकर मच्छरदानी के ऊपर से चप्पलों की बरसात कर दी। आपको भी पता था कि मच्छरदानी के ऊपर से चोट नहीं लगने वाली, लेकिन मां के शब्दवाण से बचने के लिए आपने अपना रौद्र रूप दिखाया। फिर शांत हो गए। मैं और दीदी एक दूसरे को देखकर मन ही मन मुस्करा रहे थे और भईया तो ऐसे बन रहा था कि उसे जैसे कुछ पता ही नहीं अभी-अभी क्या हुआ। पापा आपके गुस्से में भी आपका प्यार हमें संबल देता है।

आपने अपनी जिंदगी में जितना संघर्ष किया उसका अंश मात्र भी हम कर लें तो बहुत होगा। आज भी आपसे बात किए हमें कई-कई दिन हो जाते हैं। मां से ही बात होती है। पर हमें पता है मां आपको सबकुछ बताती है और हम भी आपके बारे में मां से ही पूछ लेते हैं। ऐसा क्यों है यह आज तक समझ नहीं पाया। पर यह भी सच ही है कि बेटी पापा से और बेटे मां से ज्यादा करीब होते हैं।

पाप आज आपके और मां के लिए जब मैंने सेकेंड एसी का टिकट कटवाया तो मां बिगड़ने लगी। कहने लगी क्या जरूरत थी सेकेंड एसी की, थर्ड एसी से ही चले जाते। क्यों बेकार में ज्यादा पैसे खर्च कर दिए। कहने को तो मैं मां को बहुत कुछ कहता पर इतना ही कह पाया कि बहुत संघर्ष किए हैं तुमने और पापा ने अपनी जिंदगी में। अब जब सबकुछ से निश्ंिचत हो गई हो तो क्या हो गया अगर तुमने सेकेंड एसी में सफर कर लिया। मां का जवाब भी सुन लीजिए उन्होंने क्या कहा, हमारा क्या हम तो तुम लोगों के लिए ही जी रहे हैं। मां ने यह कह तो दिया पर मुझे आपका और मां का मेरे, भैया और दीदी के लिए किया गया त्याग, तप और संघर्ष ऐसा है, जिसका ऋण कभी नहीं चुकाया जा सकता। लव यू पापा। आपका और मां का साया जबतक हमारे साथ है हमारे साथ कभी बुरा नहीं हो सकता। आज हम जो कुछ भी हैं आपके द्वारा दिए गए संस्कार, प्यार और विश्वास की बदौलत हैं। थैंक्स आपने हमें इतनी बेहतर जिंदगी दी।

Friday, June 19, 2015

तो मत करिए योग, कोई जबर्दस्ती तो नहीं

हर तरफ योग की चर्चा है। ऐसा लग रहा है विश्व योग दिवस के रूप में हम एक ऐसे युग में प्रवेश करने जा रहे हैं जहां सभी स्वस्थ होंगे। हेल्दी होंगे, फिट होंगे, तंदरुस्त होंगे, जो भी आप कह लें, वे सब होंगे। पर इन सबके होने के बीच विरोध के स्वर इस तरह उठ रहे हैं जैसे कोई आपसे जबर्दस्ती कर रहा हो। क्या सच में कोई जबर्दस्ती किसी से कोई काम करवा सकता है। यह जानते हुए भी कि यह चीज आपकी भलाई के लिए है, फिर भी हम कहां मानते हैं।

हर महीने भारत में हजारों लोग रोड एक्सीडेंट में सिर्फ इसलिए मर जाते हैं क्योंकि उन्होंने हेल्मेट नहीं पहनी होती है। कुछ ऐसा ही आंकड़ा फोर व्हीलर वालों के साथ है। सीट बेल्ट न बांधने के कारण रोड एक्सीडेंट के दौरान मरने वालों की संख्या अधिक होती है। ओवर स्पीड गाड़ी न चलाएं, रेड लाइट क्रॉस न करें न जाने कितने नियम कायदे बने हैं। ये सभी हमारी सुरक्षा के लिए ही बने हैं। पर जरा मंथन करिए। हममें से कितने लोग हैं जो इसे हमारी सुरक्षा मान कर पहनते हैं या पालन करते हैं। यह हम सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि हमारे अंदर पुलिस का थोड़ा बहुत डर रहता है। पुलिस के चालान से बचने के लिए हम हेल्मेट पहनते हैं, सीट बेल्ट बांधते हैं।

हम यह जानते हैं कि हेल्मेट न पहनने का क्या-क्या नुकसान हो सकता है। कैसे कोई कीड़ा अचानक से हमारे चेहरे से टकराकर हमें घायल कर सकता है। कैसे हवा के झोंकों के साथ कोई नुकिली चीज हमारे चेहरे और आंख से टकराकर हमें अंधा बना सकती है। कैसे सूर्य की तेज रोशनी में हमारा सिर गर्म होकर तपने लगता है। पर हमें इससे ज्यादा फिक्र इस बात की होती है कि हमारे रेशमी बाल न खराब हो जाएं। अगर पुलिस के चालान का डर न हो तो शायद ही कोई हेल्मेट पहने। हेल्मेट बनाने और बेचने वाले चाय और पान की दुकान खोलने को मजबूर हो जाएं।  चालान का डर न हो तो सीट बेल्ट बांधना तक नहीं आएगा किसी को। रेडलाइट का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। हर चीज हमारी सुरक्षा और हमारी सुविधा के लिए ही है। पर फिर भी हमें इसे मानने के लिए कड़े नियमों की जरूरत है। हम मानते नहीं हैं, हमें मनाना पड़ता है। वह भी जबर्दस्ती। डंडे की जोर पर।

ऐसे में अगर किसी ने योग करने की बात कह दी तो क्या बुरा किया। कोई आपको आपके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का प्रयास कर रहा है। बता रहा है कि हजारों रुपए जिम में फेंकने के बजाय अगर थोड़ा वक्त योग के लिए निकाल लिया जाए तो हम कितने स्वस्थ रह सकते हैं। पर हमें इसमें भी राजनीति नजर आने लगती है। भाई जब आप अपने सिर और अपने जान की सुरक्षा के लिए भी नियमों में बंधे हैं तो फिर यह कैसी दलील की आपसे योग जबर्दस्ती करने को कहा जा रहा है। एक वक्त था जब भारत को योगियों और जोगियों का देश कहा जाता था। पर अब इसी योग ने वैश्विक पहचान कायम कर ली है। भारत के हजारों बाबाओं का रोजगार इसीलिए दिन दुनी राज चौगुनी प्रगति कर रहा है क्योंकि उनके विदेशी भक्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पश्चिमी सभ्यता में योग को जिंदगी का सबसे अहम अंग मान लिया गया है।

मेडिशन एस्क्वॉयर में प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी जब भाषण दे रहे थे तो निर्जला व्रत पर थे। नवरात्र चल रहा था। तमाम जगहों पर नरेंद्र मोदी गए पर अन्न और जल ग्रहण नहीं किया। विदेशी अखबारों ने नरेंद्र मोदी के इस तप पर विशेष आर्टिकल लिखा। बताया कि कैसे एक प्रधानमंत्री योग के दम पर इतनी शक्ति प्राप्त कर लेता है कि दस दिन बिना रुके, बिना थके अपना काम करता है। यह योग और विकास के बीच की कड़ी नहीं तो क्या है।
हरिद्वार और ऋषिकेश में आपको हर दिन हजारों विदेशी पर्यटक मिल जाएंगे। अगर उनसे बात करने का मौका मिले और उनसे आप पूछें कि भारत क्यों आए हैं, तो दस में से आठ के जवाब यही मिलेंगे कि ध्यान और योग सीखने। जिस पश्चिमी सभ्यता ने योग को इस तरह आत्मसात करने की दिशा में कदम उठाया है वहीं हम योग पर टिप्पणी करके इसे नीचा दिखाने का प्रयास करते नजर आते हैं।  योग को भी धर्म के बंधन में बांध कर कुछ तथाकथित सेक्यूलर लोगों ने एक ऐसा उदाहरण पेश किया है जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है।

आप पर योग करने के लिए नियमों की बंदिशें तो नहीं लगाई जा रही है। सूर्य नमस्कार करने के लिए जेल में डालने की तो धमकी तो नहीं दी रही है। सुबह सैर पर निकलने के लिए आपको घर से तो नहीं निकाला जा रहा है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर घबराने की क्या जरूरत है। आप मत जाइए योग करने, कोई जबर्दस्ती तो नहीं है। हेल्मेट नहीं लगाइए आपकी मर्जी। सीट बेल्ट मत बांधिए आपकी च्वाइस। योग मत करिए आपका मन। पर एक बार मंथन जरूर करिए, क्या हमारी जिंदगी और इससे जुड़ी सुरक्षा सिर्फ नियमों में बांध कर ही होनी चाहिए।