Friday, May 29, 2015

सॉरी बापू, तुम ही चले जाओ यहां से

जिस राष्टÑपिता महात्मा गांधी ने ताउम्र शराबबंदी की खिलाफत की, उसी राष्टÑपिता की प्रतिमा को शराब के बार के लिए अपमानित होना पड़ा है। आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले में प्रशासन के एक फैसले ने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। दरअसल बार के ठीक सामने महात्मा गांधी की प्रतिमा लगी थी। करीब 27 साल पहले स्थापित इस प्रतिमा के सामने बार खोल दिया गया था। कुछ दिनों से वहां के समाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग बार का विरोध कर रहे थे। प्रशासन से गुहार लगाई गई। बताया गया कि जिस व्यक्ति ने उम्र भर शराब का विरोध किया उसी की प्रतिमा के सामने बार खोलना उनका अपमान है। तत्काल बार को कहीं और शिफ्ट किया जाए। पर प्रशासन ने न जाने किन कारणों से बापू की प्रतिमा को ही वहां से हटवा दिया।
स्थानीय प्रशासन ने मीडिया में बयान दिया है कि महात्मा गांधी की प्रतिमा को कहीं और स्थापित कर दिया जाएगा। अब यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुका है कि ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि बार को हटाने की बजाय गांधी की प्रतिमा को ही शिफ्ट कर दिया गया। मजबूरी चाहे जो भी रही हो, लेकिन इस एक घटना ने सिद्ध कर दिया है कि आज शराब माफियाओं की पकड़ कहां तक है। कैसे उनके हितों को सुरक्षित रखने के लिए तमाम सरकारी प्रयास किए जाते रहते हैं। चाहे ठेके के आवंटन की प्रक्रिया हो या बार को लाइसेंस देने का मामला, हर जगह शराब माफियाओं ने अपनी पकड़ बना रखी है। देश के कई हिस्सों में आए दिन शराब के ठेकों और दुकानों को लेकर विरोध प्रदर्शन होता रहता है। कहीं स्कूलों के आसपास ठेका खोल दिया जाता है, कहीं मंदिर के पास।
ऐसा तब है जबकि सुप्रीम कोर्ट की रुलिंग है कि स्कूल, कॉलेज, मंदिर आदि के सौ मीटर के दायरे में शराब के ठेके नहीं खोले जा सकते हैं। बावजूद इसके प्रशासन द्वारा धड़ल्ले से लाइसेंस जारी कर दिए जाते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि ठेकों का फीजिकल वैरिफिकेशन करवाया जाए। लाइसेंस जारी करने से पहले यह देखा जाना चाहिए कि किस जगह पर ठेका खोला जा रहा है। इससे क्या प्रभाव पड़ सकता है। कुछ राज्यों में ऐसा सख्त प्रावधान भी है। पर अधिकतर राज्य इसके प्रति सजग नहीं हैं। प्रशासनिक शह पाकर शराब माफियाओं के हौसले बुलंद रहते हैं। यह भी सच्चाई है कि हर साल शराब के ठेकों के आवंटन से सरकार को करोड़ों रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। पर क्या इस शर्त पर हम कुछ ऐसा भी कर सकते हैं जो सरासर गलत है। यह मंथन का वक्त है।
हर राज्य की अपनी आबकारी नीतियां होती हैं। समय-समय पर इसमें संशोधन भी होते रहते हैं। पर अमूमन ये संशोधन राजस्व से जुड़े होते हैं। बेस प्राइस से लेकर स्टॉक प्राइस पर बातें होती हैं। पर कभी इससे जुड़ी विसंगतियों पर सरकार अपनी नीतियों में मंथन नहीं करती है। कभी इन विसंगितयों को दूर करने के लिए पॉलिसी बनाने पर विचार नहीं किया जाता।  अगर कोई गांव शराब बंदी के खिलाफ पूरी तरह एकजूट है फिर क्यों उस गांव के लिए भी ठेके आवंटित कर दिए जाते हैं? क्या इसे लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं माना जाना चाहि? आबकारी नीतियों में संशोधन की प्रक्रिया अनवरत जारी है। कभी राजस्व से ऊपर जाकर भावनाओं के बारे में भी नीतियों का जिक्र किया जाना चाहिए। हर राज्य को शराब के ठेकों, दुकानों पर कुछ ऐसी नीतियों का भी एलान करना चाहिए जिसका आम लोग स्वागत कर सकें।
आज भी भारतीय समाज में शराब पीने को खराब नजर से देखा जाता है। उच्च मध्यमवर्गीय परिवार या एलिट परिवार की बात को छोड़ दिया जाए तो आम मध्यम वर्गीय परिवार में इसे छिप छिपाकर परोसा जाता है। शराब की दुकानों से शराब खरीदने के बाद अखबार या लिफाफे में छिपाकर ले जाने की जरूरत पड़ी है। ऐसी स्थिति में क्या सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि ठेके के परमिशन देने वक्त, या दुकानों का आवंटन करते वक्त जिम्मेदारी पूर्वक यह देखे कि यह कहां स्थापित किया जा रहा है। शराबबंदी को लेकर हजारों आंदोलन हो चुके हैं। बावजूद इसके सरकारी तंत्र की इस दिशा में सुस्ती गंभीर स्थिति पैदा होने का संकेत दे रही है। आंध्रप्रदेश में जो कुछ भी हुआ, भले ही इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। प्रशासन के अपने तर्क या कुतर्क हो सकते हैं। पर इस एक ताजी घटना ने मंथन करने पर मजबूर कर दिया है कि अभी भी वक्त है हमारी राज्य सरकारें शराब की दुकानों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाए। ताकि भविष्य में होने वाली ऐसी शर्मिंदगी भरी घटनाओं से बचा जा सके।


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